कराहता आम आदमी
जीवन है तो बीमारियों का साथ भी है, लेकिन इन्हें
दूर करने के लिए दवाइयां ही हैं जो साथ निभाती हैं। परन्तु आज दवाइयों को
लेकर क्या हाल है सभी जानते हैं। और-तो-और, अब जरूरी स्वास्थ्य रक्षक दवाओं
के लिए भी लोगों की मुश्किलें बढऩे लगी हैं। दिन-प्रतिदिन स्वास्थ्य
सेवाएं महंगी ही होती जा रही हैं। ऐसे में आम आदमी उसमें भी निम्र आय वर्ग
के लोगों की तो एक तरह से मरनी ही हो गई। लोगबाग तो अब अस्पताल के नाम से
ही कांपने लगते हैं। कहें कि अच्छे-भले आदमी के सामने अस्पताल का नाम ले
लें तो उसे बुखार आ जाता है।
स्थिति यह है कि निजी चिकित्सालयों में इलाज काफी महंगा हो गया है।
छोटी-से-छोटी बीमारी के लिए भी हजार रूपए से ऊपर निकल जाना आम बात हो गई
है। सामान्य सर्दी-बुखार में भी डॉक्टर की सैकड़ों रूपयों की फीस और फिर
उसके बाद रक्त-मूत्र आदि की जांच न भी हुई तो एंटीबॉयोटिक्स और एंटीएलर्जिक
से लेकर अन्य दवाओं की खरीदी में मरीज की नानी याद आ जाती है। मेडिकल
दूकानों में जाते ही मरीज सोचता है कि कहीं पैसे कम न पड़ जाएं! इसके पीछे
कारण यह है, कि ब्राण्डेड दवाएं तेजी से लोगों की जेबें हल्की कर देती हैं।
बीच में जेनरिक दवाओं के लिए सरकार ने बड़ा अभियान छेड़ा था। लेकिन अब
उसका कहीं अता-पता नहीं है। इसे देखने के लिए न तो डीआई के पास फुर्सत है
और न ही विभाग के अन्य लोग ही रुचि ले रहे हैं फिर सरकार में बैठे लोगों के
पास कहां समय है। इससे हो यह रहा है कि मेडिकल वालों से लेकर डॉक्टर्स तक
ब्राण्डेड दवाओं में हाथ खोल रहे हैं। चमकीली रैपर्स में पैक्ट्ड ब्राण्डेड
दवाइयां इतनी महंगी हैं, कि एक मरीज को अपने पूरे माह का वेतन खर्च कर
देना पड़ता है। जेनरिक दवाओं के लिए छिड़े सरकार के अभियान ने क्यों दम
तोड़ दिया? मरीज आज भी सवाल करते हैं। डॉक्टर की पर्ची मिलते ही मरीज सीधा
पूछता है, कि जेनरिक दवाएं कहां मिलेंगी? लेकिन हों तब तो! यहां तो बताते
हैं कि दवा कंपनियों की अस्पताल व नर्सिंग होम्स वालों से इतना तगड़ा
गठबंधन है कि चाह कर भी जेनरिक दवाएं नहीं चल पातीं। सिप्रोफ्लाक्सेसिन
जैसी एंटीबॉयोटिक में खूब कमाई चल रही है। किस-किस का नाम लें, अनेक दवाएं
जो जेनरिक में इतनी सस्ती हैं कि मरीज खरीदे तो पता ही न चले, लेकिन वहीं
ब्राण्ड में घुसें तो एक पत्ता लेने में हालत बिगड़ जाती है।
जेनरिक दवाओं को लेकर सरकार का अभियान बड़ा सुन्दर और पुण्यात्मक था। इसका सीधा लाभ मरीजों को मिल रहा था। किन्तु उसने क्यों सांस तोडऩी शुरू कर दी यह तो वे लोग ही जानें।
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जेनरिक दवाओं को लेकर सरकार का अभियान बड़ा सुन्दर और पुण्यात्मक था। इसका सीधा लाभ मरीजों को मिल रहा था। किन्तु उसने क्यों सांस तोडऩी शुरू कर दी यह तो वे लोग ही जानें।
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