युद्ध-कौशल को जंग
फिर तो यह चिन्ता के फलक को और बड़ा कर देने वाला है, कि नक्सली उन्मूलन में सरकार की ओर से मोर्चे पर डटे केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल(सीआरपीएफ) में फीजिकल फिटनेस का अभाव इस कदर है कि वे राष्ट्र स्तरीय स्पर्धा में ही फिसड्डी साबित हो रहे हैं!मध्य प्रदेश ग्वालियर जिले में टेकनपुर के बीएसएफ अकादमी में सम्पन्न छठवीं राष्ट्रीय स्तरीय स्पर्धा में सीआरपीएफ के कमाण्डोज के निम्न प्रदर्शन की जो जानकारियां आ रही हैं उसने तो माथे पर बल ला दिया है। पता चला है कि इस स्पर्धा में सीमा सुरक्षा बल का तो ठीक किन्तु सीआरपीएफ का प्रदर्शन बड़ा लचर रहा। बताया जा रहा है कि सीआरपीएफ के कमांडोज को सभी महत्वपूर्ण खंडों में शिकस्त मिली है। फायरिंग जैसी महत्वपूर्ण स्पर्धा तक में उनके पिछडऩे की खबर है। ऑपरेशन प्लानिंग एण्ड ब्रीफिंग, एसटीओ जंगल खंड की तो हालत और भी पतली बतायी जाती है। पता चला है कि 20 मार्च से 5 अप्रेल तक आयोजित इस प्रतियोगिता में 23 प्रतियोगियों में छत्तीसगढ़ के सीआरपीएफ कमाण्डोज को 20 वां स्थान मिला है।
उल्लेखनीय है कि यह स्पर्धा देश के सभी प्रशिक्षित कामाण्डोज की होती है। वेल ट्रेन्ड कमाण्डोज की एक तरह से यह परीक्षा होती है कि उनके अन्दर कितनी कुव्वत है और प्रतिभा के मामले में वे कितने अव्वल है। लेकिन टेकनपुर स्पर्धा में उनके लचर प्रदर्शन ने बहुत सोचने पर मजबूर कर दिया है। यह इसलिए भी है कि माओवादी लगातार अपने जंगल वार फेयर को धारदार बना रहे हैं। गुरिल्ला युद्ध का उनका रणकौशल लगातार परवान चढ़ा रहा है। एक-से-एक प्लानिंग तैयार कर वे अपने लड़ाकों को बन्दरों के समान चुस्त दुरुस्त कर अटैक करते हैं। यही वजह है कि अर्धसैनिक बलों को अनके बार मुंह की खानी पड़ती है। अभी हाल ही में लैंड माइन बिस्फोट में 7 जवान सीआरपीएफ के ही मारे गए। छत्तीसगढ़ पुलिस विभाग के एक अवकाश प्राप्त अधिकारी ने इस पर चिन्ता जताते हुए पिछले दिनों बताया था कि किस प्रकार सीआरपीएफ के कमाण्डो प्रशिक्षण से दूर हैं। बताया गया कि नियमित पीटी-परेड तो दूर की बात वे इतने लुंज-पुंज हैं कि अपने शारीरिक सौष्ठव का ध्यान तक नहीं रखते। कैम्पों में इस कदर सुस्ती है कि सोना और खाना बहुत हुआ तो थोड़ी-सी पेट्रोलिंग और संतरी ड्यूटी, बस। वहीं माओवादी लड़ाके हैं कि नियमित पीटी परेड तो छोडि़ए कोहनी और घुटने के बल पर क्रॉलिंग कर उफ् तक नहीं करते । वे जान देकर भी टे्रन्ड होने तत्पर रहते हैं। पेड़ों में छिपकर फायरिंग और डालों पर कूदकर छिपने की कला वे इस कदर विकसित करते हैं कि क्या कहें? हमारे पास अत्याधुनिक हथियार लेकिन उनके पास क्या? फिर भी वे कई बार बाजी मारते हैं तो क्या यह हमारे लिए आलोचनात्मक आत्मपरीक्षण का विषय नहीं? कड़ा प्रशिक्षण ही है जो हमारे जवानों को स्पर्धा में खरा उतार सकता है। उस पर कोई समझौता नहीं होना चाहिए। यही समय की मांग है साथ ही देश की आन्तरिक सुरक्षा का सवाल भी।
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