समीक्षा
दुनिया में अशांति व फ़साद की जड़ इन्सान का आपसी अविश्वास और नस्ली रंगभेद है। बराबरी, औरत का मर्द की तरह जीना, उसकी स्वच्छन्दता और बेमेल शादी आदि को लेकर डॉ. सत्तार की सोच कैसे भरभराती है, इसे लेकर पाकिस्तान की कहानीकार नीलोफर इक़बाल ने 'बराबरी' में अच्छी मीनाकारी की है।
इस कहानी में डॉ. सत्तार प्रगतिशील सोच के इन्सान हैं, जो मर्दों की तरह ज़िन्दगी जीने, अकेले रहने और अपने फैसले खुद करने वाली बेटी मरियम की राह में रोड़ा नहीं बनते. यहाँ तक, कि तमाम सामाजिक बन्दिशों, बेगम मिसेस सत्तार की बातों को भी अनसुना कर उसे पढ़ने अमेरिका भेज देते हैं। वहां वह एक अमेरिकी से शादी कर लेती है। इसकी सूचना घर में मिलती है तो कोहराम मच जाता है। मिसेस सत्तार सारा दोष अपने शौहर डॉ. सत्तार पर मढ़ती हैं। किन्तु वे समझाते हैं, कि दुनिया प्रगति कर रही है। क्या हुआ जो उसने एक अमेरिकी से शादी रचा ली। ले-दे कर वे चुप होती हैं। अब वे बेटी-दामाद को देखने लालायित हैं। वह वर्षों नहीं आती है, तो उलाहना देते हैं, कि तुम अपने माँ-बाप के मरने पर ही आना।
अंततः वह खबर करती है, कि दामाद के साथ पहुंच रही है। स्वागत की तैयारी शुरू हो जाती है। गैर मुल्की नफासत पसन्द होते हैं इसलिए कमरों की नफ़ीस सजावट होती है। घर में ईद का समां बांधने वाला था। समय पर बेटी-दामाद को लाने घर वाले एयरपोर्ट पहुँचते हैं. वहां इंतज़ार के बाद दोनों दिखायी देते हैं। बेटी मरियम तो ठीक है, लेकिन दामाद एरिन मानो सबकी उम्मीदों पर पहाड़ पटक देता है। उसकी मुस्कुराहट भयानक थी। गुफाओं जैसे नथूने और स्याह होंठों के अन्दर लम्बे-लम्बे सफ़ेद दांत.. मानो समाज में दफ़्न हो जाएगी सत्तार परिवार की इज़्ज़त। देखते ही मरियम की बहन बुदबुदाती है, ''शुक्र है मेरी फ्रेंड्स नहीं आ रही हैं।" मिसेस सत्तार तो टूट ही पड़तीं हैं शौहर डॉ. सत्तार पर, " जलील कर दी कमीनी ने।" भाई व्यंजना में है, " हो सकता है उसकी रूह बहुत खूबसूरत हो।" तो जवाब मिलता है, "अचार डालना है रूह का? घर पर रिश्तेदार दांत गाड़े बैठे हैं।"
अन्त में प्रगतिशील पिता डॉ. सत्तार भी बेचारे बनते हैं, "सच कह रही है तुम्हारी माँ। नहीं भेजना चाहिए था लड़की को अकेले। नस्ल ख़राब कर दी बदबख़्त ने।"
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