Thursday, 26 December 2019

मेरे प्राण,
कल रात आपसे बात कर इतना अच्छा लगा कि क्या बताऊँ। आपके विचार कितने सुन्दर विचार और प्रवाहमान हैं। इस पर हमें गर्व है। इसे बनाए रखिएगा। यह और अच्छा है कि आप समस्याओं से घबराने की बजाए उससे जूझ रहे हैं। संघर्ष कर रहे हैं। यही जीवटता की निशानी है जो व्यक्ति को सफलतम इन्सान बनाती है। कुशल तैराक वह नहीं जो बहती धारा में तैर कर नदी पार कर जाए बल्कि तूफानों और बवण्डर के बीच और वह भी धारा के विपरीत तैरकर पार उतर जाए वही कुशल तैराक कहाने का अधिकारी होता है। तो बेटे आप लगातार समस्याओं के झंझावातों से जूझ रहे और मुस्कुराते हुए अपनी मंजिल की ओर बढ़ रहे हो यही बड़ी बात है। इसके लिए हम आपको शुभकामनाएं देते हैं।
एक बात और, जीवन में बहुत दुश्वारियां आएंगी, मन निराशा-से भर उठेगा और तन-बदन में विद्रोह की लहर उठेगी तब याद रखना उन नावों को जो समुद्र के तूफान में फंसकर भी डूबती नहीं बल्कि लहरों को ही अपना जीवन बना लेती हैं जिस पर नाचते हुए इस प्रकार बढ़ती हैं मानों ये लहर ही उनकी पतवार हों। तो आप भी कठिनाइयों को अपनी ढाल बना लेना और उसी से सहारा लेकर बढ़ते जाना।
एक बात हर वक्त याद रखना कि आपको योग्य और कुशल डॉक्टर बनना है जो मानवता का कल्याण करने के लिए बना है। लक्ष्य यही हो कि कैसे समय से तालमेल, सहपाठियों से मेलजोल और वरिष्ठों से सीख कर अपनी मंजिल पा लें।
बाबा को ही देखो, उनके समक्ष कितनी कठिन परिस्थितियां नहीं आयीं लेकिन वे कभी घबराए नहीं। त्वरित फैसला करने और साहस के साथ आगे बढऩे की प्रवृत्ति ने ही उनका साथ दिए और वे अपने नाम का डंका बजाए। आप उनके जीवन से बहुत कुछ सीख सकते हो।
कल आपके फोन के बाद आपकी मम्मी और निखिल बहुत खुश थे। सब आपके बचपन की बातें करते थे कि कैसे आपके जीवनचर्या में बदलाव आया और कैसे आप उनसे तादाम्य बिठाकर चल दिए हो। हम लोग हँसते भी हैं और खुश भी होते हैं कि हमारा नीतीश कितना सुन्दर और ऊंचे विचारों का होता जा रहा है। आपको भगवान सदैव आगे रखें और आप अपने मकसद मेंं कामयाद होवो यही प्रार्थना है।
अस्तु.. शुभ।
शिवनाथ शुक्ला 

Tuesday, 24 December 2019

                       वह खुशनुमा शाम
वह 15 दिसम्बर की गम में डूबी खुशनुमा शाम थी, जब मुम्बई के जीटीबी नगर स्थित म्हाणा कॉलोनी के फ्लैट नं.-30 में तेजी-से सीढिय़ां चढ़ते आकर्षक वेश-भूषा में श्री ओंकारेश्वर मिश्र जी दिखे। देवरिया नरेश और गुरुग्राम के जाने-माने समाजसेवी इन शख्सियत को खिलखिलाते पुष्प की भाँति ताजादम देख हमारी आंखें हर्षित हो गईं। इसलिए भी, कि आप बड़े सदमे-से उबर कर आ रहे हैं और हम आपके स्वास्थ्य को लेकर बेहद चिन्तित हो रहे थे।
आप गुरुग्राम-से मुम्बई हमारी छोटी दीदी के ज्येष्ठ सुपुत्र के गौना-कार्यक्रम में सम्मिलित होने आए थे। पता चला, कि उड़ते विमान में ही आपकी तबीयत बिगड़ गयी। एक तरह-से आप बेहोश-से हो गए। विमान में उपस्थित दो चिकित्सकों ने आपका प्राथमिक उपचार किया। आप होश में आए।
मुम्बई के सान्ताक्रूज हवाई अड्डे पर उतरते ही सबसे पहले अस्पताल में जाकर आपने चेकअप कराया गया। जहां सारी जांच दुरुस्त निकली, लेकिन आराम जरूरी था। ऐसे मामलों में चिन्ता बढ़ ही जाती है, कि आखिर नीम बेहोशी भी आयी, तो क्यों? यह कोई संघातिक बीमारी तो नहीं!
                         (२)
बहरहाल, कुछ देर बाद ही पता चला, कि आदरणीय ओंकारेश्वर मिश्र जी पधार रहे हैं। हम चहक उठे और आश्चर्य में भी पड़े, कि बेहोशी के आलम-से उबरकर और थोड़ा ही विश्राम कर इतनी जल्द आप पधार भी रहे हैं! आपकी उत्कट जिजीविषा और अंधरे में भी उजाला भर देने की आपकी इस जानदार कोशिश ने हमें रोमांच-से भर दिया। मारे खुशी के हम लोग इन्तजार में बैठे, कि 6 बजे के आसपास मोबाइल ने घनघनाकर आपके पहुंचने का संकेत कर दिया। हम उठे और सीढिय़ोंं के समीप पहुंचे कि आगवानी तो करें। कि आप सहसा तेजी-से सीढिय़ों पर चढ़ते दिखे। इस शीत में भी गुनगुने जल की तरह बढ़ते आए और इससे पहले कि हमें झुक कर प्रणाम करते हमने चन्द्रमा की तरह शीतल व्यक्तित्व मिसिरजी को अपनी बाहों में भर लिया। कितने सुन्दर और लाजवाब व्यक्तित्व के मालिक श्री ओंकारेश्वर मिश्र जी।
एक मांगलिक कार्यक्रम के दौरान देवरिया में अपके पिताश्री-से हमारी संक्षिप्त मुलाकात में ही पता चल गया था कि परिवार में किस तरह संस्कार कूट-कूटकर भरे हुए हैं। आप में वही संस्कार भांति-भांति रूप में परिलक्षित होते रहे हैं। 
आपके साथ श्री ठाकुरजी भी थे जो गुडग़ांव-से ही आपके साथ आए हैं। ठाकुरजी भी गजब के जीवट व्यक्तित्व! पता चला कि उनकी किडनी फेल कर गई है। डायलिसिस पर चल रहे हैं। फिर भी चेहरा देखिए तो भान ही न हो। एकदम चमकदार और तेजोमय। इस संक्षिप्त समय में भी बहुत-से विषयों पर चर्चा हो गयी आप लोगों-से। राजनीति, समाज, अर्थ, भूूगोल, इतिहास, घर-परिवार, नाते-रिश्तेदारों-से लेकर बी-पॉजीटिव थिंक पॉजीटिव व्हाट्सएप ग्रुप और नामी शख्सियतों सहित किन-किन विषयों पर चर्चा न हुई। और देखिए, कि बातों-बातों में ही कब समय निकला और इशारों-इशारों में आपने चलने का संकेत पास कर दिया।
                           (३) 
बड़ी खुशमिजाजी-से उठे। निकलने-से पहिले नव-वधू को नेग देने के बाद हमारी श्रीमतीजी-से मिलने भीतर चले, कि चलें भाभी जी-से पहली मुलाकात तो कर लें। इतनी दूर-से आए हैं तो यह सौभाग्य क्यूं छोड़ें?
यह प्रसंग देखते ही हमें अपने कनाडा वाले पुल्हुर चाचा की याद हो आयी जो कनाडा-से अपने पैतृक गांव आजमगढ़ आते ही गोरखपुर के हमारे गांव खखाइचखोर में अम्मां-से मिलने सहज ही चले आया करते थे।
तो ओंकारेश्वर मिसिरजी बड़े प्रेम-से सबसे मुलाकात किए। दीदी और जीजा सहित बच्चों-से विदा लिए। हम आपके पीछे-पीछे चले। आप बड़ी तेजी-से सीढिय़ां उतरे मानों उर्जा-से लबरेज हों और अपनी लग्जरी कार की ओर बढ़े। हम और जीजाजी साथे थे। कुछ दूर पर आपकी मोटरकार खड़ी थी जहां पहुंच आप कार में पीछे की सीट पर विराजमान हुए। मोटरकार स्टार्ट हो गयी और बढऩे को हुई, कि आपने नजर हमारी ओर उठाईं जिनमें नेह के बादल घुमड़ रहे थे जो मानों कह रहे हों कि इतनी जल्द जाना अच्छा नहीं लग रहा।
फस्र्ट गेयर लगा और मोटरकार बढ़ी। आपने फिर हमारी ओर फिरकर देखा और हाथ जोड़े। कितने सरल, कितने सज्जन और कितने उदार..ठीक हमारे फुफा और फूआ की तरह। आज वे दोनों महामना तो नहीं हैं लेकिन ओंकारेश्वर मिश्र जी उनकी फूल-सी निशानी सुरंजना मिश्रा को बड़ी हिफाजत के साथ दाम्पत्य-पथ पर लिए चल रहे हंै। आप सपरिवार यशस्वी और कीर्तिशाली हों। ईश्वर आपको हर परिस्थितियों में महफूज रखें मिसिरजी।
उधर आपकी मोटरकार आहिस्ता-आहिस्ता बढ़ रही है और इधर मुम्बई का समुद्र मानों हमारी आंखों में उमड़ा जा रहा है। हमने बड़ी शिद्दत के साथ उसे हृदय में जज्ब किया कि मिश्रजी के नाम के मोती कहीं धरती पर न गिर पड़ें और धीरे-से अपने डग पीछे की ओर बढ़ा दिए। 
इस बीच आशाजनक खबर यह मिली है, कि मिसिर जी को जो उड़ते विमान में जो नीम-मुर्छा आई थी दरअसल वह किसी प्रकार की कोई बीमारी नहीं है। कुछ केमिकल लोचा है जो समय से व्यवस्थित हो जाता है। लेकिन ऐतिहात जरूरी है। सर्वशक्तिमान आपको स्वस्थ व प्रसन्न रखें यही प्रार्थना है।
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Saturday, 23 November 2019

मेरे प्राण!
कल रात आपके सुदर्शन व्यक्तित्व ने मुझे बेहद प्रभावित किया। सुन्दर तो लग ही रहे हो, ज्ञान की आभा भी झलक रही है। धीरे-धीरे परपक्वता आ रही है। विशेष कर लोगों को परखने और अपनी समझ को परिष्कृत करते रहने की ललक दिखायी दी। यही गुण है जो मनुष्य को आग ले जाता है। याद रखना, बाबा जब बर्मा की राजधानी रंगून में कमाने गए थे तब उनके पास सिवाय बुद्धि के और कुछ न था। एक साधारण से गांव से कलकत्ता होकर म्यामांर जाना, वह भी कमाने के लिए तब बड़ी बात थी। सोचे वे वहां कुलीगिरी नहीं किए और न ही दूसरों के आसरे जिए। उनने अपनी दुनिया खुद ही बसाई और उनके हुनर, उनके सिद्धान्त और उद्यमशीलता ने उनका साथ दिया। वे परोपकारी बहुत थे साथ ही स्वयं का विकास करना भी जानते थे। कभी पराश्रित न रहे। हम भी उन्हीं की सन्तान हैं। फिर आप तो आज एमबीबीएस का जो कोर्स कर रहे हो वह सब कुछ देता है लेकिन मुझे जो अच्छा लगता है वह देता एक सुन्दर व्यक्तित्व। तुम निरन्तर अच्छा सोचना और अच्छा करना। कभी किसी के बारे में गलत न  सोचना और कोशिश करना कि सकारात्मकता में कोई बाधा न आने पाए। अपने सिद्धान्त बनाकर रखना और चट्टान की तरह उस पर अडिग रहना। खूब पढऩा और खूब अच्छा खाना। दूध-दही के साथ प्रतिदिन एक फल खाना अच्छा रहता है। फलों में अनार और सन्तरा अच्छा रहेगा। वैसे सेब, जाम, केला आदि तो है ही। अपने डॉक्टरी हुनर को तो मन लगाकर पढऩा और उसे मांजते रहना। कभी किसी का दिल न दुखाना और न ऐसी बात कहना कि उसे खराब लगे। इस बारे में मैं आपको छुटपन से कितनी ही कहानियां बताता रहा हूं। शेष शुभ.. फिर लिखूंगा।
तुम्हारे पापा 

Friday, 22 November 2019

मैं बोल रही हूँ हिन्दी
-शिवनाथ शुक्ल
भोपाल विश्व हिन्दी सम्मेलन की अनुगूंज न केवल भारत वरन् पूरी दुनिया में सुनाई पढऩे लगी है। विश्व के एक से बढ़कर एक विद्वान इस सम्मेलन में शिरकत कर हिन्दी की जय-जय किए। उसे संयुक्त राष्ट्र संघ में आधिकारिक भाषा के तौर शामिल करने की जो कवावद लम्बे समय से चल रही है, वह अभी भी जारी है।
यहां सवाल यह है कि लगभग डेढ़ हजार वर्ष पुरानी हमारी भाषा हिन्दी जिसे पूरी दुनिया का सिरमौर बनाने की तैयारी चल रही है। उसकी स्थिति भारत में कैसी है? यह सवाल इस लिए भी कुनमुनाता है, कि हिन्दी का सोता भारत वर्ष में ही फूटा है, फिर भी उसकी दशा यहीं क्षीण होती जा रही है। हालांकि इस पर मतैक्य है। किन्तु सचाई को नहीं झुठलाया जा सकता, कि हिन्दी के साथ हो रहा विदेशी भाषाओं का घालमोल उसके अस्तिव को निरन्तर चोट पहुँचा रहा है। हिन्दी के लिए इससे बड़ी बात और क्या हो सकती है, कि जिसे हम संयुक्त राष्ट्र में ले जाने की तैयारी कर रहे हैं। वह अपने ही देश भारत में राष्ट्रभाषा का दर्जा तक नहीं पा सकी है।
न केवल अंग्रेजी वरन् समस्त भाषाएं इस बात की साक्षिणी हैं कि औपनिवेशिक भारतवर्ष की गुलामी की बेडिय़ों को तोडऩे में हिन्दी ने कितनी बड़ी भूमिका निभायी है। हम जब हिन्दी की बात करते हैं तो उसमें भारत में बोले जाने वाली समस्त भारतीय भाषाएं सन्निहित हो जाती हैं जिनने हिन्दी को सिर आँखों पर बिठाकर प्रान्त-प्रान्त मेंं क्रान्ति का अलख जगाने का काम किया है। भारत माता की जय की अनुगंूज उस वक्त ऐसी थी, कि उसकी आवाज आज भी गुंजायमान है और जिसे ब्रिटिश हुकूमत आज तक भूली नहीं होगी। तब नारा ए तकबीर, जो बोले सो निहाल, ब्रिटिश गो बैक जैसे कुछ नारे थे जो हिन्दी को तिलक  लगाकर तलवार और कृपाण थमाते थे। जिनके बल पर वीर क्रान्तिकारी देश पर कुर्बान हो जाया करते थे। महात्मा गांधी ने पूरे देश का भ्रमण कर सभी प्रान्तों और रजवाड़ों को यदि एक सूत्र में पिरोया तो वह हिन्दी की ही महिमा व देन थी।
आज वही हिन्दी कहां है? विख्यात समालोचक डॉ० नामवर सिंह ने भिलाई इस्पात संयंत्र के हिन्दी दिवस के एक कार्याक्रम में हिन्दी के शुद्धतावाद पर चिंताई जताई थी। वहीं प्रसिद्ध कवि अशोक चक्रधर ने अपने हालिया लेख में शुद्धतावादी से आगे क्रुद्धतावाद और युद्धतावाद का भी योग कर दिया। उनका निचोड़ है कि हिन्दी के भविष्य को लेकर सहृदय हो नए सिरे से सोचें। वहीं एक बड़ा वर्ग ऐसा भी है जो हिन्दी में किसी भी दूसरी भाषा के प्रवेश के खिलाफ है जो मानता है कि हिन्दी को हिन्दी ही रहने दिया जाए।
दरअसल चिन्ता हिन्दी के घालमेल की तो है ही, उससे बड़ी यह कि भारत में किसी भी प्रकार की हिन्दी की जगह अंग्रेजी तेजी से लिए जा रही है। अंग्रेजी का बढ़ता कारवां ही हिन्दी की चिन्ता का असल कारण है। फिर हिंगल्शि भी परवान चढ़ता जा रहा है।
आज आप देख लीजिए, अंग्रेजी माध्यम विद्यालयों की बाढ़-सी आ गई है। क्या निम्न और क्या उच्च, सभी भाग रहे हैं, कि हमारे बच्चे अंग्रेजी में पारंगत हो जाएं, चाहे उसका हिन्दी उच्चारण टूट ही क्यों न जाए। लेकिन जीभ अंग्रेजी को अंग्रेजी की भांति ले, तो मजा आता है। प्रतिष्ठा बढ़ती है। अब तो खतरा अन्य भारतीय भाषाओं पर ज्यादे बढ़ गया है, जो हिन्दी की जान हैं। कहां उर्दू, तेलगू, मलयाली, हरियाणी, बंगाली, भोजपुरी, छत्तीसगढ़ी, अवधी, बुंदेलखंडी, बिहारी, ओडिय़ा जैसी अन्य भारतीय भाषाओं में वह चीज बची है जो कल थी।
सिनेमा के टिकट जिसे जनमानस खरीदता है, वह तक अंग्रेजी भाषा में प्रिन्टेड है। आप बसों की टिकट देख लीजिए। हमारी भिलाई में सिटी बस शुरू हुई है जिसमें आम लोग सफर करते हैं, उसकी टिकट में प्रिन्ट अंग्रेजी में है। हमने सिनेमा एशोसिएशन के अध्यक्ष सुदर्शन बहल से इस बारे में बात की, तो उनने हिन्दी की जोरदार वाकलत यह करते हुए की, कि हमारे थियेटरों में टिकटों पर प्रिन्ट हिन्दी में ही होते हैं। लेकिन पीवीआर वगैरह में अंग्रेजी प्रिन्ट पर वे बोले की इसे हिन्दी में करना चाहिए। बैंकों में देखें तो वहां भी आम लोंगों का सीधा जुड़ाव है किन्तु अनेक निजी बैंक व बीमा कंपनियां आज भी हिन्दी को लेकर संजीदा नहीं हैं। इस बारे में हमने भिलाई इस्पात संयंत्र जन सम्पर्क विभाग के उप महाप्रबन्धक विजय मैराल से पूछा, तो उनने स्पष्ट कहा कि उनके यहां तो इसके लिए पूरा एक डिपार्टमेंट ही है राजभाषा। बकौल मैराल, हमारे यहां कामकाज हिन्दी में ही होते हैं। यहां तक कि वैज्ञानिक तरीके से हमने शब्दावली भी तैयार की है। संयंत्र के सीईओ एस.चन्द्रसेकरन को हिन्दी के लिए इस वर्ष महामहिम राष्ट्रपति पुरस्कृत भी कर रहे हैं। इस बारे में हमने भारतीय स्टेट बैंक के क्षेत्रीय प्रबन्धक सुनील कुमार लाला से बात की, तो उनका कहना था कि स्टेट बैक में सारे कामकाज हिन्दी में ही होते हैं। यहां तक कि बैंक के कर्मचारी-अधिकारी हिन्दी को और प्रोत्साहित करते हैं। लाला ने भी हिन्दी को स्कूलों में अनिवार्य किए जाने की वकालत करते हुए कहा, कि इसे राजभाषा की बजाए राष्ट्रभाषा का दर्जा दिया जाना चाहिए। चिकित्सा जगत में आज भी मरीजों को अंग्रेजी में लिखकर पर्ची दी जाती हैं। जिसे समझना मरीजें के लिए दुरूह होता है और मेडिकल वाले इसका लाभ उठाते हैं। इस पर चिकित्सक होने के साथ ही साहित्य प्रेमी-चिन्तन करने वाले डॉक्टर दीप चटर्जी से बात की, तो उनने करारी बात कही, कि मेडिकल साइन्स, इंजीनियरिंग साइन्स तो पूरी तरह से अंग्रेजी में है। अंग्रेजी तो फैल चुकी है पूरी तरह से। दूर न जाइए, सुप्रीम कोर्ट में चले जाइए और बात कीजिए हिन्दी में फिर देखिए। डिफेन्स के आला अधिकारियों की जबान पर कहां है हिन्दी? अब तो हिन्गलिश पैवस्त हो गया है हममें।
इस प्रकार अनेक सार्वजनिक जुड़ाव वाले संस्थानों व प्रमुख हस्तियों से बात करने पर लगा कि हिन्दी के पक्षधर तो सभी हैं, फिर भी हिन्दी अवमूल्यन की शिकार हो रही है। इससे इन्कार नहीं किया जा सकता, कि अंग्रेजी का प्रभाव निरंतर बढ़ रहा है और भारत के अनेक विद्वान इसे वक्त के साथ चलने की मजबूरी बता रहे हैं। लेकिन सवाल यह है कि चीन, फ्रांस, जापान, रूस जैसे देशों में तो बिल्कुल नहीं अंग्रेजी, फिर वे कैसे अपनी मातृभाषा में विकसित हो रहे हैं? यह तो तय है, कि कहीं-न-कहीं आज भी हमारा मानस अंग्रेजी को लेकर गुलाम तो नहीं लेकिन उसी के समान है।
हम भी इस बात के पक्षधर हैं कि भाषा को किसी बन्धन में बांधना सर्वथा गलत है। लेकिन भाषा के नाम पर जो लोग भी राजनीति करते हैं और कहते हैं कि व्यापार या केन्द्र-राज्य सरकारों व विदेशी मामलों में सम्पर्क या वार्ता केवल अंग्रेजी में ही संभव हो पाएगी, इसे तो समझना ही होगा। कोई कितना भी कह ले, लेकिन हिन्दी आज भी भारत में सर्वाधिक लोगों द्वारा प्रयोग की जाने वाली भाषा है। कितनी कोशिशें तो की गईं संस्कृत को धेनुमुद्रा में खड़ी कर हिन्दी को हकालने की, क्या हुआ? हिन्दी पर पश्चिमी आक्रमण के साथ ही अपने ही देश के लोगों द्वारा उपेक्षित व तिरस्कृत करने के बाद भी वह खिलखिला रही है और सन्देश दे रही है,  चिन्ता न करो.. मैं तब भी तुम्हारे साथ थी, आज भी हूँ और आगे भी रहूंगी।
(लेखक युवा साहित्यकार एवं पत्रकार हैं)
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Saturday, 2 November 2019

(9)
संध्या होने को है। लोगबाग आने लगे हैंं। गुड्डूू भाई साहब (सरोज दीदी के पतिदेव) के दर्शन होते हैं। शायद गिरिजा बाबा हैं, हमारे गांव के कृपा सुकुल भी दिख रहे हैं शायद।
इस तरफ नीलम दीदी फिर आईं हैं किसी काम-से और हमसे पूछीं हैं, "बच्चे मिले कि नहीं आपसे?"
"दिखे नहीं। आए हैं क्या वे दोनों भी?"
वे चली गईं और कुछ ही देर में सिम्मी और शिवम् आए हमने उनसे बातचीत की और बताया कि कैसे निखिल उन लोगों को याद करते रहता है। खूबसूरत और गुणी सिम्मी फेसबुक पर तो खूब एक्टिव रहती है। हमने दोनों-से कहा, कि पढ़ाई के मामले में भी ऐसे ही एक्शन मोड में रहा करो। वैसे तो दोनों बच्चे पढऩे में तेज हैं। आखिर उनके पापाजी भी तो प्रोफसर ही हैं तो बच्चे भला क्यूं पीछे रहेंगे। विद्या माई सभी को आशीर्वाद दिए हैंं।
टेंट के उस पार दूर वत्सल बाबू और शायद कि मानस बाबू और कु. नित्या की झलक दिखी है। बच्चे चंचल हैं। इन्हें भी काका का आशीर्वाद है। बर्थडे का फोटो दिखाया था निखिल-नीतीश ने हमें जिसमें बबुआ के साथ मुस्कुराते काका भी बैठे हुए आशीर्वाद दे रहे थे। खूब बढ़ें-पढ़ें ये सब।
अम्माजी यहीं बरामदे में बैठी हैंं। चुप मारकर। सभी को देख रही हैं मानो कुछ समझ नहीं पा रही हैं कि सहसा ये सब क्या होने लगा। काका के बीमार होने होने, बड़हलगंज में दिखाने, गोरखपुर में कुछ दिनों का इलाज चलने और चटपट चन्द्रलोक को प्रस्थान कर जाने की जो घटना घटी है वह किसी को भी हतप्रभ और सोचने के लिए मजबूर कर सकती हैं, फिर अम्माजी तो काका की सहधर्मिणी हैं। जिनने पल-पल उनके साथ काटे हैं। उनके प्रति हर किसी की संवेदना भरी हुई है। इसीलिए काकी (प्रकाश भैया की माताश्री) और भाभी लोग बात-बात पर उन्हें दिलासा और भरोसा देने वाली बातें कह-कहकर बारम्बार उनके आसपास ही घूमती रहती हैं ताकि वे अकेली न रहने पाएं।
शायद नाउन है क्या..जो अम्माजी के पैरों में नई पायल पहिना रही है। समझा-समझाकर और बच्चोंं की तरह बहलाकर। यह देख बिन्दू दीदी की आंखों में आंसू भरा जा रहा है लेकिन उसे रोक अन्य कार्यों में मन को व्यस्त रख रही हैं।
हम तो अम्माजी के हिम्मत की दाद देते हैंं। कितना तो समेट ली हैंं अपने को! इस घोर विपदा में भी कलेजे को मजबूत किए हैं। भीतर-से टूट चुके हृदय को भी सम्भाले रखना और घर-परिवार की जिम्मेदारी को ओढ़ लेना वाकई किसी बड़ी साध्वी-महीयसी के बस की ही बात है।
इधर जैसे-जैसे अंधेरा पसर रहा है, एक-एक कर गांव-घर और नाते-रिश्ते के लोग आते जा रहे हैं। घर के क्या छोटे और क्या बड़े यहां तक कि महिलाएं और बच्चे तक आए हुए लोगों की सेवा-टहल में लगे हैं। कोई पूड़ी लिए आ रहा है, तो कोई तरकारी। तीन-तीन प्रकार की तरकारियों की वजह-से अलग-अलग बर्तनों में गरम-गरम लेकर दौड़े आना भी कम बड़ी बात नहीं। गरम-गरम, करारी-करारी पूडिय़ां छनकर आती हैं और चट खतम हो जाती हैं। मिक्स वेज की तो खूब मांग दिख रही है। क्या तो चटखारे ले-लेकर खा रहे हैं लोग। रस में पगी बुनिया की रंगत भी देखते ही बनती है। लोग दोना में मांग-मांग कर खा रहे हैं। एक सज्जन तो घर ले जाने के लिए मांगने लगे, तो बिन्दू दीदी ने चटपट उन्हें देकर सन्तुष्ट किया। पट्टू बाबू पसीने-से लथपथ हैं। खूब भाग दौड़ करते दिखते हैं। अंगोछा लपेटे बनियान पहने दोपहर से ही दिशा-निर्देश देते अनिल भैया अभी भी किसी बात पर चिल्ला ही रहे हैंं। शायद पूड़ी आने में देर हो गई है या कि दही ठीक से नहीं रखा गया है। दीपू उस किनारे में किसी से कुछ कह रही हैं शायद। बहुत-से लोग हैं जिन्हें में चीन्हते नहीं। लेकिन देखने-से लगता है कि कोई-कोई विशिष्ट लोग हैं जिनसे हरिकेशजी हाथ जोड़-जोड़ मिल रहे हैं और अभिवादन कर रहे हैं।
एक चीज बड़ी अच्छी लगी, ब्राह्मणों के लिए चिउरा-दही की व्यवस्था भी कर दी गयी थी। अपुन तो उसी-से तर हुए। कितनी ही देर हो गयी, लेकिन प्रभाकर पाण्डेय भाई साहब और रत्नेश भाई भोजन नहीं किए हैं। वहीं बैठे लोगों से बतिया भर रहे हैंं। हमने उन लोगों से कहा, भोजन ठंडा हो जाएगा समय-से पा लीजिए। लगता है तरह-तरह के व्यंजनों के प्रकार ने लोगों को स्वाद-से आपूरति कर दिया है, तभी तो खाने के बाद हर किसी के चेहरे पर चटखारे लेने और होठों पर जीभ फेरने के दृश्य दिख रहे हैं।
रात गहरा रही है। भीषण गर्मी, वह भी चिपचिपी। लोगोंं ने लगभग भोजन कर लिया है। कल हमें अपने गांव (खखाइचखोर) जाना है। रत्नेशजी-से अनुरोध किए हैंं। उनने कहा है, कि अपने साथ लेकर स्वयं चलेंगे।
भीषण गर्मी है। आसमान खाली। पवन महराज भी रूठे लगते हैं। पत्ते तक शान्त और निर्जीव-से.. मानो काका के जाने की मायूसी हर तरफ बिखरी है। इस नियति को स्वीकार करने के सिवाय और दूसरा रास्ता ही क्या है..  (10)
अम्माजी कमरे में किसी काम से आई हैंं, भाभी की चटख आवाज सुनाई दी है..सुहानी सुबह ने हंसकर स्वागत किया मानो। वही धोबिन चिडिय़ां चींव-चींव करती लगी हैंं अपने काम मेंं। काम में छोटई भी लगे दिख रहे हैं। खरहरा के बाद गाय को नाद पर लगा वहां फैले गोबर को हटा रहे हैं फरुहा-से। एक हमारा समय था, कि हाथों-से गोबर काढ़ते थे और घूरे पर फेंक आया करते थे। लेकिन अब यह सब कौन करता है?
श्यामा गाय को देख रहे हैं। बेचारी नाद पर मुंह ले जाती है फिर छोटई की ओर देखती है मानो चीन्हने की कोशिश कर रही हो, कि "ये कौन है अजनबी! स्वामी कहां हैं मेरे, जो लाठी टेकते आते थे और माछी हांकते नेह किया करते थे।"
गैया का मुंह देखते हैं तो लगता है कि अब उसमें उछाह नहीं है, खुशी नहीं है। उदास है बेचारी। बेजुबान है तो अपना दुखड़ा किससे रोए? बस टुकुर-टुकुर देखे जा रही है। किसी ने बताया था कि "जब टिक्ठी उठ रही थी काका की तब खूब रम्भाई थी यह। कैसे तो खूंटे पर सिर पटक रही थी।"
किसी ने बताया, कि उसकी आंखों से भी अश्रू धार फूट पड़ी थी जब काका की पार्थिव काया को ले जाया जाने लगा।" वह मूक प्राणी भी शायद समझ गयी थी, कि उसके नाथ अब सदा के लिए उसे छोड़े जा रहे थे। कैसे भी थे, लेकिन कितना ख्याल रखे थे। शायद वह श्यामा भी सोच रही है, "कहीं मुझ अभागिन-से ही कोई गलती तो न हो गयी जो यों बीच रस्ते छोड़े जा रहे हैं।" गायों के बारे में कहते हैंं कि उन्हें घटने वाली घटना का पूर्वाभास हो जाता है। तो क्या इस गाय रानी को भी हो गया था, कि उसके स्वामी के जाते ही उसका खूंटा भी गया।
अभी देखिए न, कैसे तो जीभ बाहर निकाल फेंट रही है। छोटई का दिया भूसा-दाना खाना नहीं चाहती है क्या? लेकिन अब नाद में मुंह लगा रही है। धीरे-धीरे, क्या करे? पापी पेट है, न खाए तो जिए कैसे?
छोटई को गाय-बछिया सम्भालते देख सहसा काका कौंधे स्मृति पटल पर। वे कितने भी घुटनों-से लाचार थे, लेकिन गइया को सम्भालना खूब जानते थे। बांके पहलवान रहे थे अपने समय के। कई-कई बार बताया करते थे हमसे, कि कुश्ती में कैसे अच्छे-अच्छों को पछाड़ रावतपार का नाम रौशन किए हैं। फिर घीव-दूध-दही भी छक कर खाए हैं। दम था बाजुओं में उनके। तभी तो इस अवस्था में भी किसी-से इंच भर कम न थे। वो तो ईश्वर का बुलावा था। इसीलिए धमनियों में रक्त का प्रवाह कम हुआ तो हृदय की नलिकाओं को बहाना मिल गया। वर्ना अभी 10 वर्ष-से कम क्या जीते! लेकिन चलिए, जो लिखा है उसे कौन टार सकता है?
काम के बाद अब बरखी को लेकर बतकही चल रही है। कोई कहता है, कल होगा और कोई कहता है आज। इन्हीं बहस-मुबाहिसों के बीच लोग जाने की भी जल्दी में भी हैं। किसी को गोरखपुर जाना है तो किसी को अपने गांव-घर। 
हम बरामदे में आए हैं कि वन्दना आयी हैं, उनके लड़के दिव्यांशु और हिमांशु बाबू दिखे हैं। प्रणाम किए हैं दोनों। क्या तो लम्बे और छरहरे हो रहे हैं। अच्छे हाशियार बच्चे हैं। खूब आगे बढ़ें। शशि की तबीयत गड़बड़ लगती है। शायद पेट में तकलीफ है। वह भी तो लगी रही है इतने दिनों-से।
अम्माजी बैठी हैं मायूस। खोयी-सी। पूछने पर हूं-हां कर देती हैं। लगता है कुछ-कुछ याद करती रहती हैं। क्यूं न करेंंगी? गोरखपुर-से लौटने के बाद काका ने उनसे कहा था कि डॉक्टरों ने यहां काटा, वहां चीरा लगाया। आदि..आदि। सोचती होंगी, "क्यूं भेजे गए हॉस्पिटल? क्या जानें, न जाते तो बच जाते। लेकिन पेशाब उतर नहीं रहा था, पेट फूल रहा था। उफ-उफ कह इत-उत होते थे। न जाते तो और बुरा होता। ईश्वर की होनी है।"
शायद कौशल बाबू को भी निकलना है। उनकी श्रीमतीजी ने आकर प्रणाम किया है। बच्चे भी तैयार हैं। कोई फोन आ रहा है उनका। उधर पट्टू बाबू भी दिख रहे हैंं। फिर चाय आ गई है। कितनी पिएं ? कोई और आया है। हरिकेशजी आवभगत कर रहे हैं। बरखी का सामान बुलवाया जा रहा है। पंडीजी भी आ गए ही गए हैं।
ये कौन सज्जन हैं जो हमारी ओर ही आ रहे हैं..
 (11)
ओ.. तो नीलम दीदी आ रही हैं सज-धजकर। क्या तो खूबसूरती है भई उनकी। इस अवस्था में भी सबको फेल किए हैंं। मुस्कुराहट तो उनकी देखते ही बनती है। साथ में दाईं तरफ उनके श्रीमानजी भी हैं प्रोफेसर साहब। बड़ी तबीयत के आदमी हैं। सरल-सहज और सज्जन। सीधे आए हमारे पास। हम भी लपके उनकी ओर- "निकल रहे हैं क्या?"
"हाँ, अब काम है बहुत। जानते तो हैंं।" आवाज मद्धिम थी।
"सच है, आपके पास वर्कलोड भी बहुत रहता है। गोला कॉलेज ही आते हैंं न?"
"हाँ-हाँ। यह तो रूटीन है। और क्या करेंगे।"
"लेकिन पहले-से दुबले दिख हैं।" हमने सहज ही पूछा।
"नहीं, बस ऐसे ही है। कट रहा है समय।" वे फूल की तरह मुस्कुराए।
बहुत-सी बातें हुईं प्रोफेसर साहब-से। कहे कि "आपसे भेंट बड़े दिनोंं बाद होती है।" नीलम दीदी ने भी उनकी हां-में-हां मिलाया और यह कहते विदा हुईं कि गोरखपुर में पूरी व्यवस्था है आप आइए। और लोग भी निकल रहे हैं।
देवेन्दर मामा भी आए हैं। अम्माजी को समझा रहे हैंं। हमसे मुखातिब हुए हैं, बात हुई तो रोने लगे काका की याद कर। हमने दिलासा दिया। तो कहे कि वैसा आदमी होना मुश्किल है। वे बड़े भावुक हो गए हैंं मानो काका के रूप में उनकी कोई अमानत चली गयी हो। रोते-रोते भी अम्माजी को समझा रहे हैं- "आपन ध्यान रखिहअ। अब रोवले-गवले का होई? लइके-बच्चे बाडै़। सबक जिमवारी बा नै।" देवेन्दर मामा बड़े अच्छे लगते हैंं। एकदम सरलता की प्रतिमूर्ति। भेंट-मुलाकात हो रही है।
हमें भी तो खखाइचखोर जाना है। रत्नेशजी के दर्शन नहीं हो रहे हैंं। आएंगे कि नहीं। अमिताजी से पूछते हैं, तो कहती हैं आएंगे जरूर। हरिकेशजी टेंट वालों-से लेकर अन्य का चुकारा करने में लगे हैंं। इसी  बीच तय हो गया है कि बरखी आज ही होगी। बच्ची दीदी और गिरिजा दीदी के पास भी समय की कमी है।
इसी मेंं भोजना मांगने वाले असामी भी आते जा रहे हैं। बिन्दू दीदी ला-ला कर दिए जा रही हैं। इसी में अलग-से बुनिया मांगने वाले हैंं। उनकी भी इच्छा का ख्याल रखा जा रहा है। भोजन तो बहुत लोग किए लेकिन बचा भी बहुत है। वो मिक्स वेज वाली तरकरिया तो कहते हैं मुंह-सेे छूट नहीं रही थी, वह भी बची है।
अभी फिर-से पूड़ी-तरकारी बन रही है। घर के लोग ही बना रहे हैंं। बरखी है न। सामान सब हई है। कुछ लाना है तो गए हैंं हरिकेशजी। उधर अभिमन्यू भैया और भाभी भी बिजी दिख रही हैं।
गर्मी बहुत है। धोबिन सब भी गायब हैं। दुपहरिया को हम प्रभाकर पाण्डेय भाई साहब से कहते हैं कि क्यूं न बगीचे में बैठा जाए। मान गए हैं तो कुर्सी खींच वहीं चल दिए हैं। थोड़ा चैन है यहां। आंवला फला दिख रहा है। उधर बेल भी है। लेकिन सभी मौन हैं। इन वृक्षों को क्या हो गया है। सब-के-सब शान्त हैंं! क्या इन सबों को भी काका की याद सता रही है? याकि दुखी हैं कि अब उनकी आवाज सुनाई न देगी? पेड़-पौधों का भी संसार हमसे विचित्र नहीं। वे भी अपने लोगों पहचानते हैं। अपनों को देखकर हिलोर लेते हैंं और न देखेंं तो सिकुड़े रहते हैंं।
तिजहरिया हो रही है। लीजिए रत्नेशजी आते दिख रहे हैं। झोला मेंं कुछ लिए हैं। बतकही चल रही है। हम खखाइचखोर की ओर प्रस्थान करते हैं अब..आ जाएंगे जल्दिएै..
 (12)
..तो खखाइचखोर का संक्षिप्त प्रवास कर लौट रहे हैं। हाटा पहुंचे हैं तो समोसे की याद आ गई। एक बार यहीं डॉ.सतीश भैया ने समोसा खिलाया था। वह कार्नर की दूकान थी। करारे समोसे और टमाटर या कि इमली की चटनी बड़ी स्वादिष्ट लगी थी। प्रोफेसर सर प्रकाश भैया के साथ कुछ और लोग भी थे। शायद उस वक्त अनायास ही मुलाकात हो गयी थी हाटा में। खाने के बाद हम पैसा निकाल दूकानदार को देने लगे, तो प्रकाश भैया ने कहा तो कुछ नहीं, लेकिन हाथ ऐसे नचाकर हिलाए मानो आदेश दिए हों, कि बिल्कुल नहीं चलेगा और हमारे हाथ जहां-के-तहां थम गए। तब तक तो सतीश भैया ने लपककर दूकानदार को पैसा थमा ही दिया और हम थे कि इनकी उदारता का नमूना देखे-तो-देखते ही रह गए!
अभी तो समोसा खाने की इच्छा नहीं है। लेकिन खाकर उस दिन की याद को फिर ताजा क्यूं न कर लें। साथ प्रकाश-सतीश भैया न होंगे तो क्या, उनकी यादें तो होंगी। यही सब तो मनुष्य के जीवन को आनन्दमयी बनाती हैं। इसके बिना तो सब कुछ नीरस ही होता है।
लेकिन रत्नेशजी फटफटिया इतनी फास्ट भगा रहे हैं, कि देखते-ही-देखते चट-से हाटा निकल गया। अब क्या करें? वो समोसा, वो चटनी और वो हंसती-बिहंसती यादें.. क्या हसरत पूरी न होगी? कि कहला पार कर रावतपार चौराहा आ गया। मुडऩे को हुए कि वह स्थल जहां पर अनिल भैया के गैस की दूकान थी या कि आनन्द बाबू की, वहीं सड़क किनारे ठेले पर समोसे तले जा रहे हैं।
"रुकिए-रुकिए।" हमने हरका-से रत्नेशजी-से कह मोटरसाइकल रुकवा दी। हाटा न सही यहीं चलते हैं।
गए तो क्या देखते हैं कि कड़ाही में तेल के बीच समोसे शानदार तरीके-से नाच रहे हैं। उनका रंग श्वेत-से सुनहला हुआ जा रहा है। जैस ही तल कर निकाला तो हमने मांग लिया-दो-दो। उसने मिर्च भी दी। चटनी नहीं थी। वह मजा न आया जो प्रकाश-सतीश भैया के साथ हाटा में आया था।
घर आ गए हैं। बैठे हैं बरामदे में कि अमिताजी फूट लाकर काटने बैठीं। मोटे-मोटे हल्के पीले कलर के फूट बड़े अच्छे लगे।
हमारी अम्मां भी इस तरह के फूट की बड़ी शौकीन थीं। हम जब कभी जाते और सीजन रहता तो यह फूट खाने जरूर मिलता।
तो आज यह शौक अमिताजी पूरा कर रही हैं। उन्हें फूट काटता देख सहसा हमें हमारी अम्मां याद आयीं। वह दिन सोच आंखें सजल हो गईं।
अमिताजी पूरी तन्मयता के साथ उसे छील रही हैं। यह लड़की भी बेचारी देखिए, कि इतने दिनों-से लगी हुई है। काका के बीमार होने के समय से ही घरेलू काम में हाथ बँटाती है। स्वयं तो स्वास्थ्य को लेकर परेशान है उसके बाद भी लगी हुई है। अच्छी बात है यह।
फूट कट चुका है। नारंगी रंग है और रसदार भी है। खाने पर भकर-भकर नहीं लगता। उसका रसास्वादन कर रहे हैं हम और प्रभाकर भाई साहब, रत्नेशजी और लोग भी। बिन्दू दीदी को देखते हैं, वे शायद भीतर या कि उस घर गई हैं।
 (13)
संध्या ढलने लगी है। बाहर बड़ा वाला पंखा लगा है। लोग बैठे हैंं। अनिल भैया और भाभी कुर्सी पर हैं। किनारे अरुण भैया हैं इत-उत होते शायद खैनी मल रहे हैंं।
सामने चेयर पर अध्यापक सर अमित तिवारीजी विराजमान हैं। शान्त और गम्भीर बैठे कुछ मनन कर रहे हैंं शायद। उधर बच्चियां खेल रही हैंं। इधर अम्माजी बैठी हैंं भुइयां! अभिमन्यू भैया भी दिख रहे हैं। हम भी आकर बैठ गए।
किसी ने अमित बाबू की ओर इशारा कर हमसे पूछा- चिन्हअत हईं इनके?
कइसे नाइं चीन्हअब? अमित बाबू-से कुछ साल पहिले एहीं छतवै पर त मुलाकात भइल रहल। केहू अउर रहल साथे वो समय।
सुनते ही भाभी खिलखिलाकर हंसी- देखलीं बाबू पहिचान गइलीं। अइसन-वोइसन नाइं हवैंं हमार बाबू।
हम भी मुस्कुराए और अमित बाबू-से उनके बारे में पूछने लगे। यही, कि "अध्यापकी कैसी चल रही है। वहां का और क्या हाल है? गांव-घर मेंं कैसे हैंं लोग?" आदि-आदि। सरल व्यक्तित्व अमित बाबू ने तफसील-से बताया। तब तक बिन्दू दीदी भी और कि वन्दना भी याद नहीं आ रहा है, लेकिन बड़ी भाभी (श्रीमती अभिमन्यू भैया) भी आकर बैठ गईं। बिन्दू दीदी ने पंखे को देखा और कहा, कि गर्मी बहुत है आज।
इसी में नीतीश के एमबीबीएस की बात चल निकली तो अमित बाबू ने उसके बारे में बहुत सारी बातेंं बतायीं कि एमबीबीएस में कैसे-कैसे, क्या-क्या होता है। हॉस्टल और अन्य जानकारियोंं-से भी अवगत कराए।
बड़े नालेजेबल व्यक्ति हैं भई।
बन्नी और पट्टू बाबू भी आ गए हैं। आते ही दोनों ने उलाहना दिया- आजकल आप व्हाट्सएप-से दूर क्यों हो गए हैं? रहते हैं तो अच्छा लगता है।
हमने उन्हें अपनी मसरूफियत और समय का हवाला दिया। पट्टू भी नीतीश के बारे में पूछ रहे हैं। बहुत खुश हैं, कि वह अपनी मंजिल की ओर बढ़ा जा रहा है। हरिकेशजी भी आ गए हैं। गोलाकार में अच्छे लोग बैठे हैंं। भीतर भोजन की तैयारी चल रही है।
तभी किसी का फोन आया बिन्दू दीदी ने उठाया तो उधर से रोने की आवाज सुनाई दी। पता चला कि जगन्नाथ जी का फोन दिल्ली से था। वे काका के बहिन के बेटे हैंं। हम नहीं देखे हैंं उन्हें। उनकी शिकायत है कि कल ही उन्हें काका के दिवंगत होने का पता चला है। उनकी आने की बड़ी इच्छा है, लेकिन क्या करें। दिन निकल गया।
बिन्दू दीदी उन्हें समझाती हैं, हरिकेशजी समझाते हैं। हम अनिल भैया से इस बावत पूछे तो उनने बताया यहां उनके यहां कोई मिला नहीं वैसे जानकारी दी गयी थी। वे थोड़े-से झल्लाए भी कि वे लोग भी लापरवाह हैं।
हमेंं कल भिलाई के लिए प्रस्थान करना है। सोच रहे हैं..सड़क खराब है तो जल्द ही निकल जाना चाहिए। निखिल निकला था तो इस खराब सड़क ने ही उसकी ट्रेन छुटवा दी थी। वो तो अच्छा रहा कि काका का आशीर्वाद और रावतपार के लोगों की शुभकामनाएं थीं कि बनारस में उसे दूसरी ट्रेन मिल गयी थी। तो हमें जल्दी निकलना होगा।
लीजिए, भीतर-से बुलावा आ गया। भीड़ हुर्रा हो गयी।  
 (14)
सुबह की लालिमा फैलने लगी है। द्वार पर सफाई-कार्य शुरू है। यही काका होते, तो आ जाते लाठी टेकते और कुछ-कुछ निर्देश देते अम्माजी-से लेकर बच्चों को। गाय के समीप जाते, न भी बनता तो अख्तियार भर जरूरी काम तो निबटाते ही। लेकिन आज सूना है उनके बिना यह दूर तक फैला दुआर..धोबिन चिरइयां और वो देखिए छोटई भी लग गए है अपने काम में। गैया अभी भी जीभ फेंट रही है पता नहीं क्यों। अम्माजी कुछ निर्देश दे रही हैं। वे बड़े तरीके-से निभा रही हैं अपनी महत्त्वपूर्ण जिम्मेदारी। लगता है कि उन्हें इस बात का भान हो गया है, कि न केवल अपने स्वयं की बल्कि अब काका की भी जिम्मेदारी उन पर ही आन पड़ी है और वे बड़ी समझदारी-से इस दोहरी जिम्मेदारी को निभातीं अपने को संयत बनाए रखी हैंं। सभी पर ध्यान रखती हैं।
हम काकी (आनन्द बाबू की माताश्री)के बारे में भी सोचते हैं। देखते हैं
इतनी बीमारावस्था में भी चलायमान हैं। कल शाम हम उनसे मिलने गए थे। तब वे हमें देखते ही अंचरा फैला बड़ा आशीर्वाद दी थीं। दादा भी बैठे थे वहीं। लगे बताने काका की महिमा, कि कैसे वे सभी भाइयों और बच्चों के लिए होम हो जाया करते थे। उनसे यह भी पता चला, कि काका ने सभी के पालना में अपना अहम् योगदान दिया था। काका की महिमा बताते-बताते दादा की आंखेंं तर हो गयी थीं। चश्मा निकाल आंसू पोंछने लगे थे। अपने विवाह में काका के योगदान को बताना भी वे न भूले। हम सोचने लगे कि क्या तो जानदार थे भई अपने काका। सभी तो उन पर जान देते हैंं। सरोज दीदी आकर बैठ गयी थीं और वे भी हां-में-हां मिला रही थीं। काकी को हमने बहुत सांत्वना दी।
सुन्दर-से प्याले में चाय आ गयी है। 12 तक हर हाल में निकल जाना चाहते हैं। पट्टू बाबू जा रहे हैं अपने कर्तव्य-पथ पर। अभिमन्यू भैया और भाभी से बात होती है। बिन्दू दीदी हमारी तैयारी में बिजी हैं। उधर श्रीमती सुषमा भी रसोई तैयार करने मे लगी हैं शायद। जबकि हमने पहले ही कह रखा है, कि इतनी सुबह हम भोजन नहीं करते, इसलिए तकलीफ न कीजिए। तब भी लोग हैंं कि मानेंगे नहीं लगता है। अपनत्त्व का यही तो अन्दाज है, जो बाद में स्मृतियोंं को मांजे रखता है। प्रभाकर पाण्डेय भाई साहब से बात होती है।
ये देखिए, भाभी (प्रोफेसर सर प्रकाश भैया की श्रीमतीजी)आयी हैं मिलने। सरलता की प्रतिमूर्ति हैं भाभी। बोलती हैं तो होठों-से मिठास झरती है मानो। एकदम महीन आवाज में गरिमामय ठेठ भोजपूरी के शब्द और हिन्दी सुन लें तो भी अवाक रह जाएं। रहन-सहन और बोली-बात में सहजता इतनी, कि लगता ही नहीं, कि इतने बड़े शिक्षाविद् की सहधर्मिणी और इतने गुणी बच्चे-बच्चियों का सृजन करने वालीं ममतामयी मां होंगी। हम सोचते हैं, कि ऐसी ही स्त्रियां हैंं तो हमारे घर हैं वर्ना तो यह वेस्टर्न कल्चर न जाने कहां ले जाकर छोड़ेगा हमें।
तो वे बैठ गयी हैं समीप ही। हालचाल पूछ रही हैं। निखिल का बड़ा बखान कर रही हैं। नीतीश के एमबीबीएस पर हर्षित होकर कहती हैं कि यह बड़ी बात हुई है। मुस्कुरा कर ऊषाजी-से बहुत अच्छी-अच्छी बातें करती हैं और अपनत्त्व के साथ कुछ-कुछ बताती भी हैं। काका के बारे में भी बात करती हैं। अम्माजी को भी समझाती हैंं। बड़े गाम्भीर्य तरीके-से वे अपने घरेलू दायित्त्व का बोध करा देती हैं जिससे गुमान होता है हमें उन पर। छोटी भाभी (श्रीमती डॉ. सतीश भैया) और गुडिय़ा (श्रीमती बबलूजी) को नहीं देख सके हैं। लगता है वे लोग निकल गए हैंं कल ही।
आनन्द बाबू की श्रीमतीजी की झलक जरूर मिली थी। 
लीजिए, भोजन का बुलावा आ गया है। चावल-दाल, रोटी-सब्जी और साथ में ग्रीन सलाद। कच्ची रसोई है ठीक रहेगा। अभी तक तो पूड़ी-मसालेदार तरकारियां और मिष्ठानादि ही चल रहे थे। लेकिन सादा भोजन सफर में सहायक होगा। आराम-से बर्थ पर लेटो और "द मिरर" पढ़ते निकल चलो छुकछुक-छुकछुक रेल की मधुर आवाज सुनते। स्टेशनों पर चाय, करारी-करारी भजिया-पकौड़ी, जलेबी, समोसे तो तर करते ही रहते हैं।
अनिल भैया भी निकलते दिख रहे हैंं भाभी को लेकर। पूछते हैं तो कहती हैं, कि बड़हलगंज निकल रही हैं डॉक्टर को दिखाने। हम कहते हैं चलिए, पीछे-पीछे हम भी आ रहे हैं। गर्र-से मोटर साइकल रवाना हो गयी है।
याद आती हैं रेनू और गुडिय़ा। दोनों अपने परिवार के साथ हैं, कितने वर्षों-से नहीं मिली हैं ये प्रिय बच्चियां..हमारी अटैची तैयार है..
(15)
अरे, ये क्या हो गया! भीतर-से रोने की आवाज! कोठरी में पहुंचे तो देखते हैंं ऊषाजी काका की तस्वीर को सीने-से चिपटाए हबस-हबस कर रो रही हैं। उनकी आंखों-से अश्रुधार फूट पड़ी थी। देखकर हम तत्क्षण ठक् हो गए, ठकमुर्री मार गयी। जाते-जाते ये हृदयविदारक दृश्य। हमारे पास उन्हें चुप करवाने की हिम्मत न थी। अब वे थीं और उनके हृदय में समायी काका की तस्वीर थी। वे फूट-फूट कर रो रही थीं। उनकी आंखों के मोती काका की तस्वीर पर झरने लगे मानो काका भी इन मोतियों-से निहाल हो रहे हों। कि उनकी मंझली बिटिया ने अपना फर्ज अदा किया है।
28 वर्ष पूर्व किन परिस्थितियों में उनने ऊषाजी का विवाह किया था भला कौन नहीं जानता? एक वह दिन था जिसे सोचते ही रोआं काँप उठता है। परिवार के एक-एक सदस्य के माथे पर शिकन थी, नाना प्रकार की दुश्चिन्ताएं थीं। कि ऊषा का कल क्या होगा?
लेकिन आज देखिए!
अभी उस दिन बिन्दू दीदी ही बताने लगी थीं, ऊषा को देखते ही काका विह्वल हो गए थे। मारे खुशी के फूले न समा रहे थे। उसकी शरीर को देखकर उनके मुंह-से निकला था, "हई देखअ हो, बुझाता कौने राजा के घर-से आइलि है।"
काका को निखिल और नीतीश पर भी कम गुमान न था। निखिल के मैकेनिकल इन्जीनियर बनने की जितनी खुशी उन्हें मिली थी, कमोवेश उतनी ही खुशी नीतीश के डॉक्टरी प्रवेश पर भी मिली थी। हमसे वे और कौन-सी निधि चाहते भला?
तीन-तीन बेटियों और बेटे हरिकेश का क्या तो शानदार विवाह उनने किया था। तीन-तीन दिनों की बारात थी, जिसकी जितनी खातिर की गयी उतनी और कोई क्या करेगा? देखिए कि बुढ़ापे को कभी पास न फटकने दिए और मृत्यु पर्यन्त कर्माेद्यमी बने रहे। इसीलिए तो बड़े गर्व और सम्मान के साथ विदा हुए इस जंजाल-भरी दुनिया-से। ऐसा कोई न था जिसने नम आंखों-से उन्हें अन्तिम विदाई न दी हो। यहां तक कि गांव वाले भी उनका जस गा रहे थे।
ऊषाजी का रोना देख भला कौन होगा जो अपने को रोक सके। लेकिन सभी ने अपने दिल को थाम लिया। सबकी आंखेंं बह निकलतीं तो सामने अम्माजी थीं, उनका क्या हाल होता?
बिन्दू दीदी ने ऊषाजी को सम्भाला और उनके सीने-से लगी काका की फोटो लेकर कोठरी में ससम्मान रख दीं। तब तक प्रभाकर पाण्डेय भाई साहब, भाभी व अन्य लोग हर जतन-से दिलासा देने लगे।
ये लीजिए हरिकेशजी की मोटर साइकल निकल गई है। जाने को तैयारे खड़े हैं। रोते-रोते ऊषाजी जा-जाकर अपनी काकी,भाभी आदि से लेकर अन्य हृदय परिजनों का भेंट-अँकवार ले रही हैं। उनके रोते चेहरे को देख सभी मायूस हैं। दिलासा देते दिखते हैं।
अटैची बाहर आ रही है..
(16)
बिन्दू दीदी लगता है दही-चीनी लेकर आ रही हैं क्या! बड़ी भाभी भी मिल रही हैं। हम खड़े-खड़े मिलने-मिलाने का यह भावभीना दृश्य देख रहे हैं।
ऊषाजी यहां की हर वस्तु को बड़े प्रेम-से देख रही हैं। क्या तो मायका-प्रेम होता है न ? लाखों दुख हों, लेकिन मायके पर सारे दुख निछावर। कभी-कभी, "नइहर नगरी बाबा बड़ा निक लागै। बाग निक लागै, बगइचा निक
लागे..।" जैसे भाव-प्रवण गीत ऐसे ही मौकों पर अपनी सार्थकता सिद्ध करते
दिखते हैं।
हम सोचते हैं, जिन लोगों के बीच ऊषाजी का बचपना बीता, जिनके बीच पलीं और
बड़ी हुईं, जिनकी डाँट-डपट सुनते-सुनते फ्रॉक-से साड़ी पहिनना सीखीं उनको
छोडऩा सचमुच कितना दर्द देने वाला होता होगा न? हम इसे केवल महसूस कर
सकते हैं। एक तो काका के छोड़ जाने की पीड़ा, ऊपर-से अपनों का विछोह
ऊषाजी को किस कदर मथे रखा है, यह उनकी अश्रुपूरित आँख और बिलखते चेहरे को
देखकर समझा जा सकता है। फिर इस बार तो हमें लगता है कि शादी के बाद पहली
बार इतना समय बिताई हैं अपने घर-अंगनाई में। सबके साथ पंगत में बैठकर
नीक-बाउर खाई हैं। इस बार का दर्द कुछ और ही है, जो उनके अन्तस को हिलाए
है। तभी तो एक बार मिल लेने के बाद फिर-फिर लौटती हैं। फिर मिलती हैं और
आती हैं, मानो उन्हें तसल्ली ही न मिल रही है।
श्रीमती सुषमा भी कुछ देख रही हैं, शायद झोले में कोई सामान रख रही हैं।
हम बाहर आ गए हैं। मोटर साइकल तैयार है। हरिकेशजी ने एक ही किक में उसे
स्टार्ट कर दिया है। अटैची ले बैठ गए हैं हम।
सहसा काका याद आते हैं। होते तो क्या चुप बैठते? अब तक तो धोती खुँटिया,
छोटकी सइकिलिया लिए पहुंच गए होते चौराहा पर हमसे पहिले। वहां समझाते और
जीप पर बैठा कर उसे कुछ निर्देश देते और रवाना करते हमें। लेकिन नहीं, इस
बार तो वे दूसरी ही दुनिया में हैं हम लोगों को छोड़।
हरिकेश जी ने फर्स्ट गेयर लगा दिया है। मोट्साइकल चलने को है, कि नजर चली
गयी गैया पर! मानो बुला रही हो, "जाते-जाते क्या हमें न देखोगे प्रभु!"
देखे तो क्या देखते हैं, कि वह अपने दोनों कानों को अपनी आंखों की ओर
खड़ी कर एकटक नेह-से देख रही है। बेहद उदास है, जैसे कह रही हो, "काका
निकले तो अब अन्तिम मुलाकात हमसे भी है। फिर न मिलेंगे।"
मोटरसाइकल की आवाज उठी है, चक्का चलने लगा है। अम्मा की ओर निगाहें अपने
आप चली गयीं। उनकी आंखें तो तर है आंसुओं-से। लेकिन बहने से रोके रखी हैं
शायद। उनका सीधापन और नेह-नजरें उस गैया-से तनिक भी कम नहीं हैं। कितनी
भोली, कितनी मासूम और कितनी सीधी, ओह! अम्माजी को देखते ही सीने-से हूक
उठती है। हम ईश्वर-से प्रार्थना करते हैं, "काका की अमित शक्ति अम्माजी को मिले। वे सामर्थ्यवान हों। सभी को अपना प्यार लुटाएं। घर-गृहस्थी को उत्साह-से सम्भालें और बहुत जल्द उनसे दोबारा मुलाकात हो।"
चल दी मोटरसाइकल। अभी लिली होती तो पीछे-पीछे दौड़ती और सड़क तक छोड़़
आती। लेकिन नहीं है पर भी याद है। सड़क पर आ गए हैं, फिर कर देखते हैं.. सभी अपने खड़े हैं। हाथ हिला रहे हैं..अब तक शान्त हमारी आंखें भर आयी हैं। अपनों को छोड़ते जो दर्द होता है, वह हमारे दिल में अब तूफान बन कर उठ खड़ा हुआ है।
अच्छा, तो चलते हैं..
अलविदा रावतपार !
                                इति
(२)
दूसरे दिन रावतपार जाने को तैयार हुए। सीजन न होने पर भी ट्रेन में पैर रखने की जगह न थी। तिस पर तबीयत भी कुछ नासाज। फिर भी हिम्मत बांध कर ट्रेन में चढ़ गए। बनारस पहुंचे तो आगे ले जाने वाली कृषक एक्सप्रेस छूट गई। वहां से सीधे बस स्टैण्ड गए। गोरखपुर वाली बस लगी थी, बैठ गए। वर्षा-ऋतु में भी बड़ी उमस और चिपचिपी गर्मी! रात 11.30 के लगभग रावतपार चौराहा पहुंचे। हरिकेशजी खड़े थे, ऊषाजी के साथ। हम उतरे और इनके साथ निकले। रास्ते में सोच रहे थे, और बार आते थे तो बाबूजी-काका इन्तजार करते मिलते थे। कुछ वर्ष पूर्व बाबूजी चन्द्रलोक के लिए निकले तो काका अकेले ही खटिया पर बिस्तरा आदि लगाने की गुहार करते मिलते। एक लिली थी, जो दौड़े आती थी, वह भी दगा दे गई। लेकिन इस बार..सोचते ही मन थर्रा उठा। द्वार पर जाऊंगा कैसे? अम्माजी क्या कर रही होंगी? जैसे प्रश्र उमड़-घुमड़ रहे थे। तब तक द्वार आ ही गया। एकदम सूना और निचाट। कोई हलचल नहीं। यही पहले था तो सबसे पहिले तो लिल्ली ही कुंकुआते दौड़ पड़ती थी। फिर अम्मा और काका आंखें पसारे रहते।
लेकिन इस बार, सब सूना..मोटरसाइकल से उतरते ही चौंके! मानो काका बोले हों, "बड़ा देर कइलीं।" देखा तो अरुण भैया खैनी मल रहे थे, उदास।
बरामदे मेंं अम्माजी दिखीं, चुप! एकदम भाव-शून्य। बाहों में भरकर हबस पड़ीं। बिन्दू दीदी, अमिता आदि-से मुलाकात हुई। इस बारिश के मौसम और आधी रात में भी वहां भीषण गर्मी थी। इतनी की सहन न हो रहा था। स्नान किए तो जरा तरी मिली, लेकिन कुछ ही देर में उमस ने फिर परेशान किया। तो छत पर चले गए वहां भी चैन नहीं। लौटकर कमरे में आए और लेट गए। थकान थी, कब नींद लगी और कब भोर हुआ पता न लगा।
 (3)
आसमान में लाली फैलने लगी थी। चिडिय़ों की चहचह सुनाई दी। पहले तो गौरैया दिखती थीं, लेकिन वे नहीं हैं इस बार। इन बड़ी-बड़ी चिडिय़ों को देख सोचे, ये किस प्रजाति की हैं सब? जो तन्मय होकर दाना चुग रही हैंं। पता किए तो बताया गया, कि धोबिन कहतें हैं इन्हें। मुस्कुरा उठे हम। सोचे, धोबिन को तो शुभ कहा जाता है अपने यहां। मतलब अशुभ में भी कहीं-न-कहीं शुभता का सन्देश आ रहा है। सच भी है, ईश्वर अगर कभी दुख देते हैं तो सुख का साहस भी भरते हैं। इसी के बल पर तो ये जिन्दगानी है।
हम उठे बरामदे में आए ही हैं, कि भाभी (श्रीमती अनिल भैया) का उदास, किन्तु हहास भरा स्वर गूंजा- "आईं बाबू, एहीं आ जाईं।"
उनके स्वर में प्रेम इस कदर बोलता है, कि मुस्कुराहट को कितना भी रोको होठों को छुए बिना नहीं मानती। इससे पहिले कि हम उनके चरण छूएं, प्यार-से पकड़ लीं और पास ही चौकी पर बिठाईं।
तब तक बाबू पट्टू, उनकी कर्मठ श्रीमतीजी और उनके दोनों बच्चों ने पालागन की रस्म अदा की। अनिल भैया को प्रणाम किए, तो वे मुहब्बत-से हालचाल पूछे। बड़ा अपनत्त्व देते हैं ये लोग। इतनी, कि प्रशंसा के लिए हमें शब्द खोजने पड़ेंगे।
बाहर निकले और नए घर में आए तो प्रभाकर पाण्डेय जी बैठे मिले। उनसे ढेर-सी बातें हुईं। मुम्बई का हालचाल पूछे। उन्हें खरीदी के सिलसिले में कहीं जाना पड़ गया। तब तक कुमारी शशि ने सुन्दर-से प्याले मेंं चाय ला दिया। भाभी (श्रीमती अभिमन्यू भैया) दिखीं। रुआंसी जैसे खूब रोयी हों..पालागन किए तो धीमी आवाज मेंं समाचार पूछीं। वे हर बार नए अन्दाज मेंं होती हैं। लेकिन उनके प्यार का अन्दाज कभी नहीं बदलता। एकदम अपनापा। लगता है दिल में बिठा लेंगी। अभिमन्यू भैया भी मिले। समाचार पूछे और चाय के लिए अन्दर आवाज दिए कि हमने कहा, शशि ने पिला दिया है। मानो वे संतुष्ट न हुए। कितना मानते हैं ये लोग हमें।  थोड़ी ही देर में पीहू और कलश ने आकर बिना किसी के कहे प्रणाम किया। इन दोनों छुटकुओं के संस्कार देख हमें बड़ा गर्व हुआ। तभी वन्दना आईं और प्रणाम कीं। समाचारों का आदान-प्रदान हो ही रहा था कि बन्नी भी आ गईं। उनकी गोद में इस बार जानू थी। बेहद खूबसूरत और चंचल आंखों वाली। हमने रुनझुन के बारे में पूछा तो बताईं कि वह अन्दर ही कहीं खेल रही है। बिन्दू दीदी, अमिता, अमृत की मम्मी और उनकी बहिनें कुछ-कुछ करती दिख रही हैं। इसी में वे हमसे भी बतिया लेती हैं।
लीजिए, कुछ लोगों की आवाजाही दिख रही है। लगता है कोई कार्यक्रम होना है..

 (4)
सुबह-से ही तैयारी होने लगी थी। 28 वर्ष पूर्व जहां हमारे विवाहोत्सव पर 3 दिनों तक बारात रुकी थी, वहीं पिंडादि पारने और अन्य कर्मकाण्ड का कार्यक्रम था।
हमने वहां जाने की इच्छा जताई, तो ले गए तो वे लोग मोटरसाइकल-से, साथ प्रभाकर पाण्डे भाई साहब भी थे। वहां का दृश्य बेहद गमगीन! हरिकेश जी का परिधान, उनकी भाव-दशा देख, मन 'आह!' कर उठा। 
एक वह दिन याद आया जब हमारे विवाह के समय बहुत छोटे थे। द्वारपूजा के बाद उन्हें देखा तो हाफ पैन्ट और बुशर्ट पहिने तख्ते पर खामोश बैठे थे। अबोध.. वे वैसे ही थे जैसे अभी अक्षत हैं।
लेकिन हा समय! अभी धोती-बनियान पहिने कुश-आसन पर बैठे हैं। सामने सिर पर साफा लपेटे पण्डितजी हैं। बीच में दोना-पत्तलों पर रखीं पिण्ड सामग्रियां लाइन से लगी हैं जिसमें पंडित के कहे अनुसार वे कर्मकाण्ड कर रहे हैं। सामने अमृत और अक्षत के साथ ही प्रांजल आदि उनकी मदद कर रहे हैं। एक स्त्री शायद नाउन रही होगी वह भी कुछ-कुछ कर रही है।
जलम्-सुजलम्..पुष्पम्-सुपुष्पम्..अन्नम्-सुअन्नम्.. ऐसे ही न जाने कितने-कितने मन्त्र और उसकी बारम्बार की आवृत्तियां.. बार-बार की बदलती शारीरिक क्रियाएं इतनी बोझिल और थकाऊ कि शरीर परेशान हो जाए। लेकिन कर्मकाण्ड था जो अनिवार्य है। इसे करते हरिकेश जी के होंठ भिंचे हुए थे मानो समझ न पा रहे हों कि आखिर हो क्या रहा है! इस उमर में जहां लोगों को पिता के साथ की बड़ी जरूरत होती है, वहां इस नौजवान को यह कर्म करना पड़ रहा है तो सोचा जा सकता है कि उसकी मनोदशा क्या होगी?
बगल में कुर्सिया लगी हैं। जहां डॉ. सतीश भैया, बबलूजी, बाबू कौशल से लेकर गांव-घर के अन्य लोग विराजमान हैं। हम भी बैठ गए और एकटक हरिकेशजी द्वारा किए जा रहे कर्मकाण्डों को देखे, तो देखते रह गए!
कुछ ही देर में आदरणीय बबुआ भी आ गए, देवेन्दर मामा भी। प्रणाम के लिए उठे, तो वे सरल हृदयी स्वयं ही समीप आ गए और हालचाल पूछे। उनका मुख-मण्डल भी निश्तेज मानो हृदय में रो रहे हों। हम साहस न कर सके कि कुछ बात कर सकें।
तभी मोटर साइकल-से कोई आया और कहा कि अम्मां वहां सीना पीट-पीटकर दहाड़ें मार रही हैं। हम भागे, तो देखते हैं कि कोठरी के एक कोने में दुबकी वे हबस-हबस कर रो रही र्हैं। बिन्दू दीदी, ऊषाजी आदि उन्हें चुपवा रही हैं। हमने उन्हें अपने सीने में दुबका लिया और ढांढस बंधाने लगे। लेकिन यह तो सांत्वना मात्र था। सचाई तो यही है कि जिस स्त्री का सुहाग चला गया उसे कोई किन शब्दों में समझाया जा सकता है। आखिर बाल-बच्चों और घर-गृहस्थी के अलावा स्त्री का असल संसार तो उसका सिन्दूर ही है न? और वही चला जाए तो! कितने अरमान-से अम्माजी रखतीं थीं काका को। उनकी एक खुशी के लिए अपने को निछावर कर देने की जो बात उनमेंं थी वह हमने और कहीं न देखी। लेकिन यही आज है, कि वे भाव-शून्य हैं। समझा-बुझा उन्हें शान्त कराए।
तभी कन्हैया भाई साहब आ गए, उनसे भी कुशल क्षेम हुआ। गिरजा दीदी और बच्ची दीदी भी थीं जिन्होंने आशीर्वचन के शब्द कहे। इसी बीच एक अन्य व्यक्ति आए जिन्हें मिट्ठा-पानी दिया जा रहा था। परिचय पूछने पर पता चला कि बैदौली-से आए हरिकेश जी के चाचा ससुर हैं। प्रणाम किया। अम्मा के भतीजे पुलस्त भैया से भी मुलाकात हुई। अनुराधा (पुत्तुल) भी आईं और प्रणामादि के बाद समाचार पूछने लगीं। अनुराधा बड़ी चुहलबाज हैं, सहज ही घुलमिल जाती हैं। हाटा में उनका खिलाया वह पेड़ा हमें कभी भूलता नहीं। बात हो ही रही है, कि आंगन में सेज्जा की तैयारी होने लगी। अरे! यहा क्या..
(5)
आह! दर्द-भरा दृश्य! आंगन में गांव-घर, नाते-रिश्तेदारों की भीड़, इतनी कि पैर रखने को जगह नहीं। बरामदे तक में लोग खड़े हैं।
ऐसे अनेक अवसर इस आंगन में हमने देखे हैं जब खुशी की दमक हर ओर मुस्कुराहट लिए बिखरी रही है। एक हमारा विवाह ही देख लीजिए, कि इसी अंगने में हुआ.. तब भी यही भीड़ थी। लेकिन उस वक्त श्रद्धेय बाबूजी-आदर्य काका और आदरणीया माई भी थे। विवाह के मंगल-गान चल रहे थे। मार लहमक-दहमक से सजीं भाभियां और गांव-घर की अन्य स्त्रियां मोहक गारियों-से आंगन को गुलजार किए थीं। पियरी पहिने अम्मा-काका आंगन में जोड़ा बैठे थे। वृद्धावस्था में भी माई की तो उछलकूद देखते ही बनती थी उस वक्त। लेकिन यही आज है, कि सभी लोग हैं लेकिन बाबूजी-माई-काका नहीं हैं! मंगल-गान की जगह रुदन भरा सन्नाटा है। अंगने मेंं तख्ते पर गद्दा-रजाई और अन्य सामान रखा है। काका भी हैं! लेकिन भौतिक नहीं, फोटो रूप में! जिसे देखते ही रुलाई छूटती है..कितना आकर्षक व्यक्तित्व..आज फे्रम में.. क्या तो नियति है न?
होना तो यह सबके साथ है, लेकिन समय-से न हो तो अखरता है। देखिए न, काका किस चटपट तरीके-से निकले! गुपचुप! स्वयं तो असीम कष्ट सहे, लेकिन अपनी देह-सेवा में किसी को लेश मात्र भी कष्ट न दिए। ऐसा तो देवों के साथ होता है।
खैर, सोच ही रहे हैं कि सहसा आदरणीय दादा आते दिखे। लुंगी-शर्ट पहिने.. बुझी आंखों-से आए और चुप मारकर आंगन में ही एक कोने बैठ गए। तभी आदरणीय बबुआ भी आ गए, बिल्कुल रोती सूरत। बरामदे में रखी एक कुर्सी पर बैठ गए। पंडित का मन्त्रोच्चार चल रहा है। हरिकेशजी सेज्जा-कर्म में तन्मय हैं। प्रोफेसर सर प्रकाश भैया विह्वल-से अनमने इधर-उधर हो रहे हैं।
अभी आंगन में अभिमन्यू भैया-अनिल भैया-से लगायत घर के छोटे-बड़े सभी सदस्य उदास मन और रोनी सूरत-से कुछ-न-कुछ करते दिख रहे हैं। पगड़ी बांधे डॉ. प्रणव और टोपी लगाए विनय बाबू वहीं एक किनारे कुछ-कुछ समझने की कोशिश कर रहे हैं।
हम एकटक अम्माजी को देख रहे हैं, जिनका चेहरा इस कदर मासूम और भोला हुआ है जैसे कोई बहुत छोटी बच्ची हो जो बैठी तो हो किन्तु सुध-बुध खोई हो। वे स्त्रियों-से किनारे एक ओर बैठी हैं मानो संगमरमर की मूरत होंं। सूनी मांग और सूनी आंखें जैसे उनके पास अब कुछ भी शेष नहीं..सिर पर पल्लू लिए कभी इधर देखती हैं तो कभी उधर। किसी ने बताया, कि उन्हें भीतर बैठाया जा रहा था। वो तो दीपू थी जो उन्हें बाहर निकाल लायी, यह कहते कि "ये क्यों भीतर रहेंगी? सबके साथ रहेंगी। गए वो दकियानूसी विचार जो स्त्रियों को बन्धन की सिकड़ी में बांध कर रखते थे।" सुनकर दीपू पर गर्व हुआ। वह आधुनिक विचारों वाली प्रगतिशील लड़की है। यही सब तो हमारे शानदार समय की पथगामिनी हैं। ईश्वर इनका कर्त्तव्य -पथ आलोकित करते रहें।
(6)
दादा को देख रहा हूं, वे एकटक काका की फोटो निहार रहे हैं, मायूस हैं जैसे उनका कलेजा फट रहा हो। पंडित के मन्त्रोच्चार में जाने क्या है, कि उनकी आंखों में आंसू तैरने लगे जैसे काका के साथ अपने पुराने समय को याद कर रहे हों। कभी हाथ सिर पर ले जाते और सोचने लगते हैं, तो कभी हमारी ओर देखने लगते मानो बेचैन हों। हमने उनकी विह्वलता देखी, तो समझ गए, कि भीतर-से जार-जार हो रहे हैंं। तभी नजर बबुआ की ओर उठी। उनकी भी मनोदशा लगभग वैसी ही! एकदम उदास, आंखों में अश्रु! जिस बहने-से रोकने के लिए वे रुमाल साथ लिए हैं जिसे बार-बार आंखों की ओर ले जाते हैं। आदरणीय बबुआ और आदरणीय दादा वे दो लोग हैं जिन्हें हमने इन 28 वर्षों मेंं हर बार देखा है, कि कैसे काका से संपृक्त रहे हैं। बाबूजी-काका-बबुआ और दादा का आखिर नभिनालब्ध सम्बन्ध है। फिर काका तो इस बुढ़ौती में भी लाठी टेकते पहुंच जाते थे इन लोगों के पास। वे लोग भी गाहे-बगाहे अपनी बातें बाबूजी के बाद काका ही थे जिनसे चार करते। तो वे लोग कैसे हैं? उनकी दशा कैसी होगी? आंगन में यह साफ दिखायी दे रहा है। अभिमन्यू भैया और अनिल भैया को भी कई-कई बार देखा आंखों की कोर पोंछते। और-तो-और बाबू पट्टू को देखा, कि पट्ठा काम भी कर रहा है और रोती आंखों को हथेलियों से पोंछता भी जा रहा है मानो उसकी अखर और बड़ी हो। आखिर छुटपन में काका उसे भी तो अपनी गोद मे खिलाए हैं। गलत बातों पर डॉँटे हैं, प्रेरणा दिए हैं। प्रो. सर प्रकाश भैया तो और गमगीन हैं, सिर झुकाए.. निखिल ने हमें उनकी भावुकता के विषय में आते ही बताया था कि, "अस्पताल में प्रकाश मामा की हालत खराब हो गयी थी। बहुत रोए थे वे। मुझे चुप कराना पड़ा था प्रकाश मामा को।"
हम समझ गए, कि प्रकाश भैया की मानसिक दशा काका को लेकर किस भीषण त्रासद-से गुजर रही होगी। आखिर काका उन्हें भी तो बहुत मानते थे। कई अवसरों पर हमने देखा है कि कैसे ये दोनों अकेले ही खड़े गुटुर-मुटुर बतियाते रहे हैं। उन्हें प्रकाश-सतीश भैया पर गुमान था। इसीलिए तो सारा परिवार इस वक्त आंसुओं-से तरबतर था। क्या पुरुष और क्या महिलाएं, सभी के चेहरे मुर्झाकर बन्द हुए जा रहे थे, वैसे ही जैसे सन्ध्या-काल में सूरज के डूबते ही सूरजमुखी के हो जाते हैं।  
इसी में श्रीमती सुषमा दिखती हैं। पसीने-से लथपथ। अन्दर-बाहर हो रही हैं। बेचारी हॉस्पिटल-से लेकर घर तक कितना तो दौड़ी हैं वे। लेकिन चेहरे पर सिकन नहीं है। मानो अदृश्य शक्ति साथ हो। क्षण में अन्दर होती हैं और क्षण में बाहर। कोई कुछ मांग रहा है कोई कुछ, सभी की आवश्यकताओं की पूर्ति कर रही हैं वे। कभी अमृत-से कुछ लाने को कहती हैं, तो कभी अक्षत-से। इसी में बिन्दूृ दीदी, ऊषाजी और अमिता भी लगी हुई हैं। दायित्त्व निभा रहे हैं सभी। कुछ लोग पण्डित जी को कुछ कह रहे हैं। शायद जल्दी करने को।
हम एकटक कभी काका की तस्वीर देखते हैं और कभी हरिकेशजी को कर्म करते। कैसा तो चेहरा हो गया है लड़के का! महीनोंं तो हो गए काका के पीछे दौड़ते। रुपए-पैसे से लेकर पत्नी-बच्चोंं के साथ सशरीर होम हो रहा है। निखिल ने बताया था, कि "मामा-मामी बेहद परेशान हैं।" वह बारंबार कहता था कि "मामा कैसे तो हो गए हैं।"
यहां हम भी प्रत्यक्ष देख ही रहे हैं। सचमुच हरिकेश का मुखड़ा देख रुलाई आती है। लेकिन रोके रखे हैंं। वह उदास चेहरा लिए बारंबार काका की फोटो भी देखता है। मानो पूछ रहा हो, "काका! आप तो चले। अब मेरा कौन?"
सहसा बाबू पट्टू, अनिल भैया, कौशल बाबू, अभिमन्यू भैया, प्रकाश- सतीश भैया, बबलू बाबू आदि आंगन में तख्ते-से लेकर हरिकेश तक को घेरकर गोलाकार में खड़े हो गए। उनकी भाव भंगिमाएं ऐसी हैं मानो हरिकेश-से कह रहे हों- "क्यूं चिन्ता करते हो हरिकेश बाबू? काका नहीं हैं तो क्या? हम तो न मर गए! हम हर वक्त तुम्हारे साथ हैं।"
यह देख हमारे रोंगटे खड़े हो गए। आश्वस्ति भी मिली। क्या तो शानदार परिवार है। ऐसी एकजुटता कम देखने में आती है।
अन्त में आए सभी लोग भेंट-चढ़ावा अर्पित करने लगे और सेज्जा का कार्य समाप्त हुआ। हरिकेशजी उठ गए हैं और अपने घर के दरवाजे ही गए ही हैंं, कि अब तक रुकी उनकी भावनाएं मानो फूट पड़ीं। वे हबस-हबस कर रोने लगे। हमने दौड़कर उन्हें अपनी बाहों में भर लिया, कि "इतने लोग तो आपके पीछे खड़े हैं, कभी न सोचना कि काका नहीं हैं। वे भौतिक न सही लेकिन आत्मिक रूप-से सदा तुम्हारे साथ हैंं।" वे चुप हुए। लेकिन सच तो यही है, कि पिता का साया सिर-से उठ जाने के बाद किसी बेटे की मनोदशा की कल्पना करना भी रोने को मजबूर कर देता है।
बाहर द्वार पर ब्रह्मभोज की तैयारी शुरू है। टेन्ट लग रहा है। भोजन के लिए नाउर देउर से आए पप्पू भाई ने काम चालू कर दिया है।
 (7)
पण्डित-पुरोहितों के भोजन का कार्यक्रम शुरू हो रहा है। मान्यता है कि यह भोज पितरों और दिवंगत आत्मा को तृप्त करता है। इसके लिए हरिकेशजी ने विशेष व्यवस्था कर रखी है। अनेक गांवों से ब्राह्मण निमन्त्रित किए गए हैंं। रत्नेशजी से लेकर अनिल भैया और अभिमन्यू भैया ने इसमें विशेष भूमिका निभायी है। फिर भी डर है कि आज ही घर के पीछे शाहीजी के यहां भी ब्रह्मभोज है, कहीं पंडितों की कमी न हो जाए। देखते-ही-देखते ब्राह्मण मण्डली जो आनी शुरू हुई तो आती ही गई! हैरत में पड़े लोग कि अरे! इतने? बांछे खिल गयीं कि यह तो साक्षात् काका का सुकर्म दिख रहे हैं जो कितने ही अनामन्त्रित ब्राह्मण आते जा रहे हैंं। यहां तक कि चार बजते-बजते एक वक्त ऐसा आया कि पंडितों को देने वाली सामग्री कम पड़ गयी जिन्हें लेने हरिकेशजी को बाजार भागना पड़ा। इतने पुरोहित और पंडित हुए कि दक्षिणा देने के लिए हरिकेश की खोजाई होने लगी। वे तो बाजार गए थे। तो मोर्चा सम्हालने बिन्दू दीदी दौड़ीं और दक्षिणा की रकम लाने लपकती भीतर जाने को हुईं। बिन्दू दीदी गार्जियन की तरह तनकर खड़ी हैं यहां। हर वक्त हर बात के लिए तैयार। काका बीमार अवस्था में थे तभी वे बिना किसी की परवाह किए आशीष बाबू को साथ लिए मुम्बई से रावतपार के लिए चल निकली थीं। उनकी एक बाँह महीनों-से उठ नहीं रही है, किन्तु मानो उन्हें इसकी परवाह ही नहीं। न सकने के बाद भी खूब हाथ-पांव चला रही हैं।
हमने उनसे पूछा भी, कि "दीदी आपकी बाह में तो बहुत दर्द था, वह गया कहां?" तो रुंधे गले-से बोलीं, "बाबू हमारा दर्द तो काका अपने साथ लेकर चले गए।" और रोने को हुईं मानो जो दर्द अब मिला है वह मृत्यु पर्यन्त दूर होने वाला नहीं। उनकी दर्द भरी आंखों को देख लगा मानो पूछ रही हों, "बाबू! क्या काका अब इस जनम में न मिलेंगे?"
हमने उनको ढाँढस बन्धाया कि "आप निराश न हों। पूरा परिवार देखना है।" सहसा वे भीतर दौड़ीं, शायद किसी ने पत्तल मांगा था।
तभी हरिकेश जी भी आ ही गए। वे खुश थे, कि सैकड़ा-से ऊपर पुरोहितों ने भोजन पा लिया। यह कितनी बड़ी तृप्ति है। और दखिए, कि एक सज्जन और आ गए जो जाकर बबुआ के यहां बैठे हैंं। बबुआ उन्हें खिलाने को कहते हैं। वे आकर बरामदे बैठें हैं और प्रभाकर पाण्डेय भाई साहब से अपने बारे में बता रहे हैं। अब उन्हें खिलाने का उपक्रम होने लगा। हरिकेशजी ने बढ़कर दान-दक्षिणा और सामान दिया है सभी को। पंडितों ने दोनों हाथों से जय-जय कह आशीर्वाद दिया है उन्हें और अम्माजी को। यह तो काका की ही कृपा है जो इतने लोग तब आए जब शाहीजी के यहां भी भोज के लिए जाना है। अब रात के भोजन की तैयारी शुरू है। 
खड़े ही है कि सहसा जूही ने आकर प्रणाम किया है। पूछे तो बताई कि एमबीए कर रही है। ईश्वर उस बच्ची को कामयाबी की राह दिखाएं। सुभी भी दिखी है, उससे भी पूछे हैं हाल तो मुस्कुराकर बताई है।
ये देखिए, मोनूजी भी आ गईं और प्रणाम की हैं। अब उनके अँचरे में फूल-सी बच्ची आ गयी है। खूबसूरत और रूई के फाहे के समान कोमल। उसकी कजरारी आंखें और मासूम-भोली सूरत देखते ही हम रोक न सके अपने को, उसके कपोल चूम लिए। वह टक मारकर देखने लगी और खुश्श-से हँस दी।
वो फटफटी की आवाज कैसी है? लगता है किसी का आगमन हो रहा है। देखते हैंं..
(8)
अच्छा.. तो टेंट-लाइट वाले हैंं, जो अपना सामानादि लाते ही जा रहे हैं, फटफटिया-से। शायद जनरेटर वगैरह भी है। घेरा में भोजन तैयार हो रहा है। प्रभाकर भाई साहब के साथ हम भी चले वहां।
हलवाई लोग अपना काम कर रहे हैं। एक कड़ाहे में बुनिया छानी जा रही है। पप्पू भाई उसे कुछ निर्देश देते-देते स्वयं बड़े-बड़े आलू काट रहे हैं।
हमने भी सोचा, चलो बैठे-बैठे कुछ आलू ही काट दें, लेकिन बना नहीं अपने-से।
बहुत छोटे थे जब गांव में भाई-पटिदारों के यहां हो रहे शादी-विवाह में सबके साथ बैठकर आलू छीलते थे। गर्म-गर्म आलू..बालपन के हमारे नरम हाथ जलने लगते तो सी-सी कर कर पानी में छोड़ देते। कितना अच्छा लगता था तब। वह जमाना ही दूसरा था। अब तो हलवाइयों को आर्डर दे दो और बेफिक्र हो जाओ।
कुछ देर रुक हम लौटे कि आनन्द बाबू दिखे, प्रणाम किए तो हमने उनका कुशल क्षेम पूछा। अब नए घर के बरामदे में आकर बैठे हैं। तख्ते पर अमिताजी और रत्नेशजी भी हैं, कि नीलम दीदी आ गईं। प्रणाम को उठे तो लपक कर पकड़ लीं और लगीं बधाई देने, कि "नीतीश ने एमबीबीएस में प्रवेश कर हमारे पूरे परिवार को गौरव-से भर दिया है।"
उनने पास बैठकर बहुत-सी बातें कीं। गोरखपुर में उनके घर न आने का उलाहना भी दिया, कि "वहीं तो उतरते हैंं और दर्शन तक नहीं देते।"
तभी सरोज दीदी और पुत्तुलजी भी आ गईं। हमने सरोज दीदी को बताया, कि गोरखपुर में निखिल कैसे उन लोगों की बेहतरीन सेवा-से प्रभावित हुआ है।
वे लोग भी निखिल की प्रशंसा करने लगे, कि "निखिल ने बहुत किया।" यह बात तो कमोवेश वहां के सभी लोगों ने कहा था।
सुनकर सरोज दीदी मुस्कुरा कर बोलीं, "नहीं तो..कहां कुछ कर पायी मैं? बल्कि निखिल बाबू बहुत किए। हमारा अरमान तो बहुत था। लेकिन काका की तबीयत ऐसी थी कि फुर्सत ही न मिल पायी।"
पुत्तुलजी भी नीतीश के सरकारी मेडिकल कॉलेज में एमबीबीएस के दाखिले के लिए बधाई देने लगीं। हमने उनसे कहा, "हमें बधाई क्योंं? वह तो आप लोगों का बच्चा है।"
"तब बाद न कहबैं!" वे मुस्कुराकर कहीं। इसका आशय हम समझ न सके।
बन्नी भी गोद में प्यारी-सी जानू को लेकर आ गईं। गिरजीदीदी, अमिताजी और रत्नेशजी पहिलहीं-से थे। लीजिए वन्दना भी गईं। कौशल बाबू खड़े हैंं.. कोई और है..शायद अभिमन्यू भैया के साले हैंं क्या..
हमहीं-से बतकही शुरू कर दिया इन लोगों ने। पुरानी और नई बातेंं। कुछ चुहल और कुछ बुद्धि को मांजने वालीं। नीलम दीदी आज पूरे रौ में थीं। कुछ-कुछ बातें कर उदास मन को हहास-से भर देतीं। कई बार तो स्वयं ठठाकर ऐसी हँसी, कि हमारा मन भी बिहँस पड़ा। ऐसे प्रसन्नचित्त मन-से ही व्यक्ति बढ़ सकता है वर्ना तो इस घनेरी दुनिया में दुख बहुतेरे हैंं। तभी अनिल भैया आ गए और बाहर हाथ दिखाकर किसी को डाँटने लगे।
इसी बीच बेबी कौशकी आकर बैठ गई है। बताती है कि वहां मुम्बई की पढ़ाई और यहां की पढ़ाई में कितना अन्तर है। बच्चे-बच्चियों में भेदभाव भी है। वहीं बाबू कृष्णा भी इस बात से सहमत दिखते हैं किन्तु कहते हैं इससे क्या? पढऩा है तो पढऩा है। बस। अच्छा लगा, कि चलो कत्र्तव्य-बोध तो है इन सबों को। हमने इन्हें बहुत-सी बातें बताकर उत्साहवर्धन किया।बाबू अवनीश और हर्ष बाबू भी आकर आशीर्वाद लिए हैं।
सहसा निगाह गई, अरुण भैया पर। खटिया इधर-उधर कर रहे थे। हमने आने के बाद महसूस किया है, कि वे लगातार कुछ-न-कुछ कर रहे हैं। लोगोंं की बात सुन रहे हैं। लेकिन यही पहले था, कि उन्हें उलाहना मिलता था, कि वे किसी की सुनते नहीं और करते भी कुछ नहीं।
बहुत पहले एक बार बाबूजी ने ही हमसे शिकायती लहजे में कहा था, कि "सुकुलजी, आपै समझाईं इनके। पुलिस-से काहें डेरालैं। इहां पुलिस आ सकेले?" लेकिन इन पर कोई असर नहीं।
देखिए, यही अब है, कि उन्हें चैतन्य-सा देख रहा हूं। मानो काका ने जाते-जाते उन्हें शक्ति की कोई तजबीज दी हो। तभी तो कामकाज करते देख रहे हैं हम उन्हें। वे हमसे भी कुछ भी बात किए हैं वर्ना और दिनों में तो गुमशुम रहते हैं। रेडियो-से ही उन्हें लगाव रहा है। लगता है कि काका के जाने का उन्हें भी मानसिक आघात लगा है, जिसने उनकी सोई चेतना जागृत कर दी है। कितना अच्छा होता, कि अरुण भैया अपने घर के प्रति अपना कर्तव्य समझने लगते।  
००० 

Sunday, 27 October 2019

27/09/2019

 उस दिन वर्षा हो रही थी और सूरज जाने को थे..जब निखिल का फोन आया। सुनते ही ऊपर देखे, आसमान में हल्की-सी बिजली कड़की थी। "पापा, और सब तो ठीक, लेकिन यह नहीं देख सकता मैं। बाहर आ गया हूं। अन्दर हनुमान चालीसा का पाठ होने लगा है।"
सुनते ही मन बैठ गया। सर्वशक्तिमान की ओर प्रश्रवाचक निगाहों-से सिर उठाया तो सहसा आसमान-से आंसू टपकने लगे। हम समझ गए, कि निखिल ने बात में, बात कह दी है। लेकिन इतनी दूर-से कर क्या सकते थे, सिवाय ईश-प्रार्थना के।
अन्तत: वही समाचार मिला जिसकी आशंका थी- "काका नहीं रहे।"
अब हमारी नजरों के आगे अम्माजी का चेहरा नाचने लगा। उनने कितना तप किया है काका के साथ।
फोन लगाने की हिम्मत न हुई। फिर भी निखिल-से कहे, कि हो सके तो हरिकेशजी से बात करा दो। समीप ही रहे होंगे। सो, ले लिए फोन..हम कुछ कहते, कि उनने सीधे ही पूछा, "कब आ रहे हैं आप?"
हम सन्न! क्या कहें? अवसान के सप्ताह भर पहले काका ने भी बड़ी उत्सुकता-से पूछा था, "आवत हईं?"
हम क्या जानते थे कि उन्हें अपने चले जाने का इलहाम हो चुका है। हमने कहा था, "आप ठीक हो जाएं, हम जल्द आएंगे।"
"ठीक बा।" जैसे उनकी आवाज को लकवा मार गया हो।
अब हरिकेशजी-से भी कमोवेश ऐसा ही प्रश्र सुनकर हम हैरान रह गए।
"अभी छोड़ो वो बात, पहले तो आप साहस जुटाओ..हिम्मत बांधो.." अनेक सांत्वना देने वाले शब्दोंं को बोल हमने फोन रखा।
दिमाग सांय-सांय कर रहा था। ऊषाजी-से रावतपार फोन लगाकर बात किया, तो वे लोग खबर से अनभिज्ञ थे। हमने भी न बताया। हिम्मत ही न पड़ी। कैसे पड़ती? वहां अम्माजी थीं। इतना बड़ा परिवार बेताब बैठा था..सुनते ही कैसे रुदन मचेगा, सोचते ही रोंंगटे थर्रा उठे।
खैर इन सब घटनाओं के बाद..दशगात्र के दूसरे दिन फिर हरिकेशजी का फोन आया, कि "कब आ रहे हैंं?" हमने कार्यक्रम बता दिया।
क्रमश: - 2

Monday, 10 June 2019

                                                             नकौझा की फुलवारी
ये फोटो है हमारे ननिहाल नकौझा का। घर में सामने ही बगीचानुमा हरियाली लिए फैला है। वैसे तो इसे लेकर अनेकानेक स्मृतियां हैं, जहां छुटपन में हमने खूब धमाचौकड़ी मचाई, इसे देखकर रोमांच-से भर उठते हैं हम.. वह इसलिए, कि सोचते हैं कि आखिर अम्मा (जिउता देवी-इमिरता देवी) इसी मिट्टी में तो लोटी-पोटी होंगी न? पैदा होने के बाद यही माटी होगी जिसने उन्हें अपनी गोद में खिलाया होगा और बड़ा किया होगा। कितनी ही बार नाना की झिड़कियां मिली होंगी। मामा लोगों के साथ खेलते-खाते कइयों बार मार-मनुहार ओर बड़ों की डपट का सामना करना पड़ा होगा।
अम्मा अक्सर बतातीं, कि बचपन में ही हमारी नानी याने कि उनकी मां स्वर्ग सिधार गयी थीं। उन्हें मां का वात्सल्य और ममत्व नाना पूजनीय पटेश्वरी तिवारीजी और मामाओं-से ही मिला। स्कूल का मुंह न देखी थीं वे, तब भी जाने कैसे गृह-विज्ञान में इतनी निपुण? सोचते हैं कि आखिर पाक-विद्या का हुनर कहां-से जानीं होंगी वे। सैकड़ों लोगों का भोजन चटपट बनाकर खिला देने की उनकी कला आज भी हम अकेले में बैठकर सोचते रहते हैं। आधी रात को भी कोई दूर का मेहमान क्यों न आ जाए, वे तनिक भी अलसाती नहीं और चुस्ती के साथ चूल्हा जला तुरत-फुरत में भोजन बना परोस देतीं और मेहमान महाशय हैरत-से देखते रह जाते।
एक बार संझा बीती और रात 8 बजे थे। भोजनादि कर हम जांता के पास बैठे थे, कि नकौझा-से जनार्दन भैया आते दिखे। अम्मा अपने इन भतीजे को देखीं तो विह्वल हो उठीं। हाथ-उंगली के इशारों-से लगीं उनका और गांव का घर का हाल-पता पूछने। वे भी "अपें-अपें" कहते लगे बताने। फिर तो फूआ-भतीजे के बीचे इशारों में खूब बातें हुई और देखते-ही-देखते अम्मा ने उनके लिए रसोई तैयार कर दी! हम भिलाई से गए थे और अम्मा की यह फूर्ति देखी तो चकित रह गए। उसके बाद अम्मा ने उन्हें सोने का बिस्तरा लगाया और मीठ नींद सो गए।
जनार्दन भैया अक्सर खखाइचखोर पधारते। न्यौता-हँकारी तो मानो उन्हीं के जिम्मे रहता। हमारे विवाहोत्सव में उन्होंने औरों के साथ खूब डाँस किया था। वह मधुर स्मृतियां ताजादम हो उठी हैं। जनार्दन भैया हमें बहुत मानते थे। वे लिखते भी थे! कई बार कई इबारतें हमने उनसे लिखवाई हैं।
तो नकौझा का एक गुण और देखिए, कि अम्मा ने कोई संगीत-विद्या तो नहीं सीखी लेकिन गीत बड़ा सुन्दर गातीं। शायद ही कोई कार्य प्रयोजन का मंगल-गीत हो जो अम्मा को न आता। जांता-से लेकर विरह के उनके गाए अनेकों गीत हैं जिसे सुनकर हमारी आंखों की कोर भीग-भीग जाती रही हैं। विवाह समारोहों में गारी भी एक-से-एक गातीं। चुहल और हँसी-मजाक में भी कोई सानी नहीं उनकी। कितनी भी विपदा या कष्ट क्यूं न हो अम्मा को कभी उदास न देखा हमने। जब कभी उदास हम हो जाते तो गाल खींचकर खुश करतीं। कितनी बातें कहें? सोचते हैं, कि अम्मा की अम्मा बचपन में ही जब उन्हें छोड़ चल दीं तो आखिर अम्मा अपने निजी दुख कहतीं किनसे होंगी? कैसे जज्ब करती रही होंगी अपने अरमान? लेकिन इस बार जुगनू के विवाहोत्सव में जब ननिहाल गए तौर लघु शंका के लिए अनायास ही सामने की इस फुलवारी में चले आए तो सहसा केले के पत्ते लहरा कर कानों-से टकराए मानों अम्मा सक्षात् हुईं और हौले-से कहीं, "मेरे सलोने, इसी मिट्टी की तो उपज हैं हम। देखो इस भीषण गर्मी में भी कितनी हरियाली है इसमें! यहां कि मिट्टी की तासीर यही है, कि यहां किसी को शिक्षा देनी नहीं पड़ती। यहां के पूर्वजों के संस्कार हर किसी को उस सांचे में ढाल देते हैं जिसकी जिसे जरूरत हो। हमें भी इसी मिट्टी ने इस लायक बनाया कि खखाइचखोर की माटी के लायक हो सकीं।"
हमारी आंखें बह चलीं, सहसा फिर केले के पेड़ ने हिलोर ली और उसके पत्ते हमारे अधरों और कपोल को स्पर्श करने लगे मानो दुलार कर सहला रहे हों। नजर उठी, तो उसकी घवद दिखी जो नीचे तक बढ़ आयी है। केले के इस घवद को देख सुकून मिला और हम मुस्कुरा उठे। ऊपर की ओर देख सर्वशक्तिमान से प्रार्थना किए, कि नकौझा की यह माटी अमर रहे। यहां के सुन्दर और अपने लोग हर बलाओं-से महफूज हों। आबाद रहें और इस घवद की तरह दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की करते रहें ..

Tuesday, 7 May 2019

नकौझा में अपनों के बीच  
वैसे डेट तो याद नहीं किन्तु सात महीने हो ही गए होंगे जब पूजनीय मामी ने मुझे जुगनू के विवाह का निमन्त्रण अनौपचारिक रूप से यह कहते हुए दिया था कि "बाबू, दुलहिन के लेके आवेके ह।" उनने फिर ऊषाजी से भी बात कीं और आने को कहा। किन्तु विधि का विधान देखिए, कि अकस्मात ही पता चला कि वे आदर्या तो चन्द्रलोक को प्रस्थान कर गयीं! यह बेकल कर देने वाला समाचार रहा, लेकिन किया क्या जा सकता था?
बहरहाल, इस बीच फरवरी में प्रेम भैया के चिरंजीव का विवाह-निमन्त्रण भी मिला, लेकिन उसी तिथि को हमारी छोटी दीदी के ज्येष्ठ सुपुत्र का भी विवाह पड़ गया जिसमें हमें ईमिली घोटाने के लिए रहना अनिवार्य था। मन मसोस कर रह गया। टेलीफोन करके माफी मांगी तो वे सरल हृदयी मान गए।
अब औपचारिक रूप से विरेन्द्र भैया ने नकौझा से जब जुगनू के विवाहोत्सव का नेवता दिया, तो स्वर्गलोक में बैठीं अम्मा भी मानों समक्ष हो उठीं और बोलीं, चलना है। तब तक व्हाट्सएप पर निमन्त्रण पत्रिका आ गयी। देखा तो नायाब लिखावट। लिफाफे पर गणेशजी की आकृति और बीच में रिक्तता, लगा कि आइना टंगा है, जिसमें हम अपनी अन्तर्छवि देख सकते हैं। दूसरी ओर रंगीन गणेशजी की छवि। विनीत में रामाश्रय मामा और डॉ. जितेन्द्र भैया। अहा! कितना सुन्दर। रामाश्रय मामा की याद लौट-लौट कर आने लगी। फिर तो नाना-सारे मामादि की स्मृतियां कौंधने लगीं। क्या तो बांके-बिहारी थे वे लोग। अम्मा हमारी उस वक्त मायके में भी अपने इन मनीषियों के सामने सिर पर बिना पल्ला डाले न निकलतीं। बाराबंकी में अब तो रामाश्रय मामा में वृद्धता आ गयी होगी। नहीं भी तो नाइन्टी प्लस हो ही रहे होंगे। तो क्या इस वार्धक्य में भी वे नकौझा पहुंचेंगे। अम्मा भी जैसे झूम रही हों और कह रही हों, चलो बेटा, उन भाई को हमें भी देखना है। सहसा वे दृश्य याद आने लगे जब हमारे छुटपन में वे डोल्ची उठाए छोटे-से-छोटे उत्सव में भी हमें लिए नकौझा के लिए चल पड़ती थीं। कष्टों में भी वह कितना मुदित रहतीं नकौझा जाने में। तो विरेन्द्र भैया का फोन मिलते ही हमारा मन भी मयूर हो उठा। वैसे गर्मी का सीजन, फिर ट्रेनों में मारा-मारी, ऊपर-से पैर में तकलीफ भी बढ़ी। लेकिन सारे कष्ट एक तरफ और ननिहाल का सुख एक तरफ। हमने ऊषाजी से कहा, चलना है, तैयारी करो।

17 अप्रैल बुधवार को दुर्ग-नौतनवां से सफर का शुभारम्भ कर बड़े आराम से बिफोर टाइम 18 को अपनी ससुराल राउतरपार पहुंच गए। रात विश्राम के बाद 19 को सुबह 9 बजे नाश्तादि कर चलने को हुए तो ऊषाजी को उनके घर वालों ने रोक लिया, कि कम-से-कम 1 दिन यहां तो रह लेने दीजिए, साल-महीनों में तो आना होता है। तो हम अकेले ही निकले नकौझा के लिए, लेकिन लगता था कि कहीं-न-कहीं डोल्ची लिए अम्मा साथ चल रही हैं। सामने सड़क पर ही पकड़ी के लिए ऑटो मिल गया, उसने बताया कि पकड़ी से गोला के लिए दूसरी ऑटो मिल जाएगी। लेकिन देखिए, कि पकड़ी पहुंचते ही जाने क्या हुआ, कि ऑटो वाला हमें अकेले ही लिए गोला के लिए चल निकला! बड़ा विस्मय हुआ, कि हमें अकेले लेकर भला..
गोला में उसने ठीक उस जगह पर उतारा जहां उरुवा बाजार के लिए जीप तैयार खड़ी थी। ड्राइवर ने यह कहते हमेंं आगे की सीट पर बिठा लिया कि बाबू यहां आपको यहां कोई दिक्कत न होगी। उसकी बोली में ऐसी मिठास थी मानो हमें पहिले से जानता हो। गोला से जीप रवाना हुई और गोपालपुर होते आगे बढ़ी तो बड़े-बड़े खजूर-ताड़ के पेड़ दिखाई देने लगे। ये पेड़ हमें रोमांचित करते हैंं। छुटपन में अम्मा के साथ जब नकौझा के लिए आते तो यही पेड़ थे जो आकर्षण के केन्द्र में रहते और हम इन्हें गिनते जाते। इन पेड़ोंं को देखते ही जाने क्या होता है कि एक अपनत्त्व जाग जाता है। डेईडीहा आया तो एक और दृश्य कौंधा जब हम एक बार तरुणावस्था में साइकल से बीच गांवों से होते आए थे। लीजिए, उरुवा बाजार दिखाई देने लगा है। सोच रहा हूं, नकौझा कैसे जाऊंगा? पता नहीं साधन मिले भी या नहीं। चिलचिलाती धूप है और पैर में दर्द भी। तब तक उरुवा आ गया और सवारियां उतरने लगीं, हम भी उतरे और ड्राइवर को किराया अदा कर आगे बढ़े। ठीक चौराहे पर एक मम्फली बेचने वाले का ठेला है। उसके मम्फली भूजने की अदा या कि कोई और आकर्षण कहें, कि हम अनायास ही खिंचे उसके पास चले गए। वह भी था कि हँस कर स्वागत किया। हम ठड़े-ठड़े ही पूछे, "नकौझा जाना था।" वह पूरी तरह-से अपनत्त्व जताता बोला, "रुकिए बाबू! नकौझा बहुत दूर नहीं है।"
उसने सामने खड़े अपने किसी परिचित-से कहा, "ए बाबू के तनि नकौझा वाले मोड़वा पर छोडि़ आवा त।"
उसने हमें अपनी बाइक पर बिठाया और चलने को हुआ तो मम्फली वाले ने कहा, "बाबू, ओ मोड़वा-से बहुत सवारी मीलि जाई आपके।" इतना कह वह मुस्कुराया मानो किसी अपने को भेज रहा हो। उसके भोलेपन और अपनत्त्व की सीमा ऐसी थी कि हम दूर तक उसे मुड़-मुड़कर देखते रहे और इसी में हमारी अम्मा का स्वर भी सुनाई देता, "चलअ बेटा चिन्ता न करअ, हम बाड़ीं न। तुहंके कौनो परेशानी ना होई।"
उरुवां बाजार को देखते ही हमारा रोम-रोम मुस्कुरा उठता है, कि यही बाजार है जहां अम्मां कभी घूमी होंगी, अपने माता-पिता, भाई-बहिनोंं अन्य परिजनों के साथ बाजार करने आती रही होंगी। और यहीं बाजार है जहां आज हम आए हैंं। तब तक नकौझा जाने वाला मोड़ आ गया और संयोग देखिए, कि उतरते ही दूसरी बाइक वाला खड़ा था जिस पर इस बाइक वाले ने यह कहते बिठा दिया, कि "बाबू के तनि नकौझा छोडि़ दीहअ।"
जैसे कोई शक्ति काम कर रही हो जो बड़ी आसानी और सुगमता के साथ हमें नकौझा छोड़ देने के लिए तैयार हो। उस बाइक बैठे तो लगा जैसे आगे-आगे अम्मा चल रही हों। रस्ते भर इधर-उधर देखते हम खिलखिला उठते। रोम हर्षित हो रहे हैं। नेत्र मुस्कुरा उठे हैं। नकौझा बस आने ही वाला है.
"पटेश्वरी तिवारी जी का घर किधर पड़ेगा?" धोती-कुर्ता पहिने एक बुजुर्ग जो कि अपनी मस्ती चले आ रहे थे मैनें जान बूझकर उनसे नाना के घर का पता पूछा, कि देखें क्या कहते हैं। जबकि घर तो सामने ही था। नाना का नाम सुनते ही मानों उनकी धमनियों का रक्त-प्रवाह तेज हो गया और खुश हो गए। पुराने व्यक्ति थे, नाना-मामा लोगों की यश-कीर्ति भला उनसे छिपी होगी। सुनते ही पीछे पलटे और हाथ दिखाते बोले, "हउका बा। हउवै समनवे त मारे गाड़ी बाड़ी, उहै ह। एहां-से-ओहां ले सब फुलाइल उहैं क ह।" सुनते ही बाँछें खिल गयीं। खिलें भी क्यूं न? अम्मा के मायके की इस प्रकार की बड़ाई सुन भला कौन होगा जिसे खुशी न मिले। हम बढ़े मामा के घर की ओर..द्वार पर देखे तो चहल-पहल, सामने दिखे प्रेम भैया! जैसे हमारा ही रस्ता देख रहे हों। आई कान्टेक्ट होते ही वे खिल उठे। उनके होंठ मुस्कुरा उठे थे। यह तब होता है जब कोई अपनों को शिद्दत-से याद कर रहा हो। खिचड़ी पके बाल और हल्की बढ़ी दाढ़ी, हल्के गुलाबी रंग की टी-शर्ट और पायजामा, पैरों में स्लीपर पहिने प्रेम भैया के इस लुक ने बताया कि घर के कामों में मशगूल हैं। लेकिन देखते ही लपके आए। हम पालागन किए तो पकड़ लिए और कुशल क्षेम पूछ घर के भीतर जाने को कहे। यही तो नाना भी किया करते थे। शुकुल आइल बाड़ैं हो, जोर से बोलते और मामी दौड़ी आतीं और पुचकार कर हमेंं भीतर ले जातीं। तो हम ओसारे में पहुंचे जहां बोधनाथ भैया सोफे पर बैठे अखबार पढऩे में मशगूल थे। विरेन्द्र भैया के साले साहब भी पियरी पहिने बैठे थे एकदम भाभी जैसा ही चेहरा था तो हम पहिचान गए। इन आदरणीयों को दंड-प्रणाम कर जैसे ही अन्दर जाने को हुए कि विरेन्द्र भैया दिख गए, उनका चेहरा भी कमल-फूल की भांति खिल गया, रविन्द्र भैया भी मिले प्रणामादि किया। तख्ते पर अशोक के सुकुल जी भी बैठे थे उन्होंने प्रणाम किया ही था, कि जितेन्द्र भैया के दर्शन हो गए। दक्षिण भारतीयों के समान धोती लपेटे, स्लेटी टी-शर्ट पहिने, कंधे पर गमछा लटकाए हमेंं देखते ही मुस्कुराए..आपकी मुस्कुराहट बड़ी गहरी होती है जो न बोलकर भी सब कुछ बोल जाती हैं मानों कह रही हों रस्ते में दिक्कत तो न हुई बाबू! हम उनके पैरों में झुक गए तो इशारे से बोले, "भीतर चलो।"
अन्दर प्रवेश किया ही था, कि जैसे गीता दीदी स्वागत को तैयार हों, लपकी आयीं और "आवा बबुल्ले, कहतीं हाथ पकड़ीं और उस कमरे में लिए चलीं जहां भाभियों की टोली बैठी थी हमारे। गए तो दोनों भाभी (विरेन्द्र भैया और धर्मेन्द्र भैया की श्रीमतीजी) खड़ी हो गयीं और पूछीं, "अकेले?"
हमने उन्हें बताया कि ऊषाजी को उनके मायके वालों ने रोक लिया है। सो अकेले आना पड़ा। जासो दीदी, बहिन अशोक से लेकर घर के अन्य सदस्यों से मुलाकात और भेंट-अंकवार हुई। वहीं एक कुर्सी पर बैठे। तब तक जुगनू, धूरुप, आकाश, बाबू अनुपम, आशुतोष आदि भी आ गए और कुशल क्षेम चल ही रहा था, कि सहसा कटोरी में चार ठो पेड़ा लिए धर्मेन्द्र भैया आ गए और खुशबूदार मुस्कुराहट बिखेरते बगल में बैठ गए। हमने एक पेड़ा खाया तो उन्होंने कहा कि और खाओ। मना किया तो जोर दिए। इस जोर में जाने कैसा अपनापा था, कि रोक न पाए हम, मानो धर्मेन्द्र भैया के रूप में मामी ने अनुराध किया हो। अनायास ही हमारा हाथ दूसरे पेड़े की ओर चला गया। उसे खतम भी न किया कि रविन्द्र भैया की बच्ची थी शायद आयी और प्रणाम कर भरा कप चाय और नमकीन रख गयी। उसे चखे भी न थे, कि चटपटा पश्ता बन कर आ गया। इसी बीच चिल्ड पेप्सी भी लेकर आ गयी वह हंसमुख। अब बताइए गरम-ठंडा, नमकीन! क्या खाएं, क्या छोड़ें? नकौझा का वह प्यार, वह मुहब्बत और वह भीनी-भीनी खुशबू वाला अपनत्त्व ऐसा था जिसने हमें भीतर तक भिगो दिया। चाय को छोड़ सभी का स्वाद चखा। विवाहोत्सव की तैयारियां शुरू हैं...
नाश्तादि कर बाहर आने को हुए तो भाभी (बोधनाथ भैया की श्रीमतीजी) दिख गईं, दंडवत किया तो हालचाल पूछीं। उन्हें देखते ही हमें दिल्ली मेंं आर के पुरम के उनके घर का वह दृश्य याद आ जाता है जब एक बार अल्प-प्रवास पर हम वहां गए थे और आपश्रीमती ने सिंघाड़े का बड़ा स्वादिष्ट रसदार तरकारी बनाकर खिलाया था। इसके साथ ही एक बार केदार भैया के यहां शादी में जब प्रतापगढ़ अम्मा के साथ गए थे तब भी आपने हमारी जो खिदमत की वह भूलता नहीं।
आपसे मिल बाहर निकले तो हनुमानजी ने आकर पांव छूआ उनसे मिलते कि मुन्ना सोफे पर बैठे दिख गए। देखते ही हाथ जोड़ खड़े हो गए। हमने उनका हाथ पकड़ लिया,"यह क्या यार मुन्ना! बाल सखा हो यार। हम, धूरुप और आप साथ ही खेले हैंं, फिर यह आदर भला क्यों?"
उनने हंसकर कहा, "आपका ननिहाल है यह।" हम समझ गए उनके भीतर के स्नेसिक्त प्रेम को। तभी रीवा वाले भाई साहब दिखे, इसी में परपन्ने भैया के दोनों लड़के भी आ गए। हालचाल हुआ। हमने भाभी (परपन्ने भैया की श्रीमतीजी)का समाचार पूछा तो उनने बताया कि तबीयत बहुत अच्छी नहीं हैं। सुनकर निराश हुई और मन-ही-मन सर्वशक्तिमान-से प्रार्थना किया, कि वे पुरनियां जहां भी हों पूरी तरह प्रसन्न हों। आज वे होतीं तो खुशियां चार हुए बिना न रहती। बड़ी सरल और नेक हैंं भाभी। प्रतापगढ़ में केदार भैया के भीड़ भरे घर से हमें अपने घर लिवा ले गईं और तिमंजिले पर बिछौना लगाकर प्यार-से बोलीं, बाबू आप यहीं लेटिएगा और कोई तकलीफ तो बताइगा। तब परपन्ने भैया अपने साथ दूकान लेकर गए थे और मामा से मिलकर आए थे हम। दीनानाथ भैया और विश्वनाथ भैया-से तो खूब बातें हुईं थीं। क्या तो वक्त था तब। वह सब स्मृतियां कौंधने लगीं। मुकेश के कंधे पर हमने हाथ रखा और कहा, भाभीजी को हमारा सादर प्रणाम कहना।
तब तक प्रेम भैया की आवाज सुनी, बबुल्ले जी बैठिए। प्रेम भैया के इस स्वर में बड़ा स्नेह छिपा था, किन्तु यह बबुल्ले के आगे जो 'जी' पुछल्ला आपने लगाया तो हमें बड़ा अटपटा लगा। 'जी' क्योंं? आप बड़े हैं, हम छोटे..खखाइचखोर में एक बार अम्मा-से मिलने सूर्यनाथ भैया आए थे, हम और पुष्पा दीदी चिल्ल्पों कर रहे थे और वे अम्मा-से बैठकर तन्मयता-से बतिया रहे थे। हमारे हो-हल्ले-से उन्हें व्यवधान हुआ तो धर दिए एक चपत। आज वे हमारे बीच नहीं हैं, किन्तु वह प्यार भरी धौल आज भी आशीष स्वरूप दर्शाता है कि हम कुछ भी हो जाएं प्रेम भैया, आपके लिए 'जी' तो नहीं ही हो सकते। लेकिन आपने अपने बड़प्पन का जो परिचय दिया उससे यह तो लग ही गया, कि नहीं, आज भी नकौझा मेंं पुरखों-से विरासत में चला आ रहा संस्कार कुन्द नहीं हुआ है। देखिए न, जितेन्द्र भैया जब भी भोजन करते, पहले पूछ लेते, कि "सुकुलजी कर लिए?" वे कहते कि, "सुकुलजी (विरेन्द्र भैया के दामाद) का हमने पांव पूजा है।" उनके भोजन के बाद ही वे स्वयं भोजन ग्रहण करते। तो यही नकौझा की असल पहिचान है। यही तो अम्मा भी लिए खखाइचखोर में पग धारी थीं। उन्हीं की विरासत रही कि आज भी गांव-घर में लोग पहले उन्हीं पूजनीया को पूछते हैं।
तो हमने प्रेम भैया-से कुछ कहा नहीं, प्रेम-से उनकी बगल में बैठ गए। फिर तो गांव-घर-से लेकर दिल्ली और दुनिया-जहान की बातें हुईं। भाभीजी ने प्रेम भैया के कंधे-से-कंधा मिलाकर अच्छा काम किया है। बच्चों को आगे बढ़ाया और फरवरी मेंं हमारे बड़हलगंज के पास ही बड़ा अच्छा विवाह अपने चिरंजीव का किया। हमने दम्पती के सुखमय जीवन की कामना के साथ प्रेम भैया को एक बार फिर बधाइयों का गुलदस्ता थमाया। वे बिहंस पड़े। उनकी मुस्कुराहट की अदा ही निराली होती है। होंठ बहुत कम फैलते हैंं लेकिन छोटी-सी मुस्कुराहट भी तो बहुत कुछ कह जाती है। सामने जमीन पर कोई बूढ़ा, धोती-कुर्ता पहिने और पगड़ी बांधे बैठा है..हमें बड़ी जिज्ञासा-से ताक रहा है, मानो जानना चाहता हो, कि हम हैं कौन?
प्रेम भैया ने परिचय बताया, तो उसकी आंखें खिल गयीं मानोंं! फिर उनका परिचय हमसे कराया और बोले, "ये दुलारे हैं। इन्हें हमारे घर का सदस्य ही समझिए।" मैंने आपको बताया कि "हां, अम्मा अक्सर इनकी चर्चा किया करती थीं।" फिर दुलारे ही बोल पड़े, "बाबू, बहुत पहिले एक बेर हम गाइ लेके आपके गांव-घरे गईल रहलीं छोड़े के। बड़ा अच्छा लागल रहल।" फिर वे अम्मा का लगे बखान करने, "वोइसन मनई मीलल मोस्किल बा बाबू। और उनकी आंखें शून्य में चलीं गईं मानों अम्मा की छवियों को याद कर रहे हों। प्रेम भैया ने बताया, कि "दुलारे पूछ रहे थे आपके बारे में, बताया तो बड़े खुश हुए। हम उठे और सामने की बागवानी जहां केले की घवद लटकी थी उसी के आगे लघुशंका को गए, लौटे तो नल के पास दुलारे खड़े थे ! शायद हमारे पीछे आ गए हों। हम नल पर बढ़े तो वे लपकर लगे नल चलाने, हम हाथ धोने लगे तो बड़े प्रसन्न हुए मानों नल चलाकर पुण्य पा लेना चाहते हों। चलाते-चलाते अम्मा की स्मृतियों का बखान किए जा रहे थे। लौट कर फिर बैठे सोफे पर, इतने में बाबू जुगनू, आशुतोष और, और बच्चे बोतल में पेप्सी-कोला और डिस्पोजल लिए आए और सभी उपस्थितों को आदरपूर्वक सर्व करने लगे। हम उठकर बोधनाथ भैया के पास गए और हालचाल पूछने लगे। उन्होंने दिल्ली का खाका खींचा और इस वक्त के गिरते मूल्यों पर चिन्ता व्यक्त की। लगे बताने, कि जब वे पुराने घर में रहते थे तो एक बुजुर्ग जो उनके बगल में ही रहते थे और सेवा से निवृत्त हो चुके थे। उनके बच्चे उनका बिस्तरा सीढ़ी के नीचे कर दिए और जुल्मों सितम की हद होने लगी तो वे अक्सर घर के बाहर रहने लगे। अलसुबह उठते और बाग को चल निकलते, वहां-से कोई दम्पती अपने घर चाय पर ले जाती। कई बार उन्होंने भी अपने घर आमन्त्रण दिया। यह सुनकर हम कुम्हला गए, कि सचमुच आज की जनरेशन को हुआ क्या जा रहा है? वे किस वितृष्णा के शिकार हैं? सोचा न गया तो वाकई आने वाला कल भयावह ही होगा।
सूर्यनाथ भैया की बच्ची अन्नू से भी मुलाकात हुई। वह तो भिलाई में ही है। अच्छा है। हमने उससे तफसील से चर्चा की तो खुश हुई वह। बहुत-से लोग नहीं दिख रहे हैंं इस बार। प्रतापगढ़-से राकेश, दिल्ली-से वो दूरदर्शन-आकाशवाणी वाले भैया। इन सबके बारे में पूछता हूं तो कुशलता की जानकारी मिलती है। कुछ ही देर बीते होंंगे कि स्वागत करने वाले बच्चों की वही ऊपर वाली जमात फिर आयी, अबकी उनके हाथ में थर्माकोल की प्लेटेंं थीं जिनमें बड़े-बड़े सेब, केले, नाशपाती आदि काटकर रखे थे। सब को सर्व किया जाने लगा। हमने सोचा, बापरे! इतना सारा! किस पेट में जाएगा? मना किया, तो बोधनाथ भैया टस-से-मस न हुए, बोले, खाओ यार, इसमें क्या रखा है। खाने में अभी देर है। फिर ठहाका मारे। उनके ठहाके में इतना दम था, कि हमने प्लेट ले ली। काबिले गौर यह था, कि पेप्सी हो या कोला या फलों की तश्तरी, सभी उसी आदर के साथ दुलारे को मिलती जैसे हम सभी को। इससे बड़ी सौगात और आज की जनरेशन के सीख भला और क्या हो सकती है?
विरेन्द्र भैया-से लेकर जितेन्द्र भैया और धर्मेन्द्र भैया को देख रहा हूं, अन्दर-बाहर हो रहे हैं। कई महत्त्वपूर्ण काम है आप लोगों के जिम्मे..ठीक है कि लड़के की शादी है लेकिन क्या इसकी व्यस्तता किसी लड़की के विवाह-से कम होती है। लीजिए..डाल आ गया है। दुलारे और कोई स्त्री परछन का गुहार लगा रही हैं। कोहबर भी लिखा जा रहा है..उस पर गौर गणेश की छाप लगायी जा रही है शायद। घर की स्त्रियों का बुलावा है। हम देख रहे हैंं नकौझा की यह प्रीति शायद दुनिया में नायब है और बहुत कुछ सीख भी..ईश्वर यह प्रीति और बढ़ाते रहे। यही तो है जो जीवन का आधार है जिसकी शिला नाना-मामा-से लेकर उनके पूर्व के पुरखों ने रखी हैं, जिन्हें हमें सजा-सवांरकर नई पीढ़ी का ट्रान्सफर करना है..भीतर-से आते, मंगल-गान के स्वर सुनाई दे रहे हैं..
ये देखिए, बाजा वाले भी आ गए। डीजे वाली गाड़ी के साथ। बजनिहा तैयार हो रहे हैं और इधर हम लोगों को भोजन का निमन्त्रण मिल गया।
सब लोग बैठे भोजन पर..हमारे लिए कुर्सी-मेज की व्यवस्था है। हमने कहा, कि सबके साथ पंक्ति में भोजन लेंगे तो मना कर दिया गया, कि नहीं आप ऊपर ही भोजन लें।
घर वालों को पता है कि नीचे बैठने में हमें परेशानी होती है सो आप लोगों ने पूरा ख्याल रखा इसका। हमने देखा जितेन्द्र भैया आज भी भोजन में सात्विकता-पवित्रता का पूरा ख्याल रखते हैं। बनियान-टीशर्ट निकाल कर केवल धोती पहिनकर आपने भोजन ग्रहण किया। ब्राह्मणों के इस विरासत की रक्षा करने वाले के समक्ष भला कौन होगा जो सिर-नत न हो? हम भी मन-ही-मन भैया के इस पारम्परिक मूल्यों पर न्यौछावर हुए और कहे कि ईश्वर आपको और शक्ति प्रदान करे।
बाहर बाजा बजने लगा है और उसकी धुन पर डीजे वाली गाड़ी पर ही नचनियां कमर मटका रही है। गाड़ी पर माइक पकड़े गायक गा रहा है, "कइसे के आईं बलम रउरे सेज, आवत कै डर लागेला.."
उसका सुर बड़ा अच्छा है और उतना ही अच्छा नचनिया का नाच भी। कमर मटका-मटका कर उसके नाच को बरामदे में बैठे लोग बिहंस-बिहंस कर देख रहे हैं। हम उस बाजे वाले को देख रहे हैं जो बड़ी ही तन्मयता के साथ और लय-सुर के साथ ताल मिला रहा है, उसके पैर थिरक रहे हैं। हम सोच रहे हैं, कि इस संगीत को साधने में कितना तो परिश्रम कर रहा है वह। संगीत भी कम बड़ी साधना नहीं। वह भी गांव-गिरांव में रहकर साधनाभाव में इस प्रकार के गानोंं को गाना और उस पर सुर निकालना काबिले तारीफ है। गायक की भी तारीफ करनी होगी जो पुराने और नए गानों को मिलाकर बड़ा अच्छा सुर निकाल रहा है। नाच-गाने के बाद उन लोगों को भी बड़े प्रेम-से भोजन कराया गया। इतने में वह कार आ गयी जिसमें चि. वर बाबू जुगनू को निकलना था। उसकी फूलों-से सजावट हो रही है। उधर सूरज पश्चिम के अन्तिम छोर की ओर जा रहा है। इधर बारात निकालने की तैयारी हो रही है।
अब वह समय आ रहा है जिसके लिए इतना जुटान हुआ है और दूर-दूर-से लोग आए हैं याने बारात जाने का। बाजे का स्वर तेज हो गया है नचनियां भी अपने लय की गति पर है। भीतर-से स्त्रियों के मंगल-गान के बीच विष्णु रूप वर बाबू अभिषेक निकल रहे हैं। वाह! कितना सुन्दर रूप! एक-से-एक डिजाइन मेंं सजी-धजी हमारी भाभियों की टोली। विरेन्द्र भैया और धर्मेन्द्र भैया की श्रीमतीजी की खुशियां तो देखते ही बनती है। आगे-आगे चल रही हैं। यह भी कितना बड़ा सौभाग्य है, कि भाभी अपने बड़े बेटे का विवाह कर रही हैं। यह दिन तो बड़े अरमानों से आता है। गीता दीदी और जासो दीदी से लेकर अशोक तक सभी बड़े नाजों के साथ जुगनू को पकड़ रहे हैंं। उनके लट संवार रहे हैं।
गाती-बजाती इतनी स्त्रियों का समूह.. लेकिन हमारी नजरें इसी में खोज रही हैंं उन पूजनीया मामी को जिनने इस दिन को साकार करने का स्वप्र देखा था। आज जब यह दिन आया, तो हमें निमन्त्रित कर वे स्वयं कहां हैं? हम समूह में ताक रहे हैं, कि शायद दिख जाएं। लेकिन वे क्यों दिखें? वे तो हमें बुला स्वयं चन्द्रलोक चल दीं। सहसा हमने ऊपर की ओर देखा..लगा मामा-मामी और अम्मा से लेकर सभी पुरखे-पुरनियां वहीं स्वर्गलोक-से पुष्प-वर्षा कर रहे हैं और आशीर्वाद दे रहे हैं, कि बाबू जुगनू का दाम्पत्य आनन्दमय और मंगलमय हो। मानों पूरी बारात पर अमृत बरस रहा हो। हम धन्य हो गए। सांझ ढल गयी है। परछावन को स्त्रियां निकल पड़ी हैं और हम सब भी बारात को तैयार हैं।
हम जिस मोटरकार में बैठे वह बड़ी सुन्दर और आरामदायक है। साथ में राधेश्याम भैया हैं, हमारी मौसी के बेटे। पता चला, कि कार बाराबंकी वालों की है। सामने बैठे नौजवान-से नाम पूछा, तो बताए, "दुर्गेश!" आदरणीय रामाश्रय मामा के सुपौत्र और लक्ष्मीनारायण भैया के सुपुत्र। बी.टेक. कर चुके हैं और आगे अध्ययन गति पर है। खूब आगे बढ़ें होनहार बाबू दुर्गेश। हमने उनसे अपने बारे में जब पूछा, तो वे बगले झांकने लगे। आखिर करें भी क्या? पहली मुलाकात थी, तो कैसे पहिचानते? हमने कहा, "मामा-से पूछना, गाड़ी में जिउता (इमिरता देवी) के लड़के मिले थे। कौन हैं ये जिउता देवी ? देखना क्या कहते हैं।" तब वे मुस्कुराए, मानों जान गए हों, कि हो-न-हो है तो कोई खून का रिश्ता ही। फिर परिचय और रामरहारी हुआ। हमने रामाश्रय मामा का हाल पूछा, तो बताए कि थोड़े अचलस्त हैं लेकिन ठीक हैं। आ पाने की स्थिति में नहीं थे, सो नहीं आए नहीं तो उनके आने का शौक था। हमारा मन बैठ गया। पड़ी तमन्ना-से रामाश्रय मामा को देखने का अरमान लिए बैठे थे और किस्मत देखिए, कि पानी फिर गया। तो क्या मामा इतने अचलस्त हो गए! अब वही तो बचे हैं निशानी के तौर पर। इसके बाद कौन? हमने बहुत-से प्रश्र पूछे बाबू दुर्गेश-से मामा को लेकर और मन-ही-मन ईश्वर-से प्रार्थना किए कि उन आदरणीय को पूरी तरह स्वस्थ व प्रसन्न रखेंं। उनका आशीर्वाद और साथ बना रहे, वे दीर्घायु हों। लक्ष्मीनारायण भैया के बारे में भी पूछा तो पता चला, कि वे अच्छे हैं लेकिन व्यस्तता की वजह-से आ नहीं सके। भाभी आई हैंं। गीत-गाने मेंं लगी हुई हैं। पैर में तकलीफ है उनके शायद क्योंकि हमने लक्ष्य किया, कि वे ठीक-से चल नहीं पा रही हैं। लेकिन समूह में उनकी चाल शानदार है। मुस्कुराहट भी देखते बनती है।
हम गांव बाहर पहुंचे जहां परछन की रस्म अदायगी हो रही है। बड़ी वाली बस और कई लग्जरी गाडिय़ां बारातियों को ले जाने को खड़ी हैं। बाराती आते जा रहे हैं। वहां बाजा बज रहा है। नचनियां की नाच और डीजे की धुन बारात की शोभा को बढ़ा रहा है।
धर्मेन्द्र भैया बारातियों को सही ढंग-से निकालने-से लेकर बस व अन्य गाडिय़ों को ले जाने के लिए मोर्चा सम्भाले हुए हैं। रह-रहकर मोबाइल पर निर्देश देते हैं और लेते भी हैंं वे। सांझ ढल चुकी है। पूनम का चांद दिखने लगा है। बड़ा सुन्दर दृश्य और चीनी मिल की सड़क पर गाडिय़ां रफ्तार पकडऩे लगी हैं। बहुत दूर नहीं है पकड़ी, लेकिन रात का समय है और कई मोड़ों वाला रस्ता भी संकरा। ले-देकर कुछ देर में पहुंच गए पकड़ी गांव। वहां पर बड़ी अच्छी व्यवस्था है बारातियोंं के लिए। कलानी के प्राथमिक विद्यालय में बारात रुकी है। वहीं जलपान हो रहा है। नमकीन का स्वाद, वाह! क्या कहने। इसी मेंं जितेन्द्र भैया पास बैठे हैंं, न-न कहने पर भी पेप्सी पिला दिए, कि पाचन करेगा। अब करे-न-करे उनका कहा है तो कैसे टालें? कई जाने-अनजाने लोगों-से मुलाकात होती है। यहां-से वधू पक्ष के घर के लिए रवाना होते हैंं तो बीच में वे लोग पहले-से अगवानी को खड़े हैंं। यह भी एक लोक-परम्परा है..नायाब। द्वारपूजा शुरू है।
वधू-घर की स्त्रियां दरवाजे पर एकत्र हो पुष्प-वर्षा, जल-वर्षा और चावल-द्रव्य-वर्षा कर मंगल-गान कर रही हैं। "हीरा जड़ी दरवाजे, मोती जड़ी दरवाजे दमाद आ रहे हैं.." "सोनरा-से जाके कह दो, सोनरा-से जा के कह दो, सिकड़ी बना के रखना.." जैसे गीत हमारे मन को आह्लादित करते हैं। हम घूमकर एक-एक स्त्री को निहारते हैंं। सभी सजी-सँवरीं और बड़े गुमान और नेह-से घर के होने वाले दामाद बाबू (चि. अभिषेक मणि त्रिपाठी) को उचक-उचक कर निहार रही हैं। भीड़ में उनकी झलक पाने को लालायित हैं वे। एक-से-एक मंगल-गीतों को सुनकर हम अपने यहां की संस्कृति के बारे में सोच रहे हैंं.. इतनी सुन्दर और दिल पर छा जाने वाली संस्कृति भला दुनिया में और कहीं होगी? यह भारतवर्ष ही है जहां वर की भागवान विष्णु और वधू की माता लक्ष्मी के रूप मेंं पूजा की जाती है। वैसा ही कुछ दृश्य देखने को मिल रहा है यहां। उधर बुफे (भोजन) शुरू है।
लीजिए, जयमाल की तैयारी होने लगी है। स्टेज पर सुनहला प्रकाश फैलने लगा है। सबको दूल्हन का इन्तजार है।  
अहा! अनुपम दृश्य। लक्ष्मी-रूपा वधू स्टेज पर है। घराती पक्ष की स्त्रियां मंगल-गीत गाती शोभा का बढ़ा रही हैं। हर्षध्वनि, मंगलाचरण और खुशियों के बीच जयमाल सम्पन्न हुआ, तो बारी आयी आशीर्वाद देने की। बारी-बारी-से लोग स्टेज पर जाकर वर-वधू को आशीर्वचनों-से नवाज रहे हैं। जितेन्द्र भैया ने हमारी गुहार लगायी, तो उनके साथ हम भी स्टेज पर पहुंचे, आशीर्वाद क्या देते, हमें छोड़कर जा चुकीं अम्मा और बाबूजी का ध्यान कर दोनोंं हाथ उठाए और उनकी ओर-से पूरे दिल-से आशीर्वचनों की वर्षा कर दी। जोड़ी तो देखते ही बनती है भई। विरेन्द्र भैया ने अच्छी वधू और अच्छा घर खोजा है। उनके घर वाले भी बहुत अच्छे लगे।
उसके बाद कहा गया, कि भोजना कर लें। रात के बारह-से ऊपर हो रहे हैं। हम जितेन्द्र भैया के साथ प्लेट उठाते हैं। है तो बारहों व्यंजन, लेकिन वे लिट्टी-चोखा और सलाद लेते हैं, तो हम भी वही उठाते हैं। इसी में कोई आकर कहता है, कि भोजन ठंडा हो गया है। मजा नहीं आ रहा है। तो वे गहरी मुस्कुराहट छोड़ते हैं और कहते हैं, "भोजन में ऐसा कुछ नहीं होता जो मजा न दे। हमें खाने का सलीका और देखने का ढंग आना चाहिए" और इसी के साथ लिट्टी को फोड़कर बड़े चाव-से खाते भी जा रहे हैं मानों कितना स्वादिष्ट हो। हम देख कर दंग रह जाते हैंं! बार-बार जितेन्द्र भैया की ओर देखते हैंं, कि देखिए कितने बड़े महापुरुष हैंं भैया। अन्नपूर्णा का किस प्रकार सम्मान किया जाता है, बड़ी सीख मिली है। इसी में यह भी देखा, कि नकौझा में कल जो वे कपड़े-लत्ते निकाल कर भोजन कर रहे थे, वही आज पूरे परिधान में चरणपादुका पहिनकर भी भोजन पा रहे हैं। इससे बड़ी सीख और क्या हो सकती है, कि परिस्थिति चाहे जैसी आए उसमें अपने आपको ढाल लेना, अपने अनुरूप बना लेना बुद्धिमानी है। यह परम्पराओं और आधुनिकता का बेजोड़ मेल भी कहा जा सकता है जिसकी आज जरूरत है। वर्ना पोंगापंथी बनकर हम समाज के बीच नहीं रह सकते। तो भैया के साथ भोजन करके बड़ा अच्छा लगा और हम टहलते हुए फिर बारात आ गए और रात्रि विश्राम किए। सुबह उठे और दतुअन-कुल्ला करके फिर वधू के घर आए। वहां पर मिलना हुआ और बड़े आदर पूर्वक विदायी हुई। वधू के भाई मिलनसार और बड़े ही जहीन-उर्जावान लगे। हमें बताया गया, कि वधू के भाई साहब हमारे छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में ही किसी कॉलेज में प्रोफेसर हैं। कभी मिलेंगे यहां, तो बात होगी।
अब हम लौटने के लिए बस में बैठ चुके हैं। बगल में प्रेम भैया हैं। पूरा ख्याल रखते हैं और बीच-बीच में कुछ बताते भी जाते हैंं। बस चल चुकी है..
लीजिए, नकौझा आ गए। वधू का आगमन भी हो चुका है। बाहर धूप बहुत तेज है। बोधनाथ भैया स्त्रियों को आवाज देते हैंं, कि "जल्दी-से परछन करके दूल्हन को उतारो बाहर धूप बहुत है।" फिर तो गीता दीदी-से लेकर सभी स्त्रियां गाती-बजाती आयीं और दूल्हन को उतारने की रस्म अदा होने लगी। "परीछ हो रघुवर जानकी के.." जैसे मंगल-गीतों-से दूल्हन को उतारा जा रहा है। आगे-आगे वर और पीछे गांठ जोड़े वधू मउनी में पग धारते मग को पवित्र करते गृह-प्रवेश कर रहे हैंं। सुन्दर दृश्य! गीता दीदी दूल्हन को पकड़े हैंं। फिर-से हमें मामी की याद आयी। लगा, कि ड्योढ़ी पर खड़ीं वे ही दूल्हन का स्वागत कर रही हैं। आंखें भर आयीं, आज उनकी बड़ी याद आयी है हमें। लेकिन क्या करें ईश्वर के आगे तो बौने हैं हम। सिर नवा लेते हैंं उनके आगे। अब हमेंं नहाने की तलब लगती है। कल-से खजबजा गए हैं। किससे कहेें? चुपचाप सीढिय़ों-से ऊपर भागे। एकदम एकान्त! बाथरूम के पास ही तौलिया रखी है जैसे कोई कह रहा हो, "आओ बाबू नहा लो।" हम बाथरूम में पहुंचे और अन्दर-से सिटकिनी बन्द कर बड़े आराम-से नहाए और फ्रेश होकर नीचे पहुंचे। जितेन्द्र भैया के पैसे बात करने लगे। सीता-हरण का प्रसंग था..उनका दर्शन शुरू हुआ, तो लगा, सेवानिवृत्त प्रधानाचार्य डॉ. जितेन्द्र मणि त्रिपाठी की बुद्धि के आगे भला कौन टिकेगा? उद्भट विद्वान भैया के आगे सिर झुक गया। वे महाभारत प्रसंगों के साथ ही महात्मा भीष्म-कृष्ण का प्रसंग ले आए तो हम सुनकर हतप्रभ रह गए, कितना गूढ़ रहस्य छिपा रह गया हमसे। बताते-बताते भैया की आंखोंं-से अश्रुधार फूट पड़े। बिलखने लगे वे। हम जड़वत्! कितने संवेदनशील हृदय हैं भैया। यही तो असल मनुष्यता की निशानी है। हम उनके पैरों पर झुक गए। सहसा गीता दीदी आयीं..  
"ल बबुल्ले, बारा (उड़द दाल का बड़ा) खा।" हाथों मेंं रखी थाली उनने रख दी। हम भौंचक्क उनका मुंह ताकने लगे। लगा अम्मा और मामी साक्षात् हों! चाहे जिस रूप में भी हो, गीता दीदी का स्नेह सदैव हम पर बरसता रहा है। जब वे हमारे जनेऊ में खखाइचखोर आई थीं तब तो उनने पूरा माहौल ही लूट लिया था। हमें हल्दी लगातीं और बुकवा लगता तो बड़ी दीदी और पुष्पा दीदी से लेकर दोनों फूआ और मौसी सहित अम्मा और गांव-घर की औरतें खूब परिहास करते। कितना तो शानदार समय था वह। अम्मा का लगाव गीता दीदी-से बहुत था।
छुटपन में किसी उत्सव में जब हम नकौझा आते, तो तो मामी और अम्मा या मौसी बारा लाकर धीरे-से देतीं, कि "खा ल।" द्वार पर खेलते हमें इसकी सुध ही न रहती। लेकिन उनका प्यार ऐसा होता, कि मन न होते भी लपक लेते। लेकिन जब खाते, तो स्वाद! वाह क्या कहने? फिर तो नकौझा का कोरवर करारे गरम गोल-गोल, सुनहले बारा एक तरह-से दिमाग में ही बस गया। गांव-घर, शहर-से लेकर रिश्तेदारों तक हजारों जगह हमने बारा खाया, लेकिन नकौझा के बारा के आगे सब फेल। जाने क्या तो डालते हैंं ये लोग उसमें। सच तो यह है, कि प्यार-मनुहार और अपनत्त्व का जो अमृत यहां पड़ता है वह और कहां? शायद यही इसे डेलीसियस, स्वादिष्ट और जायकेदार बना देता है। यहां की दही भी हमें नहीं भूलती। मोटी-साढ़ी और उसका मीठा स्वाद हर वक्त जिह्वा पर रहता है। दही और बारा इसके स्वाद की जितनी भी प्रशंसा करें कम है।
हम बोले, "दीदी! चल नहीं पाएगा। पेट बहुत भरा है।" तो जितेन्द्र भैया ने स्नेह-से कहा, "ले लो कुछ नहीं होगा।" गीता दीदी ने भी नेहासिक्त शब्दों मेंं कहा, "कुच्छ नाहीं होई बाबू, एक्कै-दू ठो ले ल।" फिर तो हमने दो बारा खा लिया, कि चलो जो होगा देखा जाएगा। भैया ने भी साथ दिया।
जितेन्द्र भैया के दर्शन की अन्तिम कड़ी जिसमें नदियों की पवित्रता और उसमें निमज्जन-अवगाहन की परम्परा की बातें थीं, जैसे ही पूरी हुईं, कि भोजन का निमन्त्रण आ गया। हम बैठे और साथ में भोजन किए। धर्मेन्द्र भैया, शायद नींद मार रहे थे, वे भी अलसाए आए और बैठे। बड़ा आनन्द मिला साथ में भोजन करके।
यहीं दो होनहार युवा जो रविन्द्र भैया के लड़के थे शायद हमने उनसे अपने बारे में पूछा, तो ठीक-से बता नहीं पाए, लेकिन एक ने दिमाग पर जोर डालते हुए कहा, कि "आप लिखते हैं न?" सुनकर आश्चर्य हुआ, कि "अरे! इन्हें कैसे पता?" उनने बताया, कि वे हमारी पुस्तक पढ़े हैं जो गोरखपुर में रखी है। फिर तो हमने उन्हें खूब दाद दी आगे बढऩे की शुभकामना भी।
समापन..     इधर सुबह को टाटा कह दुपहरी ने तिजहरिया को आहिस्ता-से आवाज़ दी उधर हमने भी अपने प्रस्थान की इजाज़त मांगी, कि कल गोरखपुर-से ट्रेन है हमारी। इसी में खखाइचखोर भी जाना है । अब अम्मा-बाबूजी न रहे तो ताला बन्द रहता है। बीच-बीच में खेत-खलिहान, गांव-घर देखरेख करने आनाजाना पड़ता है। तो होने लगी तैयारी। सुनते ही भाभी ( विरेन्द्र भैया और धर्मेन्द्र भैया की श्रीमतीजी ) आईं। तिलक-से ले अब तक की व्यस्तता और थकान के बाद भी एकदम ताजादम और खूबसूरत लग रही थीं वे। लगें भी क्यों न? लक्ष्मी रूपा नववधू उतारीं हैं। मुस्कियाकर बच्ची-से बोलीं, "बाबू के दही ले आवा।" हम घर को देखते हैं। भरी निगाहों-से कोना-कोना निहारते हैं। ऊपर-से लेकर नीचे तक दरो-दीवार तक मामी की छबि दिखाई दे रही है मानो हमारे शुभागमन पर आशीषों की वर्षा कर बिदाई की बेला में स्वयं आ खड़ी हुई हों, हमारी आँखें डबडबा जाती हैं। निकलते हैं, पीछे-पीछे जितेन्द्र भैया-विरेन्द्र भैया-धर्मेन्द्र भैया आते हैं। ओसारे में श्रद्धेय नाना, पूजनीय रामअवध मामा-पूजनीय रामानन्द मामा की फोटुएं देखते हैं, दिखता नहीं पर भी शीश नवाते हैं। बरामदे में रविन्द्र भैया बइठे हैं पालागन कर कोठरी में जाते हैं जहां बोधनाथ भैया और प्रेम भैया सोए हैं। जगाकर प्रणाम करते हैं। तब तक मुकेश बाबू मोटर कार लिए तैयार हो जाते हैं हमें छोड़ने। कार तक पहुँचे हैं। तीनों भैया साथ हैं। आंखों को हिम्मत नहीं है कि उनकी ओर देख लें। कैसे छोड़ें हम इन सुहृद्वरों को ! कार का दरवाजा खुल गया है। हम नजरें नीची किए-ही -किए जितेन्द्र भैया और धर्मेन्द्र भैया के पांवों को स्पर्श करते हैं कि आंखें छलछला उठती हैं। आंसुओं को जज्ब करते विरेन्द्र भैया के पैरों पर गिरते हैं कि वे लपकर अपनी बाहों में भर लेते हैं हमें। अब हमारी रुलाई छूट पड़ी है। अगली सीट पर बैठने को होते हैं कि बिदाई का पैकेट थमा देते हैं भैया। कार बैक कर रहे हैं बाबू मुकेश। हमने देखा तीनों भैया के आँखों की कोर गीली हो गई हैं। वियोग का दर्द भला किसे न होगा? फिर हम तो आपके पूज्य पिताश्री के बहिन के सुपुत्र हैं। कार खुल गई है। फिरकर कांच-से देखे, आंख मलते प्रेम भैया दिखे। देख रहे थे बड़े प्रेम-से। कार उरुवा-पथ पर है। देखा तो जैसे बगल में अम्मा हैं, रुआंसीं,  कि फिर कब दिखेगा उनका नैहर। अच्छा, तो  "बाय-बाय नकौझा।"     इति!
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नकौझा में अपनों के बीच लिखे हमारे संस्मरण पर अनेक सुधिजन की टिप्पणियां मिली हैं मानों वे भी हमारे साथ चल रहे हों। इतना ही नहीं उन सुधिजनों ने लगातार प्रशंसा के शब्द लिख व इमोजी आदि डालकर हमारी हौसलाआफजाइ्र की। हम उनके शुक्रगुजार हैंं और यह भी कि उनका शुक्रिया अदा करने के लिए हमारे पास शब्द नहीं हैं। इसी-से हमें बल मिला और हमारी कलम बढ़ती गई। हम सबकी पहिचान तो न कर सके लेकिन जान कि आप हमें अपने दिल में रखे हैं।
अब देखिए, पहले ही दिन मोबाइल नम्बर 92894 23363 से मैसेज मिला, कि "बहुत सुन्दर!" तो इसके उत्तर में सिर नवाकर यही कहना चाहते हैं, कि "हमारा लिखा नहीं बल्कि आपकी सोच बहुत सुन्दर है जो हम जैसोंं के असुन्दर में भी सुन्दरता की खोज कर लेती है। आपको सादर प्रणाम करते हैं।"
इसके जस्ट बाद मो.नं 70078 97260 से इमोजी के द्वारा शानदार कहा गया तो हम आप लोगों के कायल हैं जो इतनी शिद्दत से बोझिल मैटर को भी पढ़े और दाद दिए।
विशेष उल्लेखनीय तो प्रेम भैया का सन्देश रहा जो आपने हमारे वाल पर जाकर दी। आपने लिखा, "वाह! हम इन्तजार कर रहे थे कि कब आप के मधुर लेख एक नई ज्योति बिन्दु की ज्ञान/आनन्द मिलेगा।" तो हम क्या कहें! प्रेम भैया, हम तो आपके सामने बौने हैं। आकांक्षी हैं, कि आपका प्यार-आशीर्वाद हमारा मार्ग प्रशस्त करता रहे। आपने हमार लिखा पढ़ा यह क्या कम है। इस व्यस्ततम् समय किसे फुर्सत है, लेकिन यह आपका हमारे प्रति प्यार ही तो है जो आपने इतने शब्द व्यय किए वह भी हम जैसे नाचीज के लिए।
मो.नं 78609 15026 से प्यारे-प्यारे इमोजी के साथ ही लिखा था, "बहुत अच्छा है चाचाजी।" तो हम यही कह सकते हैं, कि अच्छे तो आप सब हैंं जो इतने प्यारे और अच्छी सोच वाले हैं। खुशनसीब तो हम हैं जो आप लोगों-से अपने जन मिले हैं। आपको बहुत धन्यवाद कहते हैं। फिर आपने अंग्रेजी में लिखा, "वी रियली मिस आवर दादीमा इट वाज रियली सुपर्ब..चाचाजी।" इसे पढ़कर हमारी आंखें भर आयीं कि कितनी हर्ट टचिंग थीं हमारी पूजनीय मामीजी। उन मनीषा का हमारे सहित आप सब  पर आशीर्वाद बरसता रहेगा।
प्रिय आशुतोष, प्रिय अनुपम आदि बीच-बीच में इमोजियोंं के सहारे हमारे लिखे की दाद देते रहे हैं। हम इन नौजवानों को खूब सारा स्नेह सौंपते हैं, कि वे दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की करते रहें और अपने मकसद में कामयाब होवेंं।
इसी बीच बोधनाथ भैया का वाइस कॉल आया है, नेट बन्द होने की वजह से शायद मिल नहीं पाया उन्हें क्षमा के साथ सादर प्रणाम है।
शिवनाथ शुक्ल
७. ५. २०१९