सुबह रेलवे स्टेशन पर अकस्मात अनिल मिल गया। २५ वर्षों बाद उसे देखकर हर्षाविर्भाव हुआ। होना ही था। जिसके साथ फायरिंग की, छिपकर समोसे खाए और कॉलेज जाते टेम्पो-ट्रेन में गलमस्ती की वह इतने दिनों बाद वह भी अनायास दिख जाए तो कौन होगा जिसे खुशी न होगी? तो पत्रिका पढ़ने में तल्लीन उसे देख आवाज़ दी हमने। वह नहीं पहिचाना हमें। विस्मय से देखा मानो जानना चाहता हो कि कौन है ये अजनबी। बड़ी गूढ़ आँखों से झाँका हमारे भीतर। उसका देखना ऐसा था कि एक बारगी तो अपुन भी सहम गए, कि भावातिरेक में कहीं आँखें तो न फिसल गईं। फिर यह थोड़ा मुटियाया है, शरीर भी भरा है, डील डौल भी कम नहीं, फिर भी फेस-तो-फेस है, हमने कहा, "अनिल?"
अबकी आवाज़ ने जैसे स्मृति-किवाड़ को खटके से खोल दिया हो उसके।
"अरे! तूँ ?" और लिपट गया वह। काफी देर तक कंधों से लिपटा रहा। बताया कि कोई सुपर फ़ास्ट पकड़ने के चक्कर में उतरा है और थोड़ी देर में आने वाली है वह।
ठीक वही कॉलेज के दिनों वाली जिद करके वह स्टेशन के बाहर के एक होटल में ले आया वहां जलपान मंगाया। बताया कि वह रामानुजगंज में सीएएफ़ में प्लाटून कमाण्डर (पीसी) है। उसने खूब सारी अंतरंग बातों को साझा किया और यह भी बताया कि कैसे छत्तीसगढ़ के घनघोर जंगलों में अपनी पोस्टिंग के दौरान नक्सलियों से लोहा लिया। कई बार वह नक्सलियों से आमने-सामने का वार किया और हर बार भारी पड़ा। उसे वीरता पुरस्कार भी मिला है। वह थोड़ा दुखी था कि मुठभेड़ में नक्सलियों को मार गिराने के बाद भी उसका वीरता पदक पेंडिंग है और फाइलों में धूल खा रहा है। वह जानता है कि दुखी हो कर या तनाव में रहकर कुछ नहीं पा सकता। नक्सलियों की तरह बगावती सोच भी वह प्रजातन्त्र के लिए खतरनाक मानता है। उसे तो देश-प्रेम है। सिस्टम में पोल है तो वो क्या करे ? वह तो अर्जी बढ़ाएगा। हाथ जोड़ेगा और नहीं तो कोर्ट जाएगा। उसे न्याय पर भरोसा है। आँखों की कोर पर हथेली ले जाकर उसने यह कहते विदा लिया,
वतन परस्ती का जज्बा जवान रखते हैं, बहुत सम्हाल के हम पुरखों की शान रखते हैं।
कह दो मुल्क के नापाक ठेकेदारों से, हम अपने सीने में हिन्दुस्तान रखते हैं।
अलविदा दोस्त फिर मिलेंगे…
अबकी आवाज़ ने जैसे स्मृति-किवाड़ को खटके से खोल दिया हो उसके।
"अरे! तूँ ?" और लिपट गया वह। काफी देर तक कंधों से लिपटा रहा। बताया कि कोई सुपर फ़ास्ट पकड़ने के चक्कर में उतरा है और थोड़ी देर में आने वाली है वह।
ठीक वही कॉलेज के दिनों वाली जिद करके वह स्टेशन के बाहर के एक होटल में ले आया वहां जलपान मंगाया। बताया कि वह रामानुजगंज में सीएएफ़ में प्लाटून कमाण्डर (पीसी) है। उसने खूब सारी अंतरंग बातों को साझा किया और यह भी बताया कि कैसे छत्तीसगढ़ के घनघोर जंगलों में अपनी पोस्टिंग के दौरान नक्सलियों से लोहा लिया। कई बार वह नक्सलियों से आमने-सामने का वार किया और हर बार भारी पड़ा। उसे वीरता पुरस्कार भी मिला है। वह थोड़ा दुखी था कि मुठभेड़ में नक्सलियों को मार गिराने के बाद भी उसका वीरता पदक पेंडिंग है और फाइलों में धूल खा रहा है। वह जानता है कि दुखी हो कर या तनाव में रहकर कुछ नहीं पा सकता। नक्सलियों की तरह बगावती सोच भी वह प्रजातन्त्र के लिए खतरनाक मानता है। उसे तो देश-प्रेम है। सिस्टम में पोल है तो वो क्या करे ? वह तो अर्जी बढ़ाएगा। हाथ जोड़ेगा और नहीं तो कोर्ट जाएगा। उसे न्याय पर भरोसा है। आँखों की कोर पर हथेली ले जाकर उसने यह कहते विदा लिया,
वतन परस्ती का जज्बा जवान रखते हैं, बहुत सम्हाल के हम पुरखों की शान रखते हैं।
कह दो मुल्क के नापाक ठेकेदारों से, हम अपने सीने में हिन्दुस्तान रखते हैं।
अलविदा दोस्त फिर मिलेंगे…
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