Thursday, 27 August 2015

  खुशी 

उदास था मैं
कि दिखी
रो रही फूल-सी बच्ची
उठा लिया गोद में
उसके रूई-से गालों  
और गुलाबी अधरों को
हौले-से थपकाया
जैसे मिली हो दस्तक
उसके हृदय-द्वार पर
खोए पिता की
लग गई सीने से
हिचकना बंद उसका
हमारी उदासी
बदल गयी पल में
खुशियों से सराबोर हो गए दोनों

Sunday, 23 August 2015

                                           मौन-सौन्दर्य

     सोचता हूँ, भाषा न होती तो ? देखिए मूक पशुओं को, भावनाओं को कितना सुन्दर एक्सप्रेस करते हैं वे। अभी उसी दिन नीतीश बता रहा था कि वह पढ़कर आ रहा था। न्यू बसंत टॉकीज़ के सामने देखा कि रेल्वे क्रासिंग को भैसों के झुण्ड में एक भैंस अपने पाड़ा के साथ पार कर रही है। इसी बीच ट्रेन आ गई और उसकी जद में पाड़ा आ गया। छितरा गया बेचारा। मज़मा लग गया। भीड़ देख शेष भैंसें तो तितर-बितर हो गईं लेकिन उसकी माँ भैंस वहीं ट्रैक के पास बैठ गई। चुप अपने उस टुकड़े को देख रही है, जो कुछ देर पहिले ही उसकी थन से लगा आगे-पीछे हो रहा था। उसकी आँखों से अविरल धार बहने लगीं।
अभी उसी दिन मैत्री बाग़ में एक मृगछौना अपनी हिरणी माँ की पीठ अपनी निकल रही सींगों से ऐसे रगड़ने लगा कि वह उठ खड़ी हुई और लगी उसे दौड़ाने, मानो एक माँ अपने बच्चे को दण्ड देना चाहती हो। वह भी काम नहीं, छकाने लगा और अन्त में आकर लिपट गया जैसे मुआफ़ी मांग रहा हो। वह भी चाटने लगी उसे। यह मातृ-स्नेह का कैसा एक्सप्रेसन है। है न ?
अलगनी पर बैठी उस कपोती को देखा, कैसे तो बगल में प्रेंखादोला कर रहे कपोत के चिबुक को उसने अपने चंचु से सहलाया। जाने कौन सी भाषा थी कि फौरन दोनों उड़ गए, जैसे प्रणय में मगन होकर उड़े हों।
तो इन भाषाहीनों को देखिए। कितनी सुन्दर अभिव्यक्ति है इनकी। है कि नहीं ?
हमारे पास तो भाषा का वरदान है। एक-से-एक भाषा। इंटरनेशनल लैंग्वेज़ से लेकर अपनी राजभाषा हिन्दी, फिर उससे भी ऊपर अपनी मिट्टी की भाषा, याने मातृभाषा। इसके बाद भी क्या हम उन मूक पशु-पक्षियों से गलीच नहीं ? मौन-सौन्दर्य हमें उनसे सीखना चाहिए। है न?

Saturday, 8 August 2015

                                                       भोर और संध्या  

भोर से प्रेम का तात्पर्य यह तो नहीं, कि हम संध्या का आलिंगन ही विस्मृत कर दें। आखिर वह भी तो हमें बहुत कुछ समर्पित करती है। मानते हैं, कि भोर हमें नवोन्मेष से भर देता है। एक ताज़गी, स्फूर्ति और नई सोच के साथ हर दिन सूरज उदित होता है। लेकिन यही सूरज चंद घंटों में कैसा तो रौद्र रूप धरता जाता है। फुल ग्लेयरिंग में कितना परेशान करता है वह।
बेचारी उस संध्या को तो देखिए। कितने हौले-से दस्तक देती है। दिन भर जलने के बाद भी उसकी नज़ाकत। जरा निकलकर देखिए तो उसका नज़ारा। किस मन्द समीर के साथ वह हममें भीतर तक समा जाना चाहती है मानो कहती हो, चलो न जी , कुछ गुनगुनाओ भी हमारे साथ। वह भोर यदि आपको दूध में ब्रेड डुबाकर खिलाने को आमन्त्रित करता है, तो मैं भी तो चाय में टोस्ट का आनन्द देने को तत्पर रहती हूँ।  फिर वह स्निग्ध-शीतल चंदा के दर्शन भी कराती है जिसके ग्लोरी की अपनी ही छटा है। इससे हम प्यार की परिभाषा सीख सकते हैं।
वास्तव में संध्या का स्नेह तो भोर से कहीं ज्यादे है। वह शीतल से शीतलता की चलती है. इतनी कि यदि उसके साथ चलते रहे तो वह शान्त-शीतल चाँदनी की गोद में लिए चलेगी। उजली रात में उसके साथ एकांत में बैठकर आप कविता लिख सकते हैं। अम्मा-बाबूजी की यादों में दो बूँद चुआ सकते हैं। प्रियतमा को उलाहना दे सकते हैं और बच्चों के साथ खेल भी सकते हैं। अंधेरी रात हो तो भी अपनी बच्ची को पेट पर लिटाए उसे लोरी सुना सकते हैं. उसके विवाह और विदाई की कल्पना कर रो सकते हैं।
शायद यही वजह है, कि भोर में पंछी की चहचहाहट से मधुर होता है संध्या-काल का उनका कलरव . इसीलिये गिलहरी का फुदकना, तितली का फरफराना भाता है। बच्चे भी तो इसी संध्या पर लहालोट रहते हैं। पतंग के पीछे भागना। चिड्डा-तितली पकड़ने दौड़ना। फ्राक के पीछे बुशर्ट का दौड़ना...आखिर यही संध्या तो उन्हें ललचाता है न ? और वे भागे चले आते हैं।
भोर हमें शक्ति देता है तो संध्या शान्ति। यही जीवन का फलसफा है। इसी को कहते हैं भारतीयता।

Saturday, 1 August 2015

जब 'दृष्यम्' में इतना थ्रिल है, तो पक्का जबरदस्त उपन्यास होगा ' द डिवोशन ऑफ़ सस्पेक्ट X '. आखिर जापान के अपराध-लेखक कइगो हिगाशिनो के इस नॉवेल से प्रेरित होकर ही तो निशिकान्त कामत ने इस फिल्म का निर्माण किया है। इस पर आज सुबह टाइम्स ऑफ़ इण्डिया में छपे रिव्यू और फिर चौकसे जी की समीक्षा पढ़ने के बाद दृश्य सोचा ही था, कि दीप दा का मोबाइल आ गया, कि आओ चलें।
फिल्म देखकर लगा, कि वस्तुतः भारतवर्ष की सोच पक्के तौर पर जापान की सोच से अलहदा है. वहां के साहित्य में इल्लूसियनिस्म दिखाई देता है। लगता है इसीलिए जापानियों का मायालोक हमारे यहाँ के खड़ंजा की भांति है। हम पक्की सड़क पर भी गिरते हैं और वे खड़ंजा पर दौड़कर भी 'रेड बेल्ट' तक पहुँचते हैं। 'दृश्यम' में अनेक चित्ताकर्षक और मोहक चित्र हैं जो प्रकृति की सुंदरता को अनावृत्त करते हैं. लेकिन जो सबसे बड़ी बात है वह है व्यक्ति का अपने परिवार की सुरक्षा के प्रति उत्तरदायित्त्व और परिवार का भी अपने मुखिया से इस प्रकार सम्पृक्त हो जाना कि आँखों के भाव से ही वे अपने कर्त्तव्य-बोध से जड़ित हो जाएं। फ़िल्म का नायक विजय सालगांवकर अपनी पत्नी और २ बेटियों के छोटे-से परिवार के साथ खुशहाल है। सीमित आय में छोटी-छोटी खुशियों से ही सही, लेकिन अपने परिवार को वह संस्कारों के आलोक में दीप्त रखने की कोशिशों में लगा रहता है। सच्चाई, ईमानदारी, नेकनियती उसकी आभा है, जिसके नेपथ्य में उसकी पत्नी-बेटियों का साथ है। यही तो है भारतीयता। वास्तविक जीवन में भी अजय देवगन की सफलता का राज भी तो उनका 'परिवार' ही है।
तथाकथित सभ्य समाज का एकलौता चिराग, आईजी सुपुत्र इस कदर बिगड़ैल और अपसंस्कृति की चपेट में है, कि वह नेचरल स्टडी पर गई विजय की बेटी का नहाते हुए चोरी से एमएमएस बनाकर उसे ब्लैकमेल करता है। यहाँ तक कि वह इतना बेख़ौफ़ कि वह उसकी माँ तक की भावनाओं को मर्माहत कर मनमानी पर उतारू है। जिसकी परिणति उसकी हत्या से होती है, जो अप्रत्याशित रूप से विजय की बेटी के हाथों हो जाती है। यहीं से शुरू होता है थ्रिल जिसमें विजय अपने और परिवार के बचाव में इलूश़न रचता है। गज़ब का इलूश़न! पोलिस चकरघिन्नी बन जाती है। सब समझते भी आईजी साहिबा बेबस हैं। नटवरलाल भी फेल। अंततः वे हथ्यार डाल देती हैं। यहाँ मानवीयता का रूप उभरता है। विजय का आईजी से माफ़ीनामा सबूत है कि उसके मन में कहीं-न-कहीं इसे लेकर पश्चात्ताप तो है लेकिन पोलिस अभी भी उसे फांसने की जुगत में है।
यह मूवी कई आयाम तो देती है, लेकिन कई पश्न भी छोड़ती है। क्या समाज में सभ्यता का आवरण ऐसा होगा जिसमें बेटे बिगड़ैल बनें? स्वछन्द होकर दूसरे की बच्चियों को बेईज्ज़त करें और बेटियां बेचारी मज़बूरी के आवरण में सिसकती रहें ? क्या करे पिता?
मूवी में वे दो बेटियां, विशेषकर छोटी ने तो कमाल ही कर दिया! विजय की पत्नी की सरलता का अभिनय भी प्रशंसा को मज़बूर करता है। और तब्बू के क्या कहने! आँखों में ममत्व का पानी और चेहरे पर पुलिस ऑफिसर की दृढ़ता एक साथ साधना मज़ाक नहीं, जिसे उन्होंने कर दिखाया। बेहतरीन।