Tuesday, 5 July 2016
Friday, 1 July 2016
नस-नस में भ्रष्टाचारी खून!
ऐसे में कैसे चलेगा? हर तरफ यदि भ्रष्टाचार का ही बोलबाला होगा तो आने वाली पीढिय़ां कैसे साफ-सुथरी और चमकीली होंगी? फिर तो न्यू जनरेशन में भी उसी करप्शन का ब्लड रीफर होगा और जिस सुन्दर समाज की हम परिकल्पना कर रहे हैं वह रह ही जाएगा। दुर्भाग्य तो यह है कि जिस राजनीतिक शुचिता की हम परिकल्पना और बातें करते हैं वह कहीं भी दिखाई नहीं देता। बल्कि कहें तो राजनीति एक तरह से आज की डेट में पूरी तरह-से व्यापार में तब्दील हुई दिखती है। लेकिन इसमें भी है कि नेताओं को व्यापार करना भी नहीं आता आखिर वे व्यापारी तो हैं नहीं इसीलिए सब कुछ गड्ड-मड्ड है। इसी का परिणाम हैं कि हम किसी नतीजे पर नहीं पहुंच रहे हैं। हमारे नेताओं को न राजनीति करने आ रही है न ही व्यापार। अव्वल समाज सेवा तो शायद उनकी डायरी से गायब ही है।
अरस्तु ने राजनीति के बारे में कहा था कि राजसत्ता को समाज के प्रति अभिमुख होना चाहिए। प्लेटो से लेकर माक्र्स और फिर अपने यहां के गांधी, पं. नेहरू, जेपी, पं. दीनदयाल से लेकर अनेकों चिन्तक हुए जिनने अन्तिम व्यक्ति की बात कही है, लेकिन कौन चल रहा उस रस्ते पर? माआवादियों को देखिए, कि वे अलग ही राह भटके हुए हैं। कहां बढ़ पा रहे हैं वे माओ-त्से-तुंग की राह पर भी? ऐसे में कहां सम्भव है क्रान्ति? फिर सत्ता भी है, कि उसका चरित्र सभी देख ही रहे हैं। राजनीतिक दलों के लोग अपनी पार्टियों के मेनिफेस्टो का हाशिये पर रख बस निजी स्वार्थों में ही मस्त हैं। इसका सीधा असर समाज और जन साधारण के जीवन पर पड़ रहा है। जन-जीवन आक्रान्त है और लोग अपनी रोजमर्रा की तकलीफों से लहूलुहान। फिर प्रश्र है, कि कौन मसीहा है? जो आएगा और जन-तकलीफों को छूमन्तर करेगा। कई बार यह जुमला उछला, कि प्रधानमंत्री के पास कोई जादू की छड़ी नहीं है। यह ठीक है, लेकिन यह भी सोचना होगा कि यदि जादू की छड़ी नहीं है, तो कोई तो ऐसा जादूई नुस्खा आए जो इन नताओं और हमारे सिस्टम में फैले भ्रष्टाचार के खून को साफ करे। कारण कि भारतवर्ष आजादी के बाद-से लगातार विकास के उन पायदानों को छूने की कोशिश कर रहा है जिन्हें विकसित देश अपना मानते रहे हैं। उसमें कोई अड़ंगा नहीं है। हमारे उससे ज्यदा ही है जो अन्य देशों के पास है। जरूरत है तो इस बात की कि हमारी कोशिशें ईमानदार पर देश के प्रति समर्पित हों। वर्ना तो ढर्रा चल ही रहा है।
Friday, 17 June 2016
सब्जियों के दाम आसमान छू रहे हैं! टमाटर और पेट्रोल की कीमतें लगभग समान होने को हैं! दालें तो कबकी दूर हो चुकीं हैं थाली-से! अब फिर डीजल-पेट्रोल का दाम बढ़ा है, तो स्वाभाविक है कि फिर-से वस्तुओं के दाम बढ़ेंगे ही। परिवहन चार्ज बढऩे का सीधा असर आवश्यक वस्तुओं पर ही पड़ता है। ऐसे में क्या स्थिति होगी आम आदमी की? वह तो पहले ही दुब्बर हुआ जा रहा है, फिर-से उस पर मंहगाई का बोझ लादते जाने-से तो डर है, कि कहीं उसकी कमर ही न टूट जाए। देखा जाए तो आज की डेट में अगर कोई पिस रहा है, तो वह आम मध्यवर्ग है, जिसकी कि संख्या बहुतायत है। गरीब रेखा-से नीचे जीवन यापन करने वाले ऐसे लोग जिनका नाम सरकारी पंजी में दर्ज है उन्हें सस्ता चावल तो मिल जा रहा है, लेकिन सवाल है कि केवल चावल से ही तो नहीं हो जाता न? सब्जी-भाजी, दूध, मसालों से लेकर चायपत्ती, तेल, नमक, बे्रड आदि भी तो हैं जो बहुत नहीं तो थोड़े पोषण आहार के रूप में तो जरूरी हैं। फिर बच्चों की फीस, इलाज का खर्चा अलग ही है। उसकी व्यवस्था कैसे होगी? फिर आम मध्यवर्ग की ओर देखें तो उस बेचारे के पास तो चावल तक का सुभीता नहीं है। आज की डेट में गिरे-से-गिरे चावल की क्या स्थिति है मार्केट में भला किससे छिपा है? एचएमटी से नीचे कोई खाने लायक चावल भी नहीं मिलता। ऐसे में वह क्या करेगा?
फलों के दाम आसमान छू रहे हैं। आम को ही देख लीजिए, मौसमी फल है। बड़ों से लेकर बच्चों तक को यह बहुत पसन्द रहता है। लेकिन उसका मूल्य कोई सुन ले तो देखे न उस ओर। गरीब तो छोडि़ए, आम मध्यवर्ग आम की ओर से विमुख हुआ है। एक आम खाने के लिए भी सोचना पड़ा है। अन्य फलों की भी कमोवेश यही स्थिति है। फिर आम आदमी करेगा क्या?
यह समझ नहीं आता कि लोकतान्त्रिक व्यवस्था में तन्त्र को देखिए तो वह तो फल फूल रहा है, लेकिन लोगों की दशा दयनीय रूप से गिरती जा रही है। यह विडम्बना की ओर इशारा नहीं तो और क्या है? दो नम्बरी और चार सौ बीस करने वाले मिठलबरे, भ्रष्ट ठेकेदार, नेताओं की जिन्दगी देख लीजिए तो अच्छे पढ़े-लिखे और सभ्य समाज के लोग सिर नीचा कर सोचने लगते हैं कि क्या इसी दिन के लिए कुर्बानी हुई थी हमारे महान नेताओं की! दरसल सचाई तो यह है, कि जनसाधारण एकमत नहीं है। वह वर्गों में विभक्त है इसीलिए उसकी आवाज उठ नहीं पाती और नीति नियन्ता मनमानियां करते हैं। लेकिन यह दशा ठीक नहीं है। इससे तो स्थितियां सुधरेंगी नहीं। इसके लिए तो आम आदमी को एक होकर अपने हक के लिए आगे आना ही होगा।
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Wednesday, 25 May 2016
भालू-बन्दरों का भी उत्पात
छत्तीसगढ़ के जंगलों से वन्य पशुओं का निकल कर बाहर आना लगातार जारी है। वे फसलों से लेकर अन्य सामानों और घरों को तोड़कर तबाही तो मचा ही रहे हैं साथ-ही-साथ ग्रामीणों को भी मार कर बड़ा नुकसान करते जा रहे हैं। उनका आतंक इस कदर फैलता जा रहा है, कि ग्रामीण अब घर-बार छोड़कर दूसरे ठौर की तलाश करने लगे हैं। सरगुजा से लेकर अम्बिकापुर, रायगढ़, कोरबा आदि के पूरे क्षेत्र में हाथियों का बड़ा आतंक देखने को मिल रहा है। आए दिन इस प्रकार की खबरें सुनने में आ रही हैं कि हथियों के दल गांवों में पहुंच कर घरों को विनष्ट कर सामानों को तितर-बितर कर रहे हैं। कइयों घटनाएं हुईं जिनमें हाथियों ने जानमाल की बड़ी तबाही की है। शुक्रवार को धरमजयगढ़ वनमंडल के कापू व छाल वन परिक्षेत्र में तेंदूपत्ता तोडऩे निकले ग्रामीण को हाथी ने कुचल कर मारा ही था, कि फिर खबर आई है कि प्रेमनगर में एक ग्रामीण को सूंड़ में लपेट कर हाथी ने पटक दिया जिससे उसकी मौत हो गई। दर्जनों से ऊपर इन्सीडेन्ट हो चुके हैं जिनमें हाथियों ने महिला-पुरुषों को कुचलकर या पटककर मारा है। बताते हैं कि हाथियों के दल खाना-पानी की तलाश में जंगलों से निकल कर गांवों में विचरण कर रहे हैं।
इसी प्रकार भालुओं का भी आतंक हैं। वे भी ग्रामीणों को नोच-खसोट रहे हैं। बालोद क्षेत्र में बन्दरों का उत्पात है। वहां मालीघुड़ी ग्राम के एक निवासी ने बताया कि उस क्षेत्र में बन्दरों का आतंक इतना है कि किसान अपने कवेलू के घरों को हटाकर टीन शेड डलवा रहे हैं या फिर पक्का बनवा रहे हैं। वन्य जन्तुओं का इस प्रकार से जंगलों से निकलना बताता है, कि कहीं-न-कहीं उन्हें दाना-पानी की दिक्कतें हैं। बताया जाता है कि जंगलों में पानी की कमी होती जा रही है। बढ़ती गर्मी में गला तर करने के लिए वे जंगलों से निकल रहे हैं। ऐसी स्थिति में समझ में यह नहीं आता कि जंगल के अफसरान वन परिक्षेत्र में पोखरों का जगह-जगह निर्माण क्यों नहीं करवाते? यह भी है, कि जंगलों में पारिस्थिक सन्तुलन गड़बड़ा रहा है। इसीलिए वन्य पशु भी परेशान हैं। हिरन, खरगोश आदि लुप्त होते जा रहे हैं। इस ओर बड़े प्रोजेक्ट के निर्माण के साथ सुगठित नीति बनाने की जरूरत है। इसे गम्भीरता से लेकर और परिस्थितियों के साथ स्थानीय भूगोल को समझकर योजना को अमलीजामा पहिनाना होगा। जिससे जंगलों के साथ ही वन्य-पशु भी सुरक्षित रह सकें और मनुष्यों के साथ ही उनके घर व खेत-खार की सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।
Tuesday, 10 May 2016
बच्चों की चोरी
तो क्या छत्तीसगढ़ के सरकारी अस्पताल भी अब भगवान भरोसे ही चल रहे हैं? यह प्रश्र इसलिए है, कि राज्य के सरकारी अस्पतालों में अनेक गम्भीर किस्म की विसंगतियां लगातार सामने आ रही हैं। जिला चिकित्सालय दुर्ग में तो कल एक बच्चा ही चोरी चला गया! जिसका अब तक कोई अता-पता नहीं है। कितनी बड़ी और गम्भीर बात है यह, कि प्रसव पीड़ा से तड़पती एक गरीबन सरकारी अस्पताल दुर्ग में डिलवरी के लिए जाती है और डिलवरी में उसे लड़का प्राप्त होता है जिसे कुछ ही देर में चोरी कर लिया जाता है! सोचा जा सकता है, कि क्या हालत होगी उस मां का जिसका बच्चा उसकी आंखों के सामने से ही गायब हो जाए। क्या भरोसा करेगी वह सरकारी अस्पताल पर?
देखा जाए तो यह कोई पहला मामला नहीं है। अनेकों मामले हैं जिसमें नवजात बच्चों के इधर-उधर किए जाने और चोरी के मामले देखने को मिले हैं। यह तब है जब सरकार ने सुरक्षा के लिए अस्पतालों में अनेक प्रकार इन्तजामात किए हैं। एक पूरा अमला ही इसके लिए लगाया गया है, जिसमें भारी भरकम खर्च किए जा रहे हैं। पुलिस की व्यवस्था जो है सो अलग। फिर भी कैसे घटित हो रही हैं इस प्रकार की घटनाएं? क्या कोई अन्तर्राष्ट्रीय रैकेट काम कर रहा है, जो इस प्रकार की घटनाओं को सरंजाम देने में सरकारी मिशनरी से मिल कर अपना काम करने मे लगा है?
बताया जाता है, कि बच्चों की चोरी के पाशविक धन्धे में एक बड़ा गिरोह काम करता है। अनेकों ऐसे मामले सामने आए जिसमें पता चला कि बच्चा खरीदने वाली दम्पतियों से लेकर क्राइम जगत से जुड़े लोग अपना जाल फैलाकर रखते हैं। लेकिन सवाल यह उठता है, कि सरकारी अस्पताल जहां कि गरीब और बेसहारा सर्वहारा वर्ग के लोग बहुतायात में आते हैं उनकी सुरक्षा और सुविधा के लिए क्या कोई समझौता किया जा सकता है? आज भी पता चलता है कि सरकारी अस्पतालों में चिकित्सकों से लेकर दवाइयों तक का टोटा रहता है, फिर भी मरीज हैं कि बेचारे बड़ी उम्मीद से वहां जाते हैं। उसके बाद भी उनके साथ नाइन्साफी हो, तो फायदा क्या? देखा जाए तो प्रशासन ने अस्पतालों के प्रसूति कक्ष में सुरक्षा के पर्याप्त इन्तजामात कर रखे हैं। सीसीटीवी कैमरे तक लगाए गए हैं पर भी घटनाएं घट ही रही हैं। हैरत तो यह होती है कि ऐन घटना के वक्त ये सीसीटीवी कैमरे बन्द पाए जाते हैं जो सन्देह पैदा करते हैं और अनेक सवालों को जन्म देेते हैं। इसीलिए लगने लगता है, कि सरकार और प्रशासन की व्यवस्था में कहीं तो खामी है और ये सरकारी अस्पताल भी भगवान भरोसे ही चल रहे हैं। आखिर कब सुधरेगी इस प्रकार की कुव्यवस्था?
Monday, 9 May 2016
रघुराम राजन की माकूल चेतावनी
सचमुच आज के बदलते दौर में बढ़ते गैर जरूरी पाठ्यक्रमों की उलझन ने छात्र-छात्राओं को अपने मोहपाश में फांस लिया है। इसकी मृगतृष्णा ऐसी है कि इसमें फंस कर छात्र-छात्राएं अपने भविष्य को दांव पर लगा रहे हैं। इस मामले में रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) के गर्वनर रघुराम राजन ने भारतीय छात्र-छात्राओं को जिस लहजे में आगाह किया है उसे समझकर चौकन्ना होने की जरूरत है।
यह सच है कि आज का युग संचार और सूचना प्रौद्योगिकी का है, जहां का वातावरण पल-प्रतिपल बदलता रहता है। इसके व्यामोह ने आभासी दुनिया का ऐसा कृत्रिम आवरण आच्छादित कर रखा है जहां कि सपने और ऊंची उड़ानें हैं। शानदार लाइफ स्टाइल और विदेश यात्रा के हसीन सपने पालती हमारी नौजवान पीढ़ी हर स्तर पर समझौते करने को तैयार खड़ी दिखती है। लेकिन यह भी याद रखना है कि यदि यह समय सूचना प्रौद्यागिकी और डिजिटलाजेशन का है तो व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा भी कम नहीं है। यह होड़ ऐसी है, कि दुनिया का युवा वर्ग इससे प्रभावित होता जा रहा है। यह भी याद रखना है, भारत आज भी तीसरी दुनिया के देशों में गिना जाता है जहां निर्धनता, गरीबी और पिछड़ेपन का दंश है। जहां का युवा वर्ग अपने बेहतर भविष्य के लिए हाथ-पैर मार रहा है। इसीलिए रघुराम राजन की चेतावनी को बड़े ध्यान से सोचने की जरूरत है। कारण कि आज भी अनेक मल्टीनेशनल कम्पनियां बड़े-बड़े सब्जबाग दिखाकर हमारी युवा पीढ़ी को आकर्षित कर रही हैं। भगोड़े विजय माल्या की नजीर हमारे सामने है, जिसने जाने कितनी जिन्दगियों को बर्बाद किया। उसकी एयरलाइन्स कम्पनी में काम करने के लिए छात्र-छात्राओं ने क्या-क्या न किया? लेकिन आज उनका भविष्य क्या है? इसी प्रकार देश के कोने-कोने में अनेक शैक्षणिक संस्थाएं खुली पड़ी हैं जो एक-से-एक पाठ्यक्रमों में प्रवेश देने की दूकानें खोले बैठी हैं जिनका दावा रहता है कि नौकरी पक्की! इसी लालच में नौजवान आकर्षित होते हैं और मोटी फीस होते हुए भी कर्ज गुआम लेकर एडमिशन ले लेते हैं।
हमारे छत्तीसगढ़ में भी ऐसे अनेक संस्थान संचालित हैं, जो बच्चों को सब्जबाग दिखा रहे हैं। शहरों से लेकर ग्रामीण इलाकों तक में इनके बड़े-बड़े होर्डिंग्स लगे हैं जो हमारे छात्रवर्ग को आकर्षित करते हैं। कई कोर्सों का नाम देकर लुभाया जा रहा है। छात्र-छात्राएं इस क्रेज को देखते हुए ऊंची फीस के लिए बैंकों से कर्ज लेकर एडमिशन लेती हैं, लेकिन बाद में उन्हें रोजगार नहीं मिल पाता और उन पर बैंक का लोन चढ़ जाता है। एविएशन क्षेत्र से लेकर एमएमई, एआइएम, आईएमआईएम जैसे दर्जनों कोर्सेस संचालित हैं जिनमें एडमिशन के लिए बच्चे भागे जा रहे हैं। पालकों और समाज के हर वर्ग के लिए यह सोचने का समय है कि वे अपने बच्चों को सही मार्गदर्शन दें और उन्हें उन्हीं पाठ्यक्रमों में प्रवेश के लिए प्रेरित करें जो रोजगार के सही अवसर प्रदान करे। साथ ही भारतीय संस्कारों का बीजारोपण भी करे।
Thursday, 5 May 2016
सामाजिक असन्तुल
लोग भौंचक हैं और कह रहे हैं कि अमीर तो और अमीर हुआ जा रहा है और गरीब और गरीब! आखिर कौन-सी नीति बनायी है हमने जो सामाजिक असन्तुल को बढ़ाती ही जा रही है। हालात देख कर एक बारगी तो ऐसा लगने लगता है कि यही हाल रहा तो बेमेल समाज में खतरनाक परिस्थितियां न उत्पन्न हो जाएं। कारण कि लोग देख रहे हैं कि अमीरी-गरीबी के बीच की खाई कितनी चौड़ी और गहरी होती जा रही है।
जिनके पास अनाप-शनाप पैसा है वे उसका उपयोग भी अनाप-शनाप ही कर रहे हैं। देखा जा रहा है कि काली कमाई करने वाले अनेक लोग रियल इस्टेट के धन्धे में भाग्य आजमाने के लिए भारी निवेश किए जा रहे हैं। शराब से लेकर अन्यान्य अवैध धन्धों से पैसा-पत्तर बनाकर दो नम्बरी किस्म के लोग सत्ताधीशों और नौकरशाहों के पास पहले तो अपनी धमक बढ़ाए और फिर खुल्ला खेल शुरू कर दिए। आज आप चाहे जहां जाएं, हर जगह उन्हीं का बोलबाला मिलेगा। सभ्य समाज के लोगों की चाहे कोई पूछ न हो लेकिन शासन और प्रशासन के गलियारे में इनकी पूछ-परख अवश्य दिखाई देगी। इसी का परिणाम है सामाजिक ताना बाना बिगड़ता ही जा रहा है। हर जगह विसंगतियां और विभेद का भाव दिखाई देने से लगता है कि आने वाला समय और कठिनाई भरा होगा। विशेषकर उसके लिए जो ईमान पसन्द और तहजीब से रहने वाला है।
आज आप गरीब बस्तियों में चले जाएं, कहां दूर हुई है उनकी गरीबी? देख लीजिए उनकी लाइफ स्टाइल। आजादी के बाद से लगातार हम गरीबी हटाओ का ढोल पीट रहे हैं लेकिन ईमानदारी से तनिक अपने सीने पर हाथ रखकर पूछें तो पता चलेगा, कि गरीबों के नाम पर इन नेताओं ने कैसे अपनी दूकानदारी चलाई है और अपना घर भरा है। सच तो यह है कि गरीब बेचारा और गरीब हुआ है। उसकी बदहाल जिन्दगी न तो पहले बहार थी और न ही अब है। शिक्षा से लेकर स्वास्थ्य और यहां तक कि खाने-पीने तक के लिए उन्हें दूसरों का मुंह ताकना पड़ता है। दुखद तो यह है कि अमीर बनने के लिए अब शार्ट कट योजना के चलते बड़े-बड़े क्राइम हो रहे हैं जिन पर किसी का ध्यान नहीं है। जमीनों की दलाली से लेकर बैंकों से ऋण लेकर अदा न करने की प्रवृत्ति और बहुतेरे अवैध धन्धों के माध्यम से धन कमाने की लिप्सा ने ही इस विभेद को बढ़ाने का काम किया है। इसे दूर करने के लिए आखिर प्रयास करेगा कौन?
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लोग भौंचक हैं और कह रहे हैं कि अमीर तो और अमीर हुआ जा रहा है और गरीब और गरीब! आखिर कौन-सी नीति बनायी है हमने जो सामाजिक असन्तुल को बढ़ाती ही जा रही है। हालात देख कर एक बारगी तो ऐसा लगने लगता है कि यही हाल रहा तो बेमेल समाज में खतरनाक परिस्थितियां न उत्पन्न हो जाएं। कारण कि लोग देख रहे हैं कि अमीरी-गरीबी के बीच की खाई कितनी चौड़ी और गहरी होती जा रही है।
जिनके पास अनाप-शनाप पैसा है वे उसका उपयोग भी अनाप-शनाप ही कर रहे हैं। देखा जा रहा है कि काली कमाई करने वाले अनेक लोग रियल इस्टेट के धन्धे में भाग्य आजमाने के लिए भारी निवेश किए जा रहे हैं। शराब से लेकर अन्यान्य अवैध धन्धों से पैसा-पत्तर बनाकर दो नम्बरी किस्म के लोग सत्ताधीशों और नौकरशाहों के पास पहले तो अपनी धमक बढ़ाए और फिर खुल्ला खेल शुरू कर दिए। आज आप चाहे जहां जाएं, हर जगह उन्हीं का बोलबाला मिलेगा। सभ्य समाज के लोगों की चाहे कोई पूछ न हो लेकिन शासन और प्रशासन के गलियारे में इनकी पूछ-परख अवश्य दिखाई देगी। इसी का परिणाम है सामाजिक ताना बाना बिगड़ता ही जा रहा है। हर जगह विसंगतियां और विभेद का भाव दिखाई देने से लगता है कि आने वाला समय और कठिनाई भरा होगा। विशेषकर उसके लिए जो ईमान पसन्द और तहजीब से रहने वाला है।
आज आप गरीब बस्तियों में चले जाएं, कहां दूर हुई है उनकी गरीबी? देख लीजिए उनकी लाइफ स्टाइल। आजादी के बाद से लगातार हम गरीबी हटाओ का ढोल पीट रहे हैं लेकिन ईमानदारी से तनिक अपने सीने पर हाथ रखकर पूछें तो पता चलेगा, कि गरीबों के नाम पर इन नेताओं ने कैसे अपनी दूकानदारी चलाई है और अपना घर भरा है। सच तो यह है कि गरीब बेचारा और गरीब हुआ है। उसकी बदहाल जिन्दगी न तो पहले बहार थी और न ही अब है। शिक्षा से लेकर स्वास्थ्य और यहां तक कि खाने-पीने तक के लिए उन्हें दूसरों का मुंह ताकना पड़ता है। दुखद तो यह है कि अमीर बनने के लिए अब शार्ट कट योजना के चलते बड़े-बड़े क्राइम हो रहे हैं जिन पर किसी का ध्यान नहीं है। जमीनों की दलाली से लेकर बैंकों से ऋण लेकर अदा न करने की प्रवृत्ति और बहुतेरे अवैध धन्धों के माध्यम से धन कमाने की लिप्सा ने ही इस विभेद को बढ़ाने का काम किया है। इसे दूर करने के लिए आखिर प्रयास करेगा कौन?
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