Saturday, 14 June 2014

                                            वो ७ दिन 

                                                           (४)

 सँउकेरे थोड़ी दूर बगल के नीम-वृक्ष पर एक लड़का चढ़ रहा है। हमनें सोचा क्यों न टूथपेस्ट रगड़ने की बजाय आज दांत-मसूड़ों से ही कुछ कसरत करवाई जाए। बिना काम के उनकी गति भी मद्धिम पड़ने लगती है। वह लड़का तेज़ी से चढ़ा जा रहा है। उसे देख हमें वह दिन याद आया जब ७-८ की उमर में हम भी बाबा द्वारा लगाए अपने द्वार के उस विशाल नीम-वृक्ष पर चढ़ा करते थे, तभी जाने कैसे घूँघट काढ़े अम्मा आ पहुँचतीं और डपट पिलातीं। लेकिन हम पर वह तनिक भी असर न करता और हम और ऊँचे चढ़े जाते। बहोत कोशिशों के बाद हारकर वे हाथ जोड़तीं और मिन्नतें करने लगतीं-'बाबू, गिर पड़ोगे, उतर आओ।'
'नहीं गिरूँगा अम्मा।' हम चढ़ते हुए वीरता दिखाते।
'तो मरा मुँह देखोगे मेरा, उतरो नहीं तो मेरी सौं।' मानो उसका कलेजा फट रहा हो।
अम्मा के इस वाक्य में जाने कैसी वेदना होती कि हम चुप से उतरते और उनकी गोद में भागते। वे भी लपककर हमें अपनें अँचरे में दुबका लेतीं। 
हमनें अपने द्वार के उस नीम-वृक्ष को निहारा। उसकी विशालता वैसी ही बनी हुयी है। यह वृक्ष डीह बाबा के चबूतरे को छाँह तो देता ही है, परछावन के लिए आने वाले वर व अन्य सभी लोग इसके छाँव में रस्म अदायगी करते हैं। कभी इसी की छाया तले अजोद्धा (ठाकुर) हमारे और पड़ोसियों के केश कर्तन किया करते थे । हाल ही में वे दिवंगत हो गए। वे भी क्या जिन्दादिल इन्सान थे। जितना अच्छा अस्तूरा फिराते उतना ही अच्छा ढोलक बजाते। मुझे तो उनसे बेहद स्नेह था। वे कभी कभार मलेरिया की टेबलेट भी बांटते थे। इसीलिए अक्सर हम उन्हें डॉक्टर कह दिया करते। यह सम्बोधन सुनकर वे खुश हो जाते। हम जब भी गांव गए, तो आवश्यक न होने पर भी हमनें निखिल-नीतीश का केश-कर्तन उनसे करवाया। बदले में जब हम कुछ पैसे उनके हाथ पर रखना चाहते, तो वे इनकार कर देते- 'ये क्या बाबू! यह खुशनसीबी बार-बार मिलती है?'
'क्यों? बाबा तो पैसे से लेकर अनाज तक जो कुछ देते, रख लिया करते थे, हमसे क्यों नहीं?'
'अरे, अपने बाबा की याद न दिलाएं सरकार। उनकी सानी कहाँ। फिर उस वक्त तो नियमित का काम था। आप तो कभी-कभी आते हैं।'
'फिर भी ले लो, बच्चों को आशीर्वाद मिल जायेगा।' हमारे इस वाक्य के आगे वे नतमस्तक। ठहाका मारते, रूपये हथेली में बंद कर लेते। उनकी पत्नी काफी पहले चल बसी थी, बड़ी सेवा भावी थी। सुना है उनका छोटा पुत्र निर्मल गांव में ही है। मुझसे मिल नहीं पाया। 
वह लड़का दातौन तोड़कर उतर आया है। दो छरका हमें भी दिया है। हमनें पत्तों को अलग कर कइयों दातौन तैयार किए और एक को अपने मुख में ले दतुअन करने लगे। थोड़ा कड़वा लगा, लेकिन मुँह की ताज़गी मञ्जन की ताज़गी से अच्छी लगी।
मौसम ख़राब है, काले-काले बादल छा रहे हैं। पानी गिरेगा क्या? सहसा घाघ की कहावत याद आयी, करिया बादर जिव डेरवावें, भूरा बादल पानी लावें। इस अनुसार तो पानी नहीं बरसेगा। हम सोचे कहीं घूम आवें। तो चलें तहसील गोला। लेकिन पानी टपकने लगा। अरे! घाघ की कहावत गलत होगी का? 
लेकिन चाय पीते कहावत सच हुयी, बूंदाबांदी बंद। हम निखिल के साथ सवेरे गोला के लिए निकल पड़े। मामखोर, बड़गों वाले रस्ते से गोला आए। वहां से सोचे क्यों न ननिहाल चला जाए। तीसों साल हो गए वहां गए। निखिल ने भी हामी भर दी। वह तो कभी नहीं गया है वहां। बच्चों में नयी जगह देखने की ललक होती ही है। 
वहां से उरुआं बाज़ार बहुत दूर नहीं है। सोचे शाम तक लौट आएंगे। फिर भी दरयाफ़्त करने के उद्देश्य से अपने मामा के छोटे सुपुत्र गोरखपुर में रह रहे शासकीय चिकित्सक डॉ. धर्मेन्द्र मणि त्रिपाठी को फोन लगा दिया। वे सुनकर खुश हो गए और बोले कि दूर नहीं है, आप पहुँचिये। हम उरुवां बाज़ार वाले रस्ते बढ़े। हमारे भीतर रोमांच था। तब कितना छोटा था, अम्मा के साथ आता था। नाना जीवित थे तब। मामा-मामी, धूरुप, अशोक, गीता दीदी से लेकर एक बड़ा परिवार। अब तो न नाना हैं न मामा। हमारी अम्मा भी जा ही चुकीं हैं। हाँ, छोटी वाली मामी नेमत हैं अभी। फिर उनका बड़ा-सा कुनबा दिल्ली-लखनऊ से लेकर प्रतापगढ़, बाराबंकी, आगरा, रांची, रीवा, इलाहबाद, हैदराबाद, बंगाल तक फैला है। एक से बढ़कर एक ऑफिसर हैं वहां के लोग। हमारी अम्मा बड़े घर की बेटी थीं, नाज़ों से पलीं। उनकी अम्मा याने हमारी नानी उनके बचपन में ही गुज़र गयीं थीं सो वे पिता और भाइयों के सहारे ही पलीं। 
उरुवां बाज़ार जैसे-जैसे नज़दीक आता हमारा मन बल्लियों उछलता मानो अम्मा साथ लिए जा रही हों। थोड़ी देर बाद सड़क के दोनों किनारों और अनेक जगहों पर खजूर के पेड़ देखने लगे- 'बस आ रहा है उरुआं बाजार निखिल। ये खजूर के पेड़ द्योतक हैं।' फिर हमनें उल्लास में बताया कि इधर खजूर के पेड़ बहुतायत में होते हैं। हमारे उल्लास को निखिल पहिचान गया था। इंजीनियरिंग कर रहा है, इतना समझदार तो हो ही गया है। 'पापा आप बहुत दिन बाद जा रहे हैं न अपने मामा के घर !' वह समझकर बोला था, हमारी तो आँखें भरी जा रही थीं, मामी को उनके उस घर को देखने के लिए जिसमें कभी हम छुपा-छुपौअल का खेल खेला करते थे। साथ नीतीश होता तो क्या खुश होता वह भी। पक्का बोलता, पापा को दादी की बहुत याद आ रही है न ? वह मेरी सम्वेदनावों को खूब समझता है। 
'लो आ गया उरुआं बाजार ! ये देखो निखिल, इधर से रास्ता जाता है मामा के गांव और इस तरफ हम घूमते हुए आ जाया करते थे।' हमनें निखिल को कुछ जगहें दिखाईं। हमारी प्रसन्नता को भांप कर वह भी खुश हो रहा था। हम एक जगह लीची लेने खड़े हुए कि सहसा बिरेन्द्र भैया मोटर साइकिल में दिखे। वे मामा के सुपुत्र हैं। मिलिट्री से अवकाश लेने के बाद घर पर ही रहते हैं। देखते ही रुक गए- 'धर्मेन्द्र ने फोन किया था, आपके आने की सूचना दी थी। लेने चला आया।'
'अरे आप क्यों परेशान हुए, हम घर तो देखे ही हैं। चले आते।'
हम मामा के गांव 'नकौझा' के रस्ते बढ़े। वाह! अब तो पक्की सड़क बन गयी है इधर। कुछ भी कहो, सड़कों के मामले में यहाँ के गावों ने प्रगति जरूर की है। हम जैसे-जैसे आगे बढ़ते पुरानी यादें अनावृत्त होती जातीं। ये देखो यहाँ पीपल का बड़ा-सा पेड़ था, अब नहीं है। वहां दूसरा पीपल उग रहा है। शायद पुत्र है, पिता की याद अक्षुण्ण रखना चाहता है। 'नकौझा' मुड़ने वाला रास्ता आ गया। उसी और मुड़ गया हूँ । कई द्वारों पर चउआ बंधे हैं। कुछ घरों के आहाते में परिवार बैठे हमें कुतूहल से देख रहें हैं, मानो बूझने की कोशिश कर रहे हों कि कौन हैं ये अज़नबी। अभी उतरकर बता दूँ, कि इमिरता देवी का लड़का हूँ, तो मिट्ठा-पानी से नीचे बात न हो। जाने क्यों यहाँ सभी मुझे अपने लग रहे हैं। इन्हीं गलियों में अम्मा दौड़ी-खेलीं होंगी न ? इन्हीं द्वारों पर कई बार किसी काम से आयी होंगी न ? इन्हीं लोगों के अपनापे में वे बड़ी हुयी होंगी और यही लोग या इनके घरों की स्त्रियां उनके विवाह में गीत गायी होंगी, रोते हुए विदा की होंगी।
लो हम मामा के दरवज्जे आ गए। अरे! घर तो पक्का हो गया है। लेकिन नाद वहीं पर है। गाय-भैंसे बंधी हैं। आहते से होते प्रवेश द्वार पहुंचे।  अरे! यह तो नाना की फोटो है, इसे हमनें उस छुटपन में अपने अल्फा कैमरे से खींचा था जो बिना फ्लैश वाला था। तब वे इसी तरह खटिये पर बैठा करते थे। तीसों बरस पहले एक प्रवास के दौरान यह फोटो खींची थी हमनें। उनकी फोटो देखकर श्रद्धा से सिर झुक गया। दरवाजा खटखटाये बिना हम सीधे घर में चले गए। मामी और भाभी गेहूं बीन रही हैं। हम सबको पहिचान गए। लपके पहुंचे और उनके चरणों में झुके। उन्होंने लरज़ती आँखों से हमें गले से लगा लिया। फिर तो खूब बाते हुईं। हमें लगा हमारी बातों में अम्मा, नाना, मामा भी शामिल हों। बिरेन्द्र भैया ने सभी का हाल बताया। हम जब दिल्ली गए थे और छत्तीसगढ़ भवन में रुके थे तब आर के पुरम में रह रहे बोधनाथ भैया के घर कुछ देर के लिए गए थे, वह रोचक प्रसंग उन्हें सुनाया तो सब लोग खुश हुए। घंटे भर में दो बार डट कर नास्ता हुआ। भाभी ने लौकी और प्याज-आलू का पकउडी बनाया था जो हमारी अम्मा भी बनाया करती थीं। लौकी का हमारे स्वास्थ्य पर कितना अच्छा असर होता है यह बिरेन्द्र भैया ने निखिल को बताया। उन्होंने बातों-बातों में रोशनी और प्रकाश में भेद भी बताया। तब तक भाभी ने बड़े-से कटोरे में भरकर चीनी मिलाई मीठी दही ले आईं। उसने इस गर्मी में गज़ब का आनन्द दिया। इसी बीच निखिल दौड़कर उस बोरिंग से हो आया जिसके हौज में हम किलोलें किया करते थे। अब हमने विदा मांगी तो मामी और भाभी रुआंसी हो गईं। रात रुकने का निवेदन किया। हमने समय की दुहाई दी, तो वे क्या बोलें ? सैकड़ों रूपये और कपड़े-लत्ते दे कर नम आँखों से हमारी विदाई कीं। हम निकले तो मानो अम्मा भी साथ हों। रस्ते में मयूरों की जोड़ी खेलती दिखी हमने वह फोटो खींच लिया। पूरे रस्ते निखिल उस मीठी दही की प्रशंसा करते नहीं थका।
वहां से शाम हम अपने गांव पहुंचे तो बनमाली शुक्ल से मुलाकात हुयी। हम साथ पढ़े हैं। उन्हीं के यहाँ गांव का कोटा है। हमसे कहे  कि मिट्टी तेल से लेकर चीनी आदि जिसकी ज़रूरत हो ले जाऊं, लेकिन मैंने सधन्यवाद उन्हें बताया की ये चीजें अभी हैं। उनके यहाँ जनेव है, रुकने के लिए बोले हैं। इसी बीच बिसुनदेव चाचा (विष्णुदेव शुक्ल) मिल गए। कुशलक्षेम पूछे। हम लोगों के समय इन्हीं माननीय के बड़े-से द्वार पर रामलीला होती थी और बबुनंनन चाचा वगैरह आरती की रस्म अदा करते थे। एक बार हम भी लक्ष्मण बने थे, तब विकास ने राम का रोल अदा किया था।
निशागमन हो गया है। चलें ऊषा जी इंतज़ार में होंगी। नीतीश भी उलाहना देगा। लौटा हूँ के रस्ते में अर्जुन बाबा का घर पड़ता है। थोड़ा वहां भी चलकर चाची से मिल लेता हूँ। मुरारी चाचा खटिये पर निस्पृह लेटे हैं, कुल्लू बैठा है देखते ही आवभगत में लगा। चाय बनाकर चाची ले आईं। कैसी हो गयीं हैं वो। जब हरिशंकर चाचा जीवित थे तब क्या रौनक थी उनपर। लेकिन अब का चेहरा देखकर दुःख होता है। पति ही पत्नी का अवलंब होता है। यही दिखा।
घर आ गया हूँ। रात घनेरी हो गयी है। बादल छाये हैं। बारिश होगा लगता है। लो, बूंदाबांदी चालू हो गयी।

Monday, 9 June 2014

                                            वो ७ दिन 

                                                           (३)

 सुबह हुयी, चाय के लिए दूध नहीं मिला। अब बताइये, गांव में दूध किल्लत ! यहाँ हमें अपने कथाकार मित्र की वह कहानी याद आ गयी जिसमें ग्रामीण पृष्ठभूमि के नायक को गाय का दूध पीने को छोड़िये, चढ़ाने तक को ढूंढें नहीं मिलता। यहाँ वह सच दिखा। क्या हो गया है हमारे गांवों को? कहाँ तो हम श्वेत क्रान्ति की बातें करते हैं और कहाँ गांव-गांव में पशुपालन ही ख़त्म हुआ जा रहा है। एक समय वह भी था जब न केवल हमारे वरन आसपास के सारे घरों के द्वार पर गाय-भैंसें बंधी होती थीं बल्कि पड़वे-बाछे इस द्वार से उस द्वार कुँलांचे भरा करते थे। हम उधर तरैना तो इधर महनोइया तक गौवें चराने जाया करते। मुझे अपनी अच्छी डील-डौल वाली वह श्यामा गाय भुलाए नहीं भूलती जो हमें देखते ही नाद छोड़कर रम्भानें लगती। जब कभी उसकी कुकुरौंछी निकालते वह पूंछ उठाती, प्यार से निहारती और हमें चाटने लगती। पोखरे में  उसे नहलाना, सिर पर टीका लगाना, गले में घंटी बांधकर उसे चराने निकलना, क्या यह सब बंद हो गया? कहते हैं चरागाह खत्म हैं, चरी बोई नहीं जाती। जितना पशुओं को खिलाओ उतना निकलता नहीं, उससे तो अच्छा दूध खरीद लो। लेकिन प्रश्न तो यही है कि बाजार में दूध आएगा कहाँ से? यही कारण है कि नकली और अमानक दूध की खपत हो रही है। हमारी ससुराल में तो अच्छा है, इस वार्धक्य में भी हमारे ससुर श्री बलदेव दूबे जी अच्छे नस्ल की जर्सी रखे हैं, बाल्टी भर देती है वह। बेचारे सुबह से शाम उसी में लगे रहते हैं वे। अच्छा है, इससे व्यस्तता तो बनी रहती है, वरना तो वे अपने बड़े भाई श्री श्यामबदन दूबे के चिरनिद्रा में सो जाने के गम को भुला ही नहीं पाते। जब समय पाते हैं उन्हीं की चर्चा छेड़े देते हैं। उनके जाने का गम किसे नहीं है? वे धर्मपरायण सज्जन पुरुष थे, जिधर निकलते लोग श्रद्धा से सिर नवा लेते। ऊषा जी के लिए मुझे प्रथम पसन्द तो उंनने ही किया था। वन्दना और अमिता तो बाद के दूसरे क्रम में आयीं। कई बार मुझसे बतियाते वे इस कदर भावुक हो जाते कि उनकी आंखॉ से मोती गिर पड़ते। अब वे नहीं हैं, द्वार पर हाथ में पत्रा लिए उनकी फोटो लगी है . ऊषा जी आज भी हमें उलाहना देतीं हैं ,'अन्त समय बाबूजी को नहीं दिखाए।'
तो हम दूध की चिंता में थे कि सामने से वह धोबिन निकली जो हमारे घर के कपडे धोया करती थी। हमें देखी तो फूल-सी खिल उठी। 
'कब अईलीं हईं ?' वह उत्साह में थी। 
'काल्हियें त।' मैं भी उस धोबिन को देख मुदित हो गया था। वही तो थी जो अन्दर से लेकर बाहर तक के कपड़े ले जाती और समय पर दे जाती थी। हमारी अम्मा बहुत मानती थीं इसे। भोजन से लेकर साड़ी, उपहार तक देतीं थीं। दोनों का बड़ा हेलमेल था। मुझे वे दिन याद आने लगे। हमने उसे भीतर बुलाया और कुछ रूपए उसके हाथों पर यों ही रख दिए। वह विभोर हो गयी। कुछ देर बाद भुलई के बारी से दूध का जुगाड़ हो गया, लेकिन हमने मना कर दिया। रेड-टी का आनन्द लेंगे। अम्मा होतीं तो ऐसा कभी न होता। 
धोबिन गयी ही है, ६-७ वर्ष का एक बालक आकर प्रणाम किया। पूछने पर बताया कि वह कुल्लू का लड़का है, १ में पढ़ रहा है। बड़ा चञ्चल और भोला दीखता है। इसके बाबा हरिशंकर चाचा बहुत पहले हमारे सामने ही चल बसे थे। उनका एक ही सुपुत्र कुल्लू अब होमगार्ड में पोस्टेड है। गोरखपुर में ड्यूटी है। उसके इस पुत्र को देख हमें खुशी हुई। हमने उससे स्कूल की प्रार्थना पूछी वह करबद्ध हो आँखें बंद कर 'इतनी शक्ति हमें देना दाता…इस तेज़ी व लय से पढ़ दिया के हम चकित रह गये ! कौन होगा जो प्रार्थना याद रखता होगा ? लेकिन यह बालक! हमने उसकी पीठ ठोंकी और खाने को मिठाई दी, वह खुश होकर हमें देखा जैसे उसका मास्टर होऊं। इसी बीच मुन्ना भैया(पोस्टमास्टर) निकले हमने खड़े होकर उन्हें प्रणाम किया। पं प्रतापनारायण मिश्र युवा सम्मान लखनऊ मिलने के बाद इस गांव में भी जब हमारा सम्मान हुआ था तब उनके पिता विशेष रूप से मुझे आशीर्वाद देने आये थे। उनसे राम-रहारी हुयी, फिर तो अनेकों लोग आते गए और हम सबसे नया-पुरान हुए। 
सन्ध्या को हम खेतवानी को निकले। पोखरा पर पहुंचे अपने खेतों दो देखा। अभी तो गर्मी है, खेत जोते नहीं गए हैं। गेहूं की फसल कट गयी है। वहां अब धान बोया जायेगा। इस खेत में कभी हम सिर पर खाँची रखकर खाद फेंकने आया करते थे। हमने यहाँ चने की फसल अपने हाथों काटी है, खूंटी भी उखाड़ी है। गेहूं के बोझ भी ढोए हैं और हेंगा की सवारी भी की है। लेकिन अब वह सब कहाँ ? अब तो सब मशीनें कर रहीं हैं। 
वहां से शिवल्ला होते घर जाने को निकले तो रस्ते में अनिल भैया के यहाँ मज़मा लगा था। वही अनिल भैया जिनका इकलौता सुपुत्र हमारा प्यारा सोनू आजकल दिल्ली में हिंदुस्तान टाइम्स ग्रुप में अपने जलवे दिखा रहा है। वे देखते ही हमें पुकार लगाए, हमने बाइक रोकी, जाकर उनका प्रणाम किया। वहां कैलाश, कुल्लू, राजेश वगैरह बैठे थे। अनिल भैया अपने अंदाज़ में बोले - क्या मीडिया में हो यार ! यहाँ गो-हत्या हो गयी और किसी पेपर वाले को फुर्सत नहीं ?'
'क्या हुआ ?' हम चकित थे। 
'तुम नहीं जानते ?'
'नहीं तो।'
'अरे सिकन्दरा एक बाछे को खिला-खिला कर मार डाला, हमने इसकी सूचना थाने से लेकर पेपर वालों तक को दी किन्तु कहीं से सुनवाई नहीं हुयी।' वहां उपस्थित सब लोगों ने एक साथ बताया। 
'कितनी देर हुयी ?' हमने पूछा। 
'दो घंटे पहले की।'
'गांव का मामला है। पुलिस को आने में समय तो लगेगा ही।'
तब तक एक बाइक में दो पोलिस वाले आते दिखे। सब चुप हो गए। पता चला वे आरोपी को ले गए।
हम घर आये तो पता चला कि श्रीमती जी से लेकर दोनों बच्चे गोलगप्पे लेकर रखे हैं! मैगी भी आएगा। शहरी संस्कृति यहाँ भी पसरने लगी है। हमने गोलगप्पे न खाया। हमें तो अम्मा की बनाई वह पकउड़ी याद आ रही है जो वह अपने हाथों से हमें खिलाया करतीं थीं। बेसन,प्याज, मिर्चादि से वेस्टित वह पकउड़ी चाय के साथ अम्मा के साथ खाकर हम बच्चे बन जाया करते थे। अम्मा! अब कभी न खिलाओगी अपने हाथों से वह पकउड़ी ? आह! अम्मा,सो न सकेंगे हम तुम्हारे बिना।

 

Sunday, 8 June 2014

                                           वो ७ दिन 

                                                           (2)

 पंछी कलरव कर रहे हैं। मयूरों के पैंकों-पैंकों की ध्वनि गुञ्जित हो रही है। पपीहे भी पी कहाँ, पी कहाँ की टेर  लगा रहे हैं। हम निद्रा में लीन हैं। कानों में इन मधुर संगीत-लहरियों ने मानो हौले से कहा- 'आँखें खोलो, भोर हो गयी।'
हमने नेत्रों की बैटरी चालू कर दी। आहा ! क्या नज़ारा है! बगल के आमों के सघन वृक्ष, बेल, नींबू, नीम आदि के पेड़-पौधों पर खिली हरियाली ने मन मोह लिया। हम बिस्तर से उठ बैठे। वातावरण अत्यन्त सुरम्य व मोहित करने वाला था। निराला-पन्त की कवितायेँ मस्तिष्क में घूमने लगीं। प्रकृति के इन रूपों को देखकर ही उनकी कविताएं फूट पड़ती होंगी। प्राची में लालिमा का फैलाव होने लगा और हम अपने गांव जाने की तैयारी में लगे। नल के ताज़े पाने की फुहार में नहाने के बाद चाय-नाश्ता के लिए बैठा तो हमारे चचेरे मंझले साले डॉ. सतीश दूबे, उनसे छोटे विनय दूबे व उनके बच्चों से मुलाकात हुयी। पता चला कि सृष्टि जेईई में अच्छा रैंक लायी है, उसका का चयन एनआईटी में तय है। खुशी हुयी, सतीश भैया स्वयं शासकीय चिकित्सक हैं, बेटी इंजीनियर हो जाएगी। उनके बड़े भाई श्री प्रकाश चन्द्र दूबे बड़हलगंज कॉलेज में गणित के प्रोफ़ेसर हैं, उनकी बिटिया दीपू डॉक्टरी की तैयारी कर ही रही है, बड़ी वाली मोनू संगीत में महारत हासिल कर चुकी है। उधर आनन्द जी का सुपुत्र अवनीश और हर्ष गज़ब का चित्र बनाते हैं भई ! दोनों हमारे फेसबुक मित्र हैं, छोटा हर्ष मुझसे चेटिंग तो खूब करता है किन्तु यहाँ चुप था। शायद शरमा रहा था। तो कितना अच्छा लगता है न एक ही घर में गणित, विज्ञान, कला, संगीत का संगम। 
बच्चे तैयार हो गए थे। हमारे साले श्री हरिकेश दूबे ने गांव जाने के लिए अपनी बाइक दे दी, यह कहकर कि आप जब तक रहें अपने पास रखें। यह बड़ी सुविधा थी। हम राउतपार से प्रस्थान किये तो कहला होते हुए हाटा बाजार पहुंचे। हाटा बाजार मेरे लिए सदैव आकर्षण का केन्द्र रहा है. यही वह जगह है जहाँ कभी अम्मा सूत कातकर देती थी और हम खादी ग्रामोद्योग में बेचने आया करते थे। तब मेरी उम्र ७-८ रही होगी। इस छुटपन में ३ किलोमीटर के करीब जाकर सूत बेचकर आने में चाहे नन्हें-नन्हें पांव थक जाते हों किन्तु सूत के बदले फुटकर मिले पैसे अम्मा के हाथों में रखने की ललक में जो उत्साह होता मानो क़दमों में खरगोश के पैर बांध देते। दौड़ते-झूमते जाते और लपकते-झपकते आते। लेकिन तब रस्ते में कुछ जगहों पर सघन वृक्षों के समूह पड़ते जहाँ पहुँचते ही हमारे प्राण सूख जाते। लाला की बारी में एक मक़बरा था उसे देखते ही कलेजा सूख जाता। सूनसान हो तो दिल निकलने को हो आता। नउवा की बारी के आम-कटहल के वृक्ष भयावह लगते। हाँ, चेड़वारी में बंगाली चाचा की बोरिंग पर बना छोटा सा कमरा जरूर थोड़ा सुकून देता, लेकिन डर यहाँ भी कम नहीं लगता। अपने एक बाल उपन्यास में हमने इसकी चर्चा की है।  
तो हाटा बाज़ार में हम दुर्गा मंदिर के सामने खड़े हैं। यही वह मंदिर है जहाँ ऊपर वाले पूजा कक्ष के सामने बरामदे में हमारे विवाह का प्रसंग हुआ था। यहीं हमारी ससुराल की स्त्रियां हमें देखने आतीं और अंततः ऊषा जी के लिए हमें पसंद कर लीं। हम मंदिर को देख रहे हैं, बगल में मेवा का होटल है। ज़माने से वह इस दूकान में मिठाइयों से लेकर समोसे, जलेबियाँ, भजिया आदि से लेकर चाय तक मिलते हैं, भीड़ लगी रहती है। हमारे ही गांव के बनिया हैं मेवा। सोचा फिर आकर इनकी दूकान में जायका ताज़ा किया जायेगा। यहाँ से हम पक्की सड़क से गांव की और बढ़े। भीटीं के बाद मोड़ से पालम बाबा का थान दिखाई देने लगा। रोमांच हो आया। यहीं हमारी प्राइमरी की क्लास लगती थी। बचपन के पुराने दिन याद आ गए। वो मुन्ना, चुन्ना, पप्पू, कैलाश, सच्चिता, दिनेश, बूटी, सुरसतिया, बिंदू, दशरथ, बलिराम, नंदू, कृपाल, बनमाली,सुनील, सुशील, बृजेश से लेकर अनेकों नाम हैं जो जेहन में घूम रहे हैं के साथ खेलना-पढ़ना सब-कुछ मानो फिर सामने हो। अब बिल्डिंग नयी बन गयी है। तब एक पुरानी बिल्डिंग को क्रेन की बजाय हाथी से गिरवाया गया था। हम तालियां बजते देखते रहे थे।
हम आगे बढे तो चेडवारी आयी, उसकी रौनक गायब थी ! वृक्षों की सघनता का भी लोप हो गया है। गांव पहुंच गए। आह! अम्मा कहाँ हो तुम ? घर में ताला है। तुम तो दौड़कर धार चढाने आती थीं। अब तो सब सूना-सूना है। सामने डीह बाबा को प्रणिपात कर हम ताला खोले मानो अम्मा सामने हों और खिलखिलाकर हमारा स्वागत कर रही हों। हमारी आँखें दरों-दीवारों पर भी अम्मा की छवि देख रही थीं। वे हमारे नयनों को भीगने से रोक रही हैं।

Friday, 6 June 2014

                                           वो ७ दिन 

                                                           (१)

दुर्ग रेलवे स्टेशन से हम गोरखपुर एक्सप्रेस में बैठे और अगले दिन मऊ जंक्शन पर शाम ८  बजे उतर गए। अँधेरा पसर गया था। बाहर निकलकर रिक्शा लिए और बस अड्डे के लिए निकले तो रिक्शे वाले ने हमारे बच्चों को जो पैदल ही चलना चाहते थे उन्हें भी पीछे टांग लिया। उसकी यह सहृदयता मुझे भा गयी। वह कमज़ोर था। बच्चे बैठते क्या, बीच-बीच में ठेलकर रिक्शेवाले की मदद करते चलते। कुछ फर्लांग पर ही बस अड्डा है, वहां पहुँच कर हमने बिन पूछे ही उसके हाथ में २० का नोट रख दिया।
अब बड़हलगंज तक जाने वाली बस की तलाश थी। घंटे भर बाद सोनौली जाने वाली एक बस आयी तो ठसाठस! लेकिन निखिल ने उसमें चढ़कर मऊ उतरने वाले यात्रियों की जगह हम सबके लिए सीट का जुगाड़ कर दिया था। बस में तिल रखने की जगह न थी लेकिन हम बैठ गए थे, बगल बैठे एक यात्री ने पूछा, 'कहाँ जाना है ?'
' ग्राम खखाईजखोर।'
सुनते ही वह पैर छू कर प्रणाम किया, ' हमें भी बड़हलगंज जाना है। वहां कपडे और ज्वेलरी की दूकान है हमारी। यहाँ मऊ में बेटी का रिश्ता देखने आये थे। आप लोग तो पूज्य हैं हमारे।' उसने हमारे गांव की महिमा गायी। सुनकर गर्व हुआ। लेकिन जब उसने यह कहा कि ' अब वहां भी लोगों का आचार-विचार भ्रष्ट हुआ जा रहा है। तो शर्मिंदगी हुयी कि वाक़ई हम कहाँ थे और कहाँ आ गए। उसने बताया कि उसका नाम मोहनजी है और वह संगम टॉकीज के पास रहता है और किसी मंदिर का प्रबंधक है। उसका अनुभव अच्छा है। बड़हलगंज तब और अब पर बहुत बातें हुईं। हम छुटपन में अम्मा के साथ रथयात्रा का मेला देखने जाते थे बड़हलगंज। सरयू में किलोलें करना, मेले में अम्मा से जिद्द कर डमरू-पिपिहिड़ी खरीदना। चटखारे ले-लेकर कचालू का स्वाद लेना, इधर-उधर भागने पर अम्मा की डपट खाना। कितनी तो यादें हैं बड़हलगंज को लेकर। कई दिनों तक रौनक रहती थी तब। मोहनजी ने बताया कि वह रौनक अब कहाँ ? अब तो औपचारिकताएं ही शेष हैं, वही निभ जाए बहुत है। तब तो हमारी दूकानों तक चबूतरे पर रेल-पेल मची रहती थी, भगाने पर भी लोग जमे रहते थे। जमाल मियाँ तक आवभगत में लगे रहते। अब सब काफूर है। उनने यह भी बताया कि कैसे खेती-किसानी चौपट हो रही है और नौजवान वर्ग नशे का शिकार हो रहा है।
बस धीरे चाल में थी, पसीने से थकबक लोग ड्राइवर पर तंज कस रहे थे। वे क्या जाने अतिरिक्त बोझ होता क्या है। दो घंटे बाद तकरीबन दस के आसपास हम बड़हलगंज पहुँच गए । वहां से हमारे ग्राम खखाईजखोर तक जाना टेढ़ी खीर था. कारण कि सड़क से तीन किलोमीटर भीतर था हमारा गांव। कैसे जाते? सोचे, चलो ससुराल चल देते हैं। वह तो सड़क पर ही है, रात बिताकर सुबह गांव चल देंगे।
तो उसी बस से आगे बढ़े और उतर गए राउतपार चौराहा। वहां हमारे साले हरिकेशजी बाइक लिए इंतज़ार करते मिले। ११ बज गए थे। बाइक पर लदफंद कर हम ससुराल पहुंचे तो सास-ससुर से लेकर सारा परिवार इंतज़ार करता मिला। हमें अपना गांव याद आया जहाँ आधी रात को भी हम ऑटो लेकर चले जाया करते थे, तब अम्मा-बाबूजी थे, दरवाजा खोलते थे, बाँहों में भर लेते थे। लेकिन अब दोनों नहीं हैं। घर पर ताला है, कौन करता स्वागत ? खैर, ससुराल में रात को भोजन कर विश्राम में चले गए। यहाँ भी मच्छर कम नहीं हैं, मच्छरदानी थी, मज़े की नींद आ गयी।   

Saturday, 21 December 2013

                                                  सपूत 

     उसकी नींद देर से खुली। 
     अरे ! झाड़ू-बुहारा हो गया, पोछा भी लग गया। पीछे बर्तन खनक रहे हैं। कौन कर रहा है यह सब !
     वह तेज़ी-से पीछे पहुँची,
     उसका दस बरस का बेटा तल्लीनता से बर्तन मांज रहा है-
     "आपकी तबीयत अच्छी नहीं है, फिर भी आपने हम लोगों को रात में कराहते हुए खाना बना कर खिलाया, क्या मैं इस लायक भी नहीं, कि घर के छोटे-मोटे काम कर सकूं ?"
     वह लपक कर बेटे को गोद में भर ली। उसकी आँखों से आंसुओं की धार फूट पड़ी मानो कह रही हो, "किस बेटी से कम है मेरा यह सपूत।"
                                                        
                                                                                            शिवनाथ शुक्ल 
                                                                                             

Sunday, 15 December 2013

विश्व भ्रमण पर निकले नेपाली पत्रकारों का प्रेस क्लब में स्वागत 

नेपाल से विश्व भ्रमण पर निकले दो युवा पत्रकार नारायण प्रसाद भट्टराई और नवराज भट्टराई छत्तीसगढ़ प्रवास के दौरान आज भिलाई पहुंचे। उन्होंने प्रेस क्लब भवन पहुंच कर पत्रकारों से मुलाकात की व एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में उपस्थित होकर गतिविधियों का भी अवलोकन किया। प्रेस क्लब अध्यक्ष शिवनाथ शुक्ल ने प्रेस क्लब में दोनों नेपाली युवा पत्रकारों का अभिनंदन करते हुए कहा कि विश्व भ्रमण पर निकले इन पत्रकारों के शोध-अध्ययन से अंतरराष्ट्रीय पत्रकारिता को एक नयी दिशा व दशा मिलेगी। दुनिया में पत्रकारिता ने जो क्रांतिकारी मुकाम हासिल किया है वह इन जैसे प्रतिबद्ध पत्रकारों के साहस व बौद्धिकता की बदौलत ही सम्भव हो सका है। नवराज भट्टराई ने भिलाई प्रेस क्लब के गतिविधयों की सराहना करते हुए कहा कि यहाँ का प्रेस कांफ्रेंस देखकर सुखद अनुभूति हुयी। उन्होंने भिलाई के पत्रकारों के ज्ञान की भी तारीफ की, कहा कि यहाँ के पत्रकार समाज पर पैनी नज़र रखते हैं। दूसरे पत्रकार नारायण प्रसाद भट्टराई ने कहा कि नेपाल और भारत की सांस्कृतिक विरासत लगभग एक है। आजकल यू ट्यूब और फेसबुक में आगामी दुनिया को खोजने वाले भिलाई के युवाओं का आचरण व उनकी भाषा शैली काफी हद तक यहाँ के संस्कृति से परे नहीं है। हम भारत का आदर और सम्मान करते हैं। भिलाई प्रेस क्लब ने जो हमारा सम्मान किया है उसे हम भूल नहीं सकते। भिलाई के बाद वे आंध्र की और रवाना होंगे। इस अवसर पर प्रेस क्लब उपाध्यक्ष अनिल गुप्ता व संजय पांडेय ने स्मृति चिन्ह देकर दोनों पत्रकारों का सम्मान किया। प्रेस क्लब के कार्यालय सचिव राजेश अग्रवाल, पत्रकार सूरज सिंह, विकास मिश्रा, रवि डहाट, सुरेन्द्र सिंह विराट, तनवीर अहमद, सुरेन्द्र साहू, हरजिंदर सिंह, सीमान्त कश्यप आदि उपस्थित थे।         

Friday, 13 December 2013

                                  उसकी रक्षा करना 

     उत्तर प्रदेश का रेलवे स्टेशन, देवरिया सदर। हाड़ कंपाने वाली ठिठुरन, धुंधलका हो गया है।
हम टिकट खिड़की के सामने लगी लम्बी कतार में अपनी बारी की प्रतीक्षा कर रहे हैं, कि सहसा लक्षित हुआ, एक महिला अपने छोटे-से बच्चे को गोद में दुबकाये इधर-उधर ताक रही है. उसके बदन पर एक मोटे सूती की साड़ी लिपटी थी, बगल में एक छोटी-सी पोटली रखी थी। उसके केश अस्त-व्यस्त थे, आँखों के भाव बताते थे कि वह किसी पीड़ा में है। सभी यात्री अपने में मस्त। हमसे रहा न गया। सामने खड़े यात्री से अपने स्थान को देख़ने का निवेदन कर तत्क्षण उस महिला के पास पहुंच गए। उसने दीन नेत्रों से हमारी ओर देखा मानो कह रही हो, मुझसे मेरा हाल पूछ लो -
     "कहाँ जाना है ?" हमने उत्सुकता-से पूछा।
     "बनारस।"  उसके जवाब में पीड़ा के भाव थे।
     "तो टिकट कटाओ, रेल आ रही है, बैठ जाओ।"
     " कैसे कटायें, किसी ने हमारा थैला उठा लिया, उसी में भाड़े के रूपये थे। अभी हमारे पास एक पैसा नहीं है, बिना टिकट कैसे जाएँ ?" उसकी आँखें भर आयीं।
     देवरिया से बनारस का टिकट बहुत ज्यादा नहीं है, सोचा मदद की जा सकती है।
लेकिन सहसा विचार कौंधा, जो झूठ बोल रही हो तो ? इसके पहले कुछ वाक्यात ऐसे हुए हैं जिनने हमारे विश्वास को ठेस पहुँचायें है। वो इंदौरी आज भी हमें नहीं भूलता। कैसे भिलाई में हाईवे कैंटीन में डोसा आते ही वह हमारे सामने आ बैठा था। १० साल पाहिले का वह एक-एक दृश्य याद है हमें - आते ही खींसे निपोरता नमस्कार किया था। बेपूछे ही बोलने लगा, " इंदौर जाना है हमें, कलकत्ता से आ रहे थे, यहीं उतरे कि किसी ने जेब काट लिया। उसी में टिकट था और पैसे भी।"
     दिखने में वह हैंडसम किसी ऑफिसर से कम न लगता था। गोरा लम्बा। उसने बताया, वह इंदौर के नौलखा में रहता है। कुछ रुपये मिल जाते तो वह पहुंचकर मनिआर्डर से वापस कर देता। 
     अब क्या करें ? माता-पिता से लेकर पढ़ाई-लिखाई से सीख यही मिली, कि खुद भूखे रह जाओ, सामने वाले को भूखा न रखो। रंतिदेव, उशीनर, कर्ण, दधीचि से लेकर हमारे पुराणों में अनेकों उदाहरण भरे पड़े हैं जिनने परहित पर स्वहित को न्योछावर कर दिया। तो अपन तो उनके पासंग भी नहीं बन सकते लिहाजा हमारी जेब में डोसे के पैसे के अतिरिक्त १५० रुपये थे।
     पहले तो हमने उसे डोसा खिलाया, फिर १०० रुपये थमाते बोले, "बस यही है, और कुछ तो नहीं लेकिन यहाँ से इंदौर तक का भाड़ा हो जायेगा। वह थोड़ा उदास हुआ मानो इतने से संतुष्ट नहीं, फिर भी लिया और हमारे घर का पता पूछ चलता बना।
     घटना को आठ वर्ष बीत गए हम भूल चुके थे कि सहसा एक दिन वही व्यक्ति बड़े सवेरे घर आया ! हम तो उसे भूल चुके थे। उसने पुरानी घटना का हवाला देते हुए अपना परिचय दिया तो हम गदगद, कि चलो देर से सही पैसे वापिस करने आया तो, मनुष्यता मरी नहीं है। 
     उसने रोनी सूरत बनाते हुए वही कहा जो आठ वर्ष पहले हाईवे कैंटीन के उस टेबल पर कहा था। यही, कि उसकी जेब कट गयी है, इंदौर तक के टिकट कि व्यस्था कर दीजिये, पहुंचते ही मनीआर्डर कर दूंगा। कोई और होता तो शायद उसे टका-सा जवाब दे देता, किन्तु जाने क्या था उसकी बातों में, कि हम इंकार न कर सके। १०० रुपये दे दिए, उसने कहा, नौलखा पहुंचते ही वह रिटर्न भेज देगा।
आज इतने बरस बीत गए कहीं कुछ नहीं, हम तो नौलखा भी नहीं जानते कहाँ है।
     बहरहाल, हम बात कर रहे थे देवरिया सदर रेल्वे स्टेशन की-
     तो उस गरीबन-सी लगाने वाली महिला के दीन लहज़े ने हमारे मुख से वाक्य निकाला- "कोई बात नहीं हम टिकट कटा देते हैं, निकल चलो ; बनारस में करती क्या हो ?"
     "ईंट भट्ठा में मज़दूरी।" वह दुखी थी।
     हम लाइन में वापिस आये, अपने साथ ही उसके लिए बनारस की टिकट खरीदी, उसे जेब में रखा और उसके पास आ गये। कुछ ही देर में रेलगाड़ी आयी, जनरल बोगी में भीड़ नहीं थी, हम चढ़ कर एक सीट पर साथ बैठ गए।
     हमारे पास गरम कम्बल था, भारी ठंड की वजह से हमने उसे पांव से लेकर सिर तक ओढ़ लिया। ट्रेन इन्दारा जंक्शन पार की, तो हमने महसूस किया, कि महिला सर्दी से ठिठुरी जा रही है और उसका बालक उसकी छाती से और दुबका जा रहा है मानो वहाँ से उसे और गर्मी की तलाश हो।
     हमसे देखा न गया, हमने बेसोचेसमझे अपने कम्बल के आगोश में उस महिला को ले लिया। मानो सर्दी ने उसे कोई भी प्रतिक्रिया करने से मना कर दिया हो। वह चुप मार कर कम्बल में दुबक गई। मऊनाथ भंजन से ट्रेन आगे बढ़ी और ठंढ ने अपना शिकंजा और कसा तो वह दुबक कर हमारी देह में समाने लगी ! अब हम का करें ! स्त्री-पुरुष के दैहिक मिलन की गर्माहट के बीच हमारे मन में हाहाकार मचा था, उस मज़दूरन की दीन दशा.. एक ओढ़ना तक नहीं। वह निर्बंध थी, हम सागर में द्वीप की भांति मर्यादा में बंधे धीरे-धीरे कम्बल से विलग हुए जा रहे थे। वह छोटा, प्यारा-सा बालक माँ की छाती छोड़ कम्बल में एक ओर दुबक गया था। दोनों सो रहे थे, सुख-चैन की नींद। भारी ठंढ ने हमारी नींद छीन ली थी।
     बनारस आया, हमने झिंझोड़ कर उसे जगाया। वह हड़बड़ा कर उठी और बच्चे को लेकर खड़ी हो गयी। उसने बड़ी आत्मीयता से हमें निहारा, उसकी आँखों में कृतज्ञता के भाव थे। उस बालक की आँखें भी हमें नेह से देख रहीं थीं। प्यार, प्यार को पहचान जाता है।
"कम्बल लेती जाओ।" हमने कहा तो वह शरमा गयी।  
"नहीं-नहीं, यहीं घर है, आप खुशी से जाएँ। यह अहसान कभी न भूलूंगी।" उसकी आँखें सजल हो गयीं।ट्रेन ने सीटी दी, वह जल्दी में उतरी।
ट्रेन भागी जा रही है। सर्दी और बढ़ गयी है। हमने कम्बल ओढ़ा, "अब तान कर सोते हैं, इस नामुराद ठंढ ने तो अब तक हमारी नींद ही छीन रखी थी।"
सहसा हाथ जेब में गया- अरे ! उसकी टिकट तो हमारे ही पास रह गयी ! अब वह बेचारी रेलवे स्टेशन का मुख्य द्वार कैसे पार करेगी ? टी टी तो उसे परेशान करके रख देगा, मुमकिन है कुछ ग़लत.. यह कैसी ग़लती हो गयी  मुझसे।
कम्बल पूरा ओढ़ लिया हूँ गर्माहट आ गयी है, लेकिन उसकी परेशानी की सोच ने एक बार फिर नींद छीन लिया है। भगवान! उसकी रक्षा करना।  

                                                                                                     शिवनाथ शुक्ल
                                                                                    लिंक रोड, कैंप-२ भिलाई (छत्तीसगढ़ ) 
                                                                                              मो० - 7804991692