Wednesday, 28 July 2021

(8) बड़ी सुबह दीदी जाग गई हैंं। नौ बजे तक बोरीवली पहुंच जाना है। बेड टी तैयार हुई। जब तक वे लोग चाय लें हम तैयार होने लगे। लगगभग 8 बजे बोरीवली लिए निकल लिए। टैक्सी से किंग्स सर्कल रेलवेे स्टेशन पहुंचे। वहां टिकिट खिड़की गए तो पता चला टिकिट उन्हीं को मिलेगा जो कामकाजी हैं। सन्नी ने अपना आईडी दिखाया तो उन्हें टिकिट मिल गयी। हमने भी अपना प्रेस आईकार्ड दिखाया तो टिकिट देने वालीं मोहतरमा ने कहा कि "यह छत्तीसगढ़ का है, यहां महाराष्ट्र में नहीं चलेगा।" हमने उन्हें अपने आने का प्रयोजन बताया किन्तु वे तैयार न हुईं। कहने लगीं "नहीं तो नहीं!" हम जाकर स्टेशन मास्टर से मिले कि "हम पत्रकार हैं और काम से जा रहे हैं। फिर आपके प्रदेश में एक तरह से अतिथि हैं। क्या अतिथियों के साथ ऐसे ही व्यवहार होता है महाराष्ट्र में?" वे सकपका गए और टिकिट दिलवा दी। इस सद्व्यवहार से हम स्टेशन मास्टर के कायल हुए कि नहीं इंसानियत मरी नहीं है। उन्हें धन्यवाद दे हम निकले ही कि बोरीवली के लिए फास्ट लोकल चिघ्घाड़ती हुई प्लेटफार्म पर खड़ी हो गई। खाली थी। हम आराम से सीट पर बैठ गए। कुछ ही मिनटों मेंं बोरीवली उतर गए। वहां से कार द्वारा कार्यक्रम स्थल। बड़ा सुन्दर कार्यक्रम निबटा। कार्यक्रम पश्चात हम बोरीवली पाण्डेयजी के घर चले गए| दीदी, सन्नी और निखिल के साथ अपने घर निकल गईं। बोरीवली पहुंचे तो अंधेरा पसर चुका था। बिन्दू दीदी ने रसोई तैयार किया। हम लोग सामूहिक भोजन किए और सो गए। चौथी मंजिले पर फ्लैट के कमरे में हम सोए थे कि खिड़की से कांव-कांव की ध्वनि सुनाई दी। शायद कौवा जगा रहा था। नींद खुल गई। देखे तो झींसा पड़ रहा था और कुछ पक्षी उड़ रहे थे। दृश्य बड़ा खूबसूरत था। उठ बैठे। तब तक उधर भी चहल-पहल शुरू हो गई थी। हम नहाने चले गए। सुनीता और उनके पतिदेव बैठे थे। कुछ देर में निखिल और आशीष भी जाग गए। बिन्दू दीदी ने दूध में सेब घिस कर मिलाया है और वही लाकर दीं पीने को। सौम्या और आयांश खेल रहे हैं। पांडेयजी अपने कारोबार के सिलसिले में फोन पर व्यस्त हैं। बारिश हो रही है तो कहीं घूमने भी नहीं जा सकते। सोफे पर पसर गए। मन नहीं लगा तो आशीष बाबू से कोई किताब मांगे। उनने अपनी आलमारी से निबन्धों का संग्रह लाकर थमा दिया। एक-दो निबंध पढ़े। तब बिन्दू दीदी भोजन परोस दीं। बड़ा स्वादिष्ट भोजन था। रसास्वादन किए और नीचे घूमने निकल गए। लौटे तो बिन्दू दीदी सेब काट कर लायीं। खा लिए। वे और ऊषाजी बड़े दिनों बाद मिली हैं तो अपने नैहर की खूब बातें कर रही हैं। भूली बिसरी। उसी में बाबूजी-काका और दादा की मृत्यु का विलाप भी है। रिंकू की कमी खल रही है। वह अपनी ससुराल में है। होती तो जरूर हमारे लिए फ्रैंकी या दोसा नहीं तो और कोई व्यंजन जरूर ले आती। रिंकू के खुशहाल जीवन की प्रार्थना के साथ हम उसे याद करते हैं। रात हो गई है और भोजन आ गया है। समय बड़ा तेजी से पास हो रहा है। कल हमें भिलाई के लिए ट्रेन पकडऩी है। भोजनोपरान्त हम दूध पीकर सो जाते हैं। सुबह उठते हैं| नहा-धोकर नाश्ता किए और छोटी दीदी के घर निकलने की तैयारी करने लगे। दोपहर बाद बोरीवली से हमारी विदाई हो गई। आशीष बाबू ने ओला बुक कर दिया है। वे हमारी सुविधा का इतना ख्याल रखते हैं कि कभी ट्रेन से नहीं जाने देते। हर बार ओला बुक कर उसी से भेजते हैं और पैसे देकर ड्राइवर को ताकीद करते हैं कि "एक पग भी पैदल न चलने देना मौसाजी को। घर के बिल्कुल समीप उतारना।" हम कहते हैं कि "ट्रेन से चल देंगे" किन्तु वे नहीं मानते। ओला आती है। बिन्दू दीदी और आशीष टैक्सी तक छोडऩे आए हैं। हल्की बारिश हो रही है। बिन्दू दीदी हमें जाने नहीं देना चाहतीं, हम भी कहां चाह रहे हैं? ऊषाजी को देखते हैं उनकी आंखें भरी जा रही हैं अपनी दीदी को देखकर। बहिन का बिछडऩा कम नहीं अखरता। फिर बिन्दू दीदी उन्हें अपने बच्चों जैसा पाली-पोसी हैं। ऊषाजी में वे अपनी बच्ची की छवि देखती हैंं। तभी तो बार-बार अंकवारी में भर लेती हैं। खोइंछा देते समय भी आशीर्वादोंं से आंचल भर दी थीं वे। टैक्सी आई तो दोनों बहिने एक दूसरे से लिपट रो पड़ीं। हमारी आंखें भी सजल थीं। आशीष बाबू ने भी भरे हृदय से हमारे चरण छुए और टैक्सी का दरवाजा खोल दिया। हम बिन्दू दीदी के चरणों में झुके तो उन्होंने हमें पकड़ लिया। उनकी सजल आंखें मानो बोल रही थीं, "बाबू, भूल-चूक माफ, सपरिवार फिर जल्द ही आइए। आप लोगों के आने से बहुत अच्छा लगा।" हम ऊषाजी के साथ कार में बन्द हो गए हैंं। बाहर सड़क भीग रही है और भीतर हृदय! टैक्सी चल दी है.. क्रमश:- 9

Tuesday, 27 July 2021

(7) रसोई में आवाज सुन नींद खुल गई। देखा तो दीदी चाय पका रही थीं। याने सुबह हो गई है और इन लोगोंं के बेड टी का टाइम हो गया है। हम तो बेड टी के आदी नहीं। जीजा और दीदी ने चाय पी तब तक पानी खुल गया। हम फारिग हुए और अखबार पढऩे लगे। पुराना अखबार था लेकिन एडिटोरियल पर एक स्टोरी मिल गयी थी और स्टोरी कहां पुरानी होती है। उसी को लगे पढऩे। तब तक बाबू शुभम नीचे जाकर गरमागरम मसाला दोसा, इडली सांबर लेकर आ गए। नाश्ता हुआ। तब तक दिलीप जीजा आ गए ड्यूटी से। उनसे बातचीत करने लगे तो एक घंटा कट गया। दीदी ने आम काट दिया। दो-एक फांकी खाए और बातचीत करते रहे कि दोपहर हो गयी। दीदी ने भोजन परोस दिया। चावल-दाल, रोटी-सब्जी बहुत ही स्वादिष्ट। भोजन पश्चात थोड़ा विश्राम किए और फिर अपराह्न बेला में जीजा से बौद्धिक चर्चा होने लगी। उनके पास तो ज्ञान और अनुभव का भंंडार है। माक्र्सवाद से लेकर राष्ट्रवाद तक की बारीकियों पर चर्चा हुई। उनसे बात करो तो कई विमर्श परत-दर-परत खुलने लगते हैं। अरस्तू और प्लेटो से लेकर नेपोलियन तक का दृष्टान्त! सोचे, चलें थोड़ा बाहर घूम आएं, लेकिन बारिश होने लगी है। फिर बैठे तो दीदी ने अनार लाकर रख दिया। अनार को छीले और जीजा को खाने को दिए। अपने भी एक अनार का स्वाद लिए। फलों में अनार और सन्तरे का कोई जवाब नहीं। वैसे फल तो सभी स्वास्थ्यवर्धक होते हैं लेकिन जो चीज अनार और सन्तरे में है, वह और फलों में कहां? पेट भरना हो तो केला या सेब खा लीजिए लेकिन अनार और सन्तरे आप के पेट चाहे न भरें लेकिन पौष्टिकता भरपूर देंगे। तो अनार खाकर हम बरामदे में पहुंचे और वहां लेटे दिलीप जीजा से चुहल करने लगे। शाम की चाय तैयार हो रही है लेकिन अपुन को चाय से कोई मतलब नहीं। बस बातों का ही खजाना है जिसे भरते रहे और खाली करते रहे। रात हो गई है। बारिश चालू है। भोजन करते हैं और सो जाते हैं। सुबह बोरीवली की तैयारी करनी है। ऊषाजी और निखिल वहीं हैं। ऊषाजी अपनी बड़ी बहिन से भूली बिसरी बातें करने में मशगूल होंगी। दोनों बहिनें बड़े दिनों बाद मिली हैं। विचार करते-करते नींद लग जाती है। क्रमश:- 8 ०००००

Monday, 26 July 2021

(6) लीजिए, बातों-ही-बातों में समय कब निकल गया और घड़ी सुई नौ पर चली गई पता ही न चला। अब दीदी चलीं भोजन बनाने। हमने शुभम बाबू से कुछ पुस्तकें मांगीं कि वे सिविल सर्विस की तैयारी कर रहे हैं तो होंगी कुछ जानदार। सचमुच उनने आठ-नौ पुस्तकें लाकर सामने रखीं, सभी विश्व विख्यात! लेकिन अंग्रेजी मेंं। अपनी अंग्रेजी का धुर्रा बिगड़ा हुआ है सो पन्ने पलटे और लौटा दिए क्योंकि पोथानुमा इन पुस्तकों को पढऩे में अच्छा-खासा समय लगेगा जो अपने पास नहीं है। लेनिक हमने शुभम बाबू को बहुत शुभकामनाएं दीं कि वे उच्चतम ज्ञान की पुस्तकें पढ़ रहे हैं। बड़ी बात है। दीदी ने रसोई तैयार कर दी है। सन्नी की श्रीमतीजी भी रसोई में लगी हुई हैं। सास-बहू की जुगलबन्दी बड़ी अच्छी रही। यही घर को सँवारने में मददगार होता है। रोटी-आलू-गोभी की रसदार तरकारी, चावल, दीदी द्वारा जमायी हुई गाढ़ी दही, सलाद आदि बड़ा स्वादिष्ट लगा। जीजा के लिए उबली हुई सब्जियों का मिक्स बना है। भोजन का आस्वदन कर हम फिर बातों में मशगूल हुए। एक तो कोरोना काल, ऊपर से बारिश का मौसम..बाहर टहलने भी नहीं निकल सकते। सो बात करके ही मन बहलाएं। सन्नी बाबू सेवा भाव से लगे हुए हैं। उनमें भी एयर फोर्स ज्वाइन करने के बाद बहुत बदलाव आया है। लड़कपन की जगह परिपक्वता की झलक दिखती है। उत्तरदायित्त्व और जिम्मेदारियां खूब निभा रहे हैं। उनमें पर्यावरण के प्रति प्रेम भी बहुत है। दीदी बताती हैंं कि जहां उनकी पोस्टिंग है वहां अपने घर की बागवानी में बड़े सुन्दर-सुन्दर फूल-पौधे लगाए हैं। उनके द्वारा उगाई भिन्डी और करेले की फोटुएं भी दीदी दिखायी। यह कितना अच्छा है कि कोई प्रकृति से इस तरह प्रेम करे। हमारे बाबा तो एक पूरा अमोला ही लगा दिए थे। नहीं भी तो बारह-पन्द्रह आम महुआ आदि के पेड़ होंगे। उनका प्रकृति प्रेम निराला था। पूरा बगीचा ही स्थापित कर दिए। यह हर व्यक्ति में होना चाहिए। क्योंकि यह प्रकृति ही है जो हमें जीवन-प्राण देती है। तो बाबू सन्नी को हमने बहुत-बहुत शुभकामनाएं दीं। व्हाट्सऐप पर कोलकाता रह रहे हमारे गांव के श्री विकास शुक्ला का सन्देश आया है। पढ़कर बड़ी खुशी मिली। बचपन के समय एक बार गांव की रामलीला में उन्होंने राम और हमने लक्ष्मण की भूमिका अदा की थी। वह दृश्य आज भी हमें रोमांचित करता है जब बबुनन्नन बाबा और गांव के अन्य वरिष्ठजनों ने हाथों में आरती की थाल लिए हमारे मुखमंडल के समक्ष घुमाते हुए "श्रीरामचंद्र कृपालु भजु मन.." गा-गाकर आरती उतारी थी और हम राम-लक्ष्मण भेष में सजे धनुष-बाण लिए गर्वोन्नत शाही कुर्सी पर मुस्कान बिखेर रहे थे। हमने विकास भाई को रिप्लाई भेज दीदी को यह प्रसंग सुनाया। अब विश्राम का समय हो गया है। बारह बजने को हैं। बाहर पानी गिरने की आवाज सुनाई दे रही है। लगता है बारिश शुरू है। क्रमश:-7 ०००

Sunday, 25 July 2021

(5) संध्या ढल चुकी है। दिलीप जीजा ड्यूटी जाने की तैयारी कर रहे हैंं। वे हमारे जीजा के अग्र्रह हैं। ब्रह्मचर्य व्र्रत की जो प्रतिज्ञा लिए तो फिर विवाह नहीं ही किए। बड़ी शान से रहते हैं। अच्छा लगता है कि उनकी पुष्ट-प्रौढ़ शरीर में आज भी बालक मन छिपा हुआ है। आज के इस भीषण समय में जब मनुष्यता तिरोहित हो रही है, लोग पाषाण हृदय हो रहे हों, तब किसी मनुष्य में बाल-सुलभ अन्दाज दिखायी देे इससे बड़ी बात और क्या हो सकती है? हमारे दिलीप जीजा दुनियाई ज्ञान के माहिर हैंं, सरयू की धार नापे हैंं, चैनपुर गांव की कुटी में धुनी रमाई है और साधु पुरुष का सानिध्य पाया है, प्राथमिक और माध्यमिक अध्यापकों को फिर-फिर उलाहना का अवसर दिया है..कम बड़ी बात नहीं। हाईस्कूल तक की कविताएं उन्हें आज भी कंठस्थ हैं। रामायण की चौपाइयों और महाभारत-गीता पर भी बात कर सकते हैं। लोकगीतों के क्या कहने! ढोलक-झाल हो तो सस्वर समा बांध दें। बताते हैं कि होली त्यौहार में एक बार बबलू जी के घर क्या तो झूमकर गाए थे। अपने तो झूमें ही सारा गांव झूम उठा उनकी गाई कजरी सुनकर। उन्हीं के गांव के सेराज भाई से बात करें तो बड़ा बखान करते हैं इनका। और बखान कौन न करे? जब हमारी अम्मा ही आंचल में मुंह छिपा इनकेे मुुंह पर दही पुतवा देतीं और सभा में ठहाके गूंज उठते, तो औरों की क्या कहें? यही वजह है कि दिलीप जीजा हमारे लिए सदैव आकर्षण के केन्द्र में रहे हैं। हम मुंबई जाते हैं तो एक लोभ यह भी रहता है कि दिलीप जीजा से मुलाकात होगी तो उनके बाल-सुलभ हृदय से खेलने को मिलेगा। "छाता ले लीजिए, नहीं भीग जाएंगे।" हमारे कहतेे ही वे पीछे मुड़ हमें देखते हैंं, लम्बी मुस्कुराहट लेते हैं और दाहिने हाथ में पकड़ा मिनी छाता दिखाते कहते हैं, "ये देखिए, ले जा रहा हूं।" हम सोचे थे कि कहेंगे कि "देख नहीं रहे हो हाथ मेंं छाता?" लेकिन उनके हृदय से बड़ी सरलता से बालक बोला था। हम निहाल हो गए और वे सीढिय़ां उतरने लगे। लीजिए, छोटी दीदी से बात होने लगी है। वे सबका हालचाल लेती जाती हैं। इतने दिनों बाद मिली हैं तो बहुत-सी भूली-बिसरी बातें परत-दर-परत खुलती जाती हैं। बाबा से लेकर माई-बाबूजी, भैया-भाभी का परिवार, उनके सालों का परिवार, दोनों भतीजे-भतीजियों का परिवार, बड़े जीजा-दीदी का परिवार, फूआ-फुफा का परिवार, ननिहाल नकौझा, खखाइचखोर, पलामू, पुल्लहुर चाचा, लखनऊ, छपिया, बढय़ा-फुलवरिया, देवरिया, बनकटा, भिलाई, नीतीश की पढ़ाई, पोटिसन..बहुत-सी बातें जो याद नहीं आ रही हैं पर चर्चा होती है। वे और जीजा चाय पीते जाते हैंं और हमें थमा दिए हैंं काजू, बादाम और कुछ सूखे मेवे। हम खाते जाते हैंं और बातोंं का सिलसिला रज्जु की भांति बढ़ता जाता है। क्रमश::-6 ०००००

Friday, 23 July 2021

(4) हमने थोड़ा आराम किया और उठे ही कि शुभम बाबू मैदू बड़ा खाने की जिद करने लगे। हमारे यहां इसे सांबर बड़ा कहते हैंं और गांव में बारा। उड़द दाल से बनता है। बड़ा बढिय़ा स्वाद होता है। हमारी माई क्या तो खूब बनाती थी बारा। उसके हाथ का यह व्यंजन हमें भूलता नहीं। छुटपन में याद आता है कि मामा के यहां नकौझा में किसी कार्य परोजन मेंं माई ही बारा बनाती थी। हमें मौसी लाकर देतीं कि "लो तुम्हारी अम्मा ने भेजा है।" हम लपक लेते और बड़े मजे से खाते। तो शुभम बाबू का ने जो मैदू बड़ा खिलाया सूखे रूप में वह बारा की तरह ही था। अब आजकल कहां बनता है घरों में यह! बहुत हुआ तो होटल से मंगा लिए। नहीं तो यही पहले था कि घर-रिश्तेदार की महिलाएं ही मिलकर बना लिया करती थीं। उसमें कितनी हंसी-ठिठोली हुआ करती थी। मान-मनौवल चलता था। लेकिन अब सब नदारद! सन्नी की श्रीमती गृह कार्य में दीदी का हाथ बंटाती है देख अच्छा लगा। शाम हुई तो चाय की तैयारी होने लगी। छोटकी दीदी को चाय का बड़ा शौक है। कुछ मिल-न-मिले, खूब पकी हुई चाय मिल जाए तो क्या कहने! वह भी बिना अदरक और काली मिर्च वाली चाहिए उन्हें! चाय पत्ती के अतिरिक्त आप कुछ उसमेंं मिलाए नहीं कि हुआ गुड़ गोबर! फिर वे न पीएंगी। माई उनसे कहा करती कि "गुड़, काली मिर्च, सोंठ आदि मेंं उबालकर चाय पिया कर, फायदा करेगा।" लेकिन केवल चायपत्ती में उबली चाय का स्वाद उनकी जिह्वा पर जो लगा तो आज तक लगा ही है। यही उन्हें तरोजाता बनाए रखता है। आप उन्हें देखिए तो अंदाजा नहीं लगा सकते कि उम्र के अर्धशतक लगा चुकीं हैं। जब देखता हूं और इनके संघर्षों को याद करता हूं तो आंखें सजल हो उठती हैं कि इसी मुंबई में भाड़े के सुविधाविहीन एक छोटे से कमरे में कैसे वे अपना दिन गुजारा करती थीं। सास-ससुर, पति और दो बच्चोंं को लेकर वे जिस प्रकार रहीं एक वह दिन देखता हूं और एक आज! आज उनने अपने दोनों बच्चों को उच्च शिक्षित कर दिया है। बड़े को भारतीय वायसेना में नौकरी मिल गयी। छोटा उच्च पद के लिए तैयारी कर रहा है। कभी दीदी के गौने के बारे में सोचता हूं तो दिखता है कि कैसा तो रोना मचा था। छोटी उम्र थी और बलिया जिला में ससुराल मिली थी। माई ने साथ मुझे लगा दिया। मैं बाबा के समय का सेर! लगा शेखी बघारने कि "मेरे साथ दीदी आराम से चली जाएंगी।" लेकिन मेरी शेखबाजी में दीदी के रोने ने ऐसा पलीता लगाया कि मैं चारों खाने चित! विदाई के वक्त गांव में जो रोना शुरू हुआ तो लगातार जारी रहा। दोहरीघाट केे बस स्टैंड पर हम नहीं भी तो दो घंटे बैठे रहे और ये रोती रहीं। रोना भी हल्का-फुल्का नहीं, पूरा हुंकारी पार-पारकर! मैंने चाय-पानी, समोसे-भजिए आदि से लेकर अनेक युक्तियां निकालीं लेकिन सब विफल। यहां तक कि चैनपुर (गुलौरा) गांव जाते तक आंसू न थमे। जीजा तब विद्यार्थी ही थे। विद्यार्थी जीवन वैसे भी साधक-जीवन होता है। फिर इन्हें पढऩे के लिए तुरतीपार पुल की जगह गांव के समीप ही सरयू पर बने पीपे के पुल से भागलपुर होते पढऩे जाना पड़ता था, वह भी साइकल से! फिर बेल्थरा रोड में एक कपड़े की दूकान भी सम्भालनी पड़ती थी। लेकिन दीदी ने सब मैनेज किया। एक बड़े परिवार में वे अपने को समाहित कीं तो यह घर से मिला संस्कार ही था। क्रमश:- 5 ०००००

Thursday, 22 July 2021

(3) बहरहाल, अब भी उनकी जीजिविषा और दौड़ पडऩे की उत्कट ललक देखने लायक थी। बिस्तर से लपक वे व्हील चेयर पर बैठ गए और लगे बात करने। हाल-समाचार के बाद हम फ्रेश होने बाथरूम में चले गए। भारत के महानगर मुंबई मेंं जहां घर की समस्या बड़ी मानी जाती है, वहां जीजा ने अपनी श्रम-साधना से फ्लैट ले लिया है। जिसमें कमरे के साथ रसोई और बाथरूम की सुविधा भी है। परिवार आराम से रह सकता है। लेकिन यहां है कि हमारे आने के बाद कमरा तंग हो गया है। जीजा-दीदी और शुभम बाबू थे ही, सन्नी बाबू अपने परिवार के साथ आए हैंं। फिर हम भी ऊषाजी और निखिल के साथ आ पहुंचे। सो कमरा भर गया है। लेकिन अपनों के मिलने के उल्लास ने इस कमरा-तंगी का एहसास तक न होने दिया। घर-परिवार, नाते-रिश्तेदारों से मिलन की अनुभूति ही दूसरी होती है। स्नान-ध्यान कर ही रहे हैं कि दीदी ने झटपट रसोई में हमारे लिए नाश्ते की तैयारी कर दी। देखा कि उनका हाथ क्या खूब चल रहा है! भाई के आने की खुशी ने मानों उनके दुख पर मरहम का लेप लगा दिया हो। नहीं तो यही था कि फोन करने पर उनकी आवाज बुझी-बुझी सुनाई पड़ती थी। जीजा महीने से बिस्तर पर हों तो अनायास चिन्ता आएगी ही। लेकिन हमारे आने के बाद मानों वे आश्वस्त हों कि अब वे तन्दुरुस्त हो जाएंगे। हमने भी रसोई में उन्हें व्यस्त देख बाबा से सादर प्रार्थना किया कि दीदी के परिवार पर उनका आशीर्वाद बना रहे। पहले तो हमारे लिए चिरपरिचित खारी आई जिसे दूध में डुबाकर आनन्दपूर्वक रसास्वादन किए। इसके बाद रसीले आम काटे गए। क्या तो दसहरी थी! बड़ी-बड़ी और गुद्दे से भरी। इस प्रजाति के आम आम कहां मिलते हैं। कलमी आम जबसे आए हैं तबसे वह स्वाद जो देसी आमों से आया करता था अब जा चुके हैं। नहीं तो वही बचपन की याद आती है जब गांव में छोटे-छोटे आम खाने के लिए बड़े-बड़े पेड़ों पर चढ़ जाया करते थे हम। लेकिन उस आम का स्वाद आज भी जिह्वा पर बना हुआ है। बैठे बात हो ही रही है कि दीदी ने रसोई तैयार कर दी। सुस्वादु रोटी-दाल, चावल, सब्जी, अचार, पापड़, सलाद, दही आदि व्यंजनों से मन तरी हो गया। दीदी उत्साह में थीं, जीजा भी बहुत खुश थे, इन खुशियों में हमारी खुशी जाकर मिली तो मानों घर में संगम की सुगन्धि बिखर गई हो। हमने सोचा, इस भीड़ को कम करने का एक ही तरीका है कि आज ही ऊषाजी को निखिल के साथ उनकी बहिन के यहां भेज दिया जाए। आखिर उनके यहां भी शुभ प्रसंग है ही। एक दिन बाद जाने से अच्छा है आज ही निकल जाएं। हमारे जैसे ही ऊषाजी की बड़ी बहिन भी मुंबई में स्थापित हो चुकी हैं। उनके पति का अच्छा कारोबार है। उनका भी अपना सुविधायुक्त फ्लैट है। हमने ऊषाजी को संकेत कर दिया। मध्याह्न उनकी तैयारी होने लगी और लगभग 4 बजे निखिल के साथ निकल गईं। क्रमश:-4 ०००००

Tuesday, 20 July 2021

(2) पहुंचते ही दीदी ने अपने चिरपरिचित अंदाज में हम पर धार चढ़ाईं तब हम गृह में प्रवेश किए। धार चढ़ाने की यह परम्परा देखते ही माई याद आ जाती है। जब भी हम अपने गांव खखाइचखोर गए वह हर बार बड़ी धार्मिक तरीके से हम पर धार चढ़ाती थी। दरअसल धार एक लोटे में भरा वह जल होता है जिसमेंं अच्छत, दूब, पुष्प, लौंग आदि रहता है जिसे आए हुए अपनों के सिर पर ओइंछ कर गिरा दिया जाता है। मान्यता है कि इससे साथ आई बुरी नजरें गायब हो जाती हैं। माई जबसे स्वर्गवासी हुई तबसे कौन चढ़ाता है धार। लेकिन छोटी दीदी आज भी इस परम्परा को कायम किए हैं। हम उन्हें अपने प्रति इस ममत्व को देख भाव विह्वल हो जाते हैं। जैसे ही उनने लोटा हमारे सिर पर ओइंछा लगा माई ही गांव की तरह ओइंंछ रही हैं। हम नतमस्तक हो गए। भीतर जाते ही जीजा के दर्शन हुए। बिस्तर पर लेटे थे। देखते ही मुस्कुरा कर फूर्ति-से उठ बैठे मानो उनकी कमर में जान आ गई हो। "नहीं-नहीं जीजा, आप लेटे रहिए।" लेकिन वे कहां मानने वाले? तकिया के सहारे बैठ गए। लगे कुशल क्षेम पूछने। हम उनके चेहरे को एकटक देखते रहे। संघर्ष की यह प्रतिमूर्ति इस अवस्था मेंं! यही और दिन होता तो वे इस समय तक तैयार हो अपने अस्पताल जाने की तैयारी करते होते और रात 10-11 बजे ही लौटते! लगभग 30 बरस से तो हम यही देखते हैं कि एक साधक की तरह वे अपनी जिन्दगी जीते रहे हैंं। छात्र-जीवन में ही संघर्ष का पथ, कपड़े के व्यापार से होते इलाहाबाद में चिकित्सकीय पढ़ाई, फिर मुंबई में बन्दरगाह पर ड्यूटी और उसके बाद दो-दो अस्पतालों में डॉक्टर के रूप में लोगों को जिन्दगी देने का सेवाकार्य। लगातार चलायमान! लेकिन यही अब है कि लगभग दो महीनोंं से बिस्तर पर! लगता है जिन्दगी भी हिसाब लेती है। आप यदि उसके मुताबिक न चले तो वह अपने अनुसार चलने के लिए आपको बाध्य कर देती है। तब आप परवश हो जाते हैं। आखिर तीस-पैंतीस बरसों की थकान कभी तो उतरनी थी सो प्रकृति स्वयं व्यवस्था कर दी कि अब आप थोड़ा विश्राम करें श्रीमान। क्रमश:- 3
मुंबई में छ: दिन इस बार मुंबई प्रवास ऐसे समय हुआ जब हमारे छोटे जीजा डॉ. प्रदीप कुमार मिश्र के कमर दर्द को ठीक करने के लिए चिकित्सकों को शल्य क्रिया करनी पड़ी और वे महीने भर के विश्राम पर थे। उन्हें देखने हम ऊषाजी और बाबू निखिल के साथ गए थे। यों वहां रिश्तेदारी में एक मंगल-निमन्त्रण था, उसमें भी शामिल होना था। 12 जुलाई को हावड़ा-मुंबई मेल से हमारी टिकिट थी। एस-7 में आरक्षण सुरक्षित हो गया था। दुर्ग रेलवे स्टेशन पर हमारी ट्रेन समय से मिली और हम अपने कूपे में बैठकर रवाना हो गए। चूंकि कोविड काल चल रहा है सो चेहरे पर मास्क और हैंडवाश सहित अन्य सावधानियां बरतते हुए हम अलसुबह मुंबई सीएसटी रेलवे स्टेशन उतर गए। वहां पसरी वीरानी इस बात की गवाही कर रही थी कि कोरोना की विभीषिका ने इस महानगर को कितने गहरे घाव दिए हैंं। नहीं तो यही पहले था कि इस रेलवे स्टेशन पर पैर रखने की जगह न मिलती थी। लोग एक-दूसरे पर चढ़े आते थे। जन सैलाब के बीच अपनों के खो जाने का भय बना रहता था, यही वजह थी कि हम एक दूसरे की उंगलियां पकड़कर चलते थे। लेकिन इस बार एकदम सन्नाटा। ट्र्रेन से उतरते ही पीपीई किट पहने कर्मचारियों ने यात्रियों को एक लाइन में खड़ा कर दिया। सभी को आधार कार्ड निकालने कहा गया। वहां डॉक्टर हर किसी का कोरोना टेस्ट कर रहा था। हम सोचे यह प्रोसेस लम्बा चलेगा। आधार कार्ड भी हम भूल गये थे। लेकिन कोरोना वैक्सीन की दोनों डोज का प्रमाण पत्र पास था। हमने यह बात उन्हें बताई तो उनने प्रमाण पत्र का मुआयना किया और हमें जाने दिया। इससे बड़ी खुशी मिली। हम धन्यवाद दे लोकल टे्रन की ओर बढ़े कि सामने हमारे प्रिय भांजे सन्नी दिखे। हमें रिसीव करने आए थे। हमने कोरोना संक्रमण का हवाला दिया तो मुस्कुरा उठे। "नहीं मामा, सावधानियां बरत कर आया हूं।" वे भारतीय वायुसेना में हैं। इसी वजह से एयर फोर्स के हॉस्पिटल में जीजा का सफल ऑपरेशन सम्भव हुआ। तो हम टिकिट कटाकर लोकल पर सवार हुए और जीटीबी नगर उतर गए। वहां टैक्सी से छोटी दीदी के घर। क्रमश:- 2 ००००