अबकी जंगल को छूने में दूसरी अनुभूति हुई। अब वह धूसरपन नहीं रहा उनमें। हरित पर्णों और लता-गुल्मों से वे इस कदर लिपटे झूम-नाच रहे हैं मानो महीनों बाद दूसरों से मिलने के चक्कर में अपना गम भी भूल गए। तभी तो यह जानते हुए भी, कि चार महीने बीतते-बीतते उनकी रंगत उड़ाने वाली वह जुल्मी गर्मी आ धमकेगी वे अपनी सुन्दरता और सजीलेपन पर लहालोट हो रहे हैं। होना भी चाहिए, आखिर यही तो जीवन का फ़लसफ़ा है, जिसकी सीख इनसे भी मिली है। दुःख के बाद सुख.. और यही चक्र निर्बाध है। विषाद में ही हर्ष के अंकुर छिपे हैं।
नरेन्द्र भाई के साथ के अपुन दुर्ग से लेकर बालोद और कांकेर के वन-प्रान्तर में घूमते रहे। अनेक हाट-बाज़ारों ने आकर्षित किया तो धान से गमकते खेतों ने भी ध्यान खींचा। सूखे की प्राकृतिक आपदा के बाद भी किसानों ने खलिहान सजा दिए यह बड़ी बात है। डिजिटल इण्डिया की तस्वीर भी साफ़ हुई। भीतर तक स्मार्ट फोन चला गया है, लेकिन यह सुनकर कलेजा बैठ गया कि मोबाईल तो है लेकिन बैलेंस नहीं ! अब वे क्या बात करें? गेम का लुत्फ़ उठा रहे हैं।
नरेन्द्र भाई के साथ के अपुन दुर्ग से लेकर बालोद और कांकेर के वन-प्रान्तर में घूमते रहे। अनेक हाट-बाज़ारों ने आकर्षित किया तो धान से गमकते खेतों ने भी ध्यान खींचा। सूखे की प्राकृतिक आपदा के बाद भी किसानों ने खलिहान सजा दिए यह बड़ी बात है। डिजिटल इण्डिया की तस्वीर भी साफ़ हुई। भीतर तक स्मार्ट फोन चला गया है, लेकिन यह सुनकर कलेजा बैठ गया कि मोबाईल तो है लेकिन बैलेंस नहीं ! अब वे क्या बात करें? गेम का लुत्फ़ उठा रहे हैं।
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