मिल बाँटकर खाओ
इधर सड़क दुर्घटनाओं में हर रोज मौतें हो रही हैं उधर वाहन चालकों को छेक कर लाइन में खड़ा किया जा रहा है.. इधर नक्सली लगातार आत्मसमर्पण में हाथ खड़े कर रहे हैं तो उधर उनके द्वारा बम-ब्लास्ट कर हमले-पर-हमले भी हो रहे हैं.. इधर पानी के लिए सरकार बैठकें कर रही है और उधर मैदानी इलाकों में नागरिक बूंद-बूंद पानी के लिए तरस रहे हैं.. अन्तिम व्यक्ति के भूख मिटाने के खाद्यान्न बंट रहे हैं तो बेचारे आदिवासियों के छींद के कीड़े खाकर भूख मिटाने की भी खबर है.. इस प्रकार की निरन्तर मिल रहे समाचारों से लगने लगता है, कि क्या छत्तीसगढ़ भगवान भरोसे है? हर जगह देखने पर लगता है कि व्यवस्था और उसके परिचालन में कहीं कोई साम्य नहीं है! हर कोई अपनी ही मस्ती में दिखता है। कोई काहू मगन कोई काहू मगन की तर्ज पर जिसे देखो वही मदमस्त है मानो उसे किसी और से कोई मतलब ही नहीं! इन सबके बीच लोग हैं कि फंसे हुए बन्दर की भांति इत-उत देख रहे हैं किन्तु कहीं ठौर नहीं मिल रहा है।
छत्तीसगढ़ की यातायात व्यवस्था पर ही बात करें, तो सवाल है कि जब हमारा टे्रफिक सिस्टम इतना चैतन्य व चौकन्ना है तो फिर सड़क दुर्घटनाएं रुक क्यों नहीं रहीं? यही सवाल माओवादी उन्मूलन में चल रहे कार्यों को लेकर भी है, कि जब माओवादी इतने ही हतोत्साहित व निराश होते जा रहे हैं तो लगातार उनके हमले कैसे जारी हैं? सरकारी अमले से लेकर बड़ी संख्या में सुरक्षा बलों की उपस्थिति के बाद भी आग के शोले उठते ेरहें तो क्या कहा जाए? इससे तो यही लगता है कि छत्तीसगढ़ के वास्तविक हितों के साथ किसी को सरोकार है, लगता नहीं! जिसे देखो वही कमाई पर लगा है। चाहे जैसे हो आने दो सोच के चलते हर जगह कबाड़ा हो रहा है। कभी-कभी लगता है कि मिल बाँटकर खाओ वाली नीति हर जगह चल रही है। माओवादी अपनी चला कर लूट ही रहे हैं तो दूसरे भी ईमान का चोला पहने नागरिकों को कोई सुविधा नहीं दे रहे हैं। बल्कि नागरिक तो बेचारा बना हुआ फुटबॉल की तरह इधर-उधर फेंका जा रहा है।
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