Saturday, 19 September 2015

पानी 

कहाँ गई वह हिलोर
किल्लोलें भी नहीं
सागर तो हरहरा रहा है
इन्तज़ार कर रहा
तड़प रहा है
तुम्हें आकाश तक ले जाने
लेकिन तुम्हारा पानी
कौन सोख रहा है
मत भूलो सागर को प्यार है
तुमसे
तुम ही हो रूठी
या कि मज़बूर
लौटेगा ज़रूर पानी
कलकल बहती जा मिलोगी
सागर से

No comments:

Post a Comment