Thursday, 10 September 2015

 
 
 
 
 

                                    कल का अपडेट

छत्तीसगढ़ी फिल्मों की अजन्ता गुफा में मद्धिम रोशनी का जो हल्का-सा खाका कल हमने खींचा था, उस पर कुछ अच्छे विमर्श छूटे हैं, उनका स्वागत करते हैं। केवल इसलिए नहीं कि इसे लेकर संजीदगी दिखी, बल्कि इसलिए भी कि छत्तीसगढ़ के बाहर भी यहाँ की फिल्मों के बारे में लोग जानकारी रखते हैं और जानना चाहते हैं। रंज केवल इस बात का है कि छालीवुड से जुड़े लोगों का चित्त क्यों नहीं फरिया रहा है? ओडिशा से में रहते हुए भी राजकुमार सिंह यहाँ की फिल्मों के प्रति जिज्ञासु बने हुए हैं, लेकिन यहाँ? आखिर दीप चटर्जी जैसे चिन्तक डॉक्टर क्योँकर कहने मज़बूर हुए, कि पाउडर थोप के, नया कपड़ा पहन के, जलपरी दिखा के फिल्में नहीं चलतीं. भूत-पिशाच भी नहीं। प्यार-रोमांस, जमींदारी, अलगाव, आतंकवाद, गाँव से कटता आदमी शहर में भटकता आदमी, युवा समस्या, टूटते घर, जुड़ते रिश्ते इस तरह कई प्लॉट्स हैं, लेकिन पटकथा नहीं. डॉ. चटर्जी ने जो यह कहा, कि रंगमंच को ही एक दृष्टि मिलती तो कुछ और अच्छी फिल्में मिल जातीं, चिन्तनीय हैं। रेल्वे पुलिस के सन्तोष दुबे जी ने इन फिल्मों में घालमेल की समस्या की ओर इशारा किया है तो रंगकर्मी हरिश्चन्द्र, कवि संजीव तिवारी व ए. त्रिनाथ राव ने किन्हीं-न-किन्हीं रूपों में स्वीकार किया है, कि हमें अपनी फिल्मों में चमत्कारी बदलाव लाना होगा और इसके लिए नए सिरे से चिन्तन-साधना-कर्म जरूरी है। तभी तो संजीव जी ने अपनी वाल पे इसे साझा भी किया है, जिस पर युवा कवि किशोर कुमार तिवारी ने गंभीर चिंतन की आवश्यकता पर बल दिया है।

उम्मीद है कि ज़रूर छत्तीसढ़ी फ़िल्मों का नया अध्याय शुरू होगा। पटकथा के साथ ही ओरिजनल छत्तीसगढ़ माटी की खुशबू महक उठेगी रजत पट के सामने ताली-सीटियों की अनुगूंज बॉलीवुड से लेकर हॉलीवुड तक सुनायी देंगी।

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