खीसे में मात्र २० रूपये थे और इच्छा थी गोलगप्पे-चाट खाने की। अब इस महंगी में इतने से होता क्या है ? एक प्लेट छोला-चाट ही ३० चट कर जाता है, वह भी ठेले पर। फिर गोलगप्पा भी १० का केवल ४ ! इधर जीभ होठों से बाहर जा रही थी मानो बाल-हठ में हो कि चाहे जैसे हो गोलगप्पे खाना ही है। सोचे चलो हाफ़ प्लेट चाट और २ गोलगप्पे से ही जिह्वा को तर करें। निकलने को हुए, कि नीतीश का स्वर, एक पेन्सिल लेते आइएगा।'
अब २ पेन्सिल में गए.. सोचता निकला, चलो छोड़ो चाट, गोलगप्पे से ही काम चलाएंगे।
सोचा पेन्सिल पहले ले लेता हूँ, तब खट्टे पानी के साथ गोलगप्पे का चटखारा लूँगा .. लेकिन यहाँ तो जिह्वा हाथ भर का निकल रही है मानो डर रही हो कि धोखा न हो जाए। लेकिन उसे होठों के भीतर ही दबाए रखा कि थोड़ा तो सबर करो।
बाज़ार निकले और किताब दूकान पहुंच गए। वहां एक-से-एक स्टेशनरी आइटम ! हमने पेन्सिल माँगा तो उसने अनेक वेराइटी निकाल दी। ५ से १० की बात थी. १० वाली ज्यादा सुन्दर थी और गाढ़ी भी, साथ में रबर मुफ़्त था । क्यों न इसी को ले लें, रबर भी तो मिल जाएगा।
अब जिह्वा विद्रोह पर उतरी, 'फिर बचे १० में कितने गोलगप्पे खा लोगे ? एक गाल भी तो न होगा।'
सोचता देख दूकान वाले ने कहा, 'ये देखिए, २०० पेज़ की कॉपी.. मात्र २० की है, साथ में पेन्सिल मुफ़्त रबर और कटर के साथ।'
४ आइटम मात्र २० में ! घाटे का सौदा नहीं है।
खट्टे पानी के स्वाद लेने की लार मुख में घूम रही थी, तिस पर विद्रोह पर उतारू जिह्वा को दबाया और मन कड़ा कर २० का नोट दूकानदार को थमा दी. मुख में स्वाद सहसा बुझ गया, लार सूख गयी और जिह्वा चुप मारकर बैठ गई मानो हो ही न।
चारों सामान लेकर घर पहुंचे। देखते ही नीतीश ने कहा, 'कॉपी, रबर और कटर की क्या ज़रूरत थी ? यह तो बहुत है मेरे पास। आप भी क्या-क्या उठा लाते हैं ?
हम कैसे बताएं उसे इस लुभावने बाज़ार के बारे में, कि उसने अपने जाल में कई दिनों से लालायित हमारे जिह्वा के स्वाद को आज फिर खट्टा कर दिया।
और चारों सामान ले कर घर पहुंचे।
अब २ पेन्सिल में गए.. सोचता निकला, चलो छोड़ो चाट, गोलगप्पे से ही काम चलाएंगे।
सोचा पेन्सिल पहले ले लेता हूँ, तब खट्टे पानी के साथ गोलगप्पे का चटखारा लूँगा .. लेकिन यहाँ तो जिह्वा हाथ भर का निकल रही है मानो डर रही हो कि धोखा न हो जाए। लेकिन उसे होठों के भीतर ही दबाए रखा कि थोड़ा तो सबर करो।
बाज़ार निकले और किताब दूकान पहुंच गए। वहां एक-से-एक स्टेशनरी आइटम ! हमने पेन्सिल माँगा तो उसने अनेक वेराइटी निकाल दी। ५ से १० की बात थी. १० वाली ज्यादा सुन्दर थी और गाढ़ी भी, साथ में रबर मुफ़्त था । क्यों न इसी को ले लें, रबर भी तो मिल जाएगा।
अब जिह्वा विद्रोह पर उतरी, 'फिर बचे १० में कितने गोलगप्पे खा लोगे ? एक गाल भी तो न होगा।'
सोचता देख दूकान वाले ने कहा, 'ये देखिए, २०० पेज़ की कॉपी.. मात्र २० की है, साथ में पेन्सिल मुफ़्त रबर और कटर के साथ।'
४ आइटम मात्र २० में ! घाटे का सौदा नहीं है।
खट्टे पानी के स्वाद लेने की लार मुख में घूम रही थी, तिस पर विद्रोह पर उतारू जिह्वा को दबाया और मन कड़ा कर २० का नोट दूकानदार को थमा दी. मुख में स्वाद सहसा बुझ गया, लार सूख गयी और जिह्वा चुप मारकर बैठ गई मानो हो ही न।
चारों सामान लेकर घर पहुंचे। देखते ही नीतीश ने कहा, 'कॉपी, रबर और कटर की क्या ज़रूरत थी ? यह तो बहुत है मेरे पास। आप भी क्या-क्या उठा लाते हैं ?
हम कैसे बताएं उसे इस लुभावने बाज़ार के बारे में, कि उसने अपने जाल में कई दिनों से लालायित हमारे जिह्वा के स्वाद को आज फिर खट्टा कर दिया।
और चारों सामान ले कर घर पहुंचे।
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