Wednesday, 13 April 2016

मिल बाँटकर खाओ

इधर सड़क दुर्घटनाओं में हर रोज मौतें हो रही हैं उधर वाहन चालकों को छेक कर लाइन में खड़ा किया जा रहा है.. इधर नक्सली लगातार आत्मसमर्पण में हाथ खड़े कर रहे हैं तो उधर उनके द्वारा बम-ब्लास्ट कर हमले-पर-हमले भी हो रहे हैं.. इधर पानी के लिए सरकार बैठकें कर रही है और उधर मैदानी इलाकों  में नागरिक बूंद-बूंद पानी के लिए  तरस रहे हैं.. अन्तिम व्यक्ति के भूख मिटाने के खाद्यान्न बंट रहे हैं तो बेचारे आदिवासियों के छींद के कीड़े खाकर भूख मिटाने की भी खबर है.. इस प्रकार की निरन्तर मिल रहे समाचारों से लगने लगता है, कि क्या छत्तीसगढ़ भगवान भरोसे है? हर जगह देखने पर लगता है कि व्यवस्था और उसके परिचालन में कहीं कोई साम्य नहीं है! हर कोई अपनी ही मस्ती में दिखता है। कोई काहू मगन कोई काहू मगन की तर्ज पर जिसे देखो वही मदमस्त है मानो उसे किसी और से कोई मतलब ही नहीं! इन सबके बीच लोग हैं कि फंसे हुए बन्दर की भांति इत-उत देख रहे हैं किन्तु कहीं ठौर नहीं मिल रहा है।
छत्तीसगढ़ की यातायात व्यवस्था पर ही बात करें, तो सवाल है कि जब हमारा टे्रफिक सिस्टम इतना चैतन्य व चौकन्ना है तो फिर सड़क दुर्घटनाएं रुक क्यों नहीं रहीं? यही सवाल माओवादी उन्मूलन में चल रहे कार्यों को लेकर भी है, कि जब माओवादी इतने ही हतोत्साहित व निराश होते जा रहे हैं तो लगातार उनके हमले कैसे जारी हैं? सरकारी अमले से लेकर बड़ी संख्या में सुरक्षा बलों की उपस्थिति के बाद भी आग के शोले उठते ेरहें तो क्या कहा जाए? इससे तो यही लगता है कि छत्तीसगढ़ के वास्तविक हितों के साथ किसी को सरोकार है, लगता नहीं! जिसे देखो वही कमाई पर लगा है। चाहे जैसे हो आने दो सोच के चलते हर जगह कबाड़ा हो रहा है। कभी-कभी लगता है कि मिल बाँटकर खाओ वाली नीति हर जगह चल रही है। माओवादी अपनी चला कर लूट ही रहे हैं तो दूसरे भी ईमान का चोला पहने नागरिकों को कोई सुविधा नहीं दे रहे हैं। बल्कि नागरिक तो बेचारा बना हुआ फुटबॉल की तरह इधर-उधर फेंका जा रहा है।

Sunday, 10 April 2016

युद्ध-कौशल को जंग 

फिर तो यह चिन्ता के फलक को और बड़ा कर देने वाला है, कि नक्सली उन्मूलन में सरकार की ओर से मोर्चे पर डटे केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल(सीआरपीएफ) में फीजिकल फिटनेस का अभाव इस कदर है कि वे राष्ट्र स्तरीय स्पर्धा में ही फिसड्डी साबित हो रहे हैं!
मध्य प्रदेश ग्वालियर जिले में टेकनपुर के बीएसएफ अकादमी में सम्पन्न छठवीं राष्ट्रीय स्तरीय स्पर्धा में सीआरपीएफ के कमाण्डोज के निम्न प्रदर्शन की जो जानकारियां आ रही हैं उसने तो माथे पर बल ला दिया है।  पता चला है कि इस स्पर्धा में सीमा सुरक्षा बल का तो ठीक किन्तु सीआरपीएफ का प्रदर्शन बड़ा लचर रहा। बताया जा रहा है कि सीआरपीएफ के कमांडोज को सभी महत्वपूर्ण खंडों में शिकस्त मिली है। फायरिंग जैसी महत्वपूर्ण स्पर्धा तक में उनके पिछडऩे की खबर है। ऑपरेशन प्लानिंग एण्ड ब्रीफिंग, एसटीओ जंगल खंड की तो हालत और भी पतली बतायी जाती है। पता चला है कि 20 मार्च से 5 अप्रेल तक आयोजित इस प्रतियोगिता में 23 प्रतियोगियों में छत्तीसगढ़ के सीआरपीएफ कमाण्डोज को 20 वां स्थान मिला है।
उल्लेखनीय है कि यह स्पर्धा देश के सभी प्रशिक्षित कामाण्डोज की होती है। वेल ट्रेन्ड कमाण्डोज की एक तरह से यह परीक्षा होती है कि उनके अन्दर कितनी कुव्वत है और प्रतिभा के मामले में वे कितने अव्वल है। लेकिन टेकनपुर स्पर्धा में उनके लचर प्रदर्शन ने बहुत सोचने पर मजबूर कर दिया है। यह इसलिए भी है कि माओवादी लगातार अपने जंगल वार फेयर को धारदार बना रहे हैं। गुरिल्ला युद्ध का उनका रणकौशल लगातार परवान चढ़ा रहा है। एक-से-एक प्लानिंग तैयार कर वे अपने लड़ाकों को बन्दरों के समान चुस्त दुरुस्त कर अटैक करते हैं। यही वजह है कि अर्धसैनिक बलों को अनके बार मुंह की खानी पड़ती है। अभी हाल ही में लैंड माइन बिस्फोट में 7 जवान सीआरपीएफ के ही मारे गए। छत्तीसगढ़ पुलिस विभाग के एक अवकाश प्राप्त अधिकारी ने इस पर चिन्ता जताते हुए पिछले दिनों बताया था कि किस प्रकार सीआरपीएफ के कमाण्डो प्रशिक्षण से दूर हैं। बताया गया कि नियमित पीटी-परेड तो दूर की बात वे इतने लुंज-पुंज हैं कि अपने शारीरिक सौष्ठव का ध्यान तक नहीं रखते। कैम्पों में इस कदर सुस्ती है कि सोना और खाना बहुत हुआ तो थोड़ी-सी पेट्रोलिंग और संतरी ड्यूटी, बस। वहीं माओवादी लड़ाके हैं कि नियमित पीटी परेड तो छोडि़ए कोहनी और घुटने के बल पर क्रॉलिंग कर उफ् तक नहीं करते । वे जान देकर भी टे्रन्ड होने तत्पर रहते हैं। पेड़ों में छिपकर फायरिंग और डालों पर कूदकर छिपने की कला वे इस कदर विकसित करते हैं कि क्या कहें? हमारे पास अत्याधुनिक हथियार लेकिन उनके पास क्या? फिर भी वे कई बार बाजी मारते हैं तो क्या यह हमारे लिए आलोचनात्मक आत्मपरीक्षण का विषय नहीं? कड़ा प्रशिक्षण ही है जो हमारे जवानों को स्पर्धा में खरा उतार सकता है। उस पर कोई समझौता नहीं होना चाहिए। यही समय की मांग है साथ ही देश की आन्तरिक सुरक्षा का सवाल भी।
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 कराहता आम आदमी 

  जीवन है तो बीमारियों का साथ भी है, लेकिन इन्हें दूर करने के लिए दवाइयां ही हैं जो साथ निभाती हैं। परन्तु आज दवाइयों को लेकर क्या हाल है सभी जानते हैं। और-तो-और, अब जरूरी स्वास्थ्य रक्षक दवाओं के लिए भी लोगों की मुश्किलें बढऩे लगी हैं। दिन-प्रतिदिन स्वास्थ्य सेवाएं महंगी ही होती जा रही हैं। ऐसे में आम आदमी उसमें भी निम्र आय वर्ग के लोगों की तो एक तरह से मरनी ही हो गई। लोगबाग तो अब अस्पताल के नाम से ही कांपने लगते हैं। कहें कि अच्छे-भले आदमी के सामने अस्पताल का नाम ले लें तो उसे बुखार आ जाता है। 
स्थिति यह है कि निजी चिकित्सालयों में इलाज काफी महंगा हो गया है। छोटी-से-छोटी बीमारी के लिए भी हजार रूपए से ऊपर निकल जाना आम बात हो गई है। सामान्य सर्दी-बुखार में भी डॉक्टर की सैकड़ों रूपयों की फीस और फिर उसके बाद रक्त-मूत्र आदि की जांच न भी हुई तो एंटीबॉयोटिक्स और एंटीएलर्जिक से लेकर अन्य दवाओं की खरीदी में मरीज की नानी याद आ जाती है। मेडिकल दूकानों में जाते ही मरीज सोचता है कि कहीं पैसे कम न पड़ जाएं! इसके पीछे कारण यह है, कि ब्राण्डेड दवाएं तेजी से लोगों की जेबें हल्की कर देती हैं। बीच में जेनरिक दवाओं के लिए सरकार ने बड़ा अभियान छेड़ा था। लेकिन अब उसका कहीं अता-पता नहीं है। इसे देखने के लिए न तो डीआई के पास फुर्सत है और न ही विभाग के अन्य लोग ही रुचि ले रहे हैं फिर सरकार में बैठे लोगों के पास कहां समय है। इससे हो यह रहा है कि मेडिकल वालों से लेकर डॉक्टर्स तक ब्राण्डेड दवाओं में हाथ खोल रहे हैं। चमकीली रैपर्स में पैक्ट्ड ब्राण्डेड दवाइयां इतनी महंगी हैं, कि एक मरीज को अपने पूरे माह का वेतन खर्च कर देना पड़ता है। जेनरिक दवाओं के लिए छिड़े सरकार के अभियान ने क्यों दम तोड़ दिया? मरीज आज भी सवाल करते हैं। डॉक्टर की पर्ची मिलते ही मरीज सीधा पूछता है, कि जेनरिक दवाएं कहां मिलेंगी? लेकिन हों तब तो! यहां तो बताते हैं कि दवा कंपनियों की अस्पताल व नर्सिंग होम्स वालों से इतना तगड़ा गठबंधन है कि चाह कर भी जेनरिक दवाएं नहीं चल पातीं। सिप्रोफ्लाक्सेसिन जैसी एंटीबॉयोटिक में खूब कमाई चल रही है। किस-किस का नाम लें, अनेक दवाएं जो जेनरिक में इतनी सस्ती हैं कि मरीज खरीदे तो पता ही न चले, लेकिन वहीं ब्राण्ड में घुसें तो एक पत्ता लेने में हालत बिगड़ जाती है।
जेनरिक दवाओं को लेकर सरकार का अभियान बड़ा सुन्दर और पुण्यात्मक था। इसका सीधा लाभ मरीजों को मिल रहा था। किन्तु उसने क्यों सांस तोडऩी शुरू कर दी यह तो वे लोग ही जानें।
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Monday, 4 April 2016

 छत्तीसगढ़ में कांग्रेस निस्तेज

     युवा दिलों की धड़कन समझे जाने वाले कांग्रेस के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राहुल गांधी हिन्दुस्तान के कोने-कोने जा रहे हैं। सम्भवत: कोई प्रदेश नहीं होगा जहां उनका पसीना न गिर रहा हो। छत्तीसगढ़ तो वे अनकों बार आए। वन-प्रदेश के आदिवासियों से लेकर ग्रामीण अंचल के किसानों और फिर शहरों में छात्र-युवा जगत से भी रूबरू हुए। देखें तो उनके पास सुन्दर आइडियालॉजी है और काम करने की चित्तवृत्ति भी। इसके बाद भी छत्तीसगढ़में कांग्रेस के जिम्मेदार लोग हंै, कि उनकी भावनाओं का लेश मात्र भी उपयोग नहीं कर रहे हंै। आपस में सिरफुटौव्वल और मुंहफुलौव्वल का ऐसा अद्भुत नजारा है कि सब इसी में लस्तम्पस्त हैं, फिर कौन देखे उनका आइडोलम!
कांग्रेस यदि तीन बार से लगातार शिकस्त खाकर राज्य-विधानसभा में उल्टा पल्ला है, तो इसके लिए वह मतदाताओं को दोष नहीं दे सकती और न ही यह कह कर बहाना बना सकती है कि मनमोहन सरकार में भ्रष्टाचार और महंगाई की पराकाष्ठा ने उसे राज्य-सत्ता से वंचित कर दिया। कोई कहता रहे कि आम जनता ने ही कांग्रेस के इतिहास को भुला दिया है, लेकिन यहां के मतदाताओं ने तो नगरीय निकाय चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशियों के सिर पर ताज पहिनाकर अपनी अभिव्यक्ति का खुला आगाज कर दिया, कि वे नेहरू-गांधी परिवार के त्याग और बलिदान को बिल्कुल नहीं भूले हैं। मिनी भारत भिलाई से लेकर राजधानी रायपुर में यदि कांग्रेस महापौर की कुर्सी पर है तो जनता का यह सन्देश नहीं तो और क्या है, कि छत्तीसगढ़ में कांग्रेस कमजोर नहीं, बल्कि कमजोर तो वे कांग्रेसी हैं जिनने नेहरू और गांधी की विरासत को ही विस्मृत करके रखा है! पूछा जा सकता है कि वैचारिक दारिद्र्य के शिकार लगते यहां के अनेक कांग्रेसी जुबान चलाने के अलावा करते क्या हैं? कांग्रेस के वैचारिक महापुरुष महात्मा गांधी ने केवल आजादी की लड़ाई ही नहीं लड़ी, बल्कि वे सीधे जनता से जुड़े और उनकी दैनिक और घरेलू समस्याओं के लिए भी चरम संघर्ष किया। चम्पारण में नीलहों का आन्दोलन इसका बड़ा उदाहरण है। फिर पंडित नेहरू को ही देख लीजिए, डिस्कवरी ऑफ इण्डिया उन्होंने यूं ही नहीं लिख दिया। उससे क्या सीख लेते हैं यहां के कांग्रेसी ?
नई दिल्ली का 10 जनपथ भी क्या न सोचता होगा, कि उनके परिवार की इतनी बड़ी कुर्बानियां क्या इसीलिए हुईं, कि कांग्रेस के लोग जब भी उसके दरवाजे आएं तो बस शिकायतों की फाइल और एक दूसरों को नीचा दिखाने वाले सबूतों का पुलिन्दा लिए अपने लिए पद-प्रतिष्ठा की मांग करने ही पहुंचें? कितने होंगे जो नि:स्वार्थ और जनता के लिए मर मिटने वाले आन्दोलनों की फेहरिस्त लिए दिल्ली दरबार में दस्तक देते हों? राहुल गांधी पूछ सकतें हैं यहां के कांग्रेसियों से, कि चलिए बताइए तो जनता से सीधे जुडऩे के लिए आपने किया क्या ? छत्तीसगढ़ में आदिवासी मर रहे हैं, बस्तर का पूरा इलाका युद्ध की चपेट में है, जनसमस्याएं नर्तन कर रही हैं और आप अपने में ही रस्साकसी कर रहे हैं। ठीक है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ आपने आवाज उठाई, किन्तु कितनों को सरंजाम तक पहुंचाया? यही छत्तीसगढ़ है जहां पं. नेहरू का नायाब तोहफा भिलाई इस्पात संयंत्र खड़ा है, यही वनांचल है जहां श्रीमती इन्दिरा गांधी के पैर आदिवासीजनों के पैरों के साथ थिरके थे और यही छत्तीसगढ़ है जहां राजीव-सोनिया गांधी को वनवासियों ने तीर-धनुष भेंट किए ? किसलिए ? इसलिए न कि वे उनसे प्यार करते थे। लेकिन अब ? अब आदिवासियों की बात ही छोडि़ए, कांग्रेसी-ही-कांग्रेसी से नफरत करता प्रतीत होता है। राहुल गांधी एक गुप्त आंकलन करा लें, पता चल जाएगा कि किस तरीके से यहां खांटी और अनुभवी कांग्रेसजनों को उपेक्षा का शिकार बना दिया गया है। भाजपा यदि आज भी डंके की चोट पर कहती है, कि वह चौथी बार भी राज्य में सरकार बनाकर दिखा देगी, तो उसके पीछे उसकी दंभोक्ति नहीं बल्कि सचाई छिपी है, कि वह सूत्र पकड़ चुकी है कि कांगे्रस को कोई और नहीं बल्कि कांग्रेसी ही हराएंगे उसे तो बस उन्हें उद्दीप्त करना है।

Friday, 1 April 2016

 बच्चों में क्षीण होती सहनशीलता

     कुछ ही दिन पूर्व भिलाई में 16 साल की 11 वीं कक्षा की छात्रा ने ट्रेन के सामने कूदकर अपनी इहलीला समाप्त की ही थी, कि अब बीएससी पढ़ रही धमतरी क्षेत्र की एक छात्रा द्वारा चूहामार दवाई खाकर आत्महत्या करने की घटना सामने आई है! उधर राजधानी रायपुर में भी एक नर्सिंग छात्रा द्वारा जहर खा के जान देने की कोशिश करने की खबर मिली थी। इस प्रकार के आकस्मिक हादसों ने बहुत कुछ सोचने पर मजबूर कर दिया है! चकित करने वाला तो यह है, कि ये आत्महत्याएं इसलिए की गईं बताई जाती हैं कि बच्चियों को उनके फेल होने की खबर थी!  इससे क्षण में वे इतने सदमे में आ गईं, कि अपने प्राण ही दे बैठीं! यह दांतों तले उंगली दबाने और माथे पर बल लाने वाला है, कि जिस देश में हिमालय-सा धीर, सागर-सा गम्भीर, पहाड़ों-सा सहनशील, माँ-सी करुणा और क्षमा जैसी उपमाओं और बिम्बों से अटी पड़ी कविताओं और कहानियों का पाठ पढ़ाया जाता हो वहां इत्ती-सी बात पर बच्चियां आत्मघात करें, अपने ही हाथों अपने प्राण हर लें! किसी कक्षा में विद्यार्थी का अनुत्तीर्ण होना सामान्य तौर पर कोई बड़ी बात तो नहीं ? अनेक विद्यार्थी हैं जो एक ही कक्षा में अनेक बार फेल हुए, किन्तु उन्होंने तो ऐसी अदम्य जीजिविषा का परिचय दिया कि फिर न केवल क्लास टॉप किया बल्कि आगे चलकर प्रथम श्रेणी के अधिकारी बनकर अपना नाम देश-दुनिया में रौशन कर दिया।
ये सच है कि आज के समाज में विद्यार्थियों में प्रतिस्पर्धा की भावना बढ़ी है और यह भी सच है कि परिवार का दबाब बच्चों पर रिजल्ट को लेकर जरूरत से ज्यादा बढ़ गया है। लेकिन इसका मतलब ये तो नहीं, कि विफलता का भय होने पर वे अपने आपको ही खत्म कर दें। फिर कहां हुई प्रतिस्पर्धा की भावना ? समाज शास्त्र तो कहता है कि प्रतिस्पर्धा में विफलता भी सफलता की घोतक होती है। क्योंकि इसमें विफल बारम्बार सफल होने की कोशिश में लगा रहता है।
लेकिन अब यह गलत साबित होने लगा है। लगता है कि टेलीविजन द्वारा पसरती अपसंस्कृति के साथ ही आज की सूचना प्रौद्योगिकी का गलत इस्तेमाल और पालकों का अपने बच्चों पर मनोवैज्ञानिक लगाव न होने की वजह से उनके चिन्तन में बदलाव आता जा रहा है। अति आधुनिकता की चासनी अब इतनी मीठी हो चली है कि बच्चे दिमाग से मजबूत तो बन रहे हैं, किन्तु उनका दिल उतना ही कमजोर हुआ जा रहा है। दिल और दिमाग में साम्य न होने की बजह से वे नकारात्मक विचारों को अंगीकार कर रहे हैं। स्कूलों द्वारा भी अपने दायित्त्यों का निर्वहन न के बराबर किया जा रहा है। वे लोग तो लगता है कि केवल पैसे की हवश में मरे जा रहे हैं मानो बच्चों की जिन्दगी से ज्यादा प्यार तो उन्हें पैसों से ही है।
ऐसे समय में जरूरी है, कि समाज अपनी भूमिका में लौटे। विशेषकर समाजशास्त्री इसके लिए आगे क्यों न आगे आएं और समाज के नवनिर्माण में अपनी भूमिका का निर्वहन करें ? वर्ना हमारे बच्चे कहीं के न रहेंगे।