Monday, 9 May 2016

रघुराम राजन की माकूल चेतावनी

सचमुच आज के बदलते दौर में बढ़ते गैर जरूरी पाठ्यक्रमों की उलझन ने छात्र-छात्राओं को अपने मोहपाश में फांस लिया है। इसकी मृगतृष्णा ऐसी है कि इसमें फंस कर छात्र-छात्राएं अपने भविष्य को दांव पर लगा रहे हैं। इस मामले में रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) के गर्वनर रघुराम राजन ने भारतीय छात्र-छात्राओं को जिस लहजे में आगाह किया है उसे समझकर चौकन्ना होने की जरूरत है।
यह सच है कि आज का युग संचार और सूचना प्रौद्योगिकी का है, जहां का वातावरण पल-प्रतिपल बदलता रहता है। इसके व्यामोह ने आभासी दुनिया का ऐसा कृत्रिम आवरण आच्छादित कर रखा है जहां कि सपने और ऊंची उड़ानें हैं। शानदार लाइफ स्टाइल और विदेश यात्रा के हसीन सपने पालती हमारी नौजवान पीढ़ी हर स्तर पर समझौते करने को तैयार खड़ी दिखती है। लेकिन यह भी याद रखना है कि यदि यह समय सूचना प्रौद्यागिकी और डिजिटलाजेशन का है तो व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा भी कम नहीं है। यह होड़ ऐसी है, कि दुनिया का युवा वर्ग इससे प्रभावित होता जा रहा है। यह भी याद रखना है, भारत आज भी तीसरी दुनिया के देशों में गिना जाता है जहां निर्धनता, गरीबी और पिछड़ेपन का दंश है। जहां का युवा वर्ग अपने बेहतर भविष्य के लिए हाथ-पैर मार रहा है। इसीलिए रघुराम राजन की चेतावनी को बड़े ध्यान से सोचने की जरूरत है। कारण कि आज भी अनेक मल्टीनेशनल कम्पनियां बड़े-बड़े सब्जबाग दिखाकर हमारी युवा पीढ़ी को आकर्षित कर रही हैं। भगोड़े विजय माल्या की नजीर हमारे सामने है, जिसने जाने कितनी जिन्दगियों को बर्बाद किया। उसकी एयरलाइन्स कम्पनी में काम करने के लिए छात्र-छात्राओं ने क्या-क्या न किया? लेकिन आज उनका भविष्य क्या है? इसी प्रकार देश के कोने-कोने में अनेक शैक्षणिक संस्थाएं खुली पड़ी हैं जो एक-से-एक पाठ्यक्रमों में प्रवेश देने की दूकानें खोले बैठी हैं जिनका दावा रहता है कि नौकरी पक्की! इसी लालच में नौजवान आकर्षित होते हैं और मोटी फीस होते हुए भी कर्ज गुआम लेकर एडमिशन ले लेते हैं।
हमारे छत्तीसगढ़ में भी ऐसे अनेक संस्थान संचालित हैं, जो बच्चों को सब्जबाग दिखा रहे हैं। शहरों से लेकर ग्रामीण इलाकों तक में इनके बड़े-बड़े होर्डिंग्स लगे हैं जो हमारे छात्रवर्ग को आकर्षित करते हैं। कई कोर्सों का नाम देकर लुभाया जा रहा है। छात्र-छात्राएं इस क्रेज को देखते हुए ऊंची फीस के लिए बैंकों से कर्ज लेकर एडमिशन लेती हैं, लेकिन बाद में उन्हें रोजगार नहीं मिल पाता और उन पर बैंक का लोन चढ़ जाता है। एविएशन क्षेत्र से लेकर एमएमई, एआइएम, आईएमआईएम जैसे दर्जनों कोर्सेस संचालित हैं जिनमें एडमिशन के लिए बच्चे भागे जा रहे हैं। पालकों और समाज के हर वर्ग के लिए यह सोचने का समय है कि वे अपने बच्चों को सही मार्गदर्शन दें और उन्हें उन्हीं पाठ्यक्रमों में प्रवेश के लिए प्रेरित करें जो रोजगार के सही अवसर प्रदान करे। साथ ही भारतीय संस्कारों का बीजारोपण भी करे।

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