मौन-सौन्दर्य
सोचता हूँ, भाषा न होती तो ? देखिए मूक पशुओं को, भावनाओं को कितना सुन्दर एक्सप्रेस करते हैं वे। अभी उसी दिन नीतीश बता रहा था कि वह पढ़कर आ रहा था। न्यू बसंत टॉकीज़ के सामने देखा कि रेल्वे क्रासिंग को भैसों के झुण्ड में एक भैंस अपने पाड़ा के साथ पार कर रही है। इसी बीच ट्रेन आ गई और उसकी जद में पाड़ा आ गया। छितरा गया बेचारा। मज़मा लग गया। भीड़ देख शेष भैंसें तो तितर-बितर हो गईं लेकिन उसकी माँ भैंस वहीं ट्रैक के पास बैठ गई। चुप अपने उस टुकड़े को देख रही है, जो कुछ देर पहिले ही उसकी थन से लगा आगे-पीछे हो रहा था। उसकी आँखों से अविरल धार बहने लगीं।अभी उसी दिन मैत्री बाग़ में एक मृगछौना अपनी हिरणी माँ की पीठ अपनी निकल रही सींगों से ऐसे रगड़ने लगा कि वह उठ खड़ी हुई और लगी उसे दौड़ाने, मानो एक माँ अपने बच्चे को दण्ड देना चाहती हो। वह भी काम नहीं, छकाने लगा और अन्त में आकर लिपट गया जैसे मुआफ़ी मांग रहा हो। वह भी चाटने लगी उसे। यह मातृ-स्नेह का कैसा एक्सप्रेसन है। है न ?
अलगनी पर बैठी उस कपोती को देखा, कैसे तो बगल में प्रेंखादोला कर रहे कपोत के चिबुक को उसने अपने चंचु से सहलाया। जाने कौन सी भाषा थी कि फौरन दोनों उड़ गए, जैसे प्रणय में मगन होकर उड़े हों।
तो इन भाषाहीनों को देखिए। कितनी सुन्दर अभिव्यक्ति है इनकी। है कि नहीं ?
हमारे पास तो भाषा का वरदान है। एक-से-एक भाषा। इंटरनेशनल लैंग्वेज़ से लेकर अपनी राजभाषा हिन्दी, फिर उससे भी ऊपर अपनी मिट्टी की भाषा, याने मातृभाषा। इसके बाद भी क्या हम उन मूक पशु-पक्षियों से गलीच नहीं ? मौन-सौन्दर्य हमें उनसे सीखना चाहिए। है न?
No comments:
Post a Comment