Saturday, 23 November 2019

मेरे प्राण!
कल रात आपके सुदर्शन व्यक्तित्व ने मुझे बेहद प्रभावित किया। सुन्दर तो लग ही रहे हो, ज्ञान की आभा भी झलक रही है। धीरे-धीरे परपक्वता आ रही है। विशेष कर लोगों को परखने और अपनी समझ को परिष्कृत करते रहने की ललक दिखायी दी। यही गुण है जो मनुष्य को आग ले जाता है। याद रखना, बाबा जब बर्मा की राजधानी रंगून में कमाने गए थे तब उनके पास सिवाय बुद्धि के और कुछ न था। एक साधारण से गांव से कलकत्ता होकर म्यामांर जाना, वह भी कमाने के लिए तब बड़ी बात थी। सोचे वे वहां कुलीगिरी नहीं किए और न ही दूसरों के आसरे जिए। उनने अपनी दुनिया खुद ही बसाई और उनके हुनर, उनके सिद्धान्त और उद्यमशीलता ने उनका साथ दिया। वे परोपकारी बहुत थे साथ ही स्वयं का विकास करना भी जानते थे। कभी पराश्रित न रहे। हम भी उन्हीं की सन्तान हैं। फिर आप तो आज एमबीबीएस का जो कोर्स कर रहे हो वह सब कुछ देता है लेकिन मुझे जो अच्छा लगता है वह देता एक सुन्दर व्यक्तित्व। तुम निरन्तर अच्छा सोचना और अच्छा करना। कभी किसी के बारे में गलत न  सोचना और कोशिश करना कि सकारात्मकता में कोई बाधा न आने पाए। अपने सिद्धान्त बनाकर रखना और चट्टान की तरह उस पर अडिग रहना। खूब पढऩा और खूब अच्छा खाना। दूध-दही के साथ प्रतिदिन एक फल खाना अच्छा रहता है। फलों में अनार और सन्तरा अच्छा रहेगा। वैसे सेब, जाम, केला आदि तो है ही। अपने डॉक्टरी हुनर को तो मन लगाकर पढऩा और उसे मांजते रहना। कभी किसी का दिल न दुखाना और न ऐसी बात कहना कि उसे खराब लगे। इस बारे में मैं आपको छुटपन से कितनी ही कहानियां बताता रहा हूं। शेष शुभ.. फिर लिखूंगा।
तुम्हारे पापा 

Friday, 22 November 2019

मैं बोल रही हूँ हिन्दी
-शिवनाथ शुक्ल
भोपाल विश्व हिन्दी सम्मेलन की अनुगूंज न केवल भारत वरन् पूरी दुनिया में सुनाई पढऩे लगी है। विश्व के एक से बढ़कर एक विद्वान इस सम्मेलन में शिरकत कर हिन्दी की जय-जय किए। उसे संयुक्त राष्ट्र संघ में आधिकारिक भाषा के तौर शामिल करने की जो कवावद लम्बे समय से चल रही है, वह अभी भी जारी है।
यहां सवाल यह है कि लगभग डेढ़ हजार वर्ष पुरानी हमारी भाषा हिन्दी जिसे पूरी दुनिया का सिरमौर बनाने की तैयारी चल रही है। उसकी स्थिति भारत में कैसी है? यह सवाल इस लिए भी कुनमुनाता है, कि हिन्दी का सोता भारत वर्ष में ही फूटा है, फिर भी उसकी दशा यहीं क्षीण होती जा रही है। हालांकि इस पर मतैक्य है। किन्तु सचाई को नहीं झुठलाया जा सकता, कि हिन्दी के साथ हो रहा विदेशी भाषाओं का घालमोल उसके अस्तिव को निरन्तर चोट पहुँचा रहा है। हिन्दी के लिए इससे बड़ी बात और क्या हो सकती है, कि जिसे हम संयुक्त राष्ट्र में ले जाने की तैयारी कर रहे हैं। वह अपने ही देश भारत में राष्ट्रभाषा का दर्जा तक नहीं पा सकी है।
न केवल अंग्रेजी वरन् समस्त भाषाएं इस बात की साक्षिणी हैं कि औपनिवेशिक भारतवर्ष की गुलामी की बेडिय़ों को तोडऩे में हिन्दी ने कितनी बड़ी भूमिका निभायी है। हम जब हिन्दी की बात करते हैं तो उसमें भारत में बोले जाने वाली समस्त भारतीय भाषाएं सन्निहित हो जाती हैं जिनने हिन्दी को सिर आँखों पर बिठाकर प्रान्त-प्रान्त मेंं क्रान्ति का अलख जगाने का काम किया है। भारत माता की जय की अनुगंूज उस वक्त ऐसी थी, कि उसकी आवाज आज भी गुंजायमान है और जिसे ब्रिटिश हुकूमत आज तक भूली नहीं होगी। तब नारा ए तकबीर, जो बोले सो निहाल, ब्रिटिश गो बैक जैसे कुछ नारे थे जो हिन्दी को तिलक  लगाकर तलवार और कृपाण थमाते थे। जिनके बल पर वीर क्रान्तिकारी देश पर कुर्बान हो जाया करते थे। महात्मा गांधी ने पूरे देश का भ्रमण कर सभी प्रान्तों और रजवाड़ों को यदि एक सूत्र में पिरोया तो वह हिन्दी की ही महिमा व देन थी।
आज वही हिन्दी कहां है? विख्यात समालोचक डॉ० नामवर सिंह ने भिलाई इस्पात संयंत्र के हिन्दी दिवस के एक कार्याक्रम में हिन्दी के शुद्धतावाद पर चिंताई जताई थी। वहीं प्रसिद्ध कवि अशोक चक्रधर ने अपने हालिया लेख में शुद्धतावादी से आगे क्रुद्धतावाद और युद्धतावाद का भी योग कर दिया। उनका निचोड़ है कि हिन्दी के भविष्य को लेकर सहृदय हो नए सिरे से सोचें। वहीं एक बड़ा वर्ग ऐसा भी है जो हिन्दी में किसी भी दूसरी भाषा के प्रवेश के खिलाफ है जो मानता है कि हिन्दी को हिन्दी ही रहने दिया जाए।
दरअसल चिन्ता हिन्दी के घालमेल की तो है ही, उससे बड़ी यह कि भारत में किसी भी प्रकार की हिन्दी की जगह अंग्रेजी तेजी से लिए जा रही है। अंग्रेजी का बढ़ता कारवां ही हिन्दी की चिन्ता का असल कारण है। फिर हिंगल्शि भी परवान चढ़ता जा रहा है।
आज आप देख लीजिए, अंग्रेजी माध्यम विद्यालयों की बाढ़-सी आ गई है। क्या निम्न और क्या उच्च, सभी भाग रहे हैं, कि हमारे बच्चे अंग्रेजी में पारंगत हो जाएं, चाहे उसका हिन्दी उच्चारण टूट ही क्यों न जाए। लेकिन जीभ अंग्रेजी को अंग्रेजी की भांति ले, तो मजा आता है। प्रतिष्ठा बढ़ती है। अब तो खतरा अन्य भारतीय भाषाओं पर ज्यादे बढ़ गया है, जो हिन्दी की जान हैं। कहां उर्दू, तेलगू, मलयाली, हरियाणी, बंगाली, भोजपुरी, छत्तीसगढ़ी, अवधी, बुंदेलखंडी, बिहारी, ओडिय़ा जैसी अन्य भारतीय भाषाओं में वह चीज बची है जो कल थी।
सिनेमा के टिकट जिसे जनमानस खरीदता है, वह तक अंग्रेजी भाषा में प्रिन्टेड है। आप बसों की टिकट देख लीजिए। हमारी भिलाई में सिटी बस शुरू हुई है जिसमें आम लोग सफर करते हैं, उसकी टिकट में प्रिन्ट अंग्रेजी में है। हमने सिनेमा एशोसिएशन के अध्यक्ष सुदर्शन बहल से इस बारे में बात की, तो उनने हिन्दी की जोरदार वाकलत यह करते हुए की, कि हमारे थियेटरों में टिकटों पर प्रिन्ट हिन्दी में ही होते हैं। लेकिन पीवीआर वगैरह में अंग्रेजी प्रिन्ट पर वे बोले की इसे हिन्दी में करना चाहिए। बैंकों में देखें तो वहां भी आम लोंगों का सीधा जुड़ाव है किन्तु अनेक निजी बैंक व बीमा कंपनियां आज भी हिन्दी को लेकर संजीदा नहीं हैं। इस बारे में हमने भिलाई इस्पात संयंत्र जन सम्पर्क विभाग के उप महाप्रबन्धक विजय मैराल से पूछा, तो उनने स्पष्ट कहा कि उनके यहां तो इसके लिए पूरा एक डिपार्टमेंट ही है राजभाषा। बकौल मैराल, हमारे यहां कामकाज हिन्दी में ही होते हैं। यहां तक कि वैज्ञानिक तरीके से हमने शब्दावली भी तैयार की है। संयंत्र के सीईओ एस.चन्द्रसेकरन को हिन्दी के लिए इस वर्ष महामहिम राष्ट्रपति पुरस्कृत भी कर रहे हैं। इस बारे में हमने भारतीय स्टेट बैंक के क्षेत्रीय प्रबन्धक सुनील कुमार लाला से बात की, तो उनका कहना था कि स्टेट बैक में सारे कामकाज हिन्दी में ही होते हैं। यहां तक कि बैंक के कर्मचारी-अधिकारी हिन्दी को और प्रोत्साहित करते हैं। लाला ने भी हिन्दी को स्कूलों में अनिवार्य किए जाने की वकालत करते हुए कहा, कि इसे राजभाषा की बजाए राष्ट्रभाषा का दर्जा दिया जाना चाहिए। चिकित्सा जगत में आज भी मरीजों को अंग्रेजी में लिखकर पर्ची दी जाती हैं। जिसे समझना मरीजें के लिए दुरूह होता है और मेडिकल वाले इसका लाभ उठाते हैं। इस पर चिकित्सक होने के साथ ही साहित्य प्रेमी-चिन्तन करने वाले डॉक्टर दीप चटर्जी से बात की, तो उनने करारी बात कही, कि मेडिकल साइन्स, इंजीनियरिंग साइन्स तो पूरी तरह से अंग्रेजी में है। अंग्रेजी तो फैल चुकी है पूरी तरह से। दूर न जाइए, सुप्रीम कोर्ट में चले जाइए और बात कीजिए हिन्दी में फिर देखिए। डिफेन्स के आला अधिकारियों की जबान पर कहां है हिन्दी? अब तो हिन्गलिश पैवस्त हो गया है हममें।
इस प्रकार अनेक सार्वजनिक जुड़ाव वाले संस्थानों व प्रमुख हस्तियों से बात करने पर लगा कि हिन्दी के पक्षधर तो सभी हैं, फिर भी हिन्दी अवमूल्यन की शिकार हो रही है। इससे इन्कार नहीं किया जा सकता, कि अंग्रेजी का प्रभाव निरंतर बढ़ रहा है और भारत के अनेक विद्वान इसे वक्त के साथ चलने की मजबूरी बता रहे हैं। लेकिन सवाल यह है कि चीन, फ्रांस, जापान, रूस जैसे देशों में तो बिल्कुल नहीं अंग्रेजी, फिर वे कैसे अपनी मातृभाषा में विकसित हो रहे हैं? यह तो तय है, कि कहीं-न-कहीं आज भी हमारा मानस अंग्रेजी को लेकर गुलाम तो नहीं लेकिन उसी के समान है।
हम भी इस बात के पक्षधर हैं कि भाषा को किसी बन्धन में बांधना सर्वथा गलत है। लेकिन भाषा के नाम पर जो लोग भी राजनीति करते हैं और कहते हैं कि व्यापार या केन्द्र-राज्य सरकारों व विदेशी मामलों में सम्पर्क या वार्ता केवल अंग्रेजी में ही संभव हो पाएगी, इसे तो समझना ही होगा। कोई कितना भी कह ले, लेकिन हिन्दी आज भी भारत में सर्वाधिक लोगों द्वारा प्रयोग की जाने वाली भाषा है। कितनी कोशिशें तो की गईं संस्कृत को धेनुमुद्रा में खड़ी कर हिन्दी को हकालने की, क्या हुआ? हिन्दी पर पश्चिमी आक्रमण के साथ ही अपने ही देश के लोगों द्वारा उपेक्षित व तिरस्कृत करने के बाद भी वह खिलखिला रही है और सन्देश दे रही है,  चिन्ता न करो.. मैं तब भी तुम्हारे साथ थी, आज भी हूँ और आगे भी रहूंगी।
(लेखक युवा साहित्यकार एवं पत्रकार हैं)
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Saturday, 2 November 2019

(9)
संध्या होने को है। लोगबाग आने लगे हैंं। गुड्डूू भाई साहब (सरोज दीदी के पतिदेव) के दर्शन होते हैं। शायद गिरिजा बाबा हैं, हमारे गांव के कृपा सुकुल भी दिख रहे हैं शायद।
इस तरफ नीलम दीदी फिर आईं हैं किसी काम-से और हमसे पूछीं हैं, "बच्चे मिले कि नहीं आपसे?"
"दिखे नहीं। आए हैं क्या वे दोनों भी?"
वे चली गईं और कुछ ही देर में सिम्मी और शिवम् आए हमने उनसे बातचीत की और बताया कि कैसे निखिल उन लोगों को याद करते रहता है। खूबसूरत और गुणी सिम्मी फेसबुक पर तो खूब एक्टिव रहती है। हमने दोनों-से कहा, कि पढ़ाई के मामले में भी ऐसे ही एक्शन मोड में रहा करो। वैसे तो दोनों बच्चे पढऩे में तेज हैं। आखिर उनके पापाजी भी तो प्रोफसर ही हैं तो बच्चे भला क्यूं पीछे रहेंगे। विद्या माई सभी को आशीर्वाद दिए हैंं।
टेंट के उस पार दूर वत्सल बाबू और शायद कि मानस बाबू और कु. नित्या की झलक दिखी है। बच्चे चंचल हैं। इन्हें भी काका का आशीर्वाद है। बर्थडे का फोटो दिखाया था निखिल-नीतीश ने हमें जिसमें बबुआ के साथ मुस्कुराते काका भी बैठे हुए आशीर्वाद दे रहे थे। खूब बढ़ें-पढ़ें ये सब।
अम्माजी यहीं बरामदे में बैठी हैंं। चुप मारकर। सभी को देख रही हैं मानो कुछ समझ नहीं पा रही हैं कि सहसा ये सब क्या होने लगा। काका के बीमार होने होने, बड़हलगंज में दिखाने, गोरखपुर में कुछ दिनों का इलाज चलने और चटपट चन्द्रलोक को प्रस्थान कर जाने की जो घटना घटी है वह किसी को भी हतप्रभ और सोचने के लिए मजबूर कर सकती हैं, फिर अम्माजी तो काका की सहधर्मिणी हैं। जिनने पल-पल उनके साथ काटे हैं। उनके प्रति हर किसी की संवेदना भरी हुई है। इसीलिए काकी (प्रकाश भैया की माताश्री) और भाभी लोग बात-बात पर उन्हें दिलासा और भरोसा देने वाली बातें कह-कहकर बारम्बार उनके आसपास ही घूमती रहती हैं ताकि वे अकेली न रहने पाएं।
शायद नाउन है क्या..जो अम्माजी के पैरों में नई पायल पहिना रही है। समझा-समझाकर और बच्चोंं की तरह बहलाकर। यह देख बिन्दू दीदी की आंखों में आंसू भरा जा रहा है लेकिन उसे रोक अन्य कार्यों में मन को व्यस्त रख रही हैं।
हम तो अम्माजी के हिम्मत की दाद देते हैंं। कितना तो समेट ली हैंं अपने को! इस घोर विपदा में भी कलेजे को मजबूत किए हैं। भीतर-से टूट चुके हृदय को भी सम्भाले रखना और घर-परिवार की जिम्मेदारी को ओढ़ लेना वाकई किसी बड़ी साध्वी-महीयसी के बस की ही बात है।
इधर जैसे-जैसे अंधेरा पसर रहा है, एक-एक कर गांव-घर और नाते-रिश्ते के लोग आते जा रहे हैं। घर के क्या छोटे और क्या बड़े यहां तक कि महिलाएं और बच्चे तक आए हुए लोगों की सेवा-टहल में लगे हैं। कोई पूड़ी लिए आ रहा है, तो कोई तरकारी। तीन-तीन प्रकार की तरकारियों की वजह-से अलग-अलग बर्तनों में गरम-गरम लेकर दौड़े आना भी कम बड़ी बात नहीं। गरम-गरम, करारी-करारी पूडिय़ां छनकर आती हैं और चट खतम हो जाती हैं। मिक्स वेज की तो खूब मांग दिख रही है। क्या तो चटखारे ले-लेकर खा रहे हैं लोग। रस में पगी बुनिया की रंगत भी देखते ही बनती है। लोग दोना में मांग-मांग कर खा रहे हैं। एक सज्जन तो घर ले जाने के लिए मांगने लगे, तो बिन्दू दीदी ने चटपट उन्हें देकर सन्तुष्ट किया। पट्टू बाबू पसीने-से लथपथ हैं। खूब भाग दौड़ करते दिखते हैं। अंगोछा लपेटे बनियान पहने दोपहर से ही दिशा-निर्देश देते अनिल भैया अभी भी किसी बात पर चिल्ला ही रहे हैंं। शायद पूड़ी आने में देर हो गई है या कि दही ठीक से नहीं रखा गया है। दीपू उस किनारे में किसी से कुछ कह रही हैं शायद। बहुत-से लोग हैं जिन्हें में चीन्हते नहीं। लेकिन देखने-से लगता है कि कोई-कोई विशिष्ट लोग हैं जिनसे हरिकेशजी हाथ जोड़-जोड़ मिल रहे हैं और अभिवादन कर रहे हैं।
एक चीज बड़ी अच्छी लगी, ब्राह्मणों के लिए चिउरा-दही की व्यवस्था भी कर दी गयी थी। अपुन तो उसी-से तर हुए। कितनी ही देर हो गयी, लेकिन प्रभाकर पाण्डेय भाई साहब और रत्नेश भाई भोजन नहीं किए हैं। वहीं बैठे लोगों से बतिया भर रहे हैंं। हमने उन लोगों से कहा, भोजन ठंडा हो जाएगा समय-से पा लीजिए। लगता है तरह-तरह के व्यंजनों के प्रकार ने लोगों को स्वाद-से आपूरति कर दिया है, तभी तो खाने के बाद हर किसी के चेहरे पर चटखारे लेने और होठों पर जीभ फेरने के दृश्य दिख रहे हैं।
रात गहरा रही है। भीषण गर्मी, वह भी चिपचिपी। लोगोंं ने लगभग भोजन कर लिया है। कल हमें अपने गांव (खखाइचखोर) जाना है। रत्नेशजी-से अनुरोध किए हैंं। उनने कहा है, कि अपने साथ लेकर स्वयं चलेंगे।
भीषण गर्मी है। आसमान खाली। पवन महराज भी रूठे लगते हैं। पत्ते तक शान्त और निर्जीव-से.. मानो काका के जाने की मायूसी हर तरफ बिखरी है। इस नियति को स्वीकार करने के सिवाय और दूसरा रास्ता ही क्या है..  (10)
अम्माजी कमरे में किसी काम से आई हैंं, भाभी की चटख आवाज सुनाई दी है..सुहानी सुबह ने हंसकर स्वागत किया मानो। वही धोबिन चिडिय़ां चींव-चींव करती लगी हैंं अपने काम मेंं। काम में छोटई भी लगे दिख रहे हैं। खरहरा के बाद गाय को नाद पर लगा वहां फैले गोबर को हटा रहे हैं फरुहा-से। एक हमारा समय था, कि हाथों-से गोबर काढ़ते थे और घूरे पर फेंक आया करते थे। लेकिन अब यह सब कौन करता है?
श्यामा गाय को देख रहे हैं। बेचारी नाद पर मुंह ले जाती है फिर छोटई की ओर देखती है मानो चीन्हने की कोशिश कर रही हो, कि "ये कौन है अजनबी! स्वामी कहां हैं मेरे, जो लाठी टेकते आते थे और माछी हांकते नेह किया करते थे।"
गैया का मुंह देखते हैं तो लगता है कि अब उसमें उछाह नहीं है, खुशी नहीं है। उदास है बेचारी। बेजुबान है तो अपना दुखड़ा किससे रोए? बस टुकुर-टुकुर देखे जा रही है। किसी ने बताया था कि "जब टिक्ठी उठ रही थी काका की तब खूब रम्भाई थी यह। कैसे तो खूंटे पर सिर पटक रही थी।"
किसी ने बताया, कि उसकी आंखों से भी अश्रू धार फूट पड़ी थी जब काका की पार्थिव काया को ले जाया जाने लगा।" वह मूक प्राणी भी शायद समझ गयी थी, कि उसके नाथ अब सदा के लिए उसे छोड़े जा रहे थे। कैसे भी थे, लेकिन कितना ख्याल रखे थे। शायद वह श्यामा भी सोच रही है, "कहीं मुझ अभागिन-से ही कोई गलती तो न हो गयी जो यों बीच रस्ते छोड़े जा रहे हैं।" गायों के बारे में कहते हैंं कि उन्हें घटने वाली घटना का पूर्वाभास हो जाता है। तो क्या इस गाय रानी को भी हो गया था, कि उसके स्वामी के जाते ही उसका खूंटा भी गया।
अभी देखिए न, कैसे तो जीभ बाहर निकाल फेंट रही है। छोटई का दिया भूसा-दाना खाना नहीं चाहती है क्या? लेकिन अब नाद में मुंह लगा रही है। धीरे-धीरे, क्या करे? पापी पेट है, न खाए तो जिए कैसे?
छोटई को गाय-बछिया सम्भालते देख सहसा काका कौंधे स्मृति पटल पर। वे कितने भी घुटनों-से लाचार थे, लेकिन गइया को सम्भालना खूब जानते थे। बांके पहलवान रहे थे अपने समय के। कई-कई बार बताया करते थे हमसे, कि कुश्ती में कैसे अच्छे-अच्छों को पछाड़ रावतपार का नाम रौशन किए हैं। फिर घीव-दूध-दही भी छक कर खाए हैं। दम था बाजुओं में उनके। तभी तो इस अवस्था में भी किसी-से इंच भर कम न थे। वो तो ईश्वर का बुलावा था। इसीलिए धमनियों में रक्त का प्रवाह कम हुआ तो हृदय की नलिकाओं को बहाना मिल गया। वर्ना अभी 10 वर्ष-से कम क्या जीते! लेकिन चलिए, जो लिखा है उसे कौन टार सकता है?
काम के बाद अब बरखी को लेकर बतकही चल रही है। कोई कहता है, कल होगा और कोई कहता है आज। इन्हीं बहस-मुबाहिसों के बीच लोग जाने की भी जल्दी में भी हैं। किसी को गोरखपुर जाना है तो किसी को अपने गांव-घर। 
हम बरामदे में आए हैं कि वन्दना आयी हैं, उनके लड़के दिव्यांशु और हिमांशु बाबू दिखे हैं। प्रणाम किए हैं दोनों। क्या तो लम्बे और छरहरे हो रहे हैं। अच्छे हाशियार बच्चे हैं। खूब आगे बढ़ें। शशि की तबीयत गड़बड़ लगती है। शायद पेट में तकलीफ है। वह भी तो लगी रही है इतने दिनों-से।
अम्माजी बैठी हैं मायूस। खोयी-सी। पूछने पर हूं-हां कर देती हैं। लगता है कुछ-कुछ याद करती रहती हैं। क्यूं न करेंंगी? गोरखपुर-से लौटने के बाद काका ने उनसे कहा था कि डॉक्टरों ने यहां काटा, वहां चीरा लगाया। आदि..आदि। सोचती होंगी, "क्यूं भेजे गए हॉस्पिटल? क्या जानें, न जाते तो बच जाते। लेकिन पेशाब उतर नहीं रहा था, पेट फूल रहा था। उफ-उफ कह इत-उत होते थे। न जाते तो और बुरा होता। ईश्वर की होनी है।"
शायद कौशल बाबू को भी निकलना है। उनकी श्रीमतीजी ने आकर प्रणाम किया है। बच्चे भी तैयार हैं। कोई फोन आ रहा है उनका। उधर पट्टू बाबू भी दिख रहे हैंं। फिर चाय आ गई है। कितनी पिएं ? कोई और आया है। हरिकेशजी आवभगत कर रहे हैं। बरखी का सामान बुलवाया जा रहा है। पंडीजी भी आ गए ही गए हैं।
ये कौन सज्जन हैं जो हमारी ओर ही आ रहे हैं..
 (11)
ओ.. तो नीलम दीदी आ रही हैं सज-धजकर। क्या तो खूबसूरती है भई उनकी। इस अवस्था में भी सबको फेल किए हैंं। मुस्कुराहट तो उनकी देखते ही बनती है। साथ में दाईं तरफ उनके श्रीमानजी भी हैं प्रोफेसर साहब। बड़ी तबीयत के आदमी हैं। सरल-सहज और सज्जन। सीधे आए हमारे पास। हम भी लपके उनकी ओर- "निकल रहे हैं क्या?"
"हाँ, अब काम है बहुत। जानते तो हैंं।" आवाज मद्धिम थी।
"सच है, आपके पास वर्कलोड भी बहुत रहता है। गोला कॉलेज ही आते हैंं न?"
"हाँ-हाँ। यह तो रूटीन है। और क्या करेंगे।"
"लेकिन पहले-से दुबले दिख हैं।" हमने सहज ही पूछा।
"नहीं, बस ऐसे ही है। कट रहा है समय।" वे फूल की तरह मुस्कुराए।
बहुत-सी बातें हुईं प्रोफेसर साहब-से। कहे कि "आपसे भेंट बड़े दिनोंं बाद होती है।" नीलम दीदी ने भी उनकी हां-में-हां मिलाया और यह कहते विदा हुईं कि गोरखपुर में पूरी व्यवस्था है आप आइए। और लोग भी निकल रहे हैं।
देवेन्दर मामा भी आए हैं। अम्माजी को समझा रहे हैंं। हमसे मुखातिब हुए हैं, बात हुई तो रोने लगे काका की याद कर। हमने दिलासा दिया। तो कहे कि वैसा आदमी होना मुश्किल है। वे बड़े भावुक हो गए हैंं मानो काका के रूप में उनकी कोई अमानत चली गयी हो। रोते-रोते भी अम्माजी को समझा रहे हैं- "आपन ध्यान रखिहअ। अब रोवले-गवले का होई? लइके-बच्चे बाडै़। सबक जिमवारी बा नै।" देवेन्दर मामा बड़े अच्छे लगते हैंं। एकदम सरलता की प्रतिमूर्ति। भेंट-मुलाकात हो रही है।
हमें भी तो खखाइचखोर जाना है। रत्नेशजी के दर्शन नहीं हो रहे हैंं। आएंगे कि नहीं। अमिताजी से पूछते हैं, तो कहती हैं आएंगे जरूर। हरिकेशजी टेंट वालों-से लेकर अन्य का चुकारा करने में लगे हैंं। इसी  बीच तय हो गया है कि बरखी आज ही होगी। बच्ची दीदी और गिरिजा दीदी के पास भी समय की कमी है।
इसी मेंं भोजना मांगने वाले असामी भी आते जा रहे हैं। बिन्दू दीदी ला-ला कर दिए जा रही हैं। इसी में अलग-से बुनिया मांगने वाले हैंं। उनकी भी इच्छा का ख्याल रखा जा रहा है। भोजन तो बहुत लोग किए लेकिन बचा भी बहुत है। वो मिक्स वेज वाली तरकरिया तो कहते हैं मुंह-सेे छूट नहीं रही थी, वह भी बची है।
अभी फिर-से पूड़ी-तरकारी बन रही है। घर के लोग ही बना रहे हैंं। बरखी है न। सामान सब हई है। कुछ लाना है तो गए हैंं हरिकेशजी। उधर अभिमन्यू भैया और भाभी भी बिजी दिख रही हैं।
गर्मी बहुत है। धोबिन सब भी गायब हैं। दुपहरिया को हम प्रभाकर पाण्डेय भाई साहब से कहते हैं कि क्यूं न बगीचे में बैठा जाए। मान गए हैं तो कुर्सी खींच वहीं चल दिए हैं। थोड़ा चैन है यहां। आंवला फला दिख रहा है। उधर बेल भी है। लेकिन सभी मौन हैं। इन वृक्षों को क्या हो गया है। सब-के-सब शान्त हैंं! क्या इन सबों को भी काका की याद सता रही है? याकि दुखी हैं कि अब उनकी आवाज सुनाई न देगी? पेड़-पौधों का भी संसार हमसे विचित्र नहीं। वे भी अपने लोगों पहचानते हैं। अपनों को देखकर हिलोर लेते हैंं और न देखेंं तो सिकुड़े रहते हैंं।
तिजहरिया हो रही है। लीजिए रत्नेशजी आते दिख रहे हैं। झोला मेंं कुछ लिए हैं। बतकही चल रही है। हम खखाइचखोर की ओर प्रस्थान करते हैं अब..आ जाएंगे जल्दिएै..
 (12)
..तो खखाइचखोर का संक्षिप्त प्रवास कर लौट रहे हैं। हाटा पहुंचे हैं तो समोसे की याद आ गई। एक बार यहीं डॉ.सतीश भैया ने समोसा खिलाया था। वह कार्नर की दूकान थी। करारे समोसे और टमाटर या कि इमली की चटनी बड़ी स्वादिष्ट लगी थी। प्रोफेसर सर प्रकाश भैया के साथ कुछ और लोग भी थे। शायद उस वक्त अनायास ही मुलाकात हो गयी थी हाटा में। खाने के बाद हम पैसा निकाल दूकानदार को देने लगे, तो प्रकाश भैया ने कहा तो कुछ नहीं, लेकिन हाथ ऐसे नचाकर हिलाए मानो आदेश दिए हों, कि बिल्कुल नहीं चलेगा और हमारे हाथ जहां-के-तहां थम गए। तब तक तो सतीश भैया ने लपककर दूकानदार को पैसा थमा ही दिया और हम थे कि इनकी उदारता का नमूना देखे-तो-देखते ही रह गए!
अभी तो समोसा खाने की इच्छा नहीं है। लेकिन खाकर उस दिन की याद को फिर ताजा क्यूं न कर लें। साथ प्रकाश-सतीश भैया न होंगे तो क्या, उनकी यादें तो होंगी। यही सब तो मनुष्य के जीवन को आनन्दमयी बनाती हैं। इसके बिना तो सब कुछ नीरस ही होता है।
लेकिन रत्नेशजी फटफटिया इतनी फास्ट भगा रहे हैं, कि देखते-ही-देखते चट-से हाटा निकल गया। अब क्या करें? वो समोसा, वो चटनी और वो हंसती-बिहंसती यादें.. क्या हसरत पूरी न होगी? कि कहला पार कर रावतपार चौराहा आ गया। मुडऩे को हुए कि वह स्थल जहां पर अनिल भैया के गैस की दूकान थी या कि आनन्द बाबू की, वहीं सड़क किनारे ठेले पर समोसे तले जा रहे हैं।
"रुकिए-रुकिए।" हमने हरका-से रत्नेशजी-से कह मोटरसाइकल रुकवा दी। हाटा न सही यहीं चलते हैं।
गए तो क्या देखते हैं कि कड़ाही में तेल के बीच समोसे शानदार तरीके-से नाच रहे हैं। उनका रंग श्वेत-से सुनहला हुआ जा रहा है। जैस ही तल कर निकाला तो हमने मांग लिया-दो-दो। उसने मिर्च भी दी। चटनी नहीं थी। वह मजा न आया जो प्रकाश-सतीश भैया के साथ हाटा में आया था।
घर आ गए हैं। बैठे हैं बरामदे में कि अमिताजी फूट लाकर काटने बैठीं। मोटे-मोटे हल्के पीले कलर के फूट बड़े अच्छे लगे।
हमारी अम्मां भी इस तरह के फूट की बड़ी शौकीन थीं। हम जब कभी जाते और सीजन रहता तो यह फूट खाने जरूर मिलता।
तो आज यह शौक अमिताजी पूरा कर रही हैं। उन्हें फूट काटता देख सहसा हमें हमारी अम्मां याद आयीं। वह दिन सोच आंखें सजल हो गईं।
अमिताजी पूरी तन्मयता के साथ उसे छील रही हैं। यह लड़की भी बेचारी देखिए, कि इतने दिनों-से लगी हुई है। काका के बीमार होने के समय से ही घरेलू काम में हाथ बँटाती है। स्वयं तो स्वास्थ्य को लेकर परेशान है उसके बाद भी लगी हुई है। अच्छी बात है यह।
फूट कट चुका है। नारंगी रंग है और रसदार भी है। खाने पर भकर-भकर नहीं लगता। उसका रसास्वादन कर रहे हैं हम और प्रभाकर भाई साहब, रत्नेशजी और लोग भी। बिन्दू दीदी को देखते हैं, वे शायद भीतर या कि उस घर गई हैं।
 (13)
संध्या ढलने लगी है। बाहर बड़ा वाला पंखा लगा है। लोग बैठे हैंं। अनिल भैया और भाभी कुर्सी पर हैं। किनारे अरुण भैया हैं इत-उत होते शायद खैनी मल रहे हैंं।
सामने चेयर पर अध्यापक सर अमित तिवारीजी विराजमान हैं। शान्त और गम्भीर बैठे कुछ मनन कर रहे हैंं शायद। उधर बच्चियां खेल रही हैंं। इधर अम्माजी बैठी हैंं भुइयां! अभिमन्यू भैया भी दिख रहे हैं। हम भी आकर बैठ गए।
किसी ने अमित बाबू की ओर इशारा कर हमसे पूछा- चिन्हअत हईं इनके?
कइसे नाइं चीन्हअब? अमित बाबू-से कुछ साल पहिले एहीं छतवै पर त मुलाकात भइल रहल। केहू अउर रहल साथे वो समय।
सुनते ही भाभी खिलखिलाकर हंसी- देखलीं बाबू पहिचान गइलीं। अइसन-वोइसन नाइं हवैंं हमार बाबू।
हम भी मुस्कुराए और अमित बाबू-से उनके बारे में पूछने लगे। यही, कि "अध्यापकी कैसी चल रही है। वहां का और क्या हाल है? गांव-घर मेंं कैसे हैंं लोग?" आदि-आदि। सरल व्यक्तित्व अमित बाबू ने तफसील-से बताया। तब तक बिन्दू दीदी भी और कि वन्दना भी याद नहीं आ रहा है, लेकिन बड़ी भाभी (श्रीमती अभिमन्यू भैया) भी आकर बैठ गईं। बिन्दू दीदी ने पंखे को देखा और कहा, कि गर्मी बहुत है आज।
इसी में नीतीश के एमबीबीएस की बात चल निकली तो अमित बाबू ने उसके बारे में बहुत सारी बातेंं बतायीं कि एमबीबीएस में कैसे-कैसे, क्या-क्या होता है। हॉस्टल और अन्य जानकारियोंं-से भी अवगत कराए।
बड़े नालेजेबल व्यक्ति हैं भई।
बन्नी और पट्टू बाबू भी आ गए हैं। आते ही दोनों ने उलाहना दिया- आजकल आप व्हाट्सएप-से दूर क्यों हो गए हैं? रहते हैं तो अच्छा लगता है।
हमने उन्हें अपनी मसरूफियत और समय का हवाला दिया। पट्टू भी नीतीश के बारे में पूछ रहे हैं। बहुत खुश हैं, कि वह अपनी मंजिल की ओर बढ़ा जा रहा है। हरिकेशजी भी आ गए हैं। गोलाकार में अच्छे लोग बैठे हैंं। भीतर भोजन की तैयारी चल रही है।
तभी किसी का फोन आया बिन्दू दीदी ने उठाया तो उधर से रोने की आवाज सुनाई दी। पता चला कि जगन्नाथ जी का फोन दिल्ली से था। वे काका के बहिन के बेटे हैंं। हम नहीं देखे हैंं उन्हें। उनकी शिकायत है कि कल ही उन्हें काका के दिवंगत होने का पता चला है। उनकी आने की बड़ी इच्छा है, लेकिन क्या करें। दिन निकल गया।
बिन्दू दीदी उन्हें समझाती हैं, हरिकेशजी समझाते हैं। हम अनिल भैया से इस बावत पूछे तो उनने बताया यहां उनके यहां कोई मिला नहीं वैसे जानकारी दी गयी थी। वे थोड़े-से झल्लाए भी कि वे लोग भी लापरवाह हैं।
हमेंं कल भिलाई के लिए प्रस्थान करना है। सोच रहे हैं..सड़क खराब है तो जल्द ही निकल जाना चाहिए। निखिल निकला था तो इस खराब सड़क ने ही उसकी ट्रेन छुटवा दी थी। वो तो अच्छा रहा कि काका का आशीर्वाद और रावतपार के लोगों की शुभकामनाएं थीं कि बनारस में उसे दूसरी ट्रेन मिल गयी थी। तो हमें जल्दी निकलना होगा।
लीजिए, भीतर-से बुलावा आ गया। भीड़ हुर्रा हो गयी।  
 (14)
सुबह की लालिमा फैलने लगी है। द्वार पर सफाई-कार्य शुरू है। यही काका होते, तो आ जाते लाठी टेकते और कुछ-कुछ निर्देश देते अम्माजी-से लेकर बच्चों को। गाय के समीप जाते, न भी बनता तो अख्तियार भर जरूरी काम तो निबटाते ही। लेकिन आज सूना है उनके बिना यह दूर तक फैला दुआर..धोबिन चिरइयां और वो देखिए छोटई भी लग गए है अपने काम में। गैया अभी भी जीभ फेंट रही है पता नहीं क्यों। अम्माजी कुछ निर्देश दे रही हैं। वे बड़े तरीके-से निभा रही हैं अपनी महत्त्वपूर्ण जिम्मेदारी। लगता है कि उन्हें इस बात का भान हो गया है, कि न केवल अपने स्वयं की बल्कि अब काका की भी जिम्मेदारी उन पर ही आन पड़ी है और वे बड़ी समझदारी-से इस दोहरी जिम्मेदारी को निभातीं अपने को संयत बनाए रखी हैंं। सभी पर ध्यान रखती हैं।
हम काकी (आनन्द बाबू की माताश्री)के बारे में भी सोचते हैं। देखते हैं
इतनी बीमारावस्था में भी चलायमान हैं। कल शाम हम उनसे मिलने गए थे। तब वे हमें देखते ही अंचरा फैला बड़ा आशीर्वाद दी थीं। दादा भी बैठे थे वहीं। लगे बताने काका की महिमा, कि कैसे वे सभी भाइयों और बच्चों के लिए होम हो जाया करते थे। उनसे यह भी पता चला, कि काका ने सभी के पालना में अपना अहम् योगदान दिया था। काका की महिमा बताते-बताते दादा की आंखेंं तर हो गयी थीं। चश्मा निकाल आंसू पोंछने लगे थे। अपने विवाह में काका के योगदान को बताना भी वे न भूले। हम सोचने लगे कि क्या तो जानदार थे भई अपने काका। सभी तो उन पर जान देते हैंं। सरोज दीदी आकर बैठ गयी थीं और वे भी हां-में-हां मिला रही थीं। काकी को हमने बहुत सांत्वना दी।
सुन्दर-से प्याले में चाय आ गयी है। 12 तक हर हाल में निकल जाना चाहते हैं। पट्टू बाबू जा रहे हैं अपने कर्तव्य-पथ पर। अभिमन्यू भैया और भाभी से बात होती है। बिन्दू दीदी हमारी तैयारी में बिजी हैं। उधर श्रीमती सुषमा भी रसोई तैयार करने मे लगी हैं शायद। जबकि हमने पहले ही कह रखा है, कि इतनी सुबह हम भोजन नहीं करते, इसलिए तकलीफ न कीजिए। तब भी लोग हैंं कि मानेंगे नहीं लगता है। अपनत्त्व का यही तो अन्दाज है, जो बाद में स्मृतियोंं को मांजे रखता है। प्रभाकर पाण्डेय भाई साहब से बात होती है।
ये देखिए, भाभी (प्रोफेसर सर प्रकाश भैया की श्रीमतीजी)आयी हैं मिलने। सरलता की प्रतिमूर्ति हैं भाभी। बोलती हैं तो होठों-से मिठास झरती है मानो। एकदम महीन आवाज में गरिमामय ठेठ भोजपूरी के शब्द और हिन्दी सुन लें तो भी अवाक रह जाएं। रहन-सहन और बोली-बात में सहजता इतनी, कि लगता ही नहीं, कि इतने बड़े शिक्षाविद् की सहधर्मिणी और इतने गुणी बच्चे-बच्चियों का सृजन करने वालीं ममतामयी मां होंगी। हम सोचते हैं, कि ऐसी ही स्त्रियां हैंं तो हमारे घर हैं वर्ना तो यह वेस्टर्न कल्चर न जाने कहां ले जाकर छोड़ेगा हमें।
तो वे बैठ गयी हैं समीप ही। हालचाल पूछ रही हैं। निखिल का बड़ा बखान कर रही हैं। नीतीश के एमबीबीएस पर हर्षित होकर कहती हैं कि यह बड़ी बात हुई है। मुस्कुरा कर ऊषाजी-से बहुत अच्छी-अच्छी बातें करती हैं और अपनत्त्व के साथ कुछ-कुछ बताती भी हैं। काका के बारे में भी बात करती हैं। अम्माजी को भी समझाती हैंं। बड़े गाम्भीर्य तरीके-से वे अपने घरेलू दायित्त्व का बोध करा देती हैं जिससे गुमान होता है हमें उन पर। छोटी भाभी (श्रीमती डॉ. सतीश भैया) और गुडिय़ा (श्रीमती बबलूजी) को नहीं देख सके हैं। लगता है वे लोग निकल गए हैंं कल ही।
आनन्द बाबू की श्रीमतीजी की झलक जरूर मिली थी। 
लीजिए, भोजन का बुलावा आ गया है। चावल-दाल, रोटी-सब्जी और साथ में ग्रीन सलाद। कच्ची रसोई है ठीक रहेगा। अभी तक तो पूड़ी-मसालेदार तरकारियां और मिष्ठानादि ही चल रहे थे। लेकिन सादा भोजन सफर में सहायक होगा। आराम-से बर्थ पर लेटो और "द मिरर" पढ़ते निकल चलो छुकछुक-छुकछुक रेल की मधुर आवाज सुनते। स्टेशनों पर चाय, करारी-करारी भजिया-पकौड़ी, जलेबी, समोसे तो तर करते ही रहते हैं।
अनिल भैया भी निकलते दिख रहे हैंं भाभी को लेकर। पूछते हैं तो कहती हैं, कि बड़हलगंज निकल रही हैं डॉक्टर को दिखाने। हम कहते हैं चलिए, पीछे-पीछे हम भी आ रहे हैं। गर्र-से मोटर साइकल रवाना हो गयी है।
याद आती हैं रेनू और गुडिय़ा। दोनों अपने परिवार के साथ हैं, कितने वर्षों-से नहीं मिली हैं ये प्रिय बच्चियां..हमारी अटैची तैयार है..
(15)
अरे, ये क्या हो गया! भीतर-से रोने की आवाज! कोठरी में पहुंचे तो देखते हैंं ऊषाजी काका की तस्वीर को सीने-से चिपटाए हबस-हबस कर रो रही हैं। उनकी आंखों-से अश्रुधार फूट पड़ी थी। देखकर हम तत्क्षण ठक् हो गए, ठकमुर्री मार गयी। जाते-जाते ये हृदयविदारक दृश्य। हमारे पास उन्हें चुप करवाने की हिम्मत न थी। अब वे थीं और उनके हृदय में समायी काका की तस्वीर थी। वे फूट-फूट कर रो रही थीं। उनकी आंखों के मोती काका की तस्वीर पर झरने लगे मानो काका भी इन मोतियों-से निहाल हो रहे हों। कि उनकी मंझली बिटिया ने अपना फर्ज अदा किया है।
28 वर्ष पूर्व किन परिस्थितियों में उनने ऊषाजी का विवाह किया था भला कौन नहीं जानता? एक वह दिन था जिसे सोचते ही रोआं काँप उठता है। परिवार के एक-एक सदस्य के माथे पर शिकन थी, नाना प्रकार की दुश्चिन्ताएं थीं। कि ऊषा का कल क्या होगा?
लेकिन आज देखिए!
अभी उस दिन बिन्दू दीदी ही बताने लगी थीं, ऊषा को देखते ही काका विह्वल हो गए थे। मारे खुशी के फूले न समा रहे थे। उसकी शरीर को देखकर उनके मुंह-से निकला था, "हई देखअ हो, बुझाता कौने राजा के घर-से आइलि है।"
काका को निखिल और नीतीश पर भी कम गुमान न था। निखिल के मैकेनिकल इन्जीनियर बनने की जितनी खुशी उन्हें मिली थी, कमोवेश उतनी ही खुशी नीतीश के डॉक्टरी प्रवेश पर भी मिली थी। हमसे वे और कौन-सी निधि चाहते भला?
तीन-तीन बेटियों और बेटे हरिकेश का क्या तो शानदार विवाह उनने किया था। तीन-तीन दिनों की बारात थी, जिसकी जितनी खातिर की गयी उतनी और कोई क्या करेगा? देखिए कि बुढ़ापे को कभी पास न फटकने दिए और मृत्यु पर्यन्त कर्माेद्यमी बने रहे। इसीलिए तो बड़े गर्व और सम्मान के साथ विदा हुए इस जंजाल-भरी दुनिया-से। ऐसा कोई न था जिसने नम आंखों-से उन्हें अन्तिम विदाई न दी हो। यहां तक कि गांव वाले भी उनका जस गा रहे थे।
ऊषाजी का रोना देख भला कौन होगा जो अपने को रोक सके। लेकिन सभी ने अपने दिल को थाम लिया। सबकी आंखेंं बह निकलतीं तो सामने अम्माजी थीं, उनका क्या हाल होता?
बिन्दू दीदी ने ऊषाजी को सम्भाला और उनके सीने-से लगी काका की फोटो लेकर कोठरी में ससम्मान रख दीं। तब तक प्रभाकर पाण्डेय भाई साहब, भाभी व अन्य लोग हर जतन-से दिलासा देने लगे।
ये लीजिए हरिकेशजी की मोटर साइकल निकल गई है। जाने को तैयारे खड़े हैं। रोते-रोते ऊषाजी जा-जाकर अपनी काकी,भाभी आदि से लेकर अन्य हृदय परिजनों का भेंट-अँकवार ले रही हैं। उनके रोते चेहरे को देख सभी मायूस हैं। दिलासा देते दिखते हैं।
अटैची बाहर आ रही है..
(16)
बिन्दू दीदी लगता है दही-चीनी लेकर आ रही हैं क्या! बड़ी भाभी भी मिल रही हैं। हम खड़े-खड़े मिलने-मिलाने का यह भावभीना दृश्य देख रहे हैं।
ऊषाजी यहां की हर वस्तु को बड़े प्रेम-से देख रही हैं। क्या तो मायका-प्रेम होता है न ? लाखों दुख हों, लेकिन मायके पर सारे दुख निछावर। कभी-कभी, "नइहर नगरी बाबा बड़ा निक लागै। बाग निक लागै, बगइचा निक
लागे..।" जैसे भाव-प्रवण गीत ऐसे ही मौकों पर अपनी सार्थकता सिद्ध करते
दिखते हैं।
हम सोचते हैं, जिन लोगों के बीच ऊषाजी का बचपना बीता, जिनके बीच पलीं और
बड़ी हुईं, जिनकी डाँट-डपट सुनते-सुनते फ्रॉक-से साड़ी पहिनना सीखीं उनको
छोडऩा सचमुच कितना दर्द देने वाला होता होगा न? हम इसे केवल महसूस कर
सकते हैं। एक तो काका के छोड़ जाने की पीड़ा, ऊपर-से अपनों का विछोह
ऊषाजी को किस कदर मथे रखा है, यह उनकी अश्रुपूरित आँख और बिलखते चेहरे को
देखकर समझा जा सकता है। फिर इस बार तो हमें लगता है कि शादी के बाद पहली
बार इतना समय बिताई हैं अपने घर-अंगनाई में। सबके साथ पंगत में बैठकर
नीक-बाउर खाई हैं। इस बार का दर्द कुछ और ही है, जो उनके अन्तस को हिलाए
है। तभी तो एक बार मिल लेने के बाद फिर-फिर लौटती हैं। फिर मिलती हैं और
आती हैं, मानो उन्हें तसल्ली ही न मिल रही है।
श्रीमती सुषमा भी कुछ देख रही हैं, शायद झोले में कोई सामान रख रही हैं।
हम बाहर आ गए हैं। मोटर साइकल तैयार है। हरिकेशजी ने एक ही किक में उसे
स्टार्ट कर दिया है। अटैची ले बैठ गए हैं हम।
सहसा काका याद आते हैं। होते तो क्या चुप बैठते? अब तक तो धोती खुँटिया,
छोटकी सइकिलिया लिए पहुंच गए होते चौराहा पर हमसे पहिले। वहां समझाते और
जीप पर बैठा कर उसे कुछ निर्देश देते और रवाना करते हमें। लेकिन नहीं, इस
बार तो वे दूसरी ही दुनिया में हैं हम लोगों को छोड़।
हरिकेश जी ने फर्स्ट गेयर लगा दिया है। मोट्साइकल चलने को है, कि नजर चली
गयी गैया पर! मानो बुला रही हो, "जाते-जाते क्या हमें न देखोगे प्रभु!"
देखे तो क्या देखते हैं, कि वह अपने दोनों कानों को अपनी आंखों की ओर
खड़ी कर एकटक नेह-से देख रही है। बेहद उदास है, जैसे कह रही हो, "काका
निकले तो अब अन्तिम मुलाकात हमसे भी है। फिर न मिलेंगे।"
मोटरसाइकल की आवाज उठी है, चक्का चलने लगा है। अम्मा की ओर निगाहें अपने
आप चली गयीं। उनकी आंखें तो तर है आंसुओं-से। लेकिन बहने से रोके रखी हैं
शायद। उनका सीधापन और नेह-नजरें उस गैया-से तनिक भी कम नहीं हैं। कितनी
भोली, कितनी मासूम और कितनी सीधी, ओह! अम्माजी को देखते ही सीने-से हूक
उठती है। हम ईश्वर-से प्रार्थना करते हैं, "काका की अमित शक्ति अम्माजी को मिले। वे सामर्थ्यवान हों। सभी को अपना प्यार लुटाएं। घर-गृहस्थी को उत्साह-से सम्भालें और बहुत जल्द उनसे दोबारा मुलाकात हो।"
चल दी मोटरसाइकल। अभी लिली होती तो पीछे-पीछे दौड़ती और सड़क तक छोड़़
आती। लेकिन नहीं है पर भी याद है। सड़क पर आ गए हैं, फिर कर देखते हैं.. सभी अपने खड़े हैं। हाथ हिला रहे हैं..अब तक शान्त हमारी आंखें भर आयी हैं। अपनों को छोड़ते जो दर्द होता है, वह हमारे दिल में अब तूफान बन कर उठ खड़ा हुआ है।
अच्छा, तो चलते हैं..
अलविदा रावतपार !
                                इति
(२)
दूसरे दिन रावतपार जाने को तैयार हुए। सीजन न होने पर भी ट्रेन में पैर रखने की जगह न थी। तिस पर तबीयत भी कुछ नासाज। फिर भी हिम्मत बांध कर ट्रेन में चढ़ गए। बनारस पहुंचे तो आगे ले जाने वाली कृषक एक्सप्रेस छूट गई। वहां से सीधे बस स्टैण्ड गए। गोरखपुर वाली बस लगी थी, बैठ गए। वर्षा-ऋतु में भी बड़ी उमस और चिपचिपी गर्मी! रात 11.30 के लगभग रावतपार चौराहा पहुंचे। हरिकेशजी खड़े थे, ऊषाजी के साथ। हम उतरे और इनके साथ निकले। रास्ते में सोच रहे थे, और बार आते थे तो बाबूजी-काका इन्तजार करते मिलते थे। कुछ वर्ष पूर्व बाबूजी चन्द्रलोक के लिए निकले तो काका अकेले ही खटिया पर बिस्तरा आदि लगाने की गुहार करते मिलते। एक लिली थी, जो दौड़े आती थी, वह भी दगा दे गई। लेकिन इस बार..सोचते ही मन थर्रा उठा। द्वार पर जाऊंगा कैसे? अम्माजी क्या कर रही होंगी? जैसे प्रश्र उमड़-घुमड़ रहे थे। तब तक द्वार आ ही गया। एकदम सूना और निचाट। कोई हलचल नहीं। यही पहले था तो सबसे पहिले तो लिल्ली ही कुंकुआते दौड़ पड़ती थी। फिर अम्मा और काका आंखें पसारे रहते।
लेकिन इस बार, सब सूना..मोटरसाइकल से उतरते ही चौंके! मानो काका बोले हों, "बड़ा देर कइलीं।" देखा तो अरुण भैया खैनी मल रहे थे, उदास।
बरामदे मेंं अम्माजी दिखीं, चुप! एकदम भाव-शून्य। बाहों में भरकर हबस पड़ीं। बिन्दू दीदी, अमिता आदि-से मुलाकात हुई। इस बारिश के मौसम और आधी रात में भी वहां भीषण गर्मी थी। इतनी की सहन न हो रहा था। स्नान किए तो जरा तरी मिली, लेकिन कुछ ही देर में उमस ने फिर परेशान किया। तो छत पर चले गए वहां भी चैन नहीं। लौटकर कमरे में आए और लेट गए। थकान थी, कब नींद लगी और कब भोर हुआ पता न लगा।
 (3)
आसमान में लाली फैलने लगी थी। चिडिय़ों की चहचह सुनाई दी। पहले तो गौरैया दिखती थीं, लेकिन वे नहीं हैं इस बार। इन बड़ी-बड़ी चिडिय़ों को देख सोचे, ये किस प्रजाति की हैं सब? जो तन्मय होकर दाना चुग रही हैंं। पता किए तो बताया गया, कि धोबिन कहतें हैं इन्हें। मुस्कुरा उठे हम। सोचे, धोबिन को तो शुभ कहा जाता है अपने यहां। मतलब अशुभ में भी कहीं-न-कहीं शुभता का सन्देश आ रहा है। सच भी है, ईश्वर अगर कभी दुख देते हैं तो सुख का साहस भी भरते हैं। इसी के बल पर तो ये जिन्दगानी है।
हम उठे बरामदे में आए ही हैं, कि भाभी (श्रीमती अनिल भैया) का उदास, किन्तु हहास भरा स्वर गूंजा- "आईं बाबू, एहीं आ जाईं।"
उनके स्वर में प्रेम इस कदर बोलता है, कि मुस्कुराहट को कितना भी रोको होठों को छुए बिना नहीं मानती। इससे पहिले कि हम उनके चरण छूएं, प्यार-से पकड़ लीं और पास ही चौकी पर बिठाईं।
तब तक बाबू पट्टू, उनकी कर्मठ श्रीमतीजी और उनके दोनों बच्चों ने पालागन की रस्म अदा की। अनिल भैया को प्रणाम किए, तो वे मुहब्बत-से हालचाल पूछे। बड़ा अपनत्त्व देते हैं ये लोग। इतनी, कि प्रशंसा के लिए हमें शब्द खोजने पड़ेंगे।
बाहर निकले और नए घर में आए तो प्रभाकर पाण्डेय जी बैठे मिले। उनसे ढेर-सी बातें हुईं। मुम्बई का हालचाल पूछे। उन्हें खरीदी के सिलसिले में कहीं जाना पड़ गया। तब तक कुमारी शशि ने सुन्दर-से प्याले मेंं चाय ला दिया। भाभी (श्रीमती अभिमन्यू भैया) दिखीं। रुआंसी जैसे खूब रोयी हों..पालागन किए तो धीमी आवाज मेंं समाचार पूछीं। वे हर बार नए अन्दाज मेंं होती हैं। लेकिन उनके प्यार का अन्दाज कभी नहीं बदलता। एकदम अपनापा। लगता है दिल में बिठा लेंगी। अभिमन्यू भैया भी मिले। समाचार पूछे और चाय के लिए अन्दर आवाज दिए कि हमने कहा, शशि ने पिला दिया है। मानो वे संतुष्ट न हुए। कितना मानते हैं ये लोग हमें।  थोड़ी ही देर में पीहू और कलश ने आकर बिना किसी के कहे प्रणाम किया। इन दोनों छुटकुओं के संस्कार देख हमें बड़ा गर्व हुआ। तभी वन्दना आईं और प्रणाम कीं। समाचारों का आदान-प्रदान हो ही रहा था कि बन्नी भी आ गईं। उनकी गोद में इस बार जानू थी। बेहद खूबसूरत और चंचल आंखों वाली। हमने रुनझुन के बारे में पूछा तो बताईं कि वह अन्दर ही कहीं खेल रही है। बिन्दू दीदी, अमिता, अमृत की मम्मी और उनकी बहिनें कुछ-कुछ करती दिख रही हैं। इसी में वे हमसे भी बतिया लेती हैं।
लीजिए, कुछ लोगों की आवाजाही दिख रही है। लगता है कोई कार्यक्रम होना है..

 (4)
सुबह-से ही तैयारी होने लगी थी। 28 वर्ष पूर्व जहां हमारे विवाहोत्सव पर 3 दिनों तक बारात रुकी थी, वहीं पिंडादि पारने और अन्य कर्मकाण्ड का कार्यक्रम था।
हमने वहां जाने की इच्छा जताई, तो ले गए तो वे लोग मोटरसाइकल-से, साथ प्रभाकर पाण्डे भाई साहब भी थे। वहां का दृश्य बेहद गमगीन! हरिकेश जी का परिधान, उनकी भाव-दशा देख, मन 'आह!' कर उठा। 
एक वह दिन याद आया जब हमारे विवाह के समय बहुत छोटे थे। द्वारपूजा के बाद उन्हें देखा तो हाफ पैन्ट और बुशर्ट पहिने तख्ते पर खामोश बैठे थे। अबोध.. वे वैसे ही थे जैसे अभी अक्षत हैं।
लेकिन हा समय! अभी धोती-बनियान पहिने कुश-आसन पर बैठे हैं। सामने सिर पर साफा लपेटे पण्डितजी हैं। बीच में दोना-पत्तलों पर रखीं पिण्ड सामग्रियां लाइन से लगी हैं जिसमें पंडित के कहे अनुसार वे कर्मकाण्ड कर रहे हैं। सामने अमृत और अक्षत के साथ ही प्रांजल आदि उनकी मदद कर रहे हैं। एक स्त्री शायद नाउन रही होगी वह भी कुछ-कुछ कर रही है।
जलम्-सुजलम्..पुष्पम्-सुपुष्पम्..अन्नम्-सुअन्नम्.. ऐसे ही न जाने कितने-कितने मन्त्र और उसकी बारम्बार की आवृत्तियां.. बार-बार की बदलती शारीरिक क्रियाएं इतनी बोझिल और थकाऊ कि शरीर परेशान हो जाए। लेकिन कर्मकाण्ड था जो अनिवार्य है। इसे करते हरिकेश जी के होंठ भिंचे हुए थे मानो समझ न पा रहे हों कि आखिर हो क्या रहा है! इस उमर में जहां लोगों को पिता के साथ की बड़ी जरूरत होती है, वहां इस नौजवान को यह कर्म करना पड़ रहा है तो सोचा जा सकता है कि उसकी मनोदशा क्या होगी?
बगल में कुर्सिया लगी हैं। जहां डॉ. सतीश भैया, बबलूजी, बाबू कौशल से लेकर गांव-घर के अन्य लोग विराजमान हैं। हम भी बैठ गए और एकटक हरिकेशजी द्वारा किए जा रहे कर्मकाण्डों को देखे, तो देखते रह गए!
कुछ ही देर में आदरणीय बबुआ भी आ गए, देवेन्दर मामा भी। प्रणाम के लिए उठे, तो वे सरल हृदयी स्वयं ही समीप आ गए और हालचाल पूछे। उनका मुख-मण्डल भी निश्तेज मानो हृदय में रो रहे हों। हम साहस न कर सके कि कुछ बात कर सकें।
तभी मोटर साइकल-से कोई आया और कहा कि अम्मां वहां सीना पीट-पीटकर दहाड़ें मार रही हैं। हम भागे, तो देखते हैं कि कोठरी के एक कोने में दुबकी वे हबस-हबस कर रो रही र्हैं। बिन्दू दीदी, ऊषाजी आदि उन्हें चुपवा रही हैं। हमने उन्हें अपने सीने में दुबका लिया और ढांढस बंधाने लगे। लेकिन यह तो सांत्वना मात्र था। सचाई तो यही है कि जिस स्त्री का सुहाग चला गया उसे कोई किन शब्दों में समझाया जा सकता है। आखिर बाल-बच्चों और घर-गृहस्थी के अलावा स्त्री का असल संसार तो उसका सिन्दूर ही है न? और वही चला जाए तो! कितने अरमान-से अम्माजी रखतीं थीं काका को। उनकी एक खुशी के लिए अपने को निछावर कर देने की जो बात उनमेंं थी वह हमने और कहीं न देखी। लेकिन यही आज है, कि वे भाव-शून्य हैं। समझा-बुझा उन्हें शान्त कराए।
तभी कन्हैया भाई साहब आ गए, उनसे भी कुशल क्षेम हुआ। गिरजा दीदी और बच्ची दीदी भी थीं जिन्होंने आशीर्वचन के शब्द कहे। इसी बीच एक अन्य व्यक्ति आए जिन्हें मिट्ठा-पानी दिया जा रहा था। परिचय पूछने पर पता चला कि बैदौली-से आए हरिकेश जी के चाचा ससुर हैं। प्रणाम किया। अम्मा के भतीजे पुलस्त भैया से भी मुलाकात हुई। अनुराधा (पुत्तुल) भी आईं और प्रणामादि के बाद समाचार पूछने लगीं। अनुराधा बड़ी चुहलबाज हैं, सहज ही घुलमिल जाती हैं। हाटा में उनका खिलाया वह पेड़ा हमें कभी भूलता नहीं। बात हो ही रही है, कि आंगन में सेज्जा की तैयारी होने लगी। अरे! यहा क्या..
(5)
आह! दर्द-भरा दृश्य! आंगन में गांव-घर, नाते-रिश्तेदारों की भीड़, इतनी कि पैर रखने को जगह नहीं। बरामदे तक में लोग खड़े हैं।
ऐसे अनेक अवसर इस आंगन में हमने देखे हैं जब खुशी की दमक हर ओर मुस्कुराहट लिए बिखरी रही है। एक हमारा विवाह ही देख लीजिए, कि इसी अंगने में हुआ.. तब भी यही भीड़ थी। लेकिन उस वक्त श्रद्धेय बाबूजी-आदर्य काका और आदरणीया माई भी थे। विवाह के मंगल-गान चल रहे थे। मार लहमक-दहमक से सजीं भाभियां और गांव-घर की अन्य स्त्रियां मोहक गारियों-से आंगन को गुलजार किए थीं। पियरी पहिने अम्मा-काका आंगन में जोड़ा बैठे थे। वृद्धावस्था में भी माई की तो उछलकूद देखते ही बनती थी उस वक्त। लेकिन यही आज है, कि सभी लोग हैं लेकिन बाबूजी-माई-काका नहीं हैं! मंगल-गान की जगह रुदन भरा सन्नाटा है। अंगने मेंं तख्ते पर गद्दा-रजाई और अन्य सामान रखा है। काका भी हैं! लेकिन भौतिक नहीं, फोटो रूप में! जिसे देखते ही रुलाई छूटती है..कितना आकर्षक व्यक्तित्व..आज फे्रम में.. क्या तो नियति है न?
होना तो यह सबके साथ है, लेकिन समय-से न हो तो अखरता है। देखिए न, काका किस चटपट तरीके-से निकले! गुपचुप! स्वयं तो असीम कष्ट सहे, लेकिन अपनी देह-सेवा में किसी को लेश मात्र भी कष्ट न दिए। ऐसा तो देवों के साथ होता है।
खैर, सोच ही रहे हैं कि सहसा आदरणीय दादा आते दिखे। लुंगी-शर्ट पहिने.. बुझी आंखों-से आए और चुप मारकर आंगन में ही एक कोने बैठ गए। तभी आदरणीय बबुआ भी आ गए, बिल्कुल रोती सूरत। बरामदे में रखी एक कुर्सी पर बैठ गए। पंडित का मन्त्रोच्चार चल रहा है। हरिकेशजी सेज्जा-कर्म में तन्मय हैं। प्रोफेसर सर प्रकाश भैया विह्वल-से अनमने इधर-उधर हो रहे हैं।
अभी आंगन में अभिमन्यू भैया-अनिल भैया-से लगायत घर के छोटे-बड़े सभी सदस्य उदास मन और रोनी सूरत-से कुछ-न-कुछ करते दिख रहे हैं। पगड़ी बांधे डॉ. प्रणव और टोपी लगाए विनय बाबू वहीं एक किनारे कुछ-कुछ समझने की कोशिश कर रहे हैं।
हम एकटक अम्माजी को देख रहे हैं, जिनका चेहरा इस कदर मासूम और भोला हुआ है जैसे कोई बहुत छोटी बच्ची हो जो बैठी तो हो किन्तु सुध-बुध खोई हो। वे स्त्रियों-से किनारे एक ओर बैठी हैं मानो संगमरमर की मूरत होंं। सूनी मांग और सूनी आंखें जैसे उनके पास अब कुछ भी शेष नहीं..सिर पर पल्लू लिए कभी इधर देखती हैं तो कभी उधर। किसी ने बताया, कि उन्हें भीतर बैठाया जा रहा था। वो तो दीपू थी जो उन्हें बाहर निकाल लायी, यह कहते कि "ये क्यों भीतर रहेंगी? सबके साथ रहेंगी। गए वो दकियानूसी विचार जो स्त्रियों को बन्धन की सिकड़ी में बांध कर रखते थे।" सुनकर दीपू पर गर्व हुआ। वह आधुनिक विचारों वाली प्रगतिशील लड़की है। यही सब तो हमारे शानदार समय की पथगामिनी हैं। ईश्वर इनका कर्त्तव्य -पथ आलोकित करते रहें।
(6)
दादा को देख रहा हूं, वे एकटक काका की फोटो निहार रहे हैं, मायूस हैं जैसे उनका कलेजा फट रहा हो। पंडित के मन्त्रोच्चार में जाने क्या है, कि उनकी आंखों में आंसू तैरने लगे जैसे काका के साथ अपने पुराने समय को याद कर रहे हों। कभी हाथ सिर पर ले जाते और सोचने लगते हैं, तो कभी हमारी ओर देखने लगते मानो बेचैन हों। हमने उनकी विह्वलता देखी, तो समझ गए, कि भीतर-से जार-जार हो रहे हैंं। तभी नजर बबुआ की ओर उठी। उनकी भी मनोदशा लगभग वैसी ही! एकदम उदास, आंखों में अश्रु! जिस बहने-से रोकने के लिए वे रुमाल साथ लिए हैं जिसे बार-बार आंखों की ओर ले जाते हैं। आदरणीय बबुआ और आदरणीय दादा वे दो लोग हैं जिन्हें हमने इन 28 वर्षों मेंं हर बार देखा है, कि कैसे काका से संपृक्त रहे हैं। बाबूजी-काका-बबुआ और दादा का आखिर नभिनालब्ध सम्बन्ध है। फिर काका तो इस बुढ़ौती में भी लाठी टेकते पहुंच जाते थे इन लोगों के पास। वे लोग भी गाहे-बगाहे अपनी बातें बाबूजी के बाद काका ही थे जिनसे चार करते। तो वे लोग कैसे हैं? उनकी दशा कैसी होगी? आंगन में यह साफ दिखायी दे रहा है। अभिमन्यू भैया और अनिल भैया को भी कई-कई बार देखा आंखों की कोर पोंछते। और-तो-और बाबू पट्टू को देखा, कि पट्ठा काम भी कर रहा है और रोती आंखों को हथेलियों से पोंछता भी जा रहा है मानो उसकी अखर और बड़ी हो। आखिर छुटपन में काका उसे भी तो अपनी गोद मे खिलाए हैं। गलत बातों पर डॉँटे हैं, प्रेरणा दिए हैं। प्रो. सर प्रकाश भैया तो और गमगीन हैं, सिर झुकाए.. निखिल ने हमें उनकी भावुकता के विषय में आते ही बताया था कि, "अस्पताल में प्रकाश मामा की हालत खराब हो गयी थी। बहुत रोए थे वे। मुझे चुप कराना पड़ा था प्रकाश मामा को।"
हम समझ गए, कि प्रकाश भैया की मानसिक दशा काका को लेकर किस भीषण त्रासद-से गुजर रही होगी। आखिर काका उन्हें भी तो बहुत मानते थे। कई अवसरों पर हमने देखा है कि कैसे ये दोनों अकेले ही खड़े गुटुर-मुटुर बतियाते रहे हैं। उन्हें प्रकाश-सतीश भैया पर गुमान था। इसीलिए तो सारा परिवार इस वक्त आंसुओं-से तरबतर था। क्या पुरुष और क्या महिलाएं, सभी के चेहरे मुर्झाकर बन्द हुए जा रहे थे, वैसे ही जैसे सन्ध्या-काल में सूरज के डूबते ही सूरजमुखी के हो जाते हैं।  
इसी में श्रीमती सुषमा दिखती हैं। पसीने-से लथपथ। अन्दर-बाहर हो रही हैं। बेचारी हॉस्पिटल-से लेकर घर तक कितना तो दौड़ी हैं वे। लेकिन चेहरे पर सिकन नहीं है। मानो अदृश्य शक्ति साथ हो। क्षण में अन्दर होती हैं और क्षण में बाहर। कोई कुछ मांग रहा है कोई कुछ, सभी की आवश्यकताओं की पूर्ति कर रही हैं वे। कभी अमृत-से कुछ लाने को कहती हैं, तो कभी अक्षत-से। इसी में बिन्दूृ दीदी, ऊषाजी और अमिता भी लगी हुई हैं। दायित्त्व निभा रहे हैं सभी। कुछ लोग पण्डित जी को कुछ कह रहे हैं। शायद जल्दी करने को।
हम एकटक कभी काका की तस्वीर देखते हैं और कभी हरिकेशजी को कर्म करते। कैसा तो चेहरा हो गया है लड़के का! महीनोंं तो हो गए काका के पीछे दौड़ते। रुपए-पैसे से लेकर पत्नी-बच्चोंं के साथ सशरीर होम हो रहा है। निखिल ने बताया था, कि "मामा-मामी बेहद परेशान हैं।" वह बारंबार कहता था कि "मामा कैसे तो हो गए हैं।"
यहां हम भी प्रत्यक्ष देख ही रहे हैं। सचमुच हरिकेश का मुखड़ा देख रुलाई आती है। लेकिन रोके रखे हैंं। वह उदास चेहरा लिए बारंबार काका की फोटो भी देखता है। मानो पूछ रहा हो, "काका! आप तो चले। अब मेरा कौन?"
सहसा बाबू पट्टू, अनिल भैया, कौशल बाबू, अभिमन्यू भैया, प्रकाश- सतीश भैया, बबलू बाबू आदि आंगन में तख्ते-से लेकर हरिकेश तक को घेरकर गोलाकार में खड़े हो गए। उनकी भाव भंगिमाएं ऐसी हैं मानो हरिकेश-से कह रहे हों- "क्यूं चिन्ता करते हो हरिकेश बाबू? काका नहीं हैं तो क्या? हम तो न मर गए! हम हर वक्त तुम्हारे साथ हैं।"
यह देख हमारे रोंगटे खड़े हो गए। आश्वस्ति भी मिली। क्या तो शानदार परिवार है। ऐसी एकजुटता कम देखने में आती है।
अन्त में आए सभी लोग भेंट-चढ़ावा अर्पित करने लगे और सेज्जा का कार्य समाप्त हुआ। हरिकेशजी उठ गए हैं और अपने घर के दरवाजे ही गए ही हैंं, कि अब तक रुकी उनकी भावनाएं मानो फूट पड़ीं। वे हबस-हबस कर रोने लगे। हमने दौड़कर उन्हें अपनी बाहों में भर लिया, कि "इतने लोग तो आपके पीछे खड़े हैं, कभी न सोचना कि काका नहीं हैं। वे भौतिक न सही लेकिन आत्मिक रूप-से सदा तुम्हारे साथ हैंं।" वे चुप हुए। लेकिन सच तो यही है, कि पिता का साया सिर-से उठ जाने के बाद किसी बेटे की मनोदशा की कल्पना करना भी रोने को मजबूर कर देता है।
बाहर द्वार पर ब्रह्मभोज की तैयारी शुरू है। टेन्ट लग रहा है। भोजन के लिए नाउर देउर से आए पप्पू भाई ने काम चालू कर दिया है।
 (7)
पण्डित-पुरोहितों के भोजन का कार्यक्रम शुरू हो रहा है। मान्यता है कि यह भोज पितरों और दिवंगत आत्मा को तृप्त करता है। इसके लिए हरिकेशजी ने विशेष व्यवस्था कर रखी है। अनेक गांवों से ब्राह्मण निमन्त्रित किए गए हैंं। रत्नेशजी से लेकर अनिल भैया और अभिमन्यू भैया ने इसमें विशेष भूमिका निभायी है। फिर भी डर है कि आज ही घर के पीछे शाहीजी के यहां भी ब्रह्मभोज है, कहीं पंडितों की कमी न हो जाए। देखते-ही-देखते ब्राह्मण मण्डली जो आनी शुरू हुई तो आती ही गई! हैरत में पड़े लोग कि अरे! इतने? बांछे खिल गयीं कि यह तो साक्षात् काका का सुकर्म दिख रहे हैं जो कितने ही अनामन्त्रित ब्राह्मण आते जा रहे हैंं। यहां तक कि चार बजते-बजते एक वक्त ऐसा आया कि पंडितों को देने वाली सामग्री कम पड़ गयी जिन्हें लेने हरिकेशजी को बाजार भागना पड़ा। इतने पुरोहित और पंडित हुए कि दक्षिणा देने के लिए हरिकेश की खोजाई होने लगी। वे तो बाजार गए थे। तो मोर्चा सम्हालने बिन्दू दीदी दौड़ीं और दक्षिणा की रकम लाने लपकती भीतर जाने को हुईं। बिन्दू दीदी गार्जियन की तरह तनकर खड़ी हैं यहां। हर वक्त हर बात के लिए तैयार। काका बीमार अवस्था में थे तभी वे बिना किसी की परवाह किए आशीष बाबू को साथ लिए मुम्बई से रावतपार के लिए चल निकली थीं। उनकी एक बाँह महीनों-से उठ नहीं रही है, किन्तु मानो उन्हें इसकी परवाह ही नहीं। न सकने के बाद भी खूब हाथ-पांव चला रही हैं।
हमने उनसे पूछा भी, कि "दीदी आपकी बाह में तो बहुत दर्द था, वह गया कहां?" तो रुंधे गले-से बोलीं, "बाबू हमारा दर्द तो काका अपने साथ लेकर चले गए।" और रोने को हुईं मानो जो दर्द अब मिला है वह मृत्यु पर्यन्त दूर होने वाला नहीं। उनकी दर्द भरी आंखों को देख लगा मानो पूछ रही हों, "बाबू! क्या काका अब इस जनम में न मिलेंगे?"
हमने उनको ढाँढस बन्धाया कि "आप निराश न हों। पूरा परिवार देखना है।" सहसा वे भीतर दौड़ीं, शायद किसी ने पत्तल मांगा था।
तभी हरिकेश जी भी आ ही गए। वे खुश थे, कि सैकड़ा-से ऊपर पुरोहितों ने भोजन पा लिया। यह कितनी बड़ी तृप्ति है। और दखिए, कि एक सज्जन और आ गए जो जाकर बबुआ के यहां बैठे हैंं। बबुआ उन्हें खिलाने को कहते हैं। वे आकर बरामदे बैठें हैं और प्रभाकर पाण्डेय भाई साहब से अपने बारे में बता रहे हैं। अब उन्हें खिलाने का उपक्रम होने लगा। हरिकेशजी ने बढ़कर दान-दक्षिणा और सामान दिया है सभी को। पंडितों ने दोनों हाथों से जय-जय कह आशीर्वाद दिया है उन्हें और अम्माजी को। यह तो काका की ही कृपा है जो इतने लोग तब आए जब शाहीजी के यहां भी भोज के लिए जाना है। अब रात के भोजन की तैयारी शुरू है। 
खड़े ही है कि सहसा जूही ने आकर प्रणाम किया है। पूछे तो बताई कि एमबीए कर रही है। ईश्वर उस बच्ची को कामयाबी की राह दिखाएं। सुभी भी दिखी है, उससे भी पूछे हैं हाल तो मुस्कुराकर बताई है।
ये देखिए, मोनूजी भी आ गईं और प्रणाम की हैं। अब उनके अँचरे में फूल-सी बच्ची आ गयी है। खूबसूरत और रूई के फाहे के समान कोमल। उसकी कजरारी आंखें और मासूम-भोली सूरत देखते ही हम रोक न सके अपने को, उसके कपोल चूम लिए। वह टक मारकर देखने लगी और खुश्श-से हँस दी।
वो फटफटी की आवाज कैसी है? लगता है किसी का आगमन हो रहा है। देखते हैंं..
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अच्छा.. तो टेंट-लाइट वाले हैंं, जो अपना सामानादि लाते ही जा रहे हैं, फटफटिया-से। शायद जनरेटर वगैरह भी है। घेरा में भोजन तैयार हो रहा है। प्रभाकर भाई साहब के साथ हम भी चले वहां।
हलवाई लोग अपना काम कर रहे हैं। एक कड़ाहे में बुनिया छानी जा रही है। पप्पू भाई उसे कुछ निर्देश देते-देते स्वयं बड़े-बड़े आलू काट रहे हैं।
हमने भी सोचा, चलो बैठे-बैठे कुछ आलू ही काट दें, लेकिन बना नहीं अपने-से।
बहुत छोटे थे जब गांव में भाई-पटिदारों के यहां हो रहे शादी-विवाह में सबके साथ बैठकर आलू छीलते थे। गर्म-गर्म आलू..बालपन के हमारे नरम हाथ जलने लगते तो सी-सी कर कर पानी में छोड़ देते। कितना अच्छा लगता था तब। वह जमाना ही दूसरा था। अब तो हलवाइयों को आर्डर दे दो और बेफिक्र हो जाओ।
कुछ देर रुक हम लौटे कि आनन्द बाबू दिखे, प्रणाम किए तो हमने उनका कुशल क्षेम पूछा। अब नए घर के बरामदे में आकर बैठे हैं। तख्ते पर अमिताजी और रत्नेशजी भी हैं, कि नीलम दीदी आ गईं। प्रणाम को उठे तो लपक कर पकड़ लीं और लगीं बधाई देने, कि "नीतीश ने एमबीबीएस में प्रवेश कर हमारे पूरे परिवार को गौरव-से भर दिया है।"
उनने पास बैठकर बहुत-सी बातें कीं। गोरखपुर में उनके घर न आने का उलाहना भी दिया, कि "वहीं तो उतरते हैंं और दर्शन तक नहीं देते।"
तभी सरोज दीदी और पुत्तुलजी भी आ गईं। हमने सरोज दीदी को बताया, कि गोरखपुर में निखिल कैसे उन लोगों की बेहतरीन सेवा-से प्रभावित हुआ है।
वे लोग भी निखिल की प्रशंसा करने लगे, कि "निखिल ने बहुत किया।" यह बात तो कमोवेश वहां के सभी लोगों ने कहा था।
सुनकर सरोज दीदी मुस्कुरा कर बोलीं, "नहीं तो..कहां कुछ कर पायी मैं? बल्कि निखिल बाबू बहुत किए। हमारा अरमान तो बहुत था। लेकिन काका की तबीयत ऐसी थी कि फुर्सत ही न मिल पायी।"
पुत्तुलजी भी नीतीश के सरकारी मेडिकल कॉलेज में एमबीबीएस के दाखिले के लिए बधाई देने लगीं। हमने उनसे कहा, "हमें बधाई क्योंं? वह तो आप लोगों का बच्चा है।"
"तब बाद न कहबैं!" वे मुस्कुराकर कहीं। इसका आशय हम समझ न सके।
बन्नी भी गोद में प्यारी-सी जानू को लेकर आ गईं। गिरजीदीदी, अमिताजी और रत्नेशजी पहिलहीं-से थे। लीजिए वन्दना भी गईं। कौशल बाबू खड़े हैंं.. कोई और है..शायद अभिमन्यू भैया के साले हैंं क्या..
हमहीं-से बतकही शुरू कर दिया इन लोगों ने। पुरानी और नई बातेंं। कुछ चुहल और कुछ बुद्धि को मांजने वालीं। नीलम दीदी आज पूरे रौ में थीं। कुछ-कुछ बातें कर उदास मन को हहास-से भर देतीं। कई बार तो स्वयं ठठाकर ऐसी हँसी, कि हमारा मन भी बिहँस पड़ा। ऐसे प्रसन्नचित्त मन-से ही व्यक्ति बढ़ सकता है वर्ना तो इस घनेरी दुनिया में दुख बहुतेरे हैंं। तभी अनिल भैया आ गए और बाहर हाथ दिखाकर किसी को डाँटने लगे।
इसी बीच बेबी कौशकी आकर बैठ गई है। बताती है कि वहां मुम्बई की पढ़ाई और यहां की पढ़ाई में कितना अन्तर है। बच्चे-बच्चियों में भेदभाव भी है। वहीं बाबू कृष्णा भी इस बात से सहमत दिखते हैं किन्तु कहते हैं इससे क्या? पढऩा है तो पढऩा है। बस। अच्छा लगा, कि चलो कत्र्तव्य-बोध तो है इन सबों को। हमने इन्हें बहुत-सी बातें बताकर उत्साहवर्धन किया।बाबू अवनीश और हर्ष बाबू भी आकर आशीर्वाद लिए हैं।
सहसा निगाह गई, अरुण भैया पर। खटिया इधर-उधर कर रहे थे। हमने आने के बाद महसूस किया है, कि वे लगातार कुछ-न-कुछ कर रहे हैं। लोगोंं की बात सुन रहे हैं। लेकिन यही पहले था, कि उन्हें उलाहना मिलता था, कि वे किसी की सुनते नहीं और करते भी कुछ नहीं।
बहुत पहले एक बार बाबूजी ने ही हमसे शिकायती लहजे में कहा था, कि "सुकुलजी, आपै समझाईं इनके। पुलिस-से काहें डेरालैं। इहां पुलिस आ सकेले?" लेकिन इन पर कोई असर नहीं।
देखिए, यही अब है, कि उन्हें चैतन्य-सा देख रहा हूं। मानो काका ने जाते-जाते उन्हें शक्ति की कोई तजबीज दी हो। तभी तो कामकाज करते देख रहे हैं हम उन्हें। वे हमसे भी कुछ भी बात किए हैं वर्ना और दिनों में तो गुमशुम रहते हैं। रेडियो-से ही उन्हें लगाव रहा है। लगता है कि काका के जाने का उन्हें भी मानसिक आघात लगा है, जिसने उनकी सोई चेतना जागृत कर दी है। कितना अच्छा होता, कि अरुण भैया अपने घर के प्रति अपना कर्तव्य समझने लगते।  
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