कहानी
एक दिन दफ्तर में चन्नन-फटाका लगाए एक ज्योतिष महाराज से मुलाकात हुई। यों मैं ज्योतिष पर बहुत ज्यादा भरोसा नहीं करता, किन्तु मां से छुटपन में ऐसे संस्कार मिले, कि उस ओर अनदेखा भी करने की हिम्मत न थी। ज्योतिष महाराज मेरे सामने की कुर्सी पर बैठे मेरे माथे को एकटक यों देखने लगे मानों कोई बहुत बारीक निरीक्षण कर रहे हैं। इससे पहले कि मैं कुछ समझ पाता, उन्होंने माथे पर नजरें गड़ाए-ही-गड़ाए होठों को सीटी बजाने के अन्दाज में सिकोड़कर बुदबुदाया- ''माथे की लकीरों में कुछ तो गड़बड़ी दिख रही है। एक रेखा, दूसरे को काट रही है, मतलब मंगल कमजोर है।'' फिर मुस्कराते हुए रहस्यमय अन्दाज में धीरे-से यों पूछे मानों बहुत-बड़ी कमजोरी पकड़ लिए हों-''अरे! तुम यहां क्या कर रहे हो? तुम्हें तो विदेश में होना था!'' उनकी आंखें इस प्रकार फैली मानों कोई बहुत बड़ा आश्चर्य देख रहें हों। मैं भी सकपकाया, ''मतलब?'' ''अरे भई! तुम्हारी जगह यहां नहीं है। तुम्हारे अन्दर असीम प्रतिभा है, इसे मंगल ग्रह काट रहा है।'' उन्होंने आत्मविश्वास से कहा। सहसा इस प्रकार की बातों से मैं भी थोड़ी देर के लिए सन्न हो गया। कौन होगा जिसे अपने प्रतिभा पर गुमान न होगा? हर व्यक्ति अपने को प्रतिभा की कसौटी पर कसकर पाता है, कि वह उस स्थान पर नहीं है जहां उसे होना चाहिए। अपने से अपात्र को आगे बढ़ता देख वह कुढ़ता है, यह नहीं सोचता कि असल अपात्र वह स्वयं है, वर्ना पीछे क्यों रहता? ज्योतिष की बातों का प्रभाव पर तनिक जमा, किन्तु मैंने उस प्रभाव को अपने पर हावी न होने दिया-नहीं-नहीं! ऐसी कोई बात नहीं है। मैं जहां हूं, ठीक हूं।''
-''क्या खाक ठीक हो? अपने मैनेजर को देखो-इण्टर फेल है तब भी वैभव सम्पदा से परिपूर्ण, और तुम एमए गोल्डमैडलिस्ट होते हुए भी अभावों की जिंदगी जी रहे हो? क्या कहोगे इसे?'' मैं निरुत्तर! क्या जवाब दूं ज्योतिष महाशय को? यह कहकर टाल गया कि ''महाराज जी, कभी घर पधारिए। पूरा भविष्य दिखाएंगे।''
मैंने उन्हें अपना पता न बताया था, किन्तु न जाने कैसे वे बड़े सबेरे ही घर पर दस्तक दे दिए। महाराज को देख कुछ सोच पाता, कि सहसा सहधर्मिणी जी पीछे-से आ गईं। सामने चन्न-फटाका, त्रिपुण्ड-चुरकीधारी महाराज को देख वे प्रभावित हुई एवं तड़ से उनके चरणों में झुक गईं। मैं क्या करता? सहधर्मिणी को तत्क्षण डांट तो नहीं सकता? फिर विवाह मण्डप में शादी के फेरे दिलाता पण्डित यह संकल्प भी लेता है, कि जिसकी मांग में सिन्दूर भर रहे हो, उसके धर्म-कर्म पर कोई बन्दिशें नहीं लगाओगे। फिर हमारे देश में पर नारियों को अपने जंघे पर बिठाकर स्त्री-शोषण का स्तम्भ लिखने वाले स्तम्भकार, पंच सितारा होटलों के महंगे सूट्स में पूंजीपतियों के सीने से अठखेलियां करतीं नारी मुक्ति का नारा देने वाली समाज सेविकाएं एवं धन-धान्य से आपूरित विदेशों में गैर मर्दों से शिव-पार्वती के अर्ध-नारीश्वर चित्रों की भांति सटकर महिला अत्याचार के खिलाफ लिखने वाली लेखिकाओं ने चाहे भारतीय मर्दों के खिलाफ जितना भी विष वमन कर डाला हो; चाहे पराए मर्द के साथ व्हिस्की-ब्राण्डी का मजा लेकर पुरुषों से घृणा करने का डंका पीटती हों, किन्तु सच्चाई यही है, कि भारतीय पुरूष आज भी अपनी स्त्री को अपनी जान से ज्यादा चाहता है। मर्दों को स्त्रियों के पीछे दास-सा घूमने वाला कहते हुए मैंने कइयों से सुना है, किन्तु हिन्दुस्तान के तकरीबन अधिकांश पुरूषों को मैंने अपनी पत्नी की इच्छाओं पर न्यौछावर होते देखा है। फिर मैं भी तो हिन्दुस्तान का ही पुरूष हूं। सहधर्मिणी ने आंखों से संकेत दिया, मैं समझ गया। झट-से दो कुर्सियां निकालीं एवं सामने नीम की छाया में रख, पण्डित को साग्रह बैठा, खुद भी बैठ गया। अभी महाराज इत्मीनान से बैठ भी न पाए होंगे कि पत्नी ने उतावलेपन से मेरी ओर इशारा करते हुए कहा, ''महाराज जी? इनके लिए तो कुछ कीजिए। घर-बार पर कुछ ध्यान देते नहीं। बच्चा भी ढीठ हुए जा रहा है। मुझे तो हर समय चिंता खाए जाती है।'' मैं भौंचक्क! क्या कहूं? पत्नी ने तो झटके-से सारा हाल यों कह सुनाया मानों किसी चिकित्सक के पास गई अपना मर्ज बता रही हो।
महाराज का मुखमण्डल ऐसे बिहंसने लगा मानों बिल्ली को घर में चूहे का भान हो गया हो। उन्होंने आंखें बन्द कर ध्यान मुद्रा में कहा-''मंगल का दोष है इन पर, और इन्हीं की वजह से सारे घर का ग्रह-नक्षत्र खराब चल रहा है।'' मेरी स्थिति तो उस अजगर के समान हो गई, जिसने छछून्दर सचमुच निगल लिया हो। कहां मैंने टालने के उद्देश्य से घर आने को कह दिया था, कहां ये महाशय पता खोज-खाजकर सचमुच का आ पहुंचे। मन किया अभी डपट दूं, ''बडे अाए हो भविष्य विचारने वाले! पहले अपना भविष्य तो देखो, द्वार-द्वार घूमना पड़ रहा है पेट चलाने को।'' पर हिम्मत न हुई। भगा तो देता, पर स्त्री का सामना कैसे करता?
तमाम वार्ता-विचार के बाद महाराज ने मंगल शांति के दो-तीन उपाय बताए जिनमेें व्रतोपवास, पीपल को जल, पण्डित को दान आदि शामिल था। पत्नी ने बिना मांगे उनके चरणों में सौ का नोट रख दिया। जाते-जाते महाराज नीम के पेड़ को देखकर भौंचक्क हुए! क्षण भर ठिठके! एवं हिकारते से बोले- ''उफ! कब अक्ल आएगी तुम लोगों को?'' पत्नी ने भय से आंखें फाड़कर पूछा-''क्या हुआ?'' कहीं द्वार पर नीम का वृक्ष रहता है? द्वार पर नीम होना तो सबसे बड़ा अनिष्टकारक है, जितनी जल्दी हो इसे कटवा दो। आह! मानों किसी ने मेरे सीने पर हथौड़ा मारा हो, किन्तु पत्नी की भावभंगिमा मानो कोई गुत्थी सुलझा रही हो।
महाराज जी चले गए। पत्नी ने हिटलरी फरमान सुनाया-''कल क्यों, आज शाम तक ही किसी मजदूर को बुलाकर नीम कटवा दो। बला कटे।'' मैंने समझाने के अंदाज में कहा, ''सब ऐसे ही कहते हैं। नीम का पेड़ भी भला कहीं अनिष्ट करता है? वह तो उल्टा जीवनदाता है।'' किन्तु पत्नी के हृदय पर महाराज का जादू असर कर गया था। स्त्री चाहे जितनी पढ़ी-लिखी हो, कितनी ही नास्तिक हो किन्तु हृदय के एक कोने में छोटा ही सही एक मंदिर अवश्य ही बनाकर रखती है। बेहद तर्कवितर्कों के बाद उसके भीषण जिद्द के आगे मुझे झुकना पड़ा और शाम को लकड़ी काटने वाले को पकड़ लाया। कुल्हाड़ी लिए जब वह आया तो लगा मानों यमदूत आया हो। मेरा गोपाल वृक्ष से लिपटा-सा खड़ा था। मुझे लगा कुल्हाड़ी मेरे गोपाल पर तो नहीं चलेगी। मैंने उसे पुचकारकर अपने पास बुलाया। आठवीं में पढ़ने वाला तेरह वर्षीय मेरा बालक रुआंसा-सा दौड़कर मुझसे लिपट गया। रोनी सूरत बनाकर पूछा, ''पापा, आप तो कहते थे वृक्ष हमें ऑक्सीजन देते हैं। तमाम आंकड़ों के माध्यम से समझाया था कि कार्बनडाई ऑक्साईड एवं ऑक्सीजन का कैसा सन्तुलन बनाकर वृक्ष हमें जीवन देते हैं। फिर आप तो सदैव पर्यावरण के चिंतक रहे हैं। फिर फिर?'' उसकी आंखों में आंसू तैरने लगे। लकड़हारे ने अपना तहमद ऊपर किया, कुल्हाड़ी सम्हाली एवं इससे पहले की वह नीम पर वार करता, मेरा गोपाल सिहर उठा मानों उसके सामने कोई जानवर काट जा रहा हो। भयभीत होता हुआ बोला-''पापा देखिए, नीम डर गया है, देखिए न उसके तनों को, उसकी पत्तियों को, एकदम शांत हो गए हैं, ऐसा लग रहा है जैसे दोनों हाथों को बांधकर भय से पीछे खिसकर रहे हैं।'' मैं भी उतावला-सा हो गया। याद आया, अभी कल ही मैंने बांग्ला के उपन्यासकार बुद्धदेव गुहा के उपन्यास कोजागोर जीव-जंतुओं के समान आर्तनाद करता है, और उसके कटकर गिरते ही आसपास के वृक्ष मातम मनाते हैं। मेरा गोपाल बेहद दु:खी हो रहा था। किसी नवजात के पीते मुंह से उसकी मां का दूध खींचकर छुड़ा दो, उसकी क्या दशा होगी? लगभग वही दशा इस समय गोपाल की थी। बेचारा एकदम सन्नाटा-सा चुप! देखते-ही-देखते लकड़हारे ने बेदर्दी से नीम को काटकर धराशायी कर दिया। अब तो गोपाल भोंकार छोड़ दिया, लगा सिसकी ले-लेकर रोने। मेरे हाथों में उसको चुप करवाने की ताकत न थी। मैं भी नेत्रों में आ गए झरने से आपूरित था।
कुछ देर बाद भीतर गया। एक कोने से सुबकने की आवाज! मैं चौंका! ''कौन?'' कुतुहल एवं जिज्ञासा से भरा मैं कोने में पहुंचा। यह क्या! अरे! यह तो सहधर्मिणी है! मुंह में कपड़ा ठूंसे हबस रही है। उसकी आंखें निर्झरणी बन गई हैं। उसने कातर नजरों से मुझे देखा एवं मुझसे लिपट कर रोने लगी। उसने हिचकी लते-लेते कहा, ''इसी नीम के पत्ते ने मेरे बच्चे के माता (चेचक) निकलने के समय कितना साथ दिया था। बिस्तर पर नीम के पत्ते के बिछा देने एवं उसके पत्तों को डुलाकर हवा करने से कितनी ठण्डक पहुंचती थी, और रोता-रोता मेरा गोपाल कैसा चुप हो जाता था। उसे अपनी गलती का आभास हो गया था। कई घटनाएं घटने के पूर्व तो बौनी लगती हैं, मनुष्य उसे बड़े हल्के से लेता है, किन्तु वही घटनाएं जब घट जाती हैं, साकार हो उठती हैं तब उसकी सच्चाई उसकी असलियत एवं उसकी अहमियत का पता चल पाता है, लेकिन तब तक तो देर हो चुकी रहती है। नीम का पेड़ कटकर धराशायी हो चुका था। मैंने सहधर्मिणी की पीठ पर हाथ फेरा, उसे पुचकारा, समझाया-''चलो तुम्हारी जिद्द पूरी हुई।'' वह आंखें पाेंछती बाहर आई। कटकर धराशायी हुआ नीम वृक्ष मानों खामोश हो गया है। उसके हरे-हरे पत्तों मानों सुग्गे से पंख दुबकाए सो रहें हों। समीप बैठा गोपाल अभी तक चुप नहीं हुआ है। उसकी आंखें रोते-रोते लाल होकर उबल-सी गई हैं। मां ने उसे कसकर अपने पास में भर लिया एवं दोनों रुदन करने लगे। मुझे अपने ऊपर नाराजगी आ रही थी, ''मैं भी कितना नादान हूं, कई अनुचित बातों में स्त्री को डांटकर चुप करा देता हूं। कई बार मनमानी करता हूं? आखिर इस बार ज्योतिष के फेर में चुप क्यों रहा? क्या मेरे अन्दर भी एक तरह का अंधविश्वास पनप चुका था? क्या मैं अपने दोषों से बच सकता हूं?'' सारा दिन-रात यों ही बीत गया, किसी को चैन न था। सबसे अधिक व्यथित मेरा गोपाल था। बच्चों का मन-मस्तिष्क बेहद कोमल तन्तुओं के समान होता है, छोटी घटनाएं भी उनके मन में भीतर तक घर जाती हैं। आज बेहद बुझे मन से दफ्तर गया। खुद का सन्ताप तो मन को घेरे ही था, सहधर्मिणी की उदासी एवं गोपाल की चुप्पी ने हृदय पर पत्थर सा रख दिया।
संध्या दफ्तर से लौटा, बेहद उदास, हृदय पर पड़ा पत्थर तब तक मन को चांपें हुए था। अरे! हरीतिमा का अंकुरण! कैसे? किसने लगाया? कटे नीम के समीप ही बड़ा-सा थाला, जिसमें पानी सींचा हुआ है और उसमें एक फुट लंबा आम का पौधा रोपा हुआ लहलहा रहा है, मानों वसुन्धरा की गोद में कोई शिशु अठखेलियां कर रहा हो। मैं अचंभित सा लपककर भीतर प्रवेश किया ही था, कि सहसा सहधर्मिणी द्वार के समीप मिली। बिहंसती हुई धीरे-से होठों पर दाहिने हाथ की तर्जनी रखती, खामोश रहने का इशारा करती हुई, पीछे-पीछे आने का संकेत करती घर के पिछवाडे बढ़ने लगी। मैं कुतूहल एवं जिज्ञासा में डूबा, लपकता पिछवाडे पहुंचा। अहा! कैसा अनुपम दृश्य! कैसा दिव्य नजारा। मेरा गोपाल नजरें नीचे किए, जीभ बाहर निकाल दोनों होठों के बीच दबाए पूरे मनोयोग से एक थाले में बेहद सुन्दर नीम की कलम रोप रहा है। मैं उसकी तन्मयता को मंत्रमुग्ध-सा देखे जा रहा हूं। सहसा उसकी नजर हमारी ओर उठी, उसके होंठ हंसी की मुद्रा में फैल गए- ''पापा, मैं स्कूल की नर्सरी से दो पौधे लाया, द्वार पर नीम की जगह आम लगा दिया हूं, और मेरा प्यारा नीम अब यहां फैलेगा। लो ज्योतिष भी खुश और मम्मी भी खुश।'' और वह रोपे उस नीम के पौधे को तन्मयता-से सींचने लगा।
''ओह! कितना समझदार हो गया है मेरा गोपाल! हम पढ़े-लिखों से तो अच्छा मेरा नादान गोपाल ही है न?'' मानों हृदय पर कल से पड़ा कोई बहुत बड़ा बोझ एकाएक हट गया हो। मन करुणा से सराबोर हो गया। गोपाल की तन्मय भाव मुद्रा देखकर मेरी आंखें भरने लगीं और मैं अपने को रोक न सका, सहसा लपकता हुआ गोपाल के पास पहुंचा, उसे अपनी बाहों में भरकर उठा लिया और इस प्रकार चूमने लगा मानों अभी-अभी पैदा हुए बालक को खिला रहा हूं। आंखों से आंसू चूने लगे। ये आंसू गोपाल की समझदारी के थे या गोपाल द्वारा जने दो पौधों की खुशी के? अर्धांगिनी समझ गई थी। नीम बन्धन में हम फिर आबद्ध हो गए।
लिंक रोड, कैम्प-2
भिलाई (छग)
नीम बन्धन
-शिवनाथ शुक्लमेरे मकान के सामने ही एक नीम का वृक्ष था। बेहद घना, किन्तु आकार में मध्यम। उसकी शीतल छांव का एक अलग ही आनंद मिलता। विभिन्न प्रजातियों के चिड़ियों का बसेरा यह नीम, दिन भर पक्षियों के कलरव से गूंजा करता। यत्र-तत्र बिखरी उसकी निबौरियों से मेरा गोपाल खेला करता। कभी चार निबौरी को खड़ा कर पाया बनाता एवं नीम पत्ते की सींक उन पायों में घुसाकर खटिया का आकार बनाता एवं ताली बजा-बजा कर मजा लेता। नित्य प्रात: नीम पेड़ से दातौन तोड़कर दतुअन करने में जो आनन्द मिलता, वह आज-कल के तथाकथित चर्बी वाले दन्त मंजनों में कहां? नीम की जड़ों के पास निकले गोंद से कई बार मेरी सहधर्मिणी गोंद लेकर टिकुली में लगाकर साटती; फिर जूड़ीताप में नीम छाल पीसकर उसका काढ़ा बनाकर पीने से भी लाभ मिलता। एक तरह से यह नीम वृक्ष हमारे परिवार का अंग बना रहा।एक दिन दफ्तर में चन्नन-फटाका लगाए एक ज्योतिष महाराज से मुलाकात हुई। यों मैं ज्योतिष पर बहुत ज्यादा भरोसा नहीं करता, किन्तु मां से छुटपन में ऐसे संस्कार मिले, कि उस ओर अनदेखा भी करने की हिम्मत न थी। ज्योतिष महाराज मेरे सामने की कुर्सी पर बैठे मेरे माथे को एकटक यों देखने लगे मानों कोई बहुत बारीक निरीक्षण कर रहे हैं। इससे पहले कि मैं कुछ समझ पाता, उन्होंने माथे पर नजरें गड़ाए-ही-गड़ाए होठों को सीटी बजाने के अन्दाज में सिकोड़कर बुदबुदाया- ''माथे की लकीरों में कुछ तो गड़बड़ी दिख रही है। एक रेखा, दूसरे को काट रही है, मतलब मंगल कमजोर है।'' फिर मुस्कराते हुए रहस्यमय अन्दाज में धीरे-से यों पूछे मानों बहुत-बड़ी कमजोरी पकड़ लिए हों-''अरे! तुम यहां क्या कर रहे हो? तुम्हें तो विदेश में होना था!'' उनकी आंखें इस प्रकार फैली मानों कोई बहुत बड़ा आश्चर्य देख रहें हों। मैं भी सकपकाया, ''मतलब?'' ''अरे भई! तुम्हारी जगह यहां नहीं है। तुम्हारे अन्दर असीम प्रतिभा है, इसे मंगल ग्रह काट रहा है।'' उन्होंने आत्मविश्वास से कहा। सहसा इस प्रकार की बातों से मैं भी थोड़ी देर के लिए सन्न हो गया। कौन होगा जिसे अपने प्रतिभा पर गुमान न होगा? हर व्यक्ति अपने को प्रतिभा की कसौटी पर कसकर पाता है, कि वह उस स्थान पर नहीं है जहां उसे होना चाहिए। अपने से अपात्र को आगे बढ़ता देख वह कुढ़ता है, यह नहीं सोचता कि असल अपात्र वह स्वयं है, वर्ना पीछे क्यों रहता? ज्योतिष की बातों का प्रभाव पर तनिक जमा, किन्तु मैंने उस प्रभाव को अपने पर हावी न होने दिया-नहीं-नहीं! ऐसी कोई बात नहीं है। मैं जहां हूं, ठीक हूं।''
-''क्या खाक ठीक हो? अपने मैनेजर को देखो-इण्टर फेल है तब भी वैभव सम्पदा से परिपूर्ण, और तुम एमए गोल्डमैडलिस्ट होते हुए भी अभावों की जिंदगी जी रहे हो? क्या कहोगे इसे?'' मैं निरुत्तर! क्या जवाब दूं ज्योतिष महाशय को? यह कहकर टाल गया कि ''महाराज जी, कभी घर पधारिए। पूरा भविष्य दिखाएंगे।''
मैंने उन्हें अपना पता न बताया था, किन्तु न जाने कैसे वे बड़े सबेरे ही घर पर दस्तक दे दिए। महाराज को देख कुछ सोच पाता, कि सहसा सहधर्मिणी जी पीछे-से आ गईं। सामने चन्न-फटाका, त्रिपुण्ड-चुरकीधारी महाराज को देख वे प्रभावित हुई एवं तड़ से उनके चरणों में झुक गईं। मैं क्या करता? सहधर्मिणी को तत्क्षण डांट तो नहीं सकता? फिर विवाह मण्डप में शादी के फेरे दिलाता पण्डित यह संकल्प भी लेता है, कि जिसकी मांग में सिन्दूर भर रहे हो, उसके धर्म-कर्म पर कोई बन्दिशें नहीं लगाओगे। फिर हमारे देश में पर नारियों को अपने जंघे पर बिठाकर स्त्री-शोषण का स्तम्भ लिखने वाले स्तम्भकार, पंच सितारा होटलों के महंगे सूट्स में पूंजीपतियों के सीने से अठखेलियां करतीं नारी मुक्ति का नारा देने वाली समाज सेविकाएं एवं धन-धान्य से आपूरित विदेशों में गैर मर्दों से शिव-पार्वती के अर्ध-नारीश्वर चित्रों की भांति सटकर महिला अत्याचार के खिलाफ लिखने वाली लेखिकाओं ने चाहे भारतीय मर्दों के खिलाफ जितना भी विष वमन कर डाला हो; चाहे पराए मर्द के साथ व्हिस्की-ब्राण्डी का मजा लेकर पुरुषों से घृणा करने का डंका पीटती हों, किन्तु सच्चाई यही है, कि भारतीय पुरूष आज भी अपनी स्त्री को अपनी जान से ज्यादा चाहता है। मर्दों को स्त्रियों के पीछे दास-सा घूमने वाला कहते हुए मैंने कइयों से सुना है, किन्तु हिन्दुस्तान के तकरीबन अधिकांश पुरूषों को मैंने अपनी पत्नी की इच्छाओं पर न्यौछावर होते देखा है। फिर मैं भी तो हिन्दुस्तान का ही पुरूष हूं। सहधर्मिणी ने आंखों से संकेत दिया, मैं समझ गया। झट-से दो कुर्सियां निकालीं एवं सामने नीम की छाया में रख, पण्डित को साग्रह बैठा, खुद भी बैठ गया। अभी महाराज इत्मीनान से बैठ भी न पाए होंगे कि पत्नी ने उतावलेपन से मेरी ओर इशारा करते हुए कहा, ''महाराज जी? इनके लिए तो कुछ कीजिए। घर-बार पर कुछ ध्यान देते नहीं। बच्चा भी ढीठ हुए जा रहा है। मुझे तो हर समय चिंता खाए जाती है।'' मैं भौंचक्क! क्या कहूं? पत्नी ने तो झटके-से सारा हाल यों कह सुनाया मानों किसी चिकित्सक के पास गई अपना मर्ज बता रही हो।
महाराज का मुखमण्डल ऐसे बिहंसने लगा मानों बिल्ली को घर में चूहे का भान हो गया हो। उन्होंने आंखें बन्द कर ध्यान मुद्रा में कहा-''मंगल का दोष है इन पर, और इन्हीं की वजह से सारे घर का ग्रह-नक्षत्र खराब चल रहा है।'' मेरी स्थिति तो उस अजगर के समान हो गई, जिसने छछून्दर सचमुच निगल लिया हो। कहां मैंने टालने के उद्देश्य से घर आने को कह दिया था, कहां ये महाशय पता खोज-खाजकर सचमुच का आ पहुंचे। मन किया अभी डपट दूं, ''बडे अाए हो भविष्य विचारने वाले! पहले अपना भविष्य तो देखो, द्वार-द्वार घूमना पड़ रहा है पेट चलाने को।'' पर हिम्मत न हुई। भगा तो देता, पर स्त्री का सामना कैसे करता?
तमाम वार्ता-विचार के बाद महाराज ने मंगल शांति के दो-तीन उपाय बताए जिनमेें व्रतोपवास, पीपल को जल, पण्डित को दान आदि शामिल था। पत्नी ने बिना मांगे उनके चरणों में सौ का नोट रख दिया। जाते-जाते महाराज नीम के पेड़ को देखकर भौंचक्क हुए! क्षण भर ठिठके! एवं हिकारते से बोले- ''उफ! कब अक्ल आएगी तुम लोगों को?'' पत्नी ने भय से आंखें फाड़कर पूछा-''क्या हुआ?'' कहीं द्वार पर नीम का वृक्ष रहता है? द्वार पर नीम होना तो सबसे बड़ा अनिष्टकारक है, जितनी जल्दी हो इसे कटवा दो। आह! मानों किसी ने मेरे सीने पर हथौड़ा मारा हो, किन्तु पत्नी की भावभंगिमा मानो कोई गुत्थी सुलझा रही हो।
महाराज जी चले गए। पत्नी ने हिटलरी फरमान सुनाया-''कल क्यों, आज शाम तक ही किसी मजदूर को बुलाकर नीम कटवा दो। बला कटे।'' मैंने समझाने के अंदाज में कहा, ''सब ऐसे ही कहते हैं। नीम का पेड़ भी भला कहीं अनिष्ट करता है? वह तो उल्टा जीवनदाता है।'' किन्तु पत्नी के हृदय पर महाराज का जादू असर कर गया था। स्त्री चाहे जितनी पढ़ी-लिखी हो, कितनी ही नास्तिक हो किन्तु हृदय के एक कोने में छोटा ही सही एक मंदिर अवश्य ही बनाकर रखती है। बेहद तर्कवितर्कों के बाद उसके भीषण जिद्द के आगे मुझे झुकना पड़ा और शाम को लकड़ी काटने वाले को पकड़ लाया। कुल्हाड़ी लिए जब वह आया तो लगा मानों यमदूत आया हो। मेरा गोपाल वृक्ष से लिपटा-सा खड़ा था। मुझे लगा कुल्हाड़ी मेरे गोपाल पर तो नहीं चलेगी। मैंने उसे पुचकारकर अपने पास बुलाया। आठवीं में पढ़ने वाला तेरह वर्षीय मेरा बालक रुआंसा-सा दौड़कर मुझसे लिपट गया। रोनी सूरत बनाकर पूछा, ''पापा, आप तो कहते थे वृक्ष हमें ऑक्सीजन देते हैं। तमाम आंकड़ों के माध्यम से समझाया था कि कार्बनडाई ऑक्साईड एवं ऑक्सीजन का कैसा सन्तुलन बनाकर वृक्ष हमें जीवन देते हैं। फिर आप तो सदैव पर्यावरण के चिंतक रहे हैं। फिर फिर?'' उसकी आंखों में आंसू तैरने लगे। लकड़हारे ने अपना तहमद ऊपर किया, कुल्हाड़ी सम्हाली एवं इससे पहले की वह नीम पर वार करता, मेरा गोपाल सिहर उठा मानों उसके सामने कोई जानवर काट जा रहा हो। भयभीत होता हुआ बोला-''पापा देखिए, नीम डर गया है, देखिए न उसके तनों को, उसकी पत्तियों को, एकदम शांत हो गए हैं, ऐसा लग रहा है जैसे दोनों हाथों को बांधकर भय से पीछे खिसकर रहे हैं।'' मैं भी उतावला-सा हो गया। याद आया, अभी कल ही मैंने बांग्ला के उपन्यासकार बुद्धदेव गुहा के उपन्यास कोजागोर जीव-जंतुओं के समान आर्तनाद करता है, और उसके कटकर गिरते ही आसपास के वृक्ष मातम मनाते हैं। मेरा गोपाल बेहद दु:खी हो रहा था। किसी नवजात के पीते मुंह से उसकी मां का दूध खींचकर छुड़ा दो, उसकी क्या दशा होगी? लगभग वही दशा इस समय गोपाल की थी। बेचारा एकदम सन्नाटा-सा चुप! देखते-ही-देखते लकड़हारे ने बेदर्दी से नीम को काटकर धराशायी कर दिया। अब तो गोपाल भोंकार छोड़ दिया, लगा सिसकी ले-लेकर रोने। मेरे हाथों में उसको चुप करवाने की ताकत न थी। मैं भी नेत्रों में आ गए झरने से आपूरित था।
कुछ देर बाद भीतर गया। एक कोने से सुबकने की आवाज! मैं चौंका! ''कौन?'' कुतुहल एवं जिज्ञासा से भरा मैं कोने में पहुंचा। यह क्या! अरे! यह तो सहधर्मिणी है! मुंह में कपड़ा ठूंसे हबस रही है। उसकी आंखें निर्झरणी बन गई हैं। उसने कातर नजरों से मुझे देखा एवं मुझसे लिपट कर रोने लगी। उसने हिचकी लते-लेते कहा, ''इसी नीम के पत्ते ने मेरे बच्चे के माता (चेचक) निकलने के समय कितना साथ दिया था। बिस्तर पर नीम के पत्ते के बिछा देने एवं उसके पत्तों को डुलाकर हवा करने से कितनी ठण्डक पहुंचती थी, और रोता-रोता मेरा गोपाल कैसा चुप हो जाता था। उसे अपनी गलती का आभास हो गया था। कई घटनाएं घटने के पूर्व तो बौनी लगती हैं, मनुष्य उसे बड़े हल्के से लेता है, किन्तु वही घटनाएं जब घट जाती हैं, साकार हो उठती हैं तब उसकी सच्चाई उसकी असलियत एवं उसकी अहमियत का पता चल पाता है, लेकिन तब तक तो देर हो चुकी रहती है। नीम का पेड़ कटकर धराशायी हो चुका था। मैंने सहधर्मिणी की पीठ पर हाथ फेरा, उसे पुचकारा, समझाया-''चलो तुम्हारी जिद्द पूरी हुई।'' वह आंखें पाेंछती बाहर आई। कटकर धराशायी हुआ नीम वृक्ष मानों खामोश हो गया है। उसके हरे-हरे पत्तों मानों सुग्गे से पंख दुबकाए सो रहें हों। समीप बैठा गोपाल अभी तक चुप नहीं हुआ है। उसकी आंखें रोते-रोते लाल होकर उबल-सी गई हैं। मां ने उसे कसकर अपने पास में भर लिया एवं दोनों रुदन करने लगे। मुझे अपने ऊपर नाराजगी आ रही थी, ''मैं भी कितना नादान हूं, कई अनुचित बातों में स्त्री को डांटकर चुप करा देता हूं। कई बार मनमानी करता हूं? आखिर इस बार ज्योतिष के फेर में चुप क्यों रहा? क्या मेरे अन्दर भी एक तरह का अंधविश्वास पनप चुका था? क्या मैं अपने दोषों से बच सकता हूं?'' सारा दिन-रात यों ही बीत गया, किसी को चैन न था। सबसे अधिक व्यथित मेरा गोपाल था। बच्चों का मन-मस्तिष्क बेहद कोमल तन्तुओं के समान होता है, छोटी घटनाएं भी उनके मन में भीतर तक घर जाती हैं। आज बेहद बुझे मन से दफ्तर गया। खुद का सन्ताप तो मन को घेरे ही था, सहधर्मिणी की उदासी एवं गोपाल की चुप्पी ने हृदय पर पत्थर सा रख दिया।
संध्या दफ्तर से लौटा, बेहद उदास, हृदय पर पड़ा पत्थर तब तक मन को चांपें हुए था। अरे! हरीतिमा का अंकुरण! कैसे? किसने लगाया? कटे नीम के समीप ही बड़ा-सा थाला, जिसमें पानी सींचा हुआ है और उसमें एक फुट लंबा आम का पौधा रोपा हुआ लहलहा रहा है, मानों वसुन्धरा की गोद में कोई शिशु अठखेलियां कर रहा हो। मैं अचंभित सा लपककर भीतर प्रवेश किया ही था, कि सहसा सहधर्मिणी द्वार के समीप मिली। बिहंसती हुई धीरे-से होठों पर दाहिने हाथ की तर्जनी रखती, खामोश रहने का इशारा करती हुई, पीछे-पीछे आने का संकेत करती घर के पिछवाडे बढ़ने लगी। मैं कुतूहल एवं जिज्ञासा में डूबा, लपकता पिछवाडे पहुंचा। अहा! कैसा अनुपम दृश्य! कैसा दिव्य नजारा। मेरा गोपाल नजरें नीचे किए, जीभ बाहर निकाल दोनों होठों के बीच दबाए पूरे मनोयोग से एक थाले में बेहद सुन्दर नीम की कलम रोप रहा है। मैं उसकी तन्मयता को मंत्रमुग्ध-सा देखे जा रहा हूं। सहसा उसकी नजर हमारी ओर उठी, उसके होंठ हंसी की मुद्रा में फैल गए- ''पापा, मैं स्कूल की नर्सरी से दो पौधे लाया, द्वार पर नीम की जगह आम लगा दिया हूं, और मेरा प्यारा नीम अब यहां फैलेगा। लो ज्योतिष भी खुश और मम्मी भी खुश।'' और वह रोपे उस नीम के पौधे को तन्मयता-से सींचने लगा।
''ओह! कितना समझदार हो गया है मेरा गोपाल! हम पढ़े-लिखों से तो अच्छा मेरा नादान गोपाल ही है न?'' मानों हृदय पर कल से पड़ा कोई बहुत बड़ा बोझ एकाएक हट गया हो। मन करुणा से सराबोर हो गया। गोपाल की तन्मय भाव मुद्रा देखकर मेरी आंखें भरने लगीं और मैं अपने को रोक न सका, सहसा लपकता हुआ गोपाल के पास पहुंचा, उसे अपनी बाहों में भरकर उठा लिया और इस प्रकार चूमने लगा मानों अभी-अभी पैदा हुए बालक को खिला रहा हूं। आंखों से आंसू चूने लगे। ये आंसू गोपाल की समझदारी के थे या गोपाल द्वारा जने दो पौधों की खुशी के? अर्धांगिनी समझ गई थी। नीम बन्धन में हम फिर आबद्ध हो गए।
लिंक रोड, कैम्प-2
भिलाई (छग)