शरीर की सफाई या दिमाग की ?
'बटला हाउस और मुस्लिमों का दर्द' शीर्षक से आईबीएन-7 के मैनेजिंग एडिटर आशुतोष ने कल जो लेख लिखा, वह न केवल वैचारिक विमर्श को नए आयाम देता है बल्कि कई खिड़कियाँ भी खोलता है. मुस्लिम समाज के भीतर भी इसे लेकर बौद्धिक विमर्श शुरू है.
कुछ दिनों पूर्व ही ह्यूमन वेलफेयर ट्रस्ट की ओर से फरीदनगर के नूरी मस्जिद में रोज़ा इफ्तार किट वितरण का प्रोग्राम था जहाँ गरीब और यतीमों को इफ्तार किट बांटा गया. इस प्रोग्राम में बतौर मुख्य अतिथि रिटायर्ड जिला एवं सत्र न्यायाधीश सफाउल्ला कुरैशी साहब ने शिरकत की. मुझे भी एक पत्रकार के रूप में बुलाया गया था, वहां जो कुछ वाक्या हुआ वह हतप्रभ कर देने वाला था. ट्रस्ट के साहबान तकरीर करते हुए जब मुस्लिम समाज की गिरती दशा पर तथ्यों के साथ बोलना शुरू किये तो हर कोई दांतों तले उंगली दबाने को मजबूर हो गया, कि वाकई मुस्लिम समाज में कितना पिछड़ापन है. उन साहबान ने समाज के लोगों को यह कहते लताड़ लगाई कि मुस्लिम समाज के लोग दीनी तालीम से दूर होते जा रहे हैं . वे साफ-सुथरे नहीं रहते, शरीर की सफाई तक ठीक से नहीं रखते। गंदे मुहल्लों में रहते हैं और अपने बच्चों को तालीम तक नहीं देते. इन हजरत ने शारीरिक सफाई पर ऐसी हांक लगाई कि कौम के लोग बगले झाँकने लगे.
लेकिन जब मुख्य अतिथि रिटायर्ड जज सफाउल्ला साहब बोलने के लिए खड़े हुए तो उन्होंने दूसरी ही धारा बहा दी ! मेरी ओर मुखातिब हुए और बोले कि शुकुलजी बैठे हैं, वसुंधरा कुटुम्बकम की बात लिखी है . उन्होंने सफाई व विशेष कर शरीर की सफाई वाली बात पर तंज कसते हुए कहा कि शरीर की सफाई से क्या होगा? असल सफाई तो हमें अपने दिमाग का करना होगा. यदि दिमाग में ही कचरा भरा होगा, तो कितनी भी शरीर की सफाई करें उससे होना क्या है ? इससे भला समाज कैसे बदल सकता है ? जाने क्या हुआ कि सफाउल्ला साहब बोल ही रहे थे कि किसी हजरत ने उनके कान में कुछ कहा और वे यह कहते बैठ गए कि अरे! देर हो रही है क्या! और वे बैठ गये.
आशुतोष जी ! कौम चाहे कोई भी हो सफाउल्ला साहब का यह कहना सौ फीसदी सच ही है न, कि हमें शरीर के साथ ही दिमाग की सफाई करनी भी जरूरी है?
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