Monday, 4 April 2016

 छत्तीसगढ़ में कांग्रेस निस्तेज

     युवा दिलों की धड़कन समझे जाने वाले कांग्रेस के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राहुल गांधी हिन्दुस्तान के कोने-कोने जा रहे हैं। सम्भवत: कोई प्रदेश नहीं होगा जहां उनका पसीना न गिर रहा हो। छत्तीसगढ़ तो वे अनकों बार आए। वन-प्रदेश के आदिवासियों से लेकर ग्रामीण अंचल के किसानों और फिर शहरों में छात्र-युवा जगत से भी रूबरू हुए। देखें तो उनके पास सुन्दर आइडियालॉजी है और काम करने की चित्तवृत्ति भी। इसके बाद भी छत्तीसगढ़में कांग्रेस के जिम्मेदार लोग हंै, कि उनकी भावनाओं का लेश मात्र भी उपयोग नहीं कर रहे हंै। आपस में सिरफुटौव्वल और मुंहफुलौव्वल का ऐसा अद्भुत नजारा है कि सब इसी में लस्तम्पस्त हैं, फिर कौन देखे उनका आइडोलम!
कांग्रेस यदि तीन बार से लगातार शिकस्त खाकर राज्य-विधानसभा में उल्टा पल्ला है, तो इसके लिए वह मतदाताओं को दोष नहीं दे सकती और न ही यह कह कर बहाना बना सकती है कि मनमोहन सरकार में भ्रष्टाचार और महंगाई की पराकाष्ठा ने उसे राज्य-सत्ता से वंचित कर दिया। कोई कहता रहे कि आम जनता ने ही कांग्रेस के इतिहास को भुला दिया है, लेकिन यहां के मतदाताओं ने तो नगरीय निकाय चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशियों के सिर पर ताज पहिनाकर अपनी अभिव्यक्ति का खुला आगाज कर दिया, कि वे नेहरू-गांधी परिवार के त्याग और बलिदान को बिल्कुल नहीं भूले हैं। मिनी भारत भिलाई से लेकर राजधानी रायपुर में यदि कांग्रेस महापौर की कुर्सी पर है तो जनता का यह सन्देश नहीं तो और क्या है, कि छत्तीसगढ़ में कांग्रेस कमजोर नहीं, बल्कि कमजोर तो वे कांग्रेसी हैं जिनने नेहरू और गांधी की विरासत को ही विस्मृत करके रखा है! पूछा जा सकता है कि वैचारिक दारिद्र्य के शिकार लगते यहां के अनेक कांग्रेसी जुबान चलाने के अलावा करते क्या हैं? कांग्रेस के वैचारिक महापुरुष महात्मा गांधी ने केवल आजादी की लड़ाई ही नहीं लड़ी, बल्कि वे सीधे जनता से जुड़े और उनकी दैनिक और घरेलू समस्याओं के लिए भी चरम संघर्ष किया। चम्पारण में नीलहों का आन्दोलन इसका बड़ा उदाहरण है। फिर पंडित नेहरू को ही देख लीजिए, डिस्कवरी ऑफ इण्डिया उन्होंने यूं ही नहीं लिख दिया। उससे क्या सीख लेते हैं यहां के कांग्रेसी ?
नई दिल्ली का 10 जनपथ भी क्या न सोचता होगा, कि उनके परिवार की इतनी बड़ी कुर्बानियां क्या इसीलिए हुईं, कि कांग्रेस के लोग जब भी उसके दरवाजे आएं तो बस शिकायतों की फाइल और एक दूसरों को नीचा दिखाने वाले सबूतों का पुलिन्दा लिए अपने लिए पद-प्रतिष्ठा की मांग करने ही पहुंचें? कितने होंगे जो नि:स्वार्थ और जनता के लिए मर मिटने वाले आन्दोलनों की फेहरिस्त लिए दिल्ली दरबार में दस्तक देते हों? राहुल गांधी पूछ सकतें हैं यहां के कांग्रेसियों से, कि चलिए बताइए तो जनता से सीधे जुडऩे के लिए आपने किया क्या ? छत्तीसगढ़ में आदिवासी मर रहे हैं, बस्तर का पूरा इलाका युद्ध की चपेट में है, जनसमस्याएं नर्तन कर रही हैं और आप अपने में ही रस्साकसी कर रहे हैं। ठीक है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ आपने आवाज उठाई, किन्तु कितनों को सरंजाम तक पहुंचाया? यही छत्तीसगढ़ है जहां पं. नेहरू का नायाब तोहफा भिलाई इस्पात संयंत्र खड़ा है, यही वनांचल है जहां श्रीमती इन्दिरा गांधी के पैर आदिवासीजनों के पैरों के साथ थिरके थे और यही छत्तीसगढ़ है जहां राजीव-सोनिया गांधी को वनवासियों ने तीर-धनुष भेंट किए ? किसलिए ? इसलिए न कि वे उनसे प्यार करते थे। लेकिन अब ? अब आदिवासियों की बात ही छोडि़ए, कांग्रेसी-ही-कांग्रेसी से नफरत करता प्रतीत होता है। राहुल गांधी एक गुप्त आंकलन करा लें, पता चल जाएगा कि किस तरीके से यहां खांटी और अनुभवी कांग्रेसजनों को उपेक्षा का शिकार बना दिया गया है। भाजपा यदि आज भी डंके की चोट पर कहती है, कि वह चौथी बार भी राज्य में सरकार बनाकर दिखा देगी, तो उसके पीछे उसकी दंभोक्ति नहीं बल्कि सचाई छिपी है, कि वह सूत्र पकड़ चुकी है कि कांगे्रस को कोई और नहीं बल्कि कांग्रेसी ही हराएंगे उसे तो बस उन्हें उद्दीप्त करना है।

No comments:

Post a Comment