Tuesday, 24 November 2015

एक मुट्ठी में किस्मत तो एक में कर्म है। इनमें एक को खोलने से चाहे रेत-कण गिरें, लेकिन दूसरे से स्वर्ण-कण गिरना तय है।

Monday, 23 November 2015

पैदा होने से लेकर अब तक अनेकों बार इस चितकबरी के कारनामें सुना चुके हैं। सोचे इसकी छवि भी दिखा ही दें। बेचारी ! शिकार सिखाने की तो छोड़िए, जब इसकी माँ को इससे लिपटकर रहने और सुरक्षा देकर पालने की जवाबदारी थी, तो जाने किस मज़बूरी के चलते वह दगा देकर चलती बनी। अब यह पोटी अकेली फंसी, तिसपर एक डरावना काला बिल्ला इसपर घात लगाए पीछे पड़ा कि मौका मिले और दबोचूँ।
इसकी दीन दशा पर कौन होगा जो न पसीजे ? हमारी दयाशील भौजाई ने पोसना शुरू किया। कटोरी से दूध पिलाने और कुछ खाने-पीने को देते रहने से वह चपल होने लगी। निखिल और नीतीश को देखा कि वे चाकू का बेट उसके पंजों के सामने कर रहे हैं और वह उस पर ऐसे झपट्टा मार रही है मानो वह बेट न होकर कोई चूहा हो जिसे अभी ले भागेगी। बड़ा मज़ा आया देखकर। अब बच्चे उसे ऐसे ही उछाल मारना सिखाने लगे। फिर तो धीरे-से उसने शिकार मारना भी शुरू कर दी। कुछ दिनों पहले तो जिस तरीके से वह मोटा-सा मूस मुँह में दाबे सीढ़ियों पर भागती दिखी, उसने तो उसके जौहर की नजीर ही पेश कर दी।
हमें उससे कोई बड़ा प्रेम न था, किन्तु उसकी क्या कहें! जैसे ही देखती, चली आती पीछे-पीछे ! म्याऊं-म्याऊं करती लिपट जाती पैरों से। कितना भी झटको टस-से-मस न होती। उसका प्रेम निराला था, निःस्वार्थ। धीरे-धीरे वह हमें अपना बनाने लगी थी, कि पता चला कोई ले गया उसे। पक्का है, उसे अब भी हमारी याद आती ही होगी। हमें तो नहीं भूलती वह।        
   

Friday, 20 November 2015

खीसे में मात्र २० रूपये थे और इच्छा थी गोलगप्पे-चाट खाने की। अब इस महंगी में इतने से होता क्या है ? एक प्लेट छोला-चाट ही ३० चट कर जाता है, वह भी ठेले पर। फिर गोलगप्पा भी १० का केवल ४ ! इधर जीभ होठों से बाहर जा रही थी मानो बाल-हठ में हो कि चाहे जैसे हो गोलगप्पे खाना ही है। सोचे चलो हाफ़ प्लेट चाट और २ गोलगप्पे से ही जिह्वा को तर करें। निकलने को हुए, कि नीतीश का स्वर, एक पेन्सिल लेते आइएगा।'
अब २ पेन्सिल में गए.. सोचता निकला, चलो छोड़ो चाट, गोलगप्पे से ही काम चलाएंगे।
सोचा पेन्सिल पहले ले लेता हूँ, तब खट्टे पानी के साथ गोलगप्पे का चटखारा लूँगा .. लेकिन यहाँ तो जिह्वा हाथ भर का निकल रही है मानो डर रही हो कि धोखा न हो जाए। लेकिन उसे होठों के भीतर ही दबाए रखा कि थोड़ा तो सबर करो।
बाज़ार निकले और किताब दूकान पहुंच गए। वहां एक-से-एक स्टेशनरी आइटम ! हमने पेन्सिल माँगा तो उसने अनेक वेराइटी निकाल दी। ५ से १० की बात थी. १० वाली ज्यादा सुन्दर थी और गाढ़ी भी, साथ में रबर मुफ़्त था । क्यों न इसी को ले लें, रबर भी तो मिल जाएगा।
अब जिह्वा विद्रोह पर उतरी, 'फिर बचे १० में कितने गोलगप्पे खा लोगे ? एक गाल भी तो न होगा।'
सोचता देख दूकान वाले ने कहा, 'ये देखिए, २०० पेज़ की कॉपी.. मात्र २० की है, साथ में पेन्सिल मुफ़्त रबर और कटर के साथ।'
४ आइटम मात्र २० में ! घाटे का सौदा नहीं है।
खट्टे पानी के स्वाद लेने की लार मुख में घूम रही थी, तिस पर विद्रोह पर उतारू जिह्वा को दबाया और मन कड़ा कर २० का नोट दूकानदार को थमा दी. मुख में स्वाद सहसा बुझ गया, लार सूख गयी और जिह्वा चुप मारकर बैठ गई मानो हो ही न।
चारों सामान लेकर घर पहुंचे। देखते ही नीतीश ने कहा, 'कॉपी, रबर और कटर की क्या ज़रूरत थी ? यह तो बहुत है मेरे पास। आप भी क्या-क्या उठा लाते हैं ?
हम कैसे बताएं उसे इस लुभावने बाज़ार के बारे में, कि उसने अपने जाल में कई दिनों से लालायित हमारे जिह्वा के स्वाद को आज फिर खट्टा कर दिया।  
 और चारों सामान ले कर घर पहुंचे।

          

Wednesday, 4 November 2015

अबकी जंगल को छूने में दूसरी अनुभूति हुई। अब वह धूसरपन नहीं रहा उनमें। हरित पर्णों और लता-गुल्मों से वे इस कदर लिपटे झूम-नाच रहे हैं मानो महीनों बाद दूसरों से मिलने के चक्कर में अपना गम भी भूल गए। तभी तो यह जानते हुए भी, कि चार महीने बीतते-बीतते उनकी रंगत उड़ाने वाली वह जुल्मी गर्मी आ धमकेगी वे अपनी सुन्दरता और सजीलेपन पर लहालोट हो रहे हैं। होना भी चाहिए, आखिर यही तो जीवन का फ़लसफ़ा है, जिसकी सीख इनसे भी मिली है। दुःख के बाद सुख.. और यही चक्र निर्बाध है। विषाद में ही हर्ष के अंकुर छिपे हैं।
नरेन्द्र भाई के साथ के अपुन दुर्ग से लेकर बालोद और कांकेर के वन-प्रान्तर में घूमते रहे। अनेक हाट-बाज़ारों ने आकर्षित किया तो धान से गमकते खेतों ने भी ध्यान खींचा। सूखे की प्राकृतिक आपदा के बाद भी किसानों ने खलिहान सजा दिए यह बड़ी बात है। डिजिटल इण्डिया की तस्वीर भी साफ़ हुई। भीतर तक स्मार्ट फोन चला गया है, लेकिन यह सुनकर कलेजा बैठ गया कि मोबाईल तो है लेकिन बैलेंस नहीं ! अब वे क्या बात करें? गेम का लुत्फ़ उठा रहे हैं।