Thursday, 8 August 2013

                                                        ईद मुबारक    

  सवेरे बुलंद आवाज़ में पुकार हुई, निकला तो सरफुद्दीन चा दहलीज़ पर खड़े मुस्कुरा रहे थे। बहत्तर के लमसम वे जब भी आते हैं बड़े तहजीब के साथ पुकारते हैं, जाहिलों की तरह धडधडाते कभी प्रवेश नहीं करते और न ही मूक खड़े रहते हैं। जोर से नाम लेकर बुलाते हैं, जब तक कोई निकले न, यों ही खड़े इंतजार करते हैं।
      तो आज भी पहुंचे और पुकारे, मैं निकला। वही बुशर्ट, वही फुल पैंट, वही दाढ़ी और वही हँसता चेहरा लिए दरवज्जे पर खड़े... अदब से सिर झुक गया, सादर भीतर लाया। उनके हाथ में थैला था जिसे बैठते ही उन्होंने मुझे थमा दिया। तत्क्षण खोला तो दिखा, चक्काकार में जलेबियों की तरह फेंटी बादामी कलर की फिरनी, काजू, किसमिस और छुआरा सजाकर रखा है। फिरनी कश्मीर में भोजन के बाद मुंह मीठा करने के लिए दिया जाता है। आजकल अपने यहाँ सेवइयों की जगह फिरनी का चलन बढ़ गया है। लेकिन फिरनी लाख स्वादिष्ट क्यों न हो हमें तो सेवइयों से ही प्रेम है। आज भी याद है बाबा रंगून से सेवैयां पूरने वाला पीतल का सांचा लेकर आये थे जिसमे हम माँ और दीदी क साथ मिलकर सेवैयाँ पूरते थे।
     उन्हें देखते ही मुंह से सीधे निकला- अरे आज ईद है!
     ' आज तो सउदी में मना है।'
     ' तो कल यहाँ मानेगा?'
     'हाँ, हम सोचे बाबू से आज ही मिल लें, क्या पता कल जल्दी निकल जाएँ।' उनके इस शब्दों में सेवइयों की मिठास थी। मुझे शुगर नहीं है सो वह मिठास दिल में सीधे उतरी। वैसे सरफुद्दीन चा मौसम बदलते ही प्रकट होते हैं, पिछली बार आये थे तो दर्ज़नों अमरुद लिये आये थे, उसके तीन महीने पहले अंगूर। उनके प्यार दर्शाने का यह अनोखा तरीका है।
आज सेवईयों का उपहार देखकर प्रेमचंद का ईदगाह, हामिद के साथ उसकी खाला और हमारी अम्मा भी याद आ गयीं। कितना अपनत्व है ईद के फेस्टिवल में. यों अपनत्व तो सभी त्योहारों में होता है किन्तु ईद का मज़ा ही कुछ और है।  अब देखिये न, ऑफिस पहुंचा तो हमारे पत्रकार मित्र तनवीर अहमद भी सेवइयों का पैकेट छोड़ गए थे।  कुछ देर बाद पहुंचे भी और हंसकर चलते बने. कल तो नयाज़ भइया, मुर्तजा सर, अज़ीज़ भाई, सिराज जी, शेख मुन्नू से लेकर अनेक मित्रों दी दावत मिलेगी। हमें भी होली का इंतजार है। सरफुद्दीन चा से लेकर सभी मित्रों को ईद मुबारक हो।                

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