नुस्खा गोरा होने का
क्या सचमुच फेयरनेस क्रीमें त्वचा को चमकार बना देती हैं ? इनके प्रयोग से स्याह और झुर्रीदार चेहरा भी गौरांग हो जाता है ? श्यामल मुख-मण्डल इसके प्रभाव से दीप्त हो हो उठता है ? ये कुछ ऐसे सवालात हैं जो आजकल बाजार में धड़ल्ले से बिकते भाँति-भाँति किस्म के फेयरनेस क्रीमों को देखकर मनोमस्तिष्क में उपजते हैं। बढ़ते बाजारवाद के शिकार में सौंदर्य प्रसाधन की सामाग्रियाँ भी फँसी हैं। मार्केट में देसी तो कम, लेकिन विदेशी सौन्दर्र्य सामग्रियों की धूम मची हुई है। इनमें सर्वाधिक मांग फेयरनेस क्रीमों की है। एक-से एक महँगे क्रीम बिक रहे हैं और सबमें यही दावा लच्छेदार भाषा में अंकित है, कि काला चेहरा भी गोरा बन जाएगा। कई कम्पनियाँ तो बाकायदा कुछ अवधि तक की गारंटी दे रखी हैं, कि इतने दिन लगाने से ही त्वचा का रंग निखरना शुरू हो जाएगा। अब क्या स्त्री, क्या पुरूष, सबके सब गोरे बनने के लिए फेयरनेस क्रीमों के पीछे दीवाने। कॉलेज-स्कूल के लड़के-लड़कियाँ तो खैर शुरू से ही इन क्रीमों के चंगुल में फंसते रहे हैं, लेकिन यहाँ नव विवाहित से लेकर अधेड़ तक गोरा-चिट्टा बनने के फेर में फेयरनेस क्रीमों के दीवाने बने हैं। आज आप चाहे जिस घर में चले जाएं, फेयरनेस क्रीमों का फण्डा जरूर दिखाई देगा। कुछ दिनों पूर्व ही चर्म रोगों के विज्ञ डॉ० दीप चटर्जी की औषधि से लेकर अध्यात्म, दर्शन से लेकर राजनीति और साहित्य की पुस्तकों से सजी क्लीनिक में बैठना हुआ, तो एक मरीज यह मर्ज लेकर पहुँचा, कि उसके चेहरे पर मुँहासेनुमा बड़े-बड़े दाने उपर आए हैं, जो पुरे मुख-मण्डल को ही बदरंग कर दिया है। डॉक्टर साहब ने पूछा, तो इन महाशय ने बताया, कि वे फेयरनेस क्रीमों का प्रयोग करते-करते थक गए, गोरे तो न हुए, जरूर चेहरे का बुरा हाल हो गया। डाक्टर मुस्कराए और सीधे-सीधे बोले, फेयरनेस क्रीम का इस्तेमाल बन्द करें। फिर हमारी ओर मुखातिब होकर बताने के अन्दाज में कहे, कि देखिए ऐसा बुरा हाल करती हैं फेयरनेस क्रीमें। दरसल लोग सोचते नहीं और कुछ भी करते हैं। जबकि सचाई है, कि प्राकृतिक त्वचा के रंग में भला बदलाव कैसे सम्भव है? लड़कियों में यह जो गोरेपन को प्राप्त के लिए क्रीमों का प्रचलन बढ़ा है, वह झूठे प्रचार की वजह से है, बल्कि इन क्रीम कम्पनियों पर तो कानूनी कार्यवाही होनी चाहिए। क्योंकि स्किन पिगमेन्ट मेलानिन के प्रोडक्शन में कमी लाकर क्रीमें थोड़ी-बहुत फेयर चाहे बना दे, परन्तु इससे त्वचा को ज्यादा नुकसान पहुँचता है। यहाँ तक कि त्वचा के संक्रमण और रोग होने का खतरा बढ़ जाता है। जाने-माने लेखक बिमान बसु ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक कैमेस्ट्री इन आवर लाइफ में तो इस पर डिटेल में समझाया है, कि हम अपनी-अपनी कॉस्टीट्यूटिव स्किन लेकर जन्मते हैं, मगर बाहरी दुनिया में प्रवेश करने व समय के साथ हमारी त्वचा का रंग कुछ-कुछ डार्क होता चला जाता है। हमें इस परिवर्तन को गम्भीरता से लेने की बजाए नैसर्गिक मानकर स्वीकार करना चाहिए। वास्तव में बिमान बसु की बातों में कितना दम है। डॉ० चटर्जी ने इसका हल बताया, कि कांतिमय व चमकदार चेहरा बनाना है, तो आहार-विहार ठीक करें। योग-व्यायाम करें व हल्की-चन्दनादि के प्रयोग को न भूलें। विशेषकर प्रात: सूर्योदय के पूर्व उठकर फुलवारी की सैर व प्रसन्नचित होकर धूप सेवन से त्वचा में निखार आता है। सबसे बड़ी चीज यह है, हमें उत्साह से लबरेज होकर काम में लगना चाहिए व हरी पत्तेदार सब्जियों के प्रयोग पर ध्यान देते रहना चाहिए। भगवान का दिया रंग कोई नहीं बदल सकता। फेयरनेस क्रीम से ही लोग गोरे होते, तो भैंसे भला काली क्यों होती? महावत क्या सफेद हाथी पर न घूमते?
No comments:
Post a Comment