छत्तीसगढ़ी फिल्मों की छाप क्यों नहीं
आखिर इतना पैसा-कौड़ी खर्चने और नामी-गिरामी कलाकारों के बावजूद छत्तीसगढ़ी फिल्में कुछ छाप क्यों नहीं छोड़तीं ? मोर छइहां भुइंया और दो-एक फिल्मों को छोड़ दें, तो याद नहीं, कि किसी और छत्तीसगढ़ी फिल्म ने मेरा मन मयूर कर दिया हो। झूठी पीठ ठोंकने वाली बात हो तब तो कुछ नहीं, लेकिन कटु सचाई है, कि हमारे सिनेमा को कोई भाव नहीं मिलता।एक बार मुंबई के बिड़ला मातोश्री सभागार में पत्रकारों के एक कार्यक्रम में बगल बैठे बॉलीवुड अभिनेता गूफी पेन्टल से हमने कहा, कि आप छत्तीसगढ़ी फिल्मों की ओर जरा देखिए. हो सकता है इससे सिनेमा की दुनिया को कुछ नायाब मिल जाए। क्योंकि छत्तीसगढ़ में एक-से-एक टैलेंटेड लोग भरे पड़े हैं। आखिर चन्दैनी गोंदा, चरनदास चोर से लेकर नवा बिहान तक अनेक नाटकों ने राष्ट्रीय स्तर पर अपने नाम का लोहा मनवाया कि नहीं ? फिर अनुराग बसु से लेकर नत्था को देख लीजिए, क्या धाक जमाई इन लोगों ने छत्तीसगढ़ की।
उसके बाद देखा; गूफी पेन्टल, मुकेश खन्ना आदि यहाँ आए। फिल्म भी बनी।
किन्तु रे दुर्भाग्य ! वे भी इसे चरागाह ही समझे! लपेटे और चले। कितना पैसा
तो डूब गया। क्या छत्तीसगढ़ी सिनेमा का दुर्भाग्य है?
आप देखिए उस नौजवान राजीव भाटिया को। प्रीतीश नन्दी के सीरियल से डायरेक्शन का काम जो शुरू किया तो परेश रावल, केतन मेहता आदि से लगायत अनेकों प्रसिद्ध लोगों की सीरियलों का निर्देशन किया। उनने हरियाणवीं में फिल्म बनाई पगड़ी द ऑनर और चमक उठे। इस फिल्म को सर्वश्रेष्ठ हरियाणवीं फिल्म पुरस्कार दिया गया। राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों के ६२ वर्षों का इतिहास था जो इस फिल्म को पुरस्कार योग्य चुना गया।
तो छत्तीसगढ़ी फिल्मों में क्यों नहीं निकल रहा कोई तीरंदाज़? जबकि देखा जाये तो छत्तीसगढ़ी फिल्मों के लिए खर्च-बर्च खूब हो रहा है। सुना हूँ सरकार भी मदद कर रही है। फिर अनेकों राजसत्ता से लगे लोग और अफसरान छत्तीसगढ़ी सिनेमा से जुड़े हैं। फिर भी यह हश्र ?
हम कहते हैं; अंतराष्ट्रीय न सही, कम-से-कम राष्ट्रीय पुरस्कार के लायक तो हों हमारी फिल्में। वर्ना तो समझा जायेगा कहीं-न-कहीं गड़बड़ी ज़रूर है।
आखिर हमारी फिल्मों का अच्छा इतिहास है। १९६५ में छालीवुड का जन्म हो चुका था। और उस कहि देबे सन्देश में संगीत के भगवान रफ़ी साहब ने गाना भी गाया था।
आप देखिए उस नौजवान राजीव भाटिया को। प्रीतीश नन्दी के सीरियल से डायरेक्शन का काम जो शुरू किया तो परेश रावल, केतन मेहता आदि से लगायत अनेकों प्रसिद्ध लोगों की सीरियलों का निर्देशन किया। उनने हरियाणवीं में फिल्म बनाई पगड़ी द ऑनर और चमक उठे। इस फिल्म को सर्वश्रेष्ठ हरियाणवीं फिल्म पुरस्कार दिया गया। राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों के ६२ वर्षों का इतिहास था जो इस फिल्म को पुरस्कार योग्य चुना गया।
तो छत्तीसगढ़ी फिल्मों में क्यों नहीं निकल रहा कोई तीरंदाज़? जबकि देखा जाये तो छत्तीसगढ़ी फिल्मों के लिए खर्च-बर्च खूब हो रहा है। सुना हूँ सरकार भी मदद कर रही है। फिर अनेकों राजसत्ता से लगे लोग और अफसरान छत्तीसगढ़ी सिनेमा से जुड़े हैं। फिर भी यह हश्र ?
हम कहते हैं; अंतराष्ट्रीय न सही, कम-से-कम राष्ट्रीय पुरस्कार के लायक तो हों हमारी फिल्में। वर्ना तो समझा जायेगा कहीं-न-कहीं गड़बड़ी ज़रूर है।
आखिर हमारी फिल्मों का अच्छा इतिहास है। १९६५ में छालीवुड का जन्म हो चुका था। और उस कहि देबे सन्देश में संगीत के भगवान रफ़ी साहब ने गाना भी गाया था।
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