बच्चों में क्षीण होती सहनशीलता
कुछ ही दिन पूर्व भिलाई में 16 साल की 11 वीं कक्षा की छात्रा ने ट्रेन के सामने कूदकर अपनी इहलीला समाप्त की ही थी, कि अब बीएससी पढ़ रही धमतरी क्षेत्र की एक छात्रा द्वारा चूहामार दवाई खाकर आत्महत्या करने की घटना सामने आई है! उधर राजधानी रायपुर में भी एक नर्सिंग छात्रा द्वारा जहर खा के जान देने की कोशिश करने की खबर मिली थी। इस प्रकार के आकस्मिक हादसों ने बहुत कुछ सोचने पर मजबूर कर दिया है! चकित करने वाला तो यह है, कि ये आत्महत्याएं इसलिए की गईं बताई जाती हैं कि बच्चियों को उनके फेल होने की खबर थी! इससे क्षण में वे इतने सदमे में आ गईं, कि अपने प्राण ही दे बैठीं! यह दांतों तले उंगली दबाने और माथे पर बल लाने वाला है, कि जिस देश में हिमालय-सा धीर, सागर-सा गम्भीर, पहाड़ों-सा सहनशील, माँ-सी करुणा और क्षमा जैसी उपमाओं और बिम्बों से अटी पड़ी कविताओं और कहानियों का पाठ पढ़ाया जाता हो वहां इत्ती-सी बात पर बच्चियां आत्मघात करें, अपने ही हाथों अपने प्राण हर लें! किसी कक्षा में विद्यार्थी का अनुत्तीर्ण होना सामान्य तौर पर कोई बड़ी बात तो नहीं ? अनेक विद्यार्थी हैं जो एक ही कक्षा में अनेक बार फेल हुए, किन्तु उन्होंने तो ऐसी अदम्य जीजिविषा का परिचय दिया कि फिर न केवल क्लास टॉप किया बल्कि आगे चलकर प्रथम श्रेणी के अधिकारी बनकर अपना नाम देश-दुनिया में रौशन कर दिया।
ये सच है कि आज के समाज में विद्यार्थियों में प्रतिस्पर्धा की भावना बढ़ी है और यह भी सच है कि परिवार का दबाब बच्चों पर रिजल्ट को लेकर जरूरत से ज्यादा बढ़ गया है। लेकिन इसका मतलब ये तो नहीं, कि विफलता का भय होने पर वे अपने आपको ही खत्म कर दें। फिर कहां हुई प्रतिस्पर्धा की भावना ? समाज शास्त्र तो कहता है कि प्रतिस्पर्धा में विफलता भी सफलता की घोतक होती है। क्योंकि इसमें विफल बारम्बार सफल होने की कोशिश में लगा रहता है।
लेकिन अब यह गलत साबित होने लगा है। लगता है कि टेलीविजन द्वारा पसरती अपसंस्कृति के साथ ही आज की सूचना प्रौद्योगिकी का गलत इस्तेमाल और पालकों का अपने बच्चों पर मनोवैज्ञानिक लगाव न होने की वजह से उनके चिन्तन में बदलाव आता जा रहा है। अति आधुनिकता की चासनी अब इतनी मीठी हो चली है कि बच्चे दिमाग से मजबूत तो बन रहे हैं, किन्तु उनका दिल उतना ही कमजोर हुआ जा रहा है। दिल और दिमाग में साम्य न होने की बजह से वे नकारात्मक विचारों को अंगीकार कर रहे हैं। स्कूलों द्वारा भी अपने दायित्त्यों का निर्वहन न के बराबर किया जा रहा है। वे लोग तो लगता है कि केवल पैसे की हवश में मरे जा रहे हैं मानो बच्चों की जिन्दगी से ज्यादा प्यार तो उन्हें पैसों से ही है।
ऐसे समय में जरूरी है, कि समाज अपनी भूमिका में लौटे। विशेषकर समाजशास्त्री इसके लिए आगे क्यों न आगे आएं और समाज के नवनिर्माण में अपनी भूमिका का निर्वहन करें ? वर्ना हमारे बच्चे कहीं के न रहेंगे।
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