ददुरवा बुलाये
कल शाम संगीत-कला की पारंगत विदुषी कल्पना ज़ोकरकर ने शास्त्रीय गायन का जो शमाँ बांधा वह अभी भी मनो मस्तिष्क में अमृतं नादं की तरह गूंज रहा है। वाह ! क्या ग़ज़ब की तान थी, क्या सुरीला लय था और आलाप के तो वाह! वाह! क्या कहने।भिलाई के स्मृति नगर में संपन्न हुए इस कार्यक्रम में तबला पर रवीन्द्र करमाकर और सारंगी पर संदीप मिश्र की संगत में ज़ोकरकर महोदया ने शास्त्रीय संगीत की जो सरिता बहाई वह किसी को भी झुमा देने के लिए पर्याप्त थी। ९ वीं में पढ़ने वाला हमारा बेटा तक झुमने लगा।
'राग मल्हार' में जब उन्होंने 'दादुरवा बुलाये' का राग अलापना शुरू किया, तो महसूस हुआ कि कैसे इस राग के नाद से बारिश हो जाया करती थी। यहाँ बिहारी से लेकर जायसी तक स्मृति में ताज़े हुए जिनकी कविताओं में संयोग और वियोग श्रृंगार उफान पर हुआ करता था। यहाँ भी नायिका को सावन में पिया की याद आ रही है। इनमें कितनी सुंदर उपमायें हैं। कुछ पंक्तियाँ देखिये --
ददुरवा बुलाये
पपीहा, कोयल शबद सुनाये
पिया सुध आये
तब चम-चम बिजुरिया चमके
याद पिया की मोहे दिलाये
गरज-गरज बरसे बदरवा. . .
इसमें चम-चम और गरज-गरज की जो टेर थी बड़ी अच्छी लगी। फिर 'राग दादरा' में 'दिवाना किये श्याम क्या जादू डारा' और राग काफी का टप्पा भी मनमोहक था। ..काश अशोक वाजपेयी जी होते।
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