Saturday, 27 July 2013

     समालोचन में प्रज्ञा  पाण्डेय की कहानी 'मेरा घर कहाँ है' ने सोचने पर विवश कर दिया कि आज भी समाज में दकियानूसी और रूढ़ विचार किस तरीके से घरों में अशांति फैला रहे हैं . हिंदुस्तान में स्त्रियों की त्रासदी का यह भयावह रूप है कि आज भी वह दूसरों की शर्तों पर जीने को मज़बूर होती है. प्रज्ञाजी ने इस कहानी में कथा नायिका का जो चित्र खींचा है वह वाकई गौर करने लायक है. पति से लेकर ससुराल के सभी लोग उसकी ओजस्विता पर खीझे हुए हैं तो मायके के लोग बेटी को घर से विदा कर अपना पल्ला  झाड़ लिए हैं ! अब उस बेचारी का कहीं कोई नहीं . क्या करे? जिस जेठानी पर हो रहे अत्याचार के खिलाफ उसने आवाज़ उठाई वह भी अपनत्व देने की बजाय परायों-सा व्यवहार की . नायिका की दारुण दशा बहुत कुछ सोचने पर मजबूर करती है. प्रज्ञाजी की यह कहानी स्त्री-विमर्श को एक नया आयाम देती है. उसका अंत देखिये , ' भाभीजी खुद को धोखेबाज़ और छिनाल तब मानती हैं जब चारों और सन्नाटा होता है और घर का हर आदमी सो गया होता है लेकिन तब भाभीजी सो नहीं पातीं  हैं .'

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