Saturday, 20 July 2013

                                                 रोना अनिद्रा का                        

     बहुतेरे हैं जो अनिद्रा रोग का रोना रो रहे है. कहते हैं कि सारी रात करवट काटते बीत जाती है लेकिन आँखें हैं कि बंद होने का नाम ही नहीं लेतीं। एक मित्र हैं, बेचारे बताने लगे, कि वे अनिद्रा की दवा कराते-कराते थक गए, फायदा तो कुछ नहीं होता, उल्टा मर्ज़ और बढ़ता ही जाता है. जितने मित्र हैं बेढब बनारसी की कहानी की तरह सब-के-सब एक से बढ़कर एक नुस्खे बताते हैं, उन्हें भी आजमाया, लेकिन ई ससुरी निंदिया है, कि  आती ही नही। अब का बताएं ये भाई, लोगों ने कहा, कि रात को रगड़कर सोना है तो डाइट भी रगड़कर होना चाहिए लिहाजा हमने खाने को डेढ़ गुना कर दिया, नतीजा यह, कि नीद और रूठ गयी और प्रातः क्रिया का जो बंटाधार हुआ सो अलग. किसी ने बताया, कि खाने में सलाद बढ़ा दो, तो हमने सब्जी बाज़ार का रुख किया।खीरा,  टमाटर, चुकंदर, गाजर, मूली, प्याज आदि खरीद लाये, उन्हें तरीके से काटकर सलाद बनाया और खाना शुरू किया, इससे पेट साफ़ होना तो शुरू हुआ, लेकिन नींद पर कोई असर नहीं पड़ा. रात हुई बिस्तर पर गए और आँख खुली-की-खुली! अब रे भैया! रात होते ही डर लगाने लगता है, कि सोयेंगे कैसे? 
     इसी बीच किसी संबंधी ने समझाईस दी, कि असल में चिंता ही निद्रा की हरनी है, यदि चैन से सोना है तो चिंता छोडो। उनने एक कहावत भी ठोकी, चिंता छोडो सुख से जियो. वह भी किया, कोई फायदा नहीं . अब का करें, सुबह उठे क्रिया किये, नास्ता दबाये, दोपहर में डटकर खाए, शाम हुई तो फिर वही नास्ता और फिर रात का भोजन। इस दिनचर्या में का रद्दोबदल करें या कौन सा गोली घोटें, कि  नींद उड़नपरी की भांति लपकती आये और आँखों में समां जाये. लोगों को और चाहे कोई चिंता होती हो, हमें तो यही चिंता खाए जात है, कि नीद आये तो कैसे. इसी में हम दुबले हुए जाते हैं.
      एक दिन स्कूल के दिनों का साथी जो अमेरिका में बड़ी कंपनी में लग गया था, आया। देखते ही छूटकर पुछा,
      'रे भई! खात-पियत ना हौ का !'
      अब हम का कहें ? वही बताये, कि नींद हमसे नाराज़ है. बिस्तर पर जाते डर लगता है . वे गमकते मुह से बोले, 
     'ई कौन सी बड़ी बात है, अमेरिका में तो यह आम मर्ज़ है। वहां तो कोई दुबला नहीं होता। इस समस्या से पीड़ित नींद की दवा लेते हैं, उनका डोज़ धीरे- धीर बढ़ता जाता है।'
     'कहाँ तक ?'
     'पांच-छह गोली त़क।'
     'उसके बाद?'
     'फिर तो नींद की सुई आवत है , वोका लगाके चैन की नींद सोवत हैं . तुमहूँ अईसा आजमाओ।'
     'ना रे भाई, ई हमसे ना हो सकत।'
     गुत्थी कैसे सुलझे? अनिद्रा की क्या वाकई कोई दवा नहीं?
   एक दिन हमारे बेटे ने बातों-बातों में गुत्थी सुलझाई, बताया -  वेद में लिखा है, निद्रा का मुख्य हेतु 'श्रम' है. इसलिये रगड़कर मेहनत करने वालों को नींद के लिए मशक्कत नहीं करनी पड़ती। परिश्रम करने वाले न भी चाहें, तो निंदिया रानी उन्हें अपने आँचल में समेट ही लेतीं हैं. लिखा भी है- 'सो जाते हैं फुटपाथ पर अख़बार बिछाकर, मजदूर कभी नींद की गोली नहीं खाते।' 
हमें अनिद्रा का अचूक नुस्खा मिल गया था. हम भागे अपने मित्र के घर, मित्रता का फ़र्ज़ अदा कर्ने। लगा श्रम के बाद की नींद परी साथ - साथ चल रही है।
२०/०७/२०१३                                                                                                     

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