जब 'दृष्यम्' में इतना थ्रिल है, तो पक्का जबरदस्त उपन्यास होगा ' द
डिवोशन ऑफ़ सस्पेक्ट X '. आखिर जापान के अपराध-लेखक कइगो हिगाशिनो के इस
नॉवेल से प्रेरित होकर ही तो निशिकान्त कामत ने इस फिल्म का निर्माण किया
है। इस पर आज सुबह टाइम्स ऑफ़ इण्डिया में छपे रिव्यू और फिर चौकसे जी की
समीक्षा पढ़ने के बाद दृश्य सोचा ही था, कि दीप दा का मोबाइल आ गया, कि आओ
चलें।
फिल्म देखकर लगा, कि वस्तुतः भारतवर्ष की सोच पक्के तौर पर
जापान की सोच से अलहदा है. वहां के साहित्य में इल्लूसियनिस्म दिखाई देता
है। लगता है इसीलिए जापानियों का मायालोक हमारे यहाँ के खड़ंजा की भांति
है। हम पक्की सड़क पर भी गिरते हैं और वे खड़ंजा पर दौड़कर भी 'रेड बेल्ट' तक
पहुँचते हैं। 'दृश्यम' में अनेक चित्ताकर्षक और मोहक चित्र हैं जो प्रकृति
की सुंदरता को अनावृत्त करते हैं. लेकिन जो सबसे बड़ी बात है वह है व्यक्ति
का अपने परिवार की सुरक्षा के प्रति उत्तरदायित्त्व और परिवार का भी अपने
मुखिया से इस प्रकार सम्पृक्त हो जाना कि आँखों के भाव से ही वे अपने
कर्त्तव्य-बोध से जड़ित हो जाएं। फ़िल्म का नायक विजय सालगांवकर अपनी पत्नी
और २ बेटियों के छोटे-से परिवार के साथ खुशहाल है। सीमित आय में छोटी-छोटी
खुशियों से ही सही, लेकिन अपने परिवार को वह संस्कारों के आलोक में दीप्त
रखने की कोशिशों में लगा रहता है। सच्चाई, ईमानदारी, नेकनियती उसकी आभा है,
जिसके नेपथ्य में उसकी पत्नी-बेटियों का साथ है। यही तो है भारतीयता।
वास्तविक जीवन में भी अजय देवगन की सफलता का राज भी तो उनका 'परिवार' ही
है।
तथाकथित सभ्य समाज का एकलौता चिराग, आईजी सुपुत्र इस कदर
बिगड़ैल और अपसंस्कृति की चपेट में है, कि वह नेचरल स्टडी पर गई विजय की
बेटी का नहाते हुए चोरी से एमएमएस बनाकर उसे ब्लैकमेल करता है। यहाँ तक कि
वह इतना बेख़ौफ़ कि वह उसकी माँ तक की भावनाओं को मर्माहत कर मनमानी पर उतारू
है। जिसकी परिणति उसकी हत्या से होती है, जो अप्रत्याशित रूप से विजय की
बेटी के हाथों हो जाती है। यहीं से शुरू होता है थ्रिल जिसमें विजय अपने
और परिवार के बचाव में इलूश़न रचता है। गज़ब का इलूश़न! पोलिस चकरघिन्नी बन
जाती है। सब समझते भी आईजी साहिबा बेबस हैं। नटवरलाल भी फेल। अंततः वे
हथ्यार डाल देती हैं। यहाँ मानवीयता का रूप उभरता है। विजय का आईजी से
माफ़ीनामा सबूत है कि उसके मन में कहीं-न-कहीं इसे लेकर पश्चात्ताप तो है
लेकिन पोलिस अभी भी उसे फांसने की जुगत में है।
यह मूवी कई आयाम तो
देती है, लेकिन कई पश्न भी छोड़ती है। क्या समाज में सभ्यता का आवरण ऐसा
होगा जिसमें बेटे बिगड़ैल बनें? स्वछन्द होकर दूसरे की बच्चियों को
बेईज्ज़त करें और बेटियां बेचारी मज़बूरी के आवरण में सिसकती रहें ? क्या करे
पिता?
मूवी में वे दो बेटियां, विशेषकर छोटी ने तो कमाल ही कर
दिया! विजय की पत्नी की सरलता का अभिनय भी प्रशंसा को मज़बूर करता है। और
तब्बू के क्या कहने! आँखों में ममत्व का पानी और चेहरे पर पुलिस ऑफिसर की
दृढ़ता एक साथ साधना मज़ाक नहीं, जिसे उन्होंने कर दिखाया। बेहतरीन।