Saturday, 3 October 2015

घरौंदे से निकला और शरीफा-अमरुद की ओर देखता बढ़ा, कि जैसे महीन आवाज़ में किसी ने पुकार लगाई, 'कभी इस ओर भी नज़रें इनायत हों हुज़ूर।'
पीछे मुड़ा। अरे, घृतकुमारी ! तो इसके बोल हैं ये। खामोश खड़ी है, लेकिन इसका हरापन तो देखो। तरी न मिलने से और पौधे पियरा रहे हैं। लेकिन ये है, कि बेचारी पानी मिले-न-मिले, अपनी प्राकृतिक सुषमा नहीं भूलती। लहलहाती रहती है।
उसका मर्म समझ पहुंचे पास। बेचारी झूम उठी। उसके तने तन गए। इसी में मन्द बयार बही और वह इसका लाभ हमको छूने में लेने को आतुर हुई। जैसे कह रही हो, आइए. अमरुद-शरीफा से कम न समझिए हमें।
बैठ गए पास उसके। तने पर हाथ फिराने की कोशिश की, तो उस पर के काँटों की पंक्तियों ने सावधान कर दिया। हमने उलाहना दिया, 'तेरे तन पर कांटे-ही-कांटे, फिर क्यों तुझे लेकर चाटें ?'
वह खिलखिलाई, 'क्या कह रहे हैं !'
'और नहीं तो क्या ? छूते ही प्रेम की जगह कांटे मिलें तो क्या कहूँ?'
'तब आपने पहिचाना ही नहीं हुज़ूर। हमें एलोवेरा के नाम से भी लोग पहिचानते हैं। हमारे ऊपर चाहे कांटें हों, लेकिन भीतर उतनी ही स्निग्धता-तरलता और मिठास है।'
'अच्छा!'
'जी हाँ, चमड़ी के रोग में हमारा बहुत उपयोग है। फिर पेट-रोगों में भी रामबाण औषधि से कम नहीं। चेहरा चमकाने के लिए भी लोग हमारे जेल का उपयोग करते हैं। इसका जूस बनाकर पीते हैं। अनेकों तरह से प्रयोग होता है हमारा।'
'ओ! अच्छा!'
'जी हाँ,  अभी कल ही भोर में बीवी जी ने हमारे एक तने से गुद्दा निकालकर खाया था। बाबू लोग भी गाहे-बगाहे हमारे तने को छीलकर चहरे पर मलते ही हैं। आपने भी तो प्रयोग किया है हमारा, फिर क्यों ऐसी रुखाई सरकार?'
'रे पगली, तू क्या सोचती है? तेरा दर्द हम नहीं समझते ?'
'बताइए ज़रा हमारे आसपास के उन सारे पौधों को खूब तरी मिलती है, लेकिन हमें ?' उसकी बात में दम तो है। हम चुप रहे। उसने आगे बोला, 'सूरज से रोज लड़ती हूँ, लेकिन मुर्झाती नहीं। अविचल रहती हूँ।'
'नहीं-नहीं, घृतकुमारी। तुम न इतना सोचो। सच है, तुम बहूपयोगी हो। इसीलिए तो तुम्हें लोग गमले तक में सजाने लगे हैं। '
वह चुप हो गई, जैसे रूठ गयी हो। धीमे-से हथेली का स्पर्श कर उसे सहलाया और होंठों को तने तक ले गया कि चाहे होंठ फट ही क्यों न जाएँ। आज इसकी शिकायत दूर ही कर दूँ। किन्तु ये क्या! इसमें से तो कुछ तरलता टपक रही है जो लार के सामान मुँह में घुल गया। आहा ! क्या तो स्वाद है !
उसने चहकते हुए कहा, 'अच्छा लगा?'  हमारी खुशी को देख मानों उसके रूप में हमारी ही बच्ची चहकी हो।
'सच, घृतकुमारी तुम अनमोल हो। तुम सुन्दर ही नहीं सुन्दरता का सन्देश देने वाली वह सेविनी भी हो जो खुद मिटकर दूसरों को जीवन देता है।'
वह लहक उठी खुशी से।
'और सूरज से तुम्हारी हर दिन की लड़ाई और तुम्हारी जीत यह भी सन्देश देती है कि कितने भी दुर्दिन हों, हमें घबराना नहीं चाहिए। विपत्तियों से लड़कर धीरज के साथ रहकर ही हमें सुख और शान्ति मिलती है। घृतकुमारी तुमसे प्रेम करते हैं हम, वही प्रेम जो एक पिता अपनी बच्ची से करता है। तुम खुश रहो। अब हम तुम्हें रोज निहारकर ही निकला करेंगे। ठीक ? तो निकलें ?
लो नीतीश इंतज़ार कर रहा है। अब आने के बाद लड़ना तुम उससे।          

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