Tuesday, 30 July 2013

कहानी

                             नीम बन्धन 

                            -शिवनाथ शुक्लमेरे मकान के सामने ही एक नीम का वृक्ष था। बेहद घना, किन्तु आकार में मध्यम। उसकी शीतल छांव का एक अलग ही आनंद मिलता। विभिन्न प्रजातियों के चिड़ियों का बसेरा यह नीम, दिन भर पक्षियों के कलरव से गूंजा करता। यत्र-तत्र बिखरी उसकी निबौरियों से मेरा गोपाल खेला करता। कभी चार निबौरी को खड़ा कर पाया बनाता एवं नीम पत्ते की सींक उन पायों में घुसाकर खटिया का आकार बनाता एवं ताली बजा-बजा कर मजा लेता। नित्य प्रात: नीम पेड़ से दातौन तोड़कर दतुअन करने में जो आनन्द मिलता, वह आज-कल के तथाकथित चर्बी वाले दन्त मंजनों में कहां? नीम की जड़ों के पास निकले गोंद से कई बार मेरी सहधर्मिणी गोंद लेकर टिकुली में लगाकर साटती; फिर जूड़ीताप में नीम छाल पीसकर उसका काढ़ा बनाकर पीने से भी लाभ मिलता। एक तरह से यह नीम वृक्ष हमारे परिवार का अंग बना रहा।
एक दिन दफ्तर में चन्नन-फटाका लगाए एक ज्योतिष महाराज से मुलाकात हुई। यों मैं ज्योतिष पर बहुत ज्यादा भरोसा नहीं करता, किन्तु मां से छुटपन में ऐसे संस्कार मिले, कि उस ओर अनदेखा भी करने की हिम्मत न थी। ज्योतिष महाराज मेरे सामने की कुर्सी पर बैठे मेरे माथे को एकटक यों देखने लगे मानों कोई बहुत बारीक निरीक्षण कर रहे हैं। इससे पहले कि मैं कुछ समझ पाता, उन्होंने माथे पर नजरें गड़ाए-ही-गड़ाए होठों को सीटी बजाने के अन्दाज में सिकोड़कर बुदबुदाया- ''माथे की लकीरों में कुछ तो गड़बड़ी दिख रही है। एक रेखा, दूसरे को काट रही है, मतलब मंगल कमजोर है।'' फिर मुस्कराते हुए रहस्यमय अन्दाज में धीरे-से यों पूछे मानों बहुत-बड़ी कमजोरी पकड़ लिए हों-''अरे! तुम यहां क्या कर रहे हो? तुम्हें तो विदेश में होना था!'' उनकी आंखें इस प्रकार फैली मानों कोई बहुत बड़ा आश्चर्य देख रहें हों। मैं भी सकपकाया, ''मतलब?'' ''अरे भई! तुम्हारी जगह यहां नहीं है। तुम्हारे अन्दर असीम प्रतिभा है, इसे मंगल ग्रह काट रहा है।'' उन्होंने आत्मविश्वास से कहा। सहसा इस प्रकार की बातों से मैं भी थोड़ी देर के लिए सन्न हो गया। कौन होगा जिसे अपने प्रतिभा पर गुमान न होगा? हर व्यक्ति अपने को प्रतिभा की कसौटी पर कसकर पाता है, कि वह उस स्थान पर नहीं है जहां उसे होना चाहिए। अपने से अपात्र को आगे बढ़ता देख वह कुढ़ता है, यह नहीं सोचता कि असल अपात्र वह स्वयं है, वर्ना पीछे क्यों रहता? ज्योतिष की बातों का प्रभाव पर तनिक जमा, किन्तु मैंने उस प्रभाव को अपने पर हावी न होने दिया-नहीं-नहीं! ऐसी कोई बात नहीं है। मैं जहां हूं, ठीक हूं।''
-''क्या खाक ठीक हो? अपने मैनेजर को देखो-इण्टर फेल है तब भी वैभव सम्पदा से परिपूर्ण, और तुम एमए गोल्डमैडलिस्ट होते हुए भी अभावों की जिंदगी जी रहे हो? क्या कहोगे इसे?'' मैं निरुत्तर! क्या जवाब दूं ज्योतिष महाशय को? यह कहकर टाल गया कि ''महाराज जी, कभी घर पधारिए। पूरा भविष्य दिखाएंगे।''
मैंने उन्हें अपना पता न बताया था, किन्तु न जाने कैसे वे बड़े सबेरे ही घर पर दस्तक दे दिए। महाराज को देख कुछ सोच पाता, कि सहसा सहधर्मिणी जी पीछे-से आ गईं। सामने चन्न-फटाका, त्रिपुण्ड-चुरकीधारी महाराज को देख वे प्रभावित हुई एवं तड़ से उनके चरणों में झुक गईं। मैं क्या करता? सहधर्मिणी को तत्क्षण डांट तो नहीं सकता? फिर विवाह मण्डप में शादी के फेरे दिलाता पण्डित यह संकल्प भी लेता है, कि जिसकी मांग में सिन्दूर भर रहे हो, उसके धर्म-कर्म पर कोई बन्दिशें नहीं लगाओगे। फिर हमारे देश में पर नारियों को अपने जंघे पर बिठाकर स्त्री-शोषण का स्तम्भ लिखने वाले स्तम्भकार, पंच सितारा होटलों के महंगे सूट्स में पूंजीपतियों के सीने से अठखेलियां करतीं नारी मुक्ति का नारा देने वाली समाज सेविकाएं एवं धन-धान्य से आपूरित विदेशों में गैर मर्दों से शिव-पार्वती के अर्ध-नारीश्वर चित्रों की भांति सटकर महिला अत्याचार के खिलाफ लिखने वाली लेखिकाओं ने चाहे भारतीय मर्दों के खिलाफ जितना भी विष वमन कर डाला हो; चाहे पराए मर्द के साथ व्हिस्की-ब्राण्डी का मजा लेकर पुरुषों से घृणा करने का डंका पीटती हों, किन्तु सच्चाई यही है, कि भारतीय पुरूष आज भी अपनी स्त्री को अपनी जान से ज्यादा चाहता है। मर्दों को स्त्रियों के पीछे दास-सा घूमने वाला कहते हुए मैंने कइयों से सुना है, किन्तु हिन्दुस्तान के तकरीबन अधिकांश पुरूषों को मैंने अपनी पत्नी की इच्छाओं पर न्यौछावर होते देखा है। फिर मैं भी तो हिन्दुस्तान का ही पुरूष हूं। सहधर्मिणी ने आंखों से संकेत दिया, मैं समझ गया। झट-से दो कुर्सियां निकालीं एवं सामने नीम की छाया में रख, पण्डित को साग्रह बैठा, खुद भी बैठ गया। अभी महाराज इत्मीनान से बैठ भी न पाए होंगे कि पत्नी ने उतावलेपन से मेरी ओर इशारा करते हुए कहा, ''महाराज जी? इनके लिए तो कुछ कीजिए। घर-बार पर कुछ ध्यान देते नहीं। बच्चा भी ढीठ हुए जा रहा है। मुझे तो हर समय चिंता खाए जाती है।'' मैं भौंचक्क! क्या कहूं? पत्नी ने तो झटके-से सारा हाल यों कह सुनाया मानों किसी चिकित्सक के पास गई अपना मर्ज बता रही हो।
महाराज का मुखमण्डल ऐसे बिहंसने लगा मानों बिल्ली को घर में चूहे का भान हो गया हो। उन्होंने आंखें बन्द कर ध्यान मुद्रा में कहा-''मंगल का दोष है इन पर, और इन्हीं की वजह से सारे घर का ग्रह-नक्षत्र खराब चल रहा है।'' मेरी स्थिति तो उस अजगर के समान हो गई, जिसने छछून्दर सचमुच निगल लिया हो। कहां मैंने टालने के उद्देश्य से घर आने को कह दिया था, कहां ये महाशय पता खोज-खाजकर सचमुच का आ पहुंचे। मन किया अभी डपट दूं, ''बडे अाए हो भविष्य विचारने वाले! पहले अपना भविष्य तो देखो, द्वार-द्वार घूमना पड़ रहा है पेट चलाने को।'' पर हिम्मत न हुई। भगा तो देता, पर स्त्री का सामना कैसे करता?
तमाम वार्ता-विचार के बाद महाराज ने मंगल शांति के दो-तीन उपाय बताए जिनमेें व्रतोपवास, पीपल को जल, पण्डित को दान आदि शामिल था। पत्नी ने बिना मांगे उनके चरणों में सौ का नोट रख दिया। जाते-जाते महाराज नीम के पेड़ को देखकर भौंचक्क हुए! क्षण भर ठिठके! एवं हिकारते से बोले- ''उफ! कब अक्ल आएगी तुम लोगों को?'' पत्नी ने भय से आंखें फाड़कर पूछा-''क्या हुआ?'' कहीं द्वार पर नीम का वृक्ष रहता है? द्वार पर नीम होना तो सबसे बड़ा अनिष्टकारक है, जितनी जल्दी हो इसे कटवा दो। आह! मानों किसी ने मेरे सीने पर हथौड़ा मारा हो, किन्तु पत्नी की भावभंगिमा मानो कोई गुत्थी सुलझा रही हो।
महाराज जी चले गए। पत्नी ने हिटलरी फरमान सुनाया-''कल क्यों, आज शाम तक ही किसी मजदूर को बुलाकर नीम कटवा दो। बला कटे।'' मैंने समझाने के अंदाज में कहा, ''सब ऐसे ही कहते हैं। नीम का पेड़ भी भला कहीं अनिष्ट करता है? वह तो उल्टा जीवनदाता है।'' किन्तु पत्नी के हृदय पर महाराज का जादू असर कर गया था। स्त्री चाहे जितनी पढ़ी-लिखी हो, कितनी ही नास्तिक हो किन्तु हृदय के एक कोने में छोटा ही सही एक मंदिर अवश्य ही बनाकर रखती है। बेहद तर्कवितर्कों के बाद उसके भीषण जिद्द के आगे मुझे झुकना पड़ा और शाम को लकड़ी काटने वाले को पकड़ लाया। कुल्हाड़ी लिए जब वह आया तो लगा मानों यमदूत आया हो। मेरा गोपाल वृक्ष से लिपटा-सा खड़ा था। मुझे लगा कुल्हाड़ी मेरे गोपाल पर तो नहीं चलेगी। मैंने उसे पुचकारकर अपने पास बुलाया। आठवीं में पढ़ने वाला तेरह वर्षीय मेरा बालक रुआंसा-सा दौड़कर मुझसे लिपट गया। रोनी सूरत बनाकर पूछा, ''पापा, आप तो कहते थे वृक्ष हमें ऑक्सीजन देते हैं। तमाम आंकड़ों के माध्यम से समझाया था कि कार्बनडाई ऑक्साईड एवं ऑक्सीजन का कैसा सन्तुलन बनाकर वृक्ष हमें जीवन देते हैं। फिर आप तो सदैव पर्यावरण के चिंतक रहे हैं। फिर फिर?'' उसकी आंखों में आंसू तैरने लगे। लकड़हारे ने अपना तहमद ऊपर किया, कुल्हाड़ी सम्हाली एवं इससे पहले की वह नीम पर वार करता, मेरा गोपाल सिहर उठा मानों उसके सामने कोई जानवर काट जा रहा हो। भयभीत होता हुआ बोला-''पापा देखिए, नीम डर गया है, देखिए न उसके तनों को, उसकी पत्तियों को, एकदम शांत हो गए हैं, ऐसा लग रहा है जैसे दोनों हाथों को बांधकर भय से पीछे खिसकर रहे हैं।'' मैं भी उतावला-सा हो गया। याद आया, अभी कल ही मैंने बांग्ला के उपन्यासकार बुद्धदेव गुहा के उपन्यास कोजागोर जीव-जंतुओं के समान आर्तनाद करता है, और उसके कटकर गिरते ही आसपास के वृक्ष मातम मनाते हैं। मेरा गोपाल बेहद दु:खी हो रहा था। किसी नवजात के पीते मुंह से उसकी मां का दूध खींचकर छुड़ा दो, उसकी क्या दशा होगी? लगभग वही दशा इस समय गोपाल की थी। बेचारा एकदम सन्नाटा-सा चुप! देखते-ही-देखते लकड़हारे ने बेदर्दी से नीम को काटकर धराशायी कर दिया। अब तो गोपाल भोंकार छोड़ दिया, लगा सिसकी ले-लेकर रोने। मेरे हाथों में उसको चुप करवाने की ताकत न थी। मैं भी नेत्रों में आ गए झरने से आपूरित था।
कुछ देर बाद भीतर गया। एक कोने से सुबकने की आवाज! मैं चौंका! ''कौन?'' कुतुहल एवं जिज्ञासा से भरा मैं कोने में पहुंचा। यह क्या! अरे! यह तो सहधर्मिणी है! मुंह में कपड़ा ठूंसे हबस रही है। उसकी आंखें निर्झरणी बन गई हैं। उसने कातर नजरों से मुझे देखा एवं मुझसे लिपट कर रोने लगी। उसने हिचकी लते-लेते कहा, ''इसी नीम के पत्ते ने मेरे बच्चे के माता (चेचक) निकलने के समय कितना साथ दिया था। बिस्तर पर नीम के पत्ते के बिछा देने एवं उसके पत्तों को डुलाकर हवा करने से कितनी ठण्डक पहुंचती थी, और रोता-रोता मेरा गोपाल कैसा चुप हो जाता था। उसे अपनी गलती का आभास हो गया था। कई घटनाएं घटने के पूर्व तो बौनी लगती हैं, मनुष्य उसे बड़े हल्के से लेता है, किन्तु वही घटनाएं जब घट जाती हैं, साकार हो उठती हैं तब उसकी सच्चाई उसकी असलियत एवं उसकी अहमियत का पता चल पाता है, लेकिन तब तक तो देर हो चुकी रहती है। नीम का पेड़ कटकर धराशायी हो चुका था। मैंने सहधर्मिणी की पीठ पर हाथ फेरा, उसे पुचकारा, समझाया-''चलो तुम्हारी जिद्द पूरी हुई।'' वह आंखें पाेंछती बाहर आई। कटकर धराशायी हुआ नीम वृक्ष मानों खामोश हो गया है। उसके हरे-हरे पत्तों मानों सुग्गे से पंख दुबकाए सो रहें हों। समीप बैठा गोपाल अभी तक चुप नहीं हुआ है। उसकी आंखें रोते-रोते लाल होकर उबल-सी गई हैं। मां ने उसे कसकर अपने पास में भर लिया एवं दोनों रुदन करने लगे। मुझे अपने ऊपर नाराजगी आ रही थी, ''मैं भी कितना नादान हूं, कई अनुचित बातों में स्त्री को डांटकर चुप करा देता हूं। कई बार मनमानी करता हूं? आखिर इस बार ज्योतिष के फेर में चुप क्यों रहा? क्या मेरे अन्दर भी एक तरह का अंधविश्वास पनप चुका था? क्या मैं अपने दोषों से बच सकता हूं?'' सारा दिन-रात यों ही बीत गया, किसी को चैन न था। सबसे अधिक व्यथित मेरा गोपाल था। बच्चों का मन-मस्तिष्क बेहद कोमल तन्तुओं के समान होता है, छोटी घटनाएं भी उनके मन में भीतर तक घर जाती हैं। आज बेहद बुझे मन से दफ्तर गया। खुद का सन्ताप तो मन को घेरे ही था, सहधर्मिणी की उदासी एवं गोपाल की चुप्पी ने हृदय पर पत्थर सा रख दिया।

संध्या दफ्तर से लौटा, बेहद उदास, हृदय पर पड़ा पत्थर तब तक मन को चांपें हुए था। अरे! हरीतिमा का अंकुरण! कैसे? किसने लगाया? कटे नीम के समीप ही बड़ा-सा थाला, जिसमें पानी सींचा हुआ है और उसमें एक फुट लंबा आम का पौधा रोपा हुआ लहलहा रहा है, मानों वसुन्धरा की गोद में कोई शिशु अठखेलियां कर रहा हो। मैं अचंभित सा लपककर भीतर प्रवेश किया ही था, कि सहसा सहधर्मिणी द्वार के समीप मिली। बिहंसती हुई धीरे-से होठों पर दाहिने हाथ की तर्जनी रखती, खामोश रहने का इशारा करती हुई, पीछे-पीछे आने का संकेत करती घर के पिछवाडे बढ़ने लगी। मैं कुतूहल एवं जिज्ञासा में डूबा, लपकता पिछवाडे पहुंचा। अहा! कैसा अनुपम दृश्य! कैसा दिव्य नजारा। मेरा गोपाल नजरें नीचे किए, जीभ बाहर निकाल दोनों होठों के बीच दबाए पूरे मनोयोग से एक थाले में बेहद सुन्दर नीम की कलम रोप रहा है। मैं उसकी तन्मयता को मंत्रमुग्ध-सा देखे जा रहा हूं। सहसा उसकी नजर हमारी ओर उठी, उसके होंठ हंसी की मुद्रा में फैल गए- ''पापा, मैं स्कूल की नर्सरी से दो पौधे लाया, द्वार पर नीम की जगह आम लगा दिया हूं, और मेरा प्यारा नीम अब यहां फैलेगा। लो ज्योतिष भी खुश और मम्मी भी खुश।'' और वह रोपे उस नीम के पौधे को तन्मयता-से सींचने लगा।
''ओह! कितना समझदार हो गया है मेरा गोपाल! हम पढ़े-लिखों से तो अच्छा मेरा नादान गोपाल ही है न?'' मानों हृदय पर कल से पड़ा कोई बहुत बड़ा बोझ एकाएक हट गया हो। मन करुणा से सराबोर हो गया। गोपाल की तन्मय भाव मुद्रा देखकर मेरी आंखें भरने लगीं और मैं अपने को रोक न सका, सहसा लपकता हुआ गोपाल के पास पहुंचा, उसे अपनी बाहों में भरकर उठा लिया और इस प्रकार चूमने लगा मानों अभी-अभी पैदा हुए बालक को खिला रहा हूं। आंखों से आंसू चूने लगे। ये आंसू गोपाल की समझदारी के थे या गोपाल द्वारा जने दो पौधों की खुशी के? अर्धांगिनी समझ गई थी। नीम बन्धन में हम फिर आबद्ध हो गए।
लिंक रोड, कैम्प-2
भिलाई (छग)

                                           शरीर की सफाई या दिमाग की ?     


     'बटला हाउस और मुस्लिमों का दर्द' शीर्षक से आईबीएन-7  के मैनेजिंग एडिटर आशुतोष ने कल जो लेख लिखा, वह न केवल वैचारिक विमर्श को नए आयाम देता है बल्कि कई खिड़कियाँ भी खोलता है. मुस्लिम समाज के भीतर भी इसे लेकर बौद्धिक विमर्श शुरू है.
     कुछ दिनों पूर्व ही ह्यूमन वेलफेयर ट्रस्ट की ओर से फरीदनगर के नूरी मस्जिद में रोज़ा इफ्तार किट वितरण का प्रोग्राम था जहाँ गरीब और यतीमों को इफ्तार किट बांटा गया. इस प्रोग्राम में बतौर मुख्य अतिथि रिटायर्ड जिला एवं सत्र न्यायाधीश सफाउल्ला कुरैशी साहब ने शिरकत की. मुझे भी एक पत्रकार के रूप में बुलाया गया था, वहां जो कुछ वाक्या हुआ वह हतप्रभ कर देने वाला था. ट्रस्ट के साहबान तकरीर करते हुए जब मुस्लिम समाज की गिरती दशा पर तथ्यों के साथ बोलना शुरू किये तो हर कोई दांतों तले उंगली दबाने को मजबूर हो गया, कि वाकई मुस्लिम समाज में कितना पिछड़ापन है. उन साहबान ने समाज के लोगों को यह कहते लताड़ लगाई कि मुस्लिम समाज के लोग दीनी तालीम से दूर होते जा रहे हैं . वे साफ-सुथरे नहीं रहते, शरीर की सफाई तक ठीक से नहीं रखते। गंदे मुहल्लों में रहते हैं और अपने बच्चों को तालीम तक नहीं देते. इन हजरत ने शारीरिक सफाई पर ऐसी हांक लगाई कि कौम के लोग बगले झाँकने लगे.
     लेकिन जब मुख्य अतिथि रिटायर्ड जज सफाउल्ला साहब बोलने के लिए खड़े हुए तो उन्होंने दूसरी ही धारा बहा दी ! मेरी ओर मुखातिब हुए और बोले कि शुकुलजी बैठे हैं, वसुंधरा कुटुम्बकम की बात लिखी है . उन्होंने सफाई व विशेष कर शरीर की सफाई वाली बात पर तंज कसते हुए कहा कि शरीर की सफाई से क्या होगा? असल सफाई तो हमें अपने दिमाग का करना होगा. यदि दिमाग में ही कचरा भरा होगा, तो कितनी भी शरीर की सफाई करें उससे होना क्या है ? इससे भला समाज कैसे बदल सकता है ? जाने क्या हुआ कि सफाउल्ला साहब बोल ही रहे थे कि किसी हजरत ने उनके कान में कुछ कहा और वे यह कहते बैठ गए कि अरे! देर हो रही है क्या! और वे बैठ गये.
     आशुतोष जी ! कौम चाहे कोई भी हो सफाउल्ला साहब का यह कहना सौ फीसदी सच ही है न, कि हमें शरीर के साथ ही दिमाग की सफाई करनी भी जरूरी है? 

Monday, 29 July 2013

जब मनुष्य मरता है तो जाता कहाँ है यह प्रश्न आज भी कुतूहल उत्पन्न करता है. विज्ञान कुछ कहता है तो धर्म कुछ और. नीद में मनुष्य की बुद्धि कहाँ चली जाती है , उसकी चेतना का क्या होता है, इसे लेकर आज भी मतैक्य है. मरने के बाद शरीर पंचतत्व में विलीन हो जाता है, बस यही भौतिक सचाई दिखती है . विज्ञान आज भी इसपर लगा हुआ है. छान्दोग्य ६. ८. १. में लिखा है कि निद्रा में जीव आत्मा के साथ ऐक्य धारण कर लेता है. वहीं छान्दोग्य ६. १५ में लिखा है- जब मनुष्य मरता है तब उसकी वाक् मन में अंतर्लीन हो जाती है. अंतर्मन प्राण मे , प्राण तेज़ में तथा अंत में तेज़ देवता में अंतर्लीन हो जाता है. आखिर है क्या?     

Sunday, 28 July 2013

                      प्रेस क्लब ने कराया पत्रकारों का बीमा 

न्यू प्रेस क्लब ऑफ़ भिलाई द्वारा भिलाई के पत्रकारों का बीमा कराया गया है. १ लाख रू के दुर्घटना बीमा में कई प्रकार के फायदे हैं . इसमें २५ साल तक के बच्चे को १० हज़ार रु तक शिक्षा निधि की व्यवस्था है साथ ही मृत्यु यात्रा का २ प्रतिशत प्रदान किया जायेगा। कुत्ता, सांप, भालू, शेर आदि जैसे जानवरों के काटने पर हुई मौत पर भी इसका पूरा लाभ मिलेगा। प्रेस क्लब अध्यक्ष शिवनाथ शुक्ल ने प्रेस क्लब की बैठक में इसकी आधिकारिक जानकारी दी जिसका समस्त पदाधिकारियों ने करतल ध्वनि से स्वागत किया। प्रेस क्लब द्वारा सरकार का स्मार्ट कार्ड भी बनाने की प्रक्रिया शुरू कर दी गयी है, इसके साथ ही आवास एवं चिकित्सा की स्थितियों की समीक्षा की गयी. आने वाले समय में इन सुविधाओं का दायरा बढाया जयेगा .       

Saturday, 27 July 2013

     समालोचन में प्रज्ञा  पाण्डेय की कहानी 'मेरा घर कहाँ है' ने सोचने पर विवश कर दिया कि आज भी समाज में दकियानूसी और रूढ़ विचार किस तरीके से घरों में अशांति फैला रहे हैं . हिंदुस्तान में स्त्रियों की त्रासदी का यह भयावह रूप है कि आज भी वह दूसरों की शर्तों पर जीने को मज़बूर होती है. प्रज्ञाजी ने इस कहानी में कथा नायिका का जो चित्र खींचा है वह वाकई गौर करने लायक है. पति से लेकर ससुराल के सभी लोग उसकी ओजस्विता पर खीझे हुए हैं तो मायके के लोग बेटी को घर से विदा कर अपना पल्ला  झाड़ लिए हैं ! अब उस बेचारी का कहीं कोई नहीं . क्या करे? जिस जेठानी पर हो रहे अत्याचार के खिलाफ उसने आवाज़ उठाई वह भी अपनत्व देने की बजाय परायों-सा व्यवहार की . नायिका की दारुण दशा बहुत कुछ सोचने पर मजबूर करती है. प्रज्ञाजी की यह कहानी स्त्री-विमर्श को एक नया आयाम देती है. उसका अंत देखिये , ' भाभीजी खुद को धोखेबाज़ और छिनाल तब मानती हैं जब चारों और सन्नाटा होता है और घर का हर आदमी सो गया होता है लेकिन तब भाभीजी सो नहीं पातीं  हैं .'

                                                            मेरा घर कहाँ है    

समालोचन में प्रज्ञा पाण्डेय की कहानी 'मेरा घर कहाँ है' ने सोचने पर विवश कर दिया कि आज भी समाज में दकियानूसी और रूढ़ विचार किस तरीके से घरों में अशांति फैला रहे हैं . हिंदुस्तान में स्त्रियों की त्रासदी का यह भयावह रूप है कि आज भी वह दूसरों की शर्तों पर जीने को मज़बूर होती है. प्रज्ञाजी ने इस कहानी में कथा नायिका का जो चित्र खींचा है वह वाकई गौर करने लायक है. पति से लेकर ससुराल के सभी लोग उसकी ओजस्विता पर खीझे हुए हैं तो मायके के लोग बेटी को घर से विदा कर अपना पल्ला झाड़ लिए हैं ! अब उस बेचारी का कहीं कोई नहीं . क्या करे? जिस जेठानी पर हो रहे अत्याचार के खिलाफ उसने आवाज़ उठाई वह भी अपनत्व देने की बजाय परायों-सा व्यवहार की . नायिका की दारुण दशा बहुत कुछ सोचने पर मजबूर करती है. प्रज्ञाजी की यह कहानी स्त्री-विमर्श को एक नया आयाम देती है. उसका अंत देखिये , ' भाभीजी खुद को धोखेबाज़ और छिनाल तब मानती हैं जब चारों और सन्नाटा होता है और घर का हर आदमी सो गया होता है लेकिन तब भाभीजी सो नहीं पातीं हैं .'

Monday, 22 July 2013

आज दोपहर दैनिक भास्कर भिलाई के संपादक अतुलजी ने समोसा खिलाने के बाद गुजरात के विकास का जो खाका खींचा वह वाकई बेहद चौंकाने वाला था. उनने बताया के छत्तीसगढ़ 

                                                                      तस्मै श्री गुरुवेनमः   


     गुरु पूर्णिमा पर सर्वत्र गुरुओं की पूजा हो रही है. आज ही याने अषाढ़ की पूर्णिमा के दिन वेदों, महाभारत के रचयिता गुरु कृष्ण द्वैपायन व्यास का जनम हुआ था. उनकी ही याद में गुरु पूर्णिमा मनाई जाती है. इस दिन का पौराणिक महत्त्व है. तब विद्याध्ययन के लिए गुरुकुल आश्रम की व्यवस्था थी. शिष्य गुरुओं के अधीन रहकर शस्त्र-विद्या के साथ ही शास्त्र-विद्या का अभ्यास करते थे . उनमे नैतिकता का विकास करने के लिए भांति-भांति के उपाय हुआ करते थे. कड़ी परीक्षा के दौर से गुजरना पड़ता था शिष्यों को. महर्षि परशुराम, गुरु द्रोण, गुरु धौम्यादि से लगायत अनेकानेक गुरुओं ने शिष्यों की जो परम्परा बनाई वह आज भी दुनिया के लिए मिसाल है. आज की स्थिति तो यह है, कि शिष्यों को दंड देना गुनाह-सा हो गया है। यह सच है, कि अब न तो गुरु-शिष्य परम्परा रही न ही वह समय, तब भी हम यह नहीं भूल सकते कि दंड के बिना शिक्षा अधूरी है. अभी-अभी हमारे सहयोगी कोमल साहू ने बताया, कि बचपन में छत्तीसगढ़ के स्कूलों से पढ़कर आने के बाद जब बच्चे अपने पलक से शिकायत करते थे, कि गुरूजी ने उनकी पिटाई की है तो माता-पिता समझाते थे -'छडी पड़े छमछम, तो विद्या आये झमझम'. तो यह थी तब की शिक्षा के गुर. लेकिन आज? याद आ रहे हैं महान गुरु भक्त आरुणि, उपमन्यु, एकलव्य, जैसे शिष्य जिनने गुरुओं पर अपने  न्योछावर कर गुरु की महत्ता को महिमामंडित कर एक नीव डाल दी . गुरु-शिष्य को नमन.  

Saturday, 20 July 2013

                                                 रोना अनिद्रा का                        

     बहुतेरे हैं जो अनिद्रा रोग का रोना रो रहे है. कहते हैं कि सारी रात करवट काटते बीत जाती है लेकिन आँखें हैं कि बंद होने का नाम ही नहीं लेतीं। एक मित्र हैं, बेचारे बताने लगे, कि वे अनिद्रा की दवा कराते-कराते थक गए, फायदा तो कुछ नहीं होता, उल्टा मर्ज़ और बढ़ता ही जाता है. जितने मित्र हैं बेढब बनारसी की कहानी की तरह सब-के-सब एक से बढ़कर एक नुस्खे बताते हैं, उन्हें भी आजमाया, लेकिन ई ससुरी निंदिया है, कि  आती ही नही। अब का बताएं ये भाई, लोगों ने कहा, कि रात को रगड़कर सोना है तो डाइट भी रगड़कर होना चाहिए लिहाजा हमने खाने को डेढ़ गुना कर दिया, नतीजा यह, कि नीद और रूठ गयी और प्रातः क्रिया का जो बंटाधार हुआ सो अलग. किसी ने बताया, कि खाने में सलाद बढ़ा दो, तो हमने सब्जी बाज़ार का रुख किया।खीरा,  टमाटर, चुकंदर, गाजर, मूली, प्याज आदि खरीद लाये, उन्हें तरीके से काटकर सलाद बनाया और खाना शुरू किया, इससे पेट साफ़ होना तो शुरू हुआ, लेकिन नींद पर कोई असर नहीं पड़ा. रात हुई बिस्तर पर गए और आँख खुली-की-खुली! अब रे भैया! रात होते ही डर लगाने लगता है, कि सोयेंगे कैसे? 
     इसी बीच किसी संबंधी ने समझाईस दी, कि असल में चिंता ही निद्रा की हरनी है, यदि चैन से सोना है तो चिंता छोडो। उनने एक कहावत भी ठोकी, चिंता छोडो सुख से जियो. वह भी किया, कोई फायदा नहीं . अब का करें, सुबह उठे क्रिया किये, नास्ता दबाये, दोपहर में डटकर खाए, शाम हुई तो फिर वही नास्ता और फिर रात का भोजन। इस दिनचर्या में का रद्दोबदल करें या कौन सा गोली घोटें, कि  नींद उड़नपरी की भांति लपकती आये और आँखों में समां जाये. लोगों को और चाहे कोई चिंता होती हो, हमें तो यही चिंता खाए जात है, कि नीद आये तो कैसे. इसी में हम दुबले हुए जाते हैं.
      एक दिन स्कूल के दिनों का साथी जो अमेरिका में बड़ी कंपनी में लग गया था, आया। देखते ही छूटकर पुछा,
      'रे भई! खात-पियत ना हौ का !'
      अब हम का कहें ? वही बताये, कि नींद हमसे नाराज़ है. बिस्तर पर जाते डर लगता है . वे गमकते मुह से बोले, 
     'ई कौन सी बड़ी बात है, अमेरिका में तो यह आम मर्ज़ है। वहां तो कोई दुबला नहीं होता। इस समस्या से पीड़ित नींद की दवा लेते हैं, उनका डोज़ धीरे- धीर बढ़ता जाता है।'
     'कहाँ तक ?'
     'पांच-छह गोली त़क।'
     'उसके बाद?'
     'फिर तो नींद की सुई आवत है , वोका लगाके चैन की नींद सोवत हैं . तुमहूँ अईसा आजमाओ।'
     'ना रे भाई, ई हमसे ना हो सकत।'
     गुत्थी कैसे सुलझे? अनिद्रा की क्या वाकई कोई दवा नहीं?
   एक दिन हमारे बेटे ने बातों-बातों में गुत्थी सुलझाई, बताया -  वेद में लिखा है, निद्रा का मुख्य हेतु 'श्रम' है. इसलिये रगड़कर मेहनत करने वालों को नींद के लिए मशक्कत नहीं करनी पड़ती। परिश्रम करने वाले न भी चाहें, तो निंदिया रानी उन्हें अपने आँचल में समेट ही लेतीं हैं. लिखा भी है- 'सो जाते हैं फुटपाथ पर अख़बार बिछाकर, मजदूर कभी नींद की गोली नहीं खाते।' 
हमें अनिद्रा का अचूक नुस्खा मिल गया था. हम भागे अपने मित्र के घर, मित्रता का फ़र्ज़ अदा कर्ने। लगा श्रम के बाद की नींद परी साथ - साथ चल रही है।
२०/०७/२०१३