Monday, 22 July 2013

                                                                      तस्मै श्री गुरुवेनमः   


     गुरु पूर्णिमा पर सर्वत्र गुरुओं की पूजा हो रही है. आज ही याने अषाढ़ की पूर्णिमा के दिन वेदों, महाभारत के रचयिता गुरु कृष्ण द्वैपायन व्यास का जनम हुआ था. उनकी ही याद में गुरु पूर्णिमा मनाई जाती है. इस दिन का पौराणिक महत्त्व है. तब विद्याध्ययन के लिए गुरुकुल आश्रम की व्यवस्था थी. शिष्य गुरुओं के अधीन रहकर शस्त्र-विद्या के साथ ही शास्त्र-विद्या का अभ्यास करते थे . उनमे नैतिकता का विकास करने के लिए भांति-भांति के उपाय हुआ करते थे. कड़ी परीक्षा के दौर से गुजरना पड़ता था शिष्यों को. महर्षि परशुराम, गुरु द्रोण, गुरु धौम्यादि से लगायत अनेकानेक गुरुओं ने शिष्यों की जो परम्परा बनाई वह आज भी दुनिया के लिए मिसाल है. आज की स्थिति तो यह है, कि शिष्यों को दंड देना गुनाह-सा हो गया है। यह सच है, कि अब न तो गुरु-शिष्य परम्परा रही न ही वह समय, तब भी हम यह नहीं भूल सकते कि दंड के बिना शिक्षा अधूरी है. अभी-अभी हमारे सहयोगी कोमल साहू ने बताया, कि बचपन में छत्तीसगढ़ के स्कूलों से पढ़कर आने के बाद जब बच्चे अपने पलक से शिकायत करते थे, कि गुरूजी ने उनकी पिटाई की है तो माता-पिता समझाते थे -'छडी पड़े छमछम, तो विद्या आये झमझम'. तो यह थी तब की शिक्षा के गुर. लेकिन आज? याद आ रहे हैं महान गुरु भक्त आरुणि, उपमन्यु, एकलव्य, जैसे शिष्य जिनने गुरुओं पर अपने  न्योछावर कर गुरु की महत्ता को महिमामंडित कर एक नीव डाल दी . गुरु-शिष्य को नमन.  

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