Friday, 23 July 2021
Thursday, 22 July 2021
Tuesday, 20 July 2021
Monday, 7 December 2020
दिनांक- 08/12/2020
प्रिय बेटे नीतीश,
तीन ही दिन हुए लेकिन लगता है कि कितने बरस हो गए आपके गए! नौ महीनों के लगातार साथ का मानो कोई मोल ही नहीं। सचमुच इतने दिनों तक हमारा एकसाथ रहना लगता है कुछ था ही नहीं। समय कैसे फुर्र हुआ और कैसे मेडिकल कॉलेज से आपका बुलावा आ गया मानो सपने की तरह हो। आप के जाने के बाद मम्मी लगातार आपको याद कर रोती हैं तो निखिल हर वक्त किसी-न-किसी बहाने आपकी ही चर्चा छेड़ देता है। उसे भी आपकी कमी खल रही है। दोनों भाई जिस तरह एक दूजे का साथ देकर बढ़ते रहे और राग-अनुराग के बीच मेरा ख्याल रखे वह अभिभूत करती है। आप दोनों का रात में टीवी ऑन कर एक साथ भोजन करना, बातें करना और ज्ञानप्रद बातों का आदान-प्रदान करना ऐसा रहा जो आपसी मुहब्बत और सामंजस्य को और प्रगाढ़ करता है। आप दोनों ने मिलकर मेरी और मम्मी की छोटी-छोटी खुशियों का भी ख्याल रखा। मेरे बीमार होने पर आप दोनों ने मिलकर जिस अद्भुत मनोवैज्ञानिक और सामाजिक तरीके-से घर को सम्भाला, मुझे और मम्मी को हिम्मत और साहस दिया वह बेमिसाल है।
आप निकले तो हम तो आपके स्वास्थ्य को लेकर बहुत चिन्तित हो गए। मैं तो फिर भी जानता था कि आप पूरी तरह फिट हो और घबराहट का फोबिया दूर कर लोगे, लेकिन मम्मी परेशान थीं। उनके लगातार रोने की वजह से मुझे उन्हें कई बार डाँटना भी पड़ा। लेकिन जब निखिल ने बताया कि रास्ते में आपने पौष्टिक चीजें खा ली हैं तो बहुत संतोष हुआ। फिर जब आपने बताया कि मेडिकल कॉलेज द्वारा की गई आपमें कोरोना टेस्ट की दोनों रिपोट्र्स निगेटिव निकलीं तो मन बाग-बाग हो गया। यह भी सुकून देने वाला रहा है कि नौ महीनों के गैप के बाद अपने को मनोवैज्ञानिक रूप तैयार कर, बहुत से सामानोंं के चोरी के बाद भी सब मैनेज कर और अपने को प्रसन्न रख आप व्यवस्थित होते रहे। ऐसे सकारात्मक प्रयास की हमें कामयाबी की राह दिखाते हैंं। समय से उठ कर कमरे की सफाई, कम्बल-चद्दर से लेकर अन्य कपड़ों को धोना और फिर लगातार पढ़ते रहना..ये ऐसे कर्तव्य हैं जिन्हें मनोयोग से करके आपने न केवल अपने आप को बल्कि ईश्वर को भी प्रसन्न किया। भगवान उसी का साथ देते हैं जो अपने कर्तव्य, अपनी जिम्मेदारियां, अपने उत्तरदायित्वों के प्रति सचेत रहता है। ये सद्गुण हैंं इन्हें हर किसी को अपनाना चाहिए। मेरे बाबा इस मामले में बहुत आगे थे। आपको बताऊं कि वे अपने कर्तव्य-पथ पर ऐसे डटे रहते थे कि बड़ी-से-बड़ी निराशा और मायूसी भी उनके पास फटकने से डरती थीं। यही वजह रही कि वे भौतिक रूप से आज नहीं हैं उसके बाद भी हमारी आजीविका में उन्हीं का हाथ है। तो आप उन्हीं पदचिह्नों पर बढ़ते रहिएगा। यहां हम लोग बहुत अच्छे से हैं। मम्मी स्वस्थ हैं और निखिल पूरी निष्ठा और लगन के साथ अपनी प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं। आप अपनी शुभकामनाएं उन्हें देते रहिएगा ताकि उनका मनोबल बढ़ता रहे।
अपने स्वास्थ्य का ख्याल रखना, खासकर नाश्ता और भोजन का। क्रीड़ा गतिविधियों में हिस्सा लेते रहिएगा। फल और दूध जरूर लेते रहिएगा। टेलीफोन हर रोज होना चाहिए इसके बिना मम्मी का चेहरा फूल जाता है। ठीक है बेटा, खुश रहो..फिर बाते करेंगे।
आपके पापा
Friday, 21 August 2020
तलाश नव-जीवन की
- शिवनाथ शुक्ल
भोर-सुबह खिड़की से पहली नजर पड़ी कि कपोत-कपोती बड़े उत्साह से दाना चुग रहे हैं। सूरज की सवारी आने से पहले का यह बड़ा सुंदर दृश्य । गुड़हल और डहलिया सहित लक्ष्मणबूटी के पुष्प मुस्कुराकर अलग ही मनोरम-सुरभि बिखेर रहे हैं ।
कई दिनों से तो अकेले यह कपोत ही दिखता था। कल सुबह भी बिजली-तार पर अकेला ही बैठा धूप सेंक रहा था। उसे देख हमने सोचा, कि 'अकेले ही दिखता है आजकल, इसकी जोड़ीदार कहां है?'
लगता है हमारे मन की बात जान गया था वह! तभी तो आज अपनी कपोती को भी साथ लिए सिर मटका-मटकाकर दाना चुग रहा है। बड़ी खुशियाली लहक रही है मानो कह रहा हो, "लीजिए श्रीमान, अकेला न समझिए हमें। सुख-दुख में निभाने वाली संगिनी ही हमारी शक्ति है ।"
दोनों के मुखमंडल देख रहे हैं! कपोती के कपोल और कजरारी आंखों में कितनी लज्जा, कितनी शर्मोहया है! वह दाना चुगती है और रह-रहकर तिरछी आंखों से अपने जोड़ीदार को देखती है, जैसे परिहास कर रही हो कि "तुम क्या चुगोगे? जरा इधर देखो, हमारा चुग्गा।"
दूसरी ओर तनिक कपोत महाशय के कपाल और चंचु देखिए, महान उत्साह की रेख दिखाई देती है इन पर ! ऐसी निशानी अक्सर उनके मुख-मंडल पर होती है जो कर्मोद्यमी, जीवट और परिश्रमी होते हैं।
तो यह कपोत-कपोती भी कुछ इसी तरह का संदेश देते प्रतीत होते हैं।
कुछ मिनट इन्हें देखते-देखते हमारी नींद की खुमारी जाती रही।आलस्य थकान दूर हो गई। आंखें चैतन्य हो गईं ।
सोचने लगे, 'इन चिड़ियों की भांति ही हर कोई तो लगा है अपने काम पर।' उन रेजाओं की याद हो आई जो अपने शिशुओं को पीठ पर गमछे के सहारे बांधकर कठोर परिश्रम करती हैं । ईंट- गारा ढोती हैं, मनरेगा में कितने ही ऐसे श्रमिक मिल जाएंगे जो उत्साह के साथ डटे रहते हैं।
सहसा दूसरा दृश्य दिखा, एक किनारे रखी बल्ली पर बभनी का बच्चा तेजी से छरकता हुआ भाग रहा है। बड़ा अच्छा लगा! 'यानी शिकारी पक्षी से अपना अस्तित्व बचाए है अब तक यह!'
यह उत्साह जागता है, कि विपत्तियों में घिरकर भी यदि हम चाहें तो अपने भीतर साहस स्फूर्ति का संचार कर अपने जीवन की रक्षा कर सकते हैं। कोरोना संकट-काल का यह स॔कट भी इसी तरह कटेगा। वह कितना भी मनुष्य को काट खाने पर आमादा हो, किंतु मनुष्य इस बभनी (सांप की मौसी) के बच्चे की भांति अपने अस्तित्व की रक्षा कर सकता है।
कोरोना लगातार बढ़ रहा है । आज भी भारत में कोरोना-विस्फोट हुआ है । अपने छत्तीसगढ़ में भी अनेक जिलों में मरीजों की संख्या में इजाफा हुआ है, और नए-नए केस मिलते जा रहे हैं। हालाँकि सार्वजनिक और भीड़-भाड़ वाले स्थल बंद हैं। उत्सव-समारोहों पर प्रतिबंध है, तब भी कोरोना मानने को तैयार नहीं है । लोगबाग कह रहे हैं कि इसके टीके का थर्ड ट्रायल शुरू हो गया, अनुमान है कि जल्दी ही आ जाएगा । इन्तजार है ।
इधर देखते-देखते श्रावण गया और आज से भाद्रपद लग गया। लेकिन वर्षा है, कि नदारद! सारी गणित धरी-की-धरी है ।
कल फिर से बंदरों की टोली आई थी छत पर। बेचारे परेशान हैं सब। धार्मिक स्थलों के खुलने के बाद ही इन्हें नव-जीवन मिलेगा लगता है। सजग मानव समाज क्या, मूक जीवों की भी तो मरनी हो रही है । सभी नव-जीवन की तलाश में हैं ।