इक़बाल और अरगास दोनों समक्ष हैं। इक़बाल प्राइमरी का सहपाठी। गणेशोत्सव शुरू होते ही लग जाता लोकोपकार में। पंडालों में खिचड़ियां बांटता और साईकिल पर दूर तलक घुमाने ले जाता हमें। अंखुआए चने की चटपटी खिलाता और मोटरसाइकलों की पहचान बताता। जावा, एज़्दी, बुलेट आदि की हेड लाइट को देखकर पहचानने की बताई उसकी कला आज भी याद है।
अरगास बढ़ई थे और उम्र में काफी बड़े। लेकिन छोटा देख बच्चों-सा ही व्यवहार करते। विश्वकर्मा पूजा हो तो अपुन उनकी दूकान पर निगाहें लगाए रखते कि कब पूजा ख़तम हो और उनकी मिठाई, बून्दी, खीरा, केला, सेब, नारियल आदि से मिश्रित प्रसाद मिले। जैसे ही पूजा होती वे हमें ही बुलाते और रख देते गदोरी पर। हम निहाल। छोटे बच्चे को और क्या चाहिए।
इक़बाल मिडिल से गायब है। अरगास परलोक सिधारे। आज से गणेशोत्सव है, विश्वकर्मा पूजा भी आज ही। लेकिन वे दोनों नहीं हैं, जिनमें सख्य-भाव था और जो अनन्त खुशियां देते थे। वे चाहे नहीं, लेकिन उनकी स्मृतियाँ साथ हैं। वे ही अश्रु ला रही हैं।
अरगास बढ़ई थे और उम्र में काफी बड़े। लेकिन छोटा देख बच्चों-सा ही व्यवहार करते। विश्वकर्मा पूजा हो तो अपुन उनकी दूकान पर निगाहें लगाए रखते कि कब पूजा ख़तम हो और उनकी मिठाई, बून्दी, खीरा, केला, सेब, नारियल आदि से मिश्रित प्रसाद मिले। जैसे ही पूजा होती वे हमें ही बुलाते और रख देते गदोरी पर। हम निहाल। छोटे बच्चे को और क्या चाहिए।
इक़बाल मिडिल से गायब है। अरगास परलोक सिधारे। आज से गणेशोत्सव है, विश्वकर्मा पूजा भी आज ही। लेकिन वे दोनों नहीं हैं, जिनमें सख्य-भाव था और जो अनन्त खुशियां देते थे। वे चाहे नहीं, लेकिन उनकी स्मृतियाँ साथ हैं। वे ही अश्रु ला रही हैं।
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