भोर
भोर में नेत्र खुले ही, कि खिड़की की आँखों से जवा-कुसुम के कई सुर्ख जोड़े इस कदर गुम्फित दिखे मानो पुष्प-गुच्छ मुस्कुराकर मॉर्निंग-वेलकम कर रहा हो। तिस पर कलियांने को आतुर रक्ताभापूरित कुसुम अलग ही मुस्किया रही है, जैसे हमारा आलस्य सोख लेना चाह रही हो। पुष्प-पौधों से कितने कुसुम-पर्ण झर गए हैं। नीचे चौतरफ़ा बिखरे मानों सन्देश दे रहे हैं, कि यही नियति है हमारी। लेकिन तुम इन्सान भी घमण्ड न करो. मिट्टी के माधो ही हो तुम भी. देखना, एक दिन मिट्टी में ही मिल जाओगे।
वहीं अमरुद में लगे हरे-हरे बतिया 'हर दिन होय न एक सामना' की तरह आने वाले सुखद कल का सन्देश देते झूल रहे हैं, कि पकने तो दो तब देखना हमारा स्वाद। सरीफ़ा भी हरियाया है. फल दिया तो है, किन्तु दो-चार ही। बेचारा एकदम शरीफ़ की भांति शराफ़त का मौन-गीत गाता पवन-झोंके में है।
वह कपोत-कपोती का जोड़ा देखो. कैसे दाना चुगते-चुगते एक दूसरे को कनखियाँ मार रहे हैं। इतरलिंगी रूप का अपना ही आकर्षण है न ? समय पाकर दोनों एक दूसरे पर चंचु-प्रहार भी कर दे रहे हैं जैसे और किसी को प्रणय-क्रीड़ा पता ही न हो। हमारे यहाँ इसके लिए बिहारी से लेकर अनेक कवि हुए हैं, समझे कबूतर दम्पती ?
अब देख लो ! छटाक भर की वह चितकबरी, बड़ा-सा मूस दाबे सीढ़ियों पर भाग रही है, जैसे कोई देख ही न रहा हो। उस बेचारी को क्या पता खिड़कियों का अविष्कार किन-किन फायदों के लिए किया गया है।
कूंचा लगने लगा है। उसकी खरर-खरर की आवाज़ मानो कह रहा हो, बिस्तर तो छोड़ो भई। पानी आ गया है। खूब सारी प्रजातियों के पंछी लग गए हैं काम में। तितलियाँ भी बदमस्त हैं फूलों पर. फिर अपुन क्या देख रहे हैं ! इतने बंदनवार, इतने स्वागत-गान से तन-मन तो जग ही गया। रोम-रोम में आनन्द समा गया। लो अगरबत्ती की महक आने लगी। मतलब अपुन का रास्ता क्लियर। अच्छा चलें।
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