Thursday, 5 May 2016

 सामाजिक असन्तुल
 
लोग भौंचक हैं और कह रहे हैं कि अमीर तो और अमीर हुआ जा रहा है और गरीब और गरीब! आखिर कौन-सी नीति बनायी है हमने जो सामाजिक असन्तुल को बढ़ाती ही जा रही है। हालात देख कर एक बारगी तो ऐसा लगने लगता है कि यही हाल रहा तो बेमेल समाज में खतरनाक परिस्थितियां न उत्पन्न हो जाएं। कारण कि लोग देख रहे हैं कि अमीरी-गरीबी के बीच की खाई कितनी चौड़ी और गहरी होती जा रही है।
जिनके पास अनाप-शनाप पैसा है वे उसका उपयोग भी अनाप-शनाप ही कर रहे हैं। देखा जा रहा है कि काली कमाई करने वाले अनेक लोग रियल इस्टेट के धन्धे में भाग्य आजमाने के लिए भारी निवेश किए जा रहे हैं।  शराब से लेकर अन्यान्य अवैध धन्धों से पैसा-पत्तर बनाकर दो नम्बरी किस्म के लोग सत्ताधीशों और नौकरशाहों के पास पहले तो अपनी धमक बढ़ाए और फिर खुल्ला खेल शुरू कर दिए। आज आप चाहे जहां जाएं, हर जगह उन्हीं का बोलबाला मिलेगा। सभ्य समाज के लोगों की चाहे कोई पूछ न हो लेकिन शासन और प्रशासन के गलियारे में इनकी पूछ-परख अवश्य दिखाई देगी। इसी का परिणाम है सामाजिक ताना बाना बिगड़ता ही जा रहा है। हर जगह विसंगतियां और विभेद का भाव दिखाई देने से लगता है कि आने वाला समय और कठिनाई भरा होगा। विशेषकर उसके लिए जो ईमान पसन्द और तहजीब से रहने वाला है।
आज आप गरीब बस्तियों में चले जाएं, कहां दूर हुई है उनकी गरीबी? देख लीजिए उनकी लाइफ स्टाइल। आजादी के बाद से लगातार हम गरीबी हटाओ का ढोल पीट रहे हैं लेकिन ईमानदारी से तनिक अपने सीने पर हाथ रखकर पूछें तो पता चलेगा, कि गरीबों के नाम पर इन नेताओं ने कैसे अपनी दूकानदारी चलाई है और अपना घर भरा है। सच तो यह है कि गरीब बेचारा और गरीब हुआ है। उसकी बदहाल जिन्दगी न तो पहले बहार थी और न ही अब है। शिक्षा से लेकर स्वास्थ्य और यहां तक कि खाने-पीने तक के लिए उन्हें दूसरों का मुंह ताकना पड़ता है। दुखद तो यह है कि अमीर बनने के लिए अब शार्ट कट योजना के चलते बड़े-बड़े क्राइम हो रहे हैं जिन पर किसी का ध्यान नहीं है। जमीनों की दलाली से लेकर बैंकों से ऋण लेकर अदा न करने की प्रवृत्ति और बहुतेरे अवैध धन्धों के माध्यम से धन कमाने की लिप्सा ने ही इस विभेद को बढ़ाने का काम किया है। इसे दूर करने के लिए आखिर प्रयास करेगा कौन?
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