Wednesday, 25 May 2016

 भालू-बन्दरों का भी उत्पात 

छत्तीसगढ़ के जंगलों से वन्य पशुओं का निकल कर बाहर आना लगातार जारी है। वे फसलों से लेकर अन्य सामानों और घरों को तोड़कर तबाही तो मचा ही रहे हैं साथ-ही-साथ ग्रामीणों को भी मार कर बड़ा नुकसान करते जा रहे हैं। उनका आतंक इस कदर फैलता जा रहा है, कि ग्रामीण अब घर-बार छोड़कर दूसरे ठौर की तलाश करने लगे हैं। सरगुजा से लेकर अम्बिकापुर, रायगढ़, कोरबा आदि के पूरे क्षेत्र में हाथियों का बड़ा आतंक देखने को मिल रहा है। आए दिन इस प्रकार की खबरें सुनने में आ रही हैं कि हथियों के दल गांवों में पहुंच कर घरों को विनष्ट कर सामानों को तितर-बितर कर रहे हैं। कइयों घटनाएं हुईं जिनमें हाथियों ने जानमाल की बड़ी तबाही की है। शुक्रवार को धरमजयगढ़ वनमंडल के कापू व छाल वन परिक्षेत्र में तेंदूपत्ता तोडऩे निकले ग्रामीण को हाथी ने कुचल कर मारा ही था, कि फिर खबर आई है कि प्रेमनगर में एक ग्रामीण को सूंड़ में लपेट कर हाथी ने पटक दिया जिससे उसकी मौत हो गई। दर्जनों से ऊपर इन्सीडेन्ट हो चुके हैं जिनमें हाथियों ने महिला-पुरुषों को कुचलकर या पटककर मारा है। बताते हैं कि हाथियों के दल खाना-पानी की तलाश में जंगलों से निकल कर गांवों में विचरण कर रहे हैं।
इसी प्रकार भालुओं का भी आतंक हैं। वे भी ग्रामीणों को नोच-खसोट रहे हैं। बालोद क्षेत्र में बन्दरों का उत्पात है। वहां मालीघुड़ी ग्राम के एक निवासी ने बताया कि उस क्षेत्र में बन्दरों का आतंक इतना है कि किसान अपने कवेलू के घरों को हटाकर टीन शेड डलवा रहे हैं या फिर पक्का बनवा रहे हैं। वन्य जन्तुओं का इस प्रकार से जंगलों से निकलना बताता है, कि कहीं-न-कहीं उन्हें दाना-पानी की दिक्कतें हैं। बताया जाता है कि जंगलों में पानी की कमी होती जा रही है। बढ़ती गर्मी में गला तर करने के लिए वे जंगलों से निकल रहे हैं। ऐसी स्थिति में समझ में यह नहीं आता कि जंगल के अफसरान वन परिक्षेत्र में पोखरों का जगह-जगह निर्माण क्यों नहीं करवाते? यह भी है, कि जंगलों में पारिस्थिक सन्तुलन गड़बड़ा रहा है। इसीलिए वन्य पशु भी परेशान हैं। हिरन, खरगोश आदि लुप्त होते जा रहे हैं। इस ओर बड़े प्रोजेक्ट के निर्माण के साथ सुगठित नीति बनाने की जरूरत है। इसे गम्भीरता से लेकर और परिस्थितियों के साथ स्थानीय भूगोल को समझकर योजना को अमलीजामा पहिनाना होगा। जिससे जंगलों के साथ ही वन्य-पशु भी सुरक्षित रह सकें और मनुष्यों के साथ ही उनके घर व खेत-खार की सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।

Tuesday, 10 May 2016

 बच्चों की चोरी

तो क्या छत्तीसगढ़ के सरकारी अस्पताल भी अब भगवान भरोसे ही चल रहे हैं? यह प्रश्र इसलिए है, कि राज्य के सरकारी अस्पतालों में अनेक गम्भीर किस्म की विसंगतियां लगातार सामने आ रही हैं। जिला चिकित्सालय दुर्ग में तो कल एक बच्चा ही चोरी चला गया! जिसका अब तक कोई अता-पता नहीं है। कितनी बड़ी और गम्भीर बात है यह, कि प्रसव पीड़ा से तड़पती एक गरीबन सरकारी अस्पताल दुर्ग में डिलवरी के लिए जाती है और डिलवरी में उसे लड़का प्राप्त होता है जिसे कुछ ही देर में चोरी कर लिया जाता है! सोचा जा सकता है, कि क्या हालत होगी उस मां का जिसका बच्चा उसकी आंखों के सामने से ही गायब हो जाए। क्या भरोसा करेगी वह सरकारी अस्पताल पर?
देखा जाए तो यह कोई पहला मामला नहीं है। अनेकों मामले हैं जिसमें नवजात बच्चों के इधर-उधर किए जाने और चोरी के मामले देखने को मिले हैं। यह तब है जब सरकार ने सुरक्षा के लिए अस्पतालों में अनेक प्रकार इन्तजामात किए हैं। एक पूरा अमला ही इसके लिए लगाया गया है, जिसमें भारी भरकम खर्च किए जा रहे हैं। पुलिस की व्यवस्था जो है सो अलग। फिर भी कैसे घटित हो रही हैं इस प्रकार की घटनाएं? क्या कोई अन्तर्राष्ट्रीय रैकेट काम कर रहा है, जो इस प्रकार की घटनाओं को सरंजाम देने में सरकारी मिशनरी से मिल कर अपना काम करने मे लगा है?
बताया जाता है, कि बच्चों की चोरी के पाशविक धन्धे में एक बड़ा गिरोह काम करता है। अनेकों ऐसे मामले सामने आए जिसमें पता चला कि बच्चा खरीदने वाली दम्पतियों से लेकर क्राइम जगत से जुड़े लोग अपना जाल फैलाकर रखते हैं। लेकिन सवाल यह उठता है, कि सरकारी अस्पताल जहां कि गरीब और बेसहारा सर्वहारा वर्ग के लोग बहुतायात में आते हैं उनकी सुरक्षा और सुविधा के लिए क्या कोई समझौता किया जा सकता है? आज भी पता चलता है कि सरकारी अस्पतालों में चिकित्सकों से लेकर दवाइयों तक का टोटा रहता है, फिर भी मरीज हैं कि बेचारे बड़ी उम्मीद से वहां जाते हैं। उसके बाद भी उनके साथ नाइन्साफी हो, तो फायदा क्या? देखा जाए तो प्रशासन ने अस्पतालों के प्रसूति कक्ष में सुरक्षा के पर्याप्त इन्तजामात कर रखे हैं। सीसीटीवी कैमरे तक लगाए गए हैं पर भी घटनाएं घट ही रही हैं। हैरत तो यह होती है कि ऐन घटना के वक्त ये सीसीटीवी कैमरे बन्द पाए जाते हैं जो सन्देह पैदा करते हैं और अनेक सवालों को जन्म देेते हैं। इसीलिए लगने लगता है, कि सरकार और प्रशासन की व्यवस्था में कहीं तो खामी है और ये सरकारी अस्पताल भी भगवान भरोसे ही चल रहे हैं। आखिर कब सुधरेगी इस प्रकार की कुव्यवस्था?

Monday, 9 May 2016

रघुराम राजन की माकूल चेतावनी

सचमुच आज के बदलते दौर में बढ़ते गैर जरूरी पाठ्यक्रमों की उलझन ने छात्र-छात्राओं को अपने मोहपाश में फांस लिया है। इसकी मृगतृष्णा ऐसी है कि इसमें फंस कर छात्र-छात्राएं अपने भविष्य को दांव पर लगा रहे हैं। इस मामले में रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) के गर्वनर रघुराम राजन ने भारतीय छात्र-छात्राओं को जिस लहजे में आगाह किया है उसे समझकर चौकन्ना होने की जरूरत है।
यह सच है कि आज का युग संचार और सूचना प्रौद्योगिकी का है, जहां का वातावरण पल-प्रतिपल बदलता रहता है। इसके व्यामोह ने आभासी दुनिया का ऐसा कृत्रिम आवरण आच्छादित कर रखा है जहां कि सपने और ऊंची उड़ानें हैं। शानदार लाइफ स्टाइल और विदेश यात्रा के हसीन सपने पालती हमारी नौजवान पीढ़ी हर स्तर पर समझौते करने को तैयार खड़ी दिखती है। लेकिन यह भी याद रखना है कि यदि यह समय सूचना प्रौद्यागिकी और डिजिटलाजेशन का है तो व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा भी कम नहीं है। यह होड़ ऐसी है, कि दुनिया का युवा वर्ग इससे प्रभावित होता जा रहा है। यह भी याद रखना है, भारत आज भी तीसरी दुनिया के देशों में गिना जाता है जहां निर्धनता, गरीबी और पिछड़ेपन का दंश है। जहां का युवा वर्ग अपने बेहतर भविष्य के लिए हाथ-पैर मार रहा है। इसीलिए रघुराम राजन की चेतावनी को बड़े ध्यान से सोचने की जरूरत है। कारण कि आज भी अनेक मल्टीनेशनल कम्पनियां बड़े-बड़े सब्जबाग दिखाकर हमारी युवा पीढ़ी को आकर्षित कर रही हैं। भगोड़े विजय माल्या की नजीर हमारे सामने है, जिसने जाने कितनी जिन्दगियों को बर्बाद किया। उसकी एयरलाइन्स कम्पनी में काम करने के लिए छात्र-छात्राओं ने क्या-क्या न किया? लेकिन आज उनका भविष्य क्या है? इसी प्रकार देश के कोने-कोने में अनेक शैक्षणिक संस्थाएं खुली पड़ी हैं जो एक-से-एक पाठ्यक्रमों में प्रवेश देने की दूकानें खोले बैठी हैं जिनका दावा रहता है कि नौकरी पक्की! इसी लालच में नौजवान आकर्षित होते हैं और मोटी फीस होते हुए भी कर्ज गुआम लेकर एडमिशन ले लेते हैं।
हमारे छत्तीसगढ़ में भी ऐसे अनेक संस्थान संचालित हैं, जो बच्चों को सब्जबाग दिखा रहे हैं। शहरों से लेकर ग्रामीण इलाकों तक में इनके बड़े-बड़े होर्डिंग्स लगे हैं जो हमारे छात्रवर्ग को आकर्षित करते हैं। कई कोर्सों का नाम देकर लुभाया जा रहा है। छात्र-छात्राएं इस क्रेज को देखते हुए ऊंची फीस के लिए बैंकों से कर्ज लेकर एडमिशन लेती हैं, लेकिन बाद में उन्हें रोजगार नहीं मिल पाता और उन पर बैंक का लोन चढ़ जाता है। एविएशन क्षेत्र से लेकर एमएमई, एआइएम, आईएमआईएम जैसे दर्जनों कोर्सेस संचालित हैं जिनमें एडमिशन के लिए बच्चे भागे जा रहे हैं। पालकों और समाज के हर वर्ग के लिए यह सोचने का समय है कि वे अपने बच्चों को सही मार्गदर्शन दें और उन्हें उन्हीं पाठ्यक्रमों में प्रवेश के लिए प्रेरित करें जो रोजगार के सही अवसर प्रदान करे। साथ ही भारतीय संस्कारों का बीजारोपण भी करे।

Thursday, 5 May 2016

 सामाजिक असन्तुल
 
लोग भौंचक हैं और कह रहे हैं कि अमीर तो और अमीर हुआ जा रहा है और गरीब और गरीब! आखिर कौन-सी नीति बनायी है हमने जो सामाजिक असन्तुल को बढ़ाती ही जा रही है। हालात देख कर एक बारगी तो ऐसा लगने लगता है कि यही हाल रहा तो बेमेल समाज में खतरनाक परिस्थितियां न उत्पन्न हो जाएं। कारण कि लोग देख रहे हैं कि अमीरी-गरीबी के बीच की खाई कितनी चौड़ी और गहरी होती जा रही है।
जिनके पास अनाप-शनाप पैसा है वे उसका उपयोग भी अनाप-शनाप ही कर रहे हैं। देखा जा रहा है कि काली कमाई करने वाले अनेक लोग रियल इस्टेट के धन्धे में भाग्य आजमाने के लिए भारी निवेश किए जा रहे हैं।  शराब से लेकर अन्यान्य अवैध धन्धों से पैसा-पत्तर बनाकर दो नम्बरी किस्म के लोग सत्ताधीशों और नौकरशाहों के पास पहले तो अपनी धमक बढ़ाए और फिर खुल्ला खेल शुरू कर दिए। आज आप चाहे जहां जाएं, हर जगह उन्हीं का बोलबाला मिलेगा। सभ्य समाज के लोगों की चाहे कोई पूछ न हो लेकिन शासन और प्रशासन के गलियारे में इनकी पूछ-परख अवश्य दिखाई देगी। इसी का परिणाम है सामाजिक ताना बाना बिगड़ता ही जा रहा है। हर जगह विसंगतियां और विभेद का भाव दिखाई देने से लगता है कि आने वाला समय और कठिनाई भरा होगा। विशेषकर उसके लिए जो ईमान पसन्द और तहजीब से रहने वाला है।
आज आप गरीब बस्तियों में चले जाएं, कहां दूर हुई है उनकी गरीबी? देख लीजिए उनकी लाइफ स्टाइल। आजादी के बाद से लगातार हम गरीबी हटाओ का ढोल पीट रहे हैं लेकिन ईमानदारी से तनिक अपने सीने पर हाथ रखकर पूछें तो पता चलेगा, कि गरीबों के नाम पर इन नेताओं ने कैसे अपनी दूकानदारी चलाई है और अपना घर भरा है। सच तो यह है कि गरीब बेचारा और गरीब हुआ है। उसकी बदहाल जिन्दगी न तो पहले बहार थी और न ही अब है। शिक्षा से लेकर स्वास्थ्य और यहां तक कि खाने-पीने तक के लिए उन्हें दूसरों का मुंह ताकना पड़ता है। दुखद तो यह है कि अमीर बनने के लिए अब शार्ट कट योजना के चलते बड़े-बड़े क्राइम हो रहे हैं जिन पर किसी का ध्यान नहीं है। जमीनों की दलाली से लेकर बैंकों से ऋण लेकर अदा न करने की प्रवृत्ति और बहुतेरे अवैध धन्धों के माध्यम से धन कमाने की लिप्सा ने ही इस विभेद को बढ़ाने का काम किया है। इसे दूर करने के लिए आखिर प्रयास करेगा कौन?
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Wednesday, 13 April 2016

मिल बाँटकर खाओ

इधर सड़क दुर्घटनाओं में हर रोज मौतें हो रही हैं उधर वाहन चालकों को छेक कर लाइन में खड़ा किया जा रहा है.. इधर नक्सली लगातार आत्मसमर्पण में हाथ खड़े कर रहे हैं तो उधर उनके द्वारा बम-ब्लास्ट कर हमले-पर-हमले भी हो रहे हैं.. इधर पानी के लिए सरकार बैठकें कर रही है और उधर मैदानी इलाकों  में नागरिक बूंद-बूंद पानी के लिए  तरस रहे हैं.. अन्तिम व्यक्ति के भूख मिटाने के खाद्यान्न बंट रहे हैं तो बेचारे आदिवासियों के छींद के कीड़े खाकर भूख मिटाने की भी खबर है.. इस प्रकार की निरन्तर मिल रहे समाचारों से लगने लगता है, कि क्या छत्तीसगढ़ भगवान भरोसे है? हर जगह देखने पर लगता है कि व्यवस्था और उसके परिचालन में कहीं कोई साम्य नहीं है! हर कोई अपनी ही मस्ती में दिखता है। कोई काहू मगन कोई काहू मगन की तर्ज पर जिसे देखो वही मदमस्त है मानो उसे किसी और से कोई मतलब ही नहीं! इन सबके बीच लोग हैं कि फंसे हुए बन्दर की भांति इत-उत देख रहे हैं किन्तु कहीं ठौर नहीं मिल रहा है।
छत्तीसगढ़ की यातायात व्यवस्था पर ही बात करें, तो सवाल है कि जब हमारा टे्रफिक सिस्टम इतना चैतन्य व चौकन्ना है तो फिर सड़क दुर्घटनाएं रुक क्यों नहीं रहीं? यही सवाल माओवादी उन्मूलन में चल रहे कार्यों को लेकर भी है, कि जब माओवादी इतने ही हतोत्साहित व निराश होते जा रहे हैं तो लगातार उनके हमले कैसे जारी हैं? सरकारी अमले से लेकर बड़ी संख्या में सुरक्षा बलों की उपस्थिति के बाद भी आग के शोले उठते ेरहें तो क्या कहा जाए? इससे तो यही लगता है कि छत्तीसगढ़ के वास्तविक हितों के साथ किसी को सरोकार है, लगता नहीं! जिसे देखो वही कमाई पर लगा है। चाहे जैसे हो आने दो सोच के चलते हर जगह कबाड़ा हो रहा है। कभी-कभी लगता है कि मिल बाँटकर खाओ वाली नीति हर जगह चल रही है। माओवादी अपनी चला कर लूट ही रहे हैं तो दूसरे भी ईमान का चोला पहने नागरिकों को कोई सुविधा नहीं दे रहे हैं। बल्कि नागरिक तो बेचारा बना हुआ फुटबॉल की तरह इधर-उधर फेंका जा रहा है।

Sunday, 10 April 2016

युद्ध-कौशल को जंग 

फिर तो यह चिन्ता के फलक को और बड़ा कर देने वाला है, कि नक्सली उन्मूलन में सरकार की ओर से मोर्चे पर डटे केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल(सीआरपीएफ) में फीजिकल फिटनेस का अभाव इस कदर है कि वे राष्ट्र स्तरीय स्पर्धा में ही फिसड्डी साबित हो रहे हैं!
मध्य प्रदेश ग्वालियर जिले में टेकनपुर के बीएसएफ अकादमी में सम्पन्न छठवीं राष्ट्रीय स्तरीय स्पर्धा में सीआरपीएफ के कमाण्डोज के निम्न प्रदर्शन की जो जानकारियां आ रही हैं उसने तो माथे पर बल ला दिया है।  पता चला है कि इस स्पर्धा में सीमा सुरक्षा बल का तो ठीक किन्तु सीआरपीएफ का प्रदर्शन बड़ा लचर रहा। बताया जा रहा है कि सीआरपीएफ के कमांडोज को सभी महत्वपूर्ण खंडों में शिकस्त मिली है। फायरिंग जैसी महत्वपूर्ण स्पर्धा तक में उनके पिछडऩे की खबर है। ऑपरेशन प्लानिंग एण्ड ब्रीफिंग, एसटीओ जंगल खंड की तो हालत और भी पतली बतायी जाती है। पता चला है कि 20 मार्च से 5 अप्रेल तक आयोजित इस प्रतियोगिता में 23 प्रतियोगियों में छत्तीसगढ़ के सीआरपीएफ कमाण्डोज को 20 वां स्थान मिला है।
उल्लेखनीय है कि यह स्पर्धा देश के सभी प्रशिक्षित कामाण्डोज की होती है। वेल ट्रेन्ड कमाण्डोज की एक तरह से यह परीक्षा होती है कि उनके अन्दर कितनी कुव्वत है और प्रतिभा के मामले में वे कितने अव्वल है। लेकिन टेकनपुर स्पर्धा में उनके लचर प्रदर्शन ने बहुत सोचने पर मजबूर कर दिया है। यह इसलिए भी है कि माओवादी लगातार अपने जंगल वार फेयर को धारदार बना रहे हैं। गुरिल्ला युद्ध का उनका रणकौशल लगातार परवान चढ़ा रहा है। एक-से-एक प्लानिंग तैयार कर वे अपने लड़ाकों को बन्दरों के समान चुस्त दुरुस्त कर अटैक करते हैं। यही वजह है कि अर्धसैनिक बलों को अनके बार मुंह की खानी पड़ती है। अभी हाल ही में लैंड माइन बिस्फोट में 7 जवान सीआरपीएफ के ही मारे गए। छत्तीसगढ़ पुलिस विभाग के एक अवकाश प्राप्त अधिकारी ने इस पर चिन्ता जताते हुए पिछले दिनों बताया था कि किस प्रकार सीआरपीएफ के कमाण्डो प्रशिक्षण से दूर हैं। बताया गया कि नियमित पीटी-परेड तो दूर की बात वे इतने लुंज-पुंज हैं कि अपने शारीरिक सौष्ठव का ध्यान तक नहीं रखते। कैम्पों में इस कदर सुस्ती है कि सोना और खाना बहुत हुआ तो थोड़ी-सी पेट्रोलिंग और संतरी ड्यूटी, बस। वहीं माओवादी लड़ाके हैं कि नियमित पीटी परेड तो छोडि़ए कोहनी और घुटने के बल पर क्रॉलिंग कर उफ् तक नहीं करते । वे जान देकर भी टे्रन्ड होने तत्पर रहते हैं। पेड़ों में छिपकर फायरिंग और डालों पर कूदकर छिपने की कला वे इस कदर विकसित करते हैं कि क्या कहें? हमारे पास अत्याधुनिक हथियार लेकिन उनके पास क्या? फिर भी वे कई बार बाजी मारते हैं तो क्या यह हमारे लिए आलोचनात्मक आत्मपरीक्षण का विषय नहीं? कड़ा प्रशिक्षण ही है जो हमारे जवानों को स्पर्धा में खरा उतार सकता है। उस पर कोई समझौता नहीं होना चाहिए। यही समय की मांग है साथ ही देश की आन्तरिक सुरक्षा का सवाल भी।
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 कराहता आम आदमी 

  जीवन है तो बीमारियों का साथ भी है, लेकिन इन्हें दूर करने के लिए दवाइयां ही हैं जो साथ निभाती हैं। परन्तु आज दवाइयों को लेकर क्या हाल है सभी जानते हैं। और-तो-और, अब जरूरी स्वास्थ्य रक्षक दवाओं के लिए भी लोगों की मुश्किलें बढऩे लगी हैं। दिन-प्रतिदिन स्वास्थ्य सेवाएं महंगी ही होती जा रही हैं। ऐसे में आम आदमी उसमें भी निम्र आय वर्ग के लोगों की तो एक तरह से मरनी ही हो गई। लोगबाग तो अब अस्पताल के नाम से ही कांपने लगते हैं। कहें कि अच्छे-भले आदमी के सामने अस्पताल का नाम ले लें तो उसे बुखार आ जाता है। 
स्थिति यह है कि निजी चिकित्सालयों में इलाज काफी महंगा हो गया है। छोटी-से-छोटी बीमारी के लिए भी हजार रूपए से ऊपर निकल जाना आम बात हो गई है। सामान्य सर्दी-बुखार में भी डॉक्टर की सैकड़ों रूपयों की फीस और फिर उसके बाद रक्त-मूत्र आदि की जांच न भी हुई तो एंटीबॉयोटिक्स और एंटीएलर्जिक से लेकर अन्य दवाओं की खरीदी में मरीज की नानी याद आ जाती है। मेडिकल दूकानों में जाते ही मरीज सोचता है कि कहीं पैसे कम न पड़ जाएं! इसके पीछे कारण यह है, कि ब्राण्डेड दवाएं तेजी से लोगों की जेबें हल्की कर देती हैं। बीच में जेनरिक दवाओं के लिए सरकार ने बड़ा अभियान छेड़ा था। लेकिन अब उसका कहीं अता-पता नहीं है। इसे देखने के लिए न तो डीआई के पास फुर्सत है और न ही विभाग के अन्य लोग ही रुचि ले रहे हैं फिर सरकार में बैठे लोगों के पास कहां समय है। इससे हो यह रहा है कि मेडिकल वालों से लेकर डॉक्टर्स तक ब्राण्डेड दवाओं में हाथ खोल रहे हैं। चमकीली रैपर्स में पैक्ट्ड ब्राण्डेड दवाइयां इतनी महंगी हैं, कि एक मरीज को अपने पूरे माह का वेतन खर्च कर देना पड़ता है। जेनरिक दवाओं के लिए छिड़े सरकार के अभियान ने क्यों दम तोड़ दिया? मरीज आज भी सवाल करते हैं। डॉक्टर की पर्ची मिलते ही मरीज सीधा पूछता है, कि जेनरिक दवाएं कहां मिलेंगी? लेकिन हों तब तो! यहां तो बताते हैं कि दवा कंपनियों की अस्पताल व नर्सिंग होम्स वालों से इतना तगड़ा गठबंधन है कि चाह कर भी जेनरिक दवाएं नहीं चल पातीं। सिप्रोफ्लाक्सेसिन जैसी एंटीबॉयोटिक में खूब कमाई चल रही है। किस-किस का नाम लें, अनेक दवाएं जो जेनरिक में इतनी सस्ती हैं कि मरीज खरीदे तो पता ही न चले, लेकिन वहीं ब्राण्ड में घुसें तो एक पत्ता लेने में हालत बिगड़ जाती है।
जेनरिक दवाओं को लेकर सरकार का अभियान बड़ा सुन्दर और पुण्यात्मक था। इसका सीधा लाभ मरीजों को मिल रहा था। किन्तु उसने क्यों सांस तोडऩी शुरू कर दी यह तो वे लोग ही जानें।
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