अम्मां ! जोगी बाबा आये हैं
'अम्मां ! अम्मां ! जोगी बाबा आ रहे हैं।'
अरे ! यह क्या चिल्ला रहा हूँ मैं।
भोर हुआ ही था, कि बड़े जोर से सरन्गी छत्तीसगढ़ में चिंकारा की धुन पर जोग-गाने ने मेरी नींद को मानो सहसा अपने पास बुला लिया। चट आँख चालू होई और जंगले से बाहर झाँका। सिर पर साफा बांधे, गेरुआ वस्त्र पहिने एक जोगी बाबा खड़े जोग गाते दिखे। बड़े-बड़े जोर-जोर से, इतनी कि दूर तक सूनी जा सके।
बीसों बरस बाद इस परिधान में, छाती से चिपटी रहने वाली इस सरन्गी को बजाते और इस मोटी ध्वनि में जोग गाते जोगी बाबा को देखा और सुना हूँ !
तब गाँव में जोगी बाबा आते थे और इसी तरह गाया करते थे। उनकी आवाज दूसरे को ओसारे से ही सुनायी दे जाती थी और हम भागते थे, क्योंकि लोग डराते थे और धनुषाकार में जो बजाने वाला यन्त्र होता है उसे दिखाकर कहते थे कि, ' ये सरन्गी तनि कान कटिह। '
जोगी बाबा की सरन्गी कान काट लेगी, इस डर से हम उनसे बचने की कोशिश करते। लेकिन इसी में हमारी अम्मां थीं, जो जोगी बाबा को देखते ही खुश हो जातीं और पुचकारकर मुझे गोद में लेकर उनकी प्रतीक्षा में बैठतीं। मैं उनकी गोद में खरगोस-सा दुबका रहता।
जोगी बाबा आते और जोग गाकर चुप होते, सर तक पल्लू लिए अम्मां बड़े आदर से मुझे दिखती हुई उनसे निहोरा करतीं - तनी बाबू के झारि देईं, सांसि रोकले नाहीं रुक्कता। '
वे बड़ी तन्मयता के साथ कुछ बुदबुदाते हुए मेरे पूरे शरीर पर फूंकते। मैं ठीक होता या नहीं यह तो नहीं मालूम, किन्तु अम्मां की आँखों में एक असीम तृप्ति और चहरे पर भरोसे का संतोष का भाव देखकर मुझे बड़ा अच्छा लगता। एक माँ का अपने बालक के प्रति कितना बड़ा स्नेह ! यही वजह थी, कि जोगी बाबा दूर से आते दिखते और बच्चे भागने लगते लेकिन में दौड़कर घर में घुसता-
'अम्मां ! अम्मां ! जोगी बाबा आ रहे हैं।' टेर लगाता उन्हें बुलाता। वे बड़ा खुश होतीं और मेरे सिर पर हाथ फेरतीं बाहर आतीं।
. . .तो उनका मंत्र ख़तम होता और अम्मां गेहूं, चना, चवलादि मौसमानुसार जो भी अनाज होता लेकर आतीं। जो कुछ मिलता जोगी बाबा अपनी झोली में लेते और गाते हुए अगला ओसारा देखते।
अब अम्मां नहीं हैं, नियमित गाँव में रहना भी नहीं है. साल में जाता भी हूँ तो जोगी बाबा नहीं दीखते। आज एक बार फिर उस जोग-गाना ने सब कुछ सामने कर कर दिया।
. . चिल्लाया ही था कि जंगले से क्या देखता हूँ, कि एक कटोरी में चावल लिए श्रीमतीजी जोगी बाबा की और ही जा रही हैं, खुश हुआ कि चलो अम्मां का फ़र्ज़ निभाया तो जा रहा है। वरना आजकल कहाँ का जोग, कहाँ के जोगी !
श्रीमतीजी बैरंग वापिस आती दिखीं और उनका जोग उसी धुन में जारी रहा।
'क्यों नहीं लिए क्या?'
'कुछ कहते नहीं बस गाए जाते हैं। '
'केवल चावल क्यों ले गयीं, अम्मां तो साथ में दाल भी देतीं थीं। ' मैंने अनुमान लगाकर निशाना मारा।
अब वे चावल के साथ कटोरी में दाल लेकर चलीं और फिर लौटी आ गयीं। अबकी बताईं, कि वे अनाज नहीं लेते, कहते हैं दक्षिणा चाहिए। और फिर वे ग्यारह रुपये नकद लेकर गयीं तो हंसती-बिहंस्ती यह कहते वापिस हुईं, कि 'जोगी बाबा ने खूब आशीर्वाद दिया, बाबू लोग स्कूल चले गए हैं। होते तो झरवा देती। बड़े बीमार पड़ते हैं।'
आह ! मानों मेरी अम्मां साक्षात हों। मैं फिर चिल्ला पड़ा - 'अम्मां ! अम्मां ! जोगी बाबा आ रहे हैं।'
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