Wednesday, 30 September 2015

कुछ भी कहें, सांस्कृतिक संकट के इस दौर में जहाँ दिल्ली के बेहतरीन राष्ट्रीय संग्रहालय के सूने पड़े रहने का रोना है, वहीं अपुन के भिलाई की सांस्कृतिक गतिविधियों के केन्द्रों में बहुत नहीं, तो कुछ चहल-पहल तो रहती ही है। चाहे सेक्टर-१ के नेहरू सांस्कृतिक सदन की बात करें अथवा सिविक सेण्टर स्थित नेहरू आर्ट गैलरी, या फिर कला मंदिर की ; इन स्थलों पर कुछ-न-कुछ होता तो दिखता ही है। हाँ, यह ज़रूर है कि पहले से अवमूल्यन तो हुआ ही है. वर्ना देखिए सुब्रत दादा को, हबीब तनवीर को, प्रेम साइमन को..किस-किस का नाम लें। अनुराग बासु ने तो 'बर्फी' को ऑस्कर के दरवज्जे ले जा कर भिलाई को रोशन ही कर दिया तो 'सखी सइयां तो खूब ई कमात हैं महंगाई डायन खाय जात है' में अपने नत्था ने भिलाई को नई ऊंचाइयां दीं। लेकिन कोई करे क्या ? संस्कार सिमट रहे हैं फिर भला कोई संस्कृति के बारे में सोचे भी कैसे। लेकिन फ़ख्र है कि अपनी सांस्कृतिक शून्यता में नहीं है। सेक्टर-१ नेहरू सांस्कृतिक सदन में आज भी रंगकर्मियों की गहमागहमी देखी जा सकती है। नाट्य संस्थाएं रिहर्सल में दिखती हैं। कल ही उभरते युवा अभिनेता अभिलाष ने शहीद भगत सिंह पर नाट्य मंचन की सूचना दी थी। अभी कुछ महीने पहिले ही रामहृदय तिवारी और अतृप्त आनन्द की नाट्य प्रस्तुतियों ने हमें अभिभूत कर दिया था। हमारे सहपाठी और रंगकर्म में अच्छा कर रहे कौशल उपाध्याय ने कई प्रतिभाओं को तराशा है। धर्मेन्द्र, हैदर, अर्चना आदि से भी उम्मीदें हैं। मणिमय मुखर्जी से लेकर राजेश श्रीवास्तव तक अनेक लोग भिलाई की सांस्कृतिक विरासत को सँवारने में अपनी ऊर्जा लगा रहे हैं। नेहरू आर्ट गैलरी में विश्व प्रसिद्ध कलाकारों और चित्रकारों की प्रदर्शनियाँ आकर्षण की केन्द्र रहती ही हैं। सिविक सेण्टर कला मन्दिर में लेटेस्ट भारत डाक विभाग ने डाक टिकटों की एक प्रदर्शनी लगाई जहाँ समाजसेवी भिलाई की स्थापना के शिल्पकारों में एक दिवंगत बलवन्त राय जैन पर एक लिफाफा निकाला। भिलाई इस्पात संयंत्र का इस क्षेत्र में योगदान सराहनीय है।
यहाँ सांस्कृतिक गतिविधियाँ बढ़ें और आगे जाएँ। पहिले से उन्नत और ऊंची सोच लेकर नई पीढ़ी आ रही है। उनका स्वागत है। 

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