भोर और संध्या
भोर से प्रेम का तात्पर्य यह तो नहीं, कि हम संध्या का आलिंगन ही विस्मृत कर दें। आखिर वह भी तो हमें बहुत कुछ समर्पित करती है। मानते हैं, कि भोर हमें नवोन्मेष से भर देता है। एक ताज़गी, स्फूर्ति और नई सोच के साथ हर दिन सूरज उदित होता है। लेकिन यही सूरज चंद घंटों में कैसा तो रौद्र रूप धरता जाता है। फुल ग्लेयरिंग में कितना परेशान करता है वह।बेचारी उस संध्या को तो देखिए। कितने हौले-से दस्तक देती है। दिन भर जलने के बाद भी उसकी नज़ाकत। जरा निकलकर देखिए तो उसका नज़ारा। किस मन्द समीर के साथ वह हममें भीतर तक समा जाना चाहती है मानो कहती हो, चलो न जी , कुछ गुनगुनाओ भी हमारे साथ। वह भोर यदि आपको दूध में ब्रेड डुबाकर खिलाने को आमन्त्रित करता है, तो मैं भी तो चाय में टोस्ट का आनन्द देने को तत्पर रहती हूँ। फिर वह स्निग्ध-शीतल चंदा के दर्शन भी कराती है जिसके ग्लोरी की अपनी ही छटा है। इससे हम प्यार की परिभाषा सीख सकते हैं।
वास्तव में संध्या का स्नेह तो भोर से कहीं ज्यादे है। वह शीतल से शीतलता की चलती है. इतनी कि यदि उसके साथ चलते रहे तो वह शान्त-शीतल चाँदनी की गोद में लिए चलेगी। उजली रात में उसके साथ एकांत में बैठकर आप कविता लिख सकते हैं। अम्मा-बाबूजी की यादों में दो बूँद चुआ सकते हैं। प्रियतमा को उलाहना दे सकते हैं और बच्चों के साथ खेल भी सकते हैं। अंधेरी रात हो तो भी अपनी बच्ची को पेट पर लिटाए उसे लोरी सुना सकते हैं. उसके विवाह और विदाई की कल्पना कर रो सकते हैं।
शायद यही वजह है, कि भोर में पंछी की चहचहाहट से मधुर होता है संध्या-काल का उनका कलरव . इसीलिये गिलहरी का फुदकना, तितली का फरफराना भाता है। बच्चे भी तो इसी संध्या पर लहालोट रहते हैं। पतंग के पीछे भागना। चिड्डा-तितली पकड़ने दौड़ना। फ्राक के पीछे बुशर्ट का दौड़ना...आखिर यही संध्या तो उन्हें ललचाता है न ? और वे भागे चले आते हैं।
भोर हमें शक्ति देता है तो संध्या शान्ति। यही जीवन का फलसफा है। इसी को कहते हैं भारतीयता।
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