Wednesday, 28 August 2013

भिलाई प्रेस क्लब में लालाजी को श्रद्धांजलि

     न्यू प्रेस क्लब ऑफ भिलाई नगर प्रबंधकारिणी की बैठक प्रेस क्लब अध्यक्ष शिवनाथ शुक्ला की अध्यक्षता में सम्पन्न हुयी। प्रेस क्लब भवन (नेहरू भवन) सुपेला में आयोजित इस बैठक में छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ पत्रकार व साहित्यकार लाला जगदलपुरी के असामयिक दिवंगत होने पर शोक श्रद्धांजलि व्यक्त की गई। भिलाई जैसे सुसंस्कृत व शांतिप्रिय शहर में गैंगरेप जैसी घृणित घटना के साथ ही मुम्बई में महिला प्रेस फोटोग्राफर के साथ हुए दुष्कर्म की कड़ी निंदा की गई। पत्रकारों ने कहा कि भिलाई जैसी नगरी में इस प्रकार की घटनाएं समाज को चैन से नहीं बैठने देंगी। इस मामले में शासन-प्रशासन को गंभीरता से ध्यान देने की जरूरत है। बैठक में सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित किया गया कि पत्रकार वार्ताओं के आयोजन से लेकर अन्य समस्त गतिविधियां अब प्रेस क्लब भवन में संचालित होंगी। इसके साथ आमने-सामने का कार्यक्रम आयोजित होगा, जिसमें शहर के आर्थिक विकास, साहित्य, कला, संस्कृति व संगीतादि के साथ प्रशासनिक, राजनीतिक, सामाजिक, शिक्षा व अन्य क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान देने वाले विज्ञ जनों को प्रेस से रूबरू कराया जाएगा। पत्रकारों को रियायती दर पर भूखंड आबंटन व पत्रकार कालोनी फेस-2 को विकसित करने के लिए राज्य शासन से विशेष पहल करने की बात की गई। क्लब के सदस्यों का सामूहिक बीमा किये जाने तथा स्मार्ट कार्ड योजना के लिए पदाधिकारियों ने हर्ष व्यक्त किया व कामना की कि भिलाई का प्रेस  क्लब निरंतर पत्रकारों के कल्याण व शहर के विकास में अपनी भागीदारी का निर्वाहन करता रहे।

       प्रेस क्लब की अनोखी रचनात्मक पहल

     प्रेस क्लब अध्यक्ष शिवनाथ शुक्ला की पहल पर अनोखी व रचनात्मक शुरूआत की जा रही है, जिसमें प्रेस से मिलिये व आमने-सामने के कार्यक्रमों में दर्शक दीर्घा की व्यवस्था होगी। इस दर्शक दीर्घा में चयनित विद्यालयों के पत्रकारिता में रूझान रखने वाले हायर सेकेण्डरी स्तर व पत्रकारिता महाविद्यालय में अध्ययनरत छात्र-छात्राओं को प्रवेश दिया जाएगा। पत्रकारिता के क्षेत्र में नई पौध को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से भिलाई प्रेस क्लब द्वारा शुरू किये जा रहे इस अभिनव योजना में सम्मिलित होने वाले छात्र-छात्राओं को प्रमाण पत्र देकर उत्साहित किया जाएगा। इस बैठक में प्रमुख रूप से प्रेस क्लब महासचिव खिलावन सिंह चौहान, वरिष्ठ उपाध्यक्ष सुबोध तिवारी, कोषाध्यक्ष अशोक पण्डा, उपाध्यक्ष अनिल गुप्ता, संजय पाण्डेय, कार्यालय सचिव राजेश अग्रवाल, सचिव विजय दुबे, एवं विनोद घोष, सह सचिव जे. एम. ताण्डी, कार्यकारिणी सदस्य मनोज अग्रवाल, बहादुर खान, दिनेश चौहान आदि उपस्थित थे।

Monday, 26 August 2013

                                     अम्मां ! जोगी बाबा आये हैं  

     'अम्मां ! अम्मां ! जोगी बाबा आ रहे हैं।'
     अरे ! यह क्या चिल्ला रहा हूँ मैं।      
     भोर हुआ ही था, कि बड़े जोर से सरन्गी छत्तीसगढ़ में चिंकारा की धुन पर जोग-गाने ने मेरी नींद को मानो सहसा अपने पास बुला लिया। चट आँख चालू होई और जंगले से बाहर झाँका। सिर पर साफा बांधे, गेरुआ वस्त्र पहिने एक जोगी बाबा खड़े जोग गाते दिखे। बड़े-बड़े जोर-जोर से, इतनी कि दूर तक सूनी जा सके। 
     बीसों बरस बाद इस परिधान में, छाती से चिपटी रहने वाली इस सरन्गी को बजाते और इस मोटी ध्वनि में जोग गाते जोगी बाबा को देखा और सुना हूँ ! 
     तब गाँव में जोगी बाबा आते थे और इसी तरह गाया करते थे। उनकी आवाज दूसरे को ओसारे से ही सुनायी दे जाती थी और हम भागते थे, क्योंकि लोग डराते थे और धनुषाकार में जो बजाने वाला यन्त्र होता है उसे दिखाकर कहते थे कि, ' ये सरन्गी तनि कान कटिह। '
     जोगी बाबा की सरन्गी कान काट लेगी, इस डर से हम उनसे बचने की कोशिश करते। लेकिन इसी में हमारी अम्मां थीं, जो जोगी बाबा को देखते ही खुश हो जातीं और पुचकारकर मुझे गोद में लेकर उनकी प्रतीक्षा में बैठतीं। मैं उनकी गोद में खरगोस-सा दुबका रहता। 
     जोगी बाबा आते और जोग गाकर चुप होते, सर तक पल्लू लिए अम्मां बड़े आदर से मुझे दिखती हुई उनसे निहोरा करतीं - तनी बाबू के झारि देईं, सांसि रोकले नाहीं रुक्कता। '
     वे बड़ी तन्मयता के साथ कुछ बुदबुदाते हुए मेरे पूरे शरीर पर फूंकते। मैं ठीक होता या नहीं यह तो नहीं मालूम, किन्तु अम्मां की आँखों में एक असीम तृप्ति और चहरे पर भरोसे का संतोष का भाव देखकर मुझे बड़ा अच्छा लगता। एक माँ का अपने बालक के प्रति कितना बड़ा स्नेह ! यही वजह थी, कि जोगी बाबा दूर से आते दिखते और बच्चे भागने लगते लेकिन में दौड़कर घर में घुसता-
      'अम्मां ! अम्मां ! जोगी बाबा आ रहे हैं।' टेर लगाता उन्हें बुलाता। वे बड़ा खुश होतीं और मेरे सिर पर हाथ फेरतीं बाहर आतीं।       
      . . .तो उनका मंत्र ख़तम होता और अम्मां गेहूं, चना, चवलादि मौसमानुसार जो भी अनाज होता लेकर आतीं।  जो कुछ मिलता जोगी बाबा अपनी झोली में लेते और गाते हुए अगला ओसारा देखते।
       अब अम्मां नहीं हैं, नियमित गाँव में रहना भी नहीं है. साल में जाता भी हूँ तो जोगी बाबा नहीं दीखते। आज एक बार फिर उस जोग-गाना ने सब कुछ सामने कर कर दिया। 
      . . चिल्लाया ही था कि जंगले से क्या देखता हूँ, कि एक कटोरी में चावल लिए श्रीमतीजी जोगी बाबा की और ही जा रही हैं, खुश हुआ कि चलो अम्मां का फ़र्ज़ निभाया तो जा रहा है। वरना आजकल कहाँ का जोग, कहाँ के जोगी ! 
     श्रीमतीजी बैरंग वापिस आती दिखीं और उनका जोग उसी धुन में जारी रहा। 
    'क्यों नहीं लिए क्या?'
    'कुछ कहते नहीं बस गाए जाते हैं। '
    'केवल चावल क्यों ले गयीं, अम्मां तो साथ में दाल भी देतीं थीं। ' मैंने अनुमान लगाकर निशाना मारा। 
    अब वे चावल के साथ कटोरी में दाल लेकर चलीं और फिर लौटी आ गयीं। अबकी बताईं, कि वे अनाज नहीं लेते, कहते हैं दक्षिणा चाहिए। और फिर वे ग्यारह रुपये नकद लेकर गयीं तो हंसती-बिहंस्ती यह कहते वापिस हुईं, कि 'जोगी बाबा ने खूब आशीर्वाद दिया, बाबू लोग स्कूल चले गए हैं। होते तो झरवा देती। बड़े बीमार पड़ते हैं।' 
     आह ! मानों मेरी अम्मां साक्षात हों। मैं फिर चिल्ला पड़ा -  'अम्मां ! अम्मां ! जोगी बाबा आ रहे हैं।'
          
                  
                       

Wednesday, 21 August 2013

                                                          नुस्खा गोरा होने का                                                               

      क्या सचमुच फेयरनेस क्रीमें त्वचा को चमकार बना देती हैं ? इनके प्रयोग से स्याह और झुर्रीदार चेहरा भी गौरांग हो जाता है ? श्यामल मुख-मण्डल इसके प्रभाव से दीप्त हो हो उठता है ? ये कुछ ऐसे सवालात हैं जो आजकल बाजार में धड़ल्ले से बिकते भाँति-भाँति किस्म के फेयरनेस क्रीमों को देखकर मनोमस्तिष्क में उपजते हैं। बढ़ते बाजारवाद के शिकार में सौंदर्य प्रसाधन की सामाग्रियाँ भी फँसी हैं। मार्केट में देसी तो कम, लेकिन विदेशी सौन्दर्र्य सामग्रियों की धूम मची हुई है। इनमें सर्वाधिक मांग फेयरनेस क्रीमों की है। एक-से एक महँगे क्रीम बिक रहे हैं और सबमें यही दावा लच्छेदार भाषा में अंकित है, कि काला चेहरा भी गोरा बन जाएगा। कई कम्पनियाँ तो बाकायदा कुछ अवधि तक की गारंटी दे रखी हैं, कि इतने दिन लगाने से ही त्वचा का रंग निखरना शुरू हो जाएगा। अब क्या स्त्री, क्या पुरूष, सबके सब गोरे बनने के लिए फेयरनेस क्रीमों के पीछे दीवाने। कॉलेज-स्कूल के लड़के-लड़कियाँ तो खैर शुरू से ही इन क्रीमों के चंगुल में फंसते रहे हैं, लेकिन यहाँ नव विवाहित से लेकर अधेड़ तक गोरा-चिट्टा बनने के फेर में फेयरनेस क्रीमों के दीवाने बने हैं। आज आप चाहे जिस घर में चले जाएं, फेयरनेस क्रीमों का फण्डा जरूर दिखाई देगा। कुछ दिनों पूर्व ही चर्म रोगों के विज्ञ डॉ० दीप चटर्जी की औषधि से लेकर अध्यात्म, दर्शन से लेकर राजनीति और साहित्य की पुस्तकों से सजी क्लीनिक में बैठना हुआ, तो एक मरीज यह मर्ज लेकर पहुँचा, कि उसके चेहरे पर मुँहासेनुमा बड़े-बड़े दाने उपर आए हैं, जो पुरे मुख-मण्डल को ही बदरंग कर दिया है। डॉक्टर साहब ने पूछा, तो इन महाशय ने बताया, कि वे फेयरनेस क्रीमों का प्रयोग करते-करते थक गए, गोरे तो न हुए, जरूर चेहरे का बुरा हाल हो गया। डाक्टर मुस्कराए और सीधे-सीधे बोले, फेयरनेस क्रीम का इस्तेमाल बन्द करें। फिर हमारी ओर मुखातिब होकर बताने के अन्दाज में कहे, कि देखिए ऐसा बुरा हाल करती हैं फेयरनेस क्रीमें। दरसल लोग सोचते नहीं और कुछ भी करते हैं। जबकि सचाई है, कि प्राकृतिक त्वचा के रंग में भला बदलाव कैसे सम्भव है? लड़कियों में यह जो गोरेपन को प्राप्त के लिए क्रीमों का प्रचलन बढ़ा है, वह झूठे प्रचार की वजह से है, बल्कि इन क्रीम कम्पनियों पर तो कानूनी कार्यवाही होनी चाहिए। क्योंकि स्किन पिगमेन्ट मेलानिन के प्रोडक्शन में कमी लाकर क्रीमें थोड़ी-बहुत फेयर चाहे बना दे, परन्तु इससे त्वचा को ज्यादा नुकसान पहुँचता है। यहाँ तक कि त्वचा के संक्रमण और रोग होने का खतरा बढ़ जाता है। जाने-माने लेखक बिमान बसु ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक कैमेस्ट्री इन आवर लाइफ में तो इस पर डिटेल में समझाया है, कि हम अपनी-अपनी कॉस्टीट्यूटिव स्किन लेकर जन्मते हैं, मगर बाहरी दुनिया में प्रवेश करने व समय के साथ हमारी त्वचा का रंग कुछ-कुछ डार्क होता चला जाता है। हमें इस परिवर्तन को गम्भीरता से लेने की बजाए नैसर्गिक मानकर स्वीकार करना चाहिए। वास्तव में बिमान बसु की बातों में कितना दम है। डॉ० चटर्जी ने इसका हल बताया, कि कांतिमय व चमकदार चेहरा बनाना है, तो आहार-विहार ठीक करें। योग-व्यायाम करें व हल्की-चन्दनादि के प्रयोग को न भूलें। विशेषकर प्रात: सूर्योदय के पूर्व उठकर फुलवारी की सैर व प्रसन्नचित होकर धूप सेवन से त्वचा में निखार आता है। सबसे बड़ी चीज यह है, हमें उत्साह से लबरेज होकर काम में लगना चाहिए व हरी पत्तेदार सब्जियों के प्रयोग पर ध्यान देते रहना चाहिए। भगवान का दिया रंग कोई नहीं बदल सकता। फेयरनेस क्रीम से ही लोग गोरे होते, तो भैंसे भला काली क्यों होती? महावत क्या सफेद हाथी पर न घूमते?

Friday, 16 August 2013

                                                   भिलाई में प्रेस क्लब भवन का हुआ शुभारम्भ 

     भिलाई की पत्रकार बिरादरी को बहुत-बहुत बधाई ! इसलिए, कि न्यू प्रेस क्लब ऑफ़ भिलाई को अपना भवन मिल गया। स्वतंत्रता दिवस के दिन भिलाई के ऐतिहासिक स्थल 'नेहरू भवन' को नगर निगम द्वारा प्रेस क्लब को समर्पित किया गया। यहाँ सबसे पहले प्रातः ८. ३० बजे प्रेस क्लब अध्यक्ष शिवनाथ शुक्ल ने वरिष्ठ पत्रकारों के साथ नगर निगम आयुक्त व अन्य अधिकारियों सहित जनप्रतिनिधियों, बुद्धिजीवियों व गणमान्य नागरिकों की गरिमामय उपस्थिति में राष्ट्रीय ध्वज फहराया। अपने सन्देश में शुक्ल ने कहा कि भिलाई में पत्रकारिता का गौरवशाली इतिहास रहा है। यहाँ भारत, रूस से लेकर अनके देशों के राजनेता, खिलाडी, पत्रकार-साहित्यकार, कलाकार आदि आते रहे हैं। साथ ही एशिया का विश्व प्रसिद्ध इस्पात कारखाना भी यहाँ स्थापित है। इसलिए प्रेस क्लब का अपना विशेष महत्व है। हम पर स्वयं में परिष्कार करते हुए शहर को नयी पहचान दिलाने का जिम्मा भी है।
     तत्पश्चात वरिष्ठ संपादक शिव श्रीवास्तव ने शुभारम्भ-पट्टिका का अनावरण कर प्रेस क्लब भवन का शुभारम्भ किया। उन्होंने कहा कि भिलाई में प्रेस क्लब निरंतर रचनात्मक कार्यों की और अग्रसर है। यह ऐतिहासिक पल पत्रकारिता के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में लिखा जायेगा। पत्रिका भिलाई संस्करण के संपादक श्री महेन्द्र सिंह शेखावत व नई दुनिया के न्यूज़ एडिटर श्री मयंक चतुर्वेदी ने प्रेस क्लब की गतिविधियों की तारीफ करते हुए कहा कि आदर्श पत्रकारिता से ही मज़बूत लोकतंत्र का निर्माण हो सकता है। वरिष्ठ पत्रकार अब्दुल मजीद, बी डी निज़ामी, मिथलेश ठाकुर ने प्रेस क्लब के उत्तरोत्तर प्रगति की तारीफ की। प्रेस क्लब महासचिव खिलावन सिंह चौहान ने आभार व्यक्त करते हुए कहा कि प्रेस क्लब भवन में सारी सुविधाएँ मौजूद रहेंगी। कार्यालय सचिव राजेश अग्रवाल ने कहा कि अब क्लब की सारी गतिविधियाँ यहीं से संचालित होंगी।
नगर निगम के आयुक्त श्री अनिल टुटेजा प्रेस क्लब भवन को मूर्त रूप में सामने देख प्रसन्नता से भर उठे। बोले कि भिलाई का प्रेस उत्तरोत्तर प्रगति करे यही कामना है। नगर निगम के जन संपर्क अधिकारी श्री अशोक पहाड़िया ने भी अपनी शुभकामनायें दी।
     प्रेस क्लब भवन पहुँच कर वैशाली नगर के विधायक भजन सिंह निरंकारी, मेयर श्रीमती निर्मला यादव, विजय यादव, बृज जीवन राय सहित अनेकों लोगों ने पत्रकारों को इस उपलब्धि के लिए बधाई दी। सञ्चालन प्रेस क्लब के वरिष्ठ उपाध्यक्ष सुबोध तिवारी ने किया। प्रेस क्लब के कोषाध्यक्ष अशोक पंडा, उपाध्यक्ष संजय पांडे, अनिल गुप्ता, शहर के पत्रकार प्रदीप सान्याल, राजेंद्र भारती गोस्वामी, मोहन साहू, मुकेश तिवारी, आर बी केशरवानी, तनवीर अहमद, अनूप कुमार जायसवार, रत्नाकर अल्वा, अनुभूति भाकरे, अमित नगरकर, राधामोहन मिश्र, सर्वेश सिंह सोनू, जोगिन्दर सिंह, बी एम दास, योगेश वर्मा, केदार महानंद, सुरेन्द्र सिंह विराट सहित अनेकों पत्रकार उपस्थित थे।         

Wednesday, 14 August 2013

                                                          नेहरू भवन प्रेस क्लब को समर्पित       

     बताते हुए खुशी हो रही है कि न्यू प्रेस क्लब ऑफ़ भिलाई को अपना प्रेस क्लब भवन मिल गया है। भिलाई के पत्रकारों के अथक परिश्रम से यह काम हो पाया है। भिलाई जिसे 'मिनी हिन्दुस्तान' के नाम से विश्व भर में प्रसिद्धि मिली है वहां अब 'प्रेस क्लब' का अपना भवन होगा, इससे बड़े खुशी की बात प्रेस बिरादरी के लिए और क्या हो सकती है। वह भी नगर निगम ने ऐतिहासिक स्थल ' नेहरू भवन ' को प्रेस क्लब को दिया है।  यह वही भवन है जहाँ हिंदुस्तान के अनेक राजनेता, नौकरशाह, सामाजिक कार्यकर्ता, और पत्रकारों सहित बड़ी-बड़ी हस्तियाँ आ चुकी हैं। भिलाई में प्रेस क्लब भवन की तत्परता के लिए हम नगर निगम के कमिश्नर श्री अनिल टुटेजा से लेकर सभी पदाधिकारियों का अभिनन्दन करते हैं।

                                                       प्रेस क्लब में होगा ध्वजारोहण  

     १५ अगस्त को सवेरे ८. ३० बजे ध्वजारोहण होगा।वरिष्ठ पत्रकारों की उपस्थिति में प्रेस क्लब भवन का शुभारम्भ भी किया जायेगा। इस अवसर पर सभी पत्रकारों की उपस्थिति प्रार्थनीय है। 

Sunday, 11 August 2013

                                                               ददुरवा बुलाये 

     कल शाम संगीत-कला की पारंगत विदुषी कल्पना ज़ोकरकर ने शास्त्रीय गायन का जो शमाँ बांधा वह अभी भी मनो मस्तिष्क में अमृतं नादं की तरह गूंज रहा है। वाह ! क्या ग़ज़ब की तान थी, क्या सुरीला लय था और आलाप के तो वाह! वाह! क्या कहने।
     भिलाई के स्मृति नगर में संपन्न हुए इस कार्यक्रम में तबला पर रवीन्द्र करमाकर और सारंगी पर संदीप मिश्र की संगत में ज़ोकरकर महोदया ने शास्त्रीय संगीत की जो सरिता बहाई वह किसी को भी झुमा देने के लिए पर्याप्त थी। ९ वीं में पढ़ने वाला हमारा बेटा तक झुमने लगा।
     'राग मल्हार' में जब उन्होंने 'दादुरवा बुलाये' का राग अलापना शुरू किया, तो महसूस हुआ कि कैसे इस राग के नाद से बारिश हो जाया करती थी। यहाँ बिहारी से लेकर जायसी तक स्मृति में ताज़े हुए जिनकी कविताओं में संयोग और वियोग श्रृंगार उफान पर हुआ करता था। यहाँ भी नायिका को सावन में पिया की याद आ रही है।  इनमें कितनी सुंदर उपमायें हैं। कुछ पंक्तियाँ देखिये --
     ददुरवा बुलाये
     पपीहा, कोयल शबद सुनाये
     पिया सुध आये
     तब चम-चम बिजुरिया चमके
     याद पिया की मोहे दिलाये
     गरज-गरज बरसे बदरवा. . .
     इसमें चम-चम और गरज-गरज की जो टेर थी बड़ी अच्छी लगी।  फिर 'राग दादरा' में 'दिवाना किये श्याम क्या जादू डारा' और राग काफी का टप्पा भी मनमोहक था। ..काश अशोक वाजपेयी जी होते।         

Thursday, 8 August 2013

                                                        ईद मुबारक    

  सवेरे बुलंद आवाज़ में पुकार हुई, निकला तो सरफुद्दीन चा दहलीज़ पर खड़े मुस्कुरा रहे थे। बहत्तर के लमसम वे जब भी आते हैं बड़े तहजीब के साथ पुकारते हैं, जाहिलों की तरह धडधडाते कभी प्रवेश नहीं करते और न ही मूक खड़े रहते हैं। जोर से नाम लेकर बुलाते हैं, जब तक कोई निकले न, यों ही खड़े इंतजार करते हैं।
      तो आज भी पहुंचे और पुकारे, मैं निकला। वही बुशर्ट, वही फुल पैंट, वही दाढ़ी और वही हँसता चेहरा लिए दरवज्जे पर खड़े... अदब से सिर झुक गया, सादर भीतर लाया। उनके हाथ में थैला था जिसे बैठते ही उन्होंने मुझे थमा दिया। तत्क्षण खोला तो दिखा, चक्काकार में जलेबियों की तरह फेंटी बादामी कलर की फिरनी, काजू, किसमिस और छुआरा सजाकर रखा है। फिरनी कश्मीर में भोजन के बाद मुंह मीठा करने के लिए दिया जाता है। आजकल अपने यहाँ सेवइयों की जगह फिरनी का चलन बढ़ गया है। लेकिन फिरनी लाख स्वादिष्ट क्यों न हो हमें तो सेवइयों से ही प्रेम है। आज भी याद है बाबा रंगून से सेवैयां पूरने वाला पीतल का सांचा लेकर आये थे जिसमे हम माँ और दीदी क साथ मिलकर सेवैयाँ पूरते थे।
     उन्हें देखते ही मुंह से सीधे निकला- अरे आज ईद है!
     ' आज तो सउदी में मना है।'
     ' तो कल यहाँ मानेगा?'
     'हाँ, हम सोचे बाबू से आज ही मिल लें, क्या पता कल जल्दी निकल जाएँ।' उनके इस शब्दों में सेवइयों की मिठास थी। मुझे शुगर नहीं है सो वह मिठास दिल में सीधे उतरी। वैसे सरफुद्दीन चा मौसम बदलते ही प्रकट होते हैं, पिछली बार आये थे तो दर्ज़नों अमरुद लिये आये थे, उसके तीन महीने पहले अंगूर। उनके प्यार दर्शाने का यह अनोखा तरीका है।
आज सेवईयों का उपहार देखकर प्रेमचंद का ईदगाह, हामिद के साथ उसकी खाला और हमारी अम्मा भी याद आ गयीं। कितना अपनत्व है ईद के फेस्टिवल में. यों अपनत्व तो सभी त्योहारों में होता है किन्तु ईद का मज़ा ही कुछ और है।  अब देखिये न, ऑफिस पहुंचा तो हमारे पत्रकार मित्र तनवीर अहमद भी सेवइयों का पैकेट छोड़ गए थे।  कुछ देर बाद पहुंचे भी और हंसकर चलते बने. कल तो नयाज़ भइया, मुर्तजा सर, अज़ीज़ भाई, सिराज जी, शेख मुन्नू से लेकर अनेक मित्रों दी दावत मिलेगी। हमें भी होली का इंतजार है। सरफुद्दीन चा से लेकर सभी मित्रों को ईद मुबारक हो।