Monday, 25 August 2014

वह रो रहा था
अपने आप पर या दूसरों पर यह तो नहीं पता
किन्तु वह रो रहा था
उसके रुदन में अट्टहास का पुट था
वैसे ही जैसे सियार रोते हैं
किसी मोटे शिकार को देखकर और बुलाते हैं
साथियों को अपने
वह रो रहा था
सहसा उसका रोना
बदल गया हंसी में
अब वह हँस रहा था
पता नहीं किस पर

              -शिवनाथ शुक्ल

Tuesday, 12 August 2014

                                              आँसू  

तालियों की गड़गड़ाहट और बड़े साहब के सीना मिलाकर गले मिलने से भाव विभोर हो गए त्रिवेदीजी। लम्बी अवधि की नौकरी के बाद आज वे सेवानिवृृत्त हो रहे हैं।
यही साहबान हैं जो कल तक साँस तक न लेने देते। और-तो और अपने काम का बोझ भी उन्हीं पर लादे देते थे। लेकिन आज है, कि उन्हें गले लगाया जा रहा है। अच्छा है, विश्रांति की बेला में साहब का यह स्नेह कम-से-कम शेष जीवन को तो सुकून देगा।
'स्वागत है त्रिवेदीजी, आपने हमारी कम्पनी की तरक्की के लिए जीवन लगा दिया अपना। आपकी ईमानदारी, लगन और निष्ठा के साथ ही कम्पनी के प्रति वफ़ादारी के कायल हैं हम।' कहते हुए साहब ने एक बड़ा-सा पैकेट त्रिवेदीजी को थमाया- 'यह रहा आपका इनाम।'
आँखें छलक पड़ीं त्रिवेदीजी की। काम के लिए आदेश देने वाले होंठो से सत्कार के मुलायम शब्द, यह इनाम, साहब की सहृदयता पर वे नतमस्तक हो गए।
निकलने लगे, तो साहब ने कहा- ' यार त्रिवेदी, एक काम करना; घण्टे भर लगेंगे, जाते-जाते ज़रा आज के फ़ाइल का निबटारा तो करते जाना।'
मानो त्रिवेदीजी आसमान से गिरे। हाथ में रखा इनाम मानो उपहास कर रहा हो, ' लो सेवानिवृत्ति का असली इनाम तो यह है कि जाते-जाते भी करते जाओ काम।'
उनकी आँखें फिर छलक पड़ीं ! कृतज्ञता के नहीं, साहब की कृतघ्नता के आंसू थे।

Saturday, 9 August 2014

                                           भिलाई के पत्रकारों का ढाई लाख का दुर्घटना बीमा

न्यू प्रेस क्लब ऑफ़ भिलाई ने इस वर्ष पत्रकारों के बीमा राशि के दायरे को बढ़ाकर ढाई लाख रूपये कर दिया है। अब पत्रकारों को नेशनल इंश्युरेंस कंपनी द्वारा ढाई लाख रुपये तक एक्सीडेंट रिस्क कवर मिलेगा। प्रेस क्लब व राज्य सरकार के दुर्घटना बीमा का लाभ पत्रकारों के साथ ही प्रेस दफ्तरों में काम करने वाले कंप्यूटर ऑपरेटरों व सभी प्रकार के प्रेस वर्करों को भी प्राप्त हो इस दिशा में प्रयास शुरू कर दिए गए हैं। भिलाई प्रेस क्लब के अध्यक्ष शिवनाथ शुक्ल ने बताया कि पिछले वर्ष १ लाख रूपये के दुर्घटना बीमा के दायरे को बढ़ाया गया है, लक्ष्य ५ लाख रूपये का है। बीमा के साथ ही पत्रकारों के राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा (स्मार्ट कार्ड), पत्रकार कॉलोनी फेस-२ निर्माण की प्रक्रिया जारी है। इसके साथ ही राज्य सरकार द्वारा पत्रकारों के ५ लाख के दुर्घटना बीमा व वरिष्ठ पत्रकारों को पेंशन के दायरे को बढाने का भी प्रयास किया जा रहा है।

Thursday, 26 June 2014

                                           वो ७ दिन 

                                                                    (कैफ़ियत)

ग्राम्य यात्रा के वृतान्त (वो ७ दिन) में कई ऐसे लोग मिले जो हमारे साथ-साथ चले हैं। उनकी प्रतिक्रियाओं से ऐसा आभास हुआ कि यात्रा तो हमनें की, आवागमन का कष्ट हमने झेला, खानपान की परेशानियां हमें हुईं लेकिन उसका असल आनन्द तो हमारे उन पाठकों व शुभचिन्तकों ने उठाया जो रस ले लेकर इसे पढ़े और टिप्पणियां कीं। ऐसा लगा कि पूरी यात्रा उन्होंने हमारे साथ ही कर लीं और हमारे सबसे परिचित भी हो लिए। इसे पढ़कर कइयों ने तो फोन भी किया।
सबसे पहले तो बिन्दू दीदी ही कीं। वे मुम्बई में रहती हैं, ऊषा जी की बड़ी बहिन हैं. लगीं कहने कि बहुत अच्छा लगा पढ़कर। फोटुओं की भी तारीफ कीं वे।
हमारे पुराने पत्रकार साथी असित बोस जो अब कोरबा में हैं, उनने कई पत्रकार और साहित्यकार साथियों का नाम लेते हुए टिप्पणी की, कि लाजवाब भाई, भूले-बिसरे दिनों की याद आ गयी। रोजी-रोटी के फेर में मशीन का एक पुर्ज़ा बन जाने की बात कहीं उनने। लिखे, कि हम लोगों का नसीब अच्छा है जो किसी न किसी रूप में साहित्य की सेवा कर रहे हैं। असित भाई बहुत मारक लिखने वालों में रहे हैं। मुझे उनका साथ अच्छा मिला। असित भाई, आप जानते हैं कॉफी हाउस में बात भी हुयी है, पत्रकार कभी मशीन का पुर्ज़ा नहीं बन सकता। उसमें माद्दा होता है। आप तो जीवट इन्सान हो, हम साथ हैं। शुभकामना के लिए आपका धन्यवाद।
साहित्यकार-बैरिस्टर संजीव तिवारी ने लिखा, कि पढ़ते हुए लग रहा है कि वे हमारे साथ सफर में हैं। फिर दूसरे दिन संजीव जी ने टिप्पणी की- वाह भई, अन्तिम पंक्तियों ने आँखें नम कर दीं। तीसरे दिन उनकी टिप्पणी रही, कि हमरे संगे गाँव उहो घूम रहे हैं। संजीव सम्वेदनशील ह्रदय के लगते हैं। तभी उनने उन तंतुओं को पकड़ा जो उनके मन से होते आँखों के करीब तक पहुँच पाए। इसे ही साहित्य कहते हैं। 
अरुण शुक्ला ने टिप्पणी की, कि मैंने पहली बार हमारी स्टोरी पढ़ी, कहने के लिए शब्द नहीं हैं....सच। अरुण सोचने वालों जिज्ञासु लोगों में लगते हैं। उनको हमारी शुभकामनाएं। इंडियन आर्मी के हमारे भतीजे मनीष शुक्ला (सीटू) का कॉमेंट है कि उन्हें उनके बचपन का सफर याद आ गया। अच्छा लिखे हैं। बचपन के सफर की बात ही कुछ और होती है। सचिन शुक्ला ने बहुत धन्यवाद कहा है, शायद उन्हें अच्छा लगा हो . दिल्ली से उमाशंकर शुक्ला का कहना है कि हम हमेशा ही दिल छू लेते हैं। बेहतरीन लिखावट है। फिर दूसरे दिन उनने टिप्पणी की कि हम रियली ग्रेट हैं.…हैट्स ऑफ। हम ग्रेट तो नहीं लेकिन उमाशंकर की भावनावों का सम्मान जरूर करते हैं।
प्रज्ञा दूबे ने लिखा कि हम उन लोगों में गिने जाते हैं जो लोगों की कमियों से ज्यादा खूबियां पहचानते हैं। प्रज्ञा जी ने कुछ तो ठीक लिखा है। लेकिन खूबियों के हक़दार वही होते हैं जो उसके लायक होते हैं। बाद में प्रज्ञा जी ने लिखा कि लगता है कि हम उनके घर को अच्छे से जानते हैं। प्रज्ञा जी. प्यार करने वालों को कौन नहीं जानता? लिली भी तो इसी लिए पसंद आती हैं न ? 
संगीत की मल्लिका मोनू के लेख है, कि हमारा लेख उन्हें हमेशा प्रभावित करता है, तो यह हमारा सौभाग्य है। सरस्वती की देवी बोल रहीं हैं यह क्या कम है हमारे लिए।
 अवनीश दूबे ने लिखा है 'वेरी नाइस' तो इसके लिए अवनीश को वेरी थैंक्स।
 राजनीति के दिनों के हमारे साथी शशि भूषण ने लिखा कि बहुत दिनों बाद अपनों से मिलना अच्छा लगा। अपनों से दिनों बाद की मुलाक़ात सुखकर होती ही है शशि भाई। हमें भी कुछ कम न हुयी आपकी टिप्पणी पढ़कर। 
युवा वैज्ञानिक प्रकाश शर्मा ने गज़ब कर दिया ! लिखे, कि गाय और गांव की कथा ने मुंशी प्रेमचन्द के गोदान की याद दिला दी। प्रकाश जी की अपनी भावनाएं हैं, लेकिन अपुन समझते हैं कि हम उनके घलुआ बराबर भी नहीं। कहाँ प्रेमचन्द कहाँ हम!
डॉक्टर मनोज आनन्द ने वेरी नाइस लिखा तो डॉक्टर साहब को वेरी थैंक्स।
हरिकेश दूबे ने लिखा,
पुरानी अनूभूति एवँ वर्तमान की सच्चाई का एहसास कर के अच्छा लगा। हमें भी उनकी यह टिप्पणी पढ़कर अच्छा लगा। 
दूरदर्शन के पत्रकार मो. फ़ारूक़ का कहना है की वो 7 दिन साहित्य लेखन का अच्छा उदाहरण है, यह लेख युवावों को अच्छे लेख के लिए प्रेरित करता है। ठीक है फारूक जी, आप भी लिखें। हमारी शुभकामना। नवभारत की प्रतिभाशालिनी पत्रकार संगीता मिश्रा ने लिखा कि हमनें जो लिखा वैसा दृश्य उनकी आँखों के सामने दिख गया। यही लेखन की सफलता है। संगीता सुरुचि में अच्छा कर रही हैं। उन्हें बधाई।
पैथोलॉजी में गरीबों की सेवा करने वाले मुक्तकंठ साहित्य समिति के अध्यक्ष-साहित्यकार सतीश चौहान को इसमें गांव की खुशबू मिल गयी, यह अच्छी बात है कि गावों की खुशबू महकने का अहसास लोगों में है। यही गॉवों को जीवित रखेगा। अन्त में सतीश जी ने लिखा, अपनो के बीच की अपनी बातें....सतीश जी हमारे अपने ही हैं। उन्हें अपनापा महसूस हुआ हम धन्य हुए।
दिल्ली से राजीव निगम की टिप्पणी भी प्रेरक है, कि हम ग्रेट हैं और हमारे सभी लेख पढ़ने से उन्हें अच्छे लगते हैं। राजीव को धन्यवाद हमारा। उन्होंने और सोनू ने लिखा की वे हमारी अम्माँ को बड़ा मिस करते हैं। इसलिए सोनू-राजू आप लोग हमारे दिल में रहते हैं।
मुम्बई से आशीष पाण्डेय ने फोटो की तारीफ की है। मुंबई से रिंकी पाण्डेय ने प्रणाम किया है तो उन्हें आशीष। दीपक कुमार वासनिक ने वेरी नाइस लिखा है उन्हें थैंक्स। 
अनेक लोग ऐसे भी हैं जिनने हमारे ब्लॉग वाले फोटो पर टिप्पणी कीं। इक़बाल राइन ने लिखा, दाढ़ी बना कर बढ़िया से रहा करो यार। ध्यान देंगे इक़बाल जी।
डॉ. मनोज आनन्द और प्रवीण दूबे को फोटो बाबा की तरह लगती है, हम 'बाबा' की चरण धूलि भी नहीं हो सकते। बहरहाल उनकी टिप्पणी से हमारा मन विभोर हो गया।
एस. राजू ने पूछा है कि मैं इतना सीरियस क्यों दिख रहा हूँ ? राजू जी, ऐसी कोई बात नहीं हैं, आप-से शुभचिंतक हैं, तो सीरियस का कहाँ सवाल? 
हितवाद के हमारे पत्रकार साथी प्रशान्त सरकार ने लिखा हम स्कॉलर-फिलॉस्फर लग रहे हैं, प्रशान्त जी आपके मुँह में घी-चीनी. 
इसके साथ ही अनिल मिश्रा, विक्की शर्मा, भैया अशोक श्रीवास्तव, प्रेम गुप्ता, निखिल, सूर्यप्रकाश मिश्रा, अवधेश यादव, भैया प्रमोद भारद्वाज, मोंटू तिवारी, स्नेहा मिश्रा, विशाल कुकरेजा, प्रकाश शर्मा, ममता शुक्ला, सुधीर शुक्ला, एंजेल सारिका, धनञ्जय शुक्ला, राजकुमार नंदे, आदरणीय दीनबन्धु शुक्ला, अभिषेक शुक्ला, सोनाली धर चक्रवर्ती, अनिल मणि त्रिपाठी, ललित कुमार वर्मा, तेजेंदर सिंह गगन, राजेश मिश्रा, इन्द्रनील श्रीवास्तव, महेन्द्र सिंह शेखावत, रामप्रकाश ढीमर, राकेश मणि त्रिपाठी, दीनबन्धु मिश्रा, मनीष जाग्याशी, रमज़ान खान, राजकिशोर भगत, सन्तोष सिंह, विनोद उपाध्याय, विनोद दुबे, अनूप कुमार जैसवार, मृदुल शुक्ला, सैय्यद मज़हर हुसैन, रवि दाहटे, हर्ष दूबे, अतुल गुप्ता, विजय शर्मा, अन्जन दास, गिरिजा यादव, अभिनेष त्रिपाठी, गोलू मिश्रा, सुभाशीष सेनगुप्ता, रमाकान्त गुप्ता, सीमान्त कश्यप, गुरदेव सिंह रंधावा, हरेन्द्र अवस्थी, संजय कुमार, जगदीश कुदरिया, तरविन्दर सिंह छत्री, सतनाम पामा सहित और कइयों लोगों ने इस वृतान्त को पसंद किया है। उनके प्रति आभार.. 

                                                                                                          इतिश्री  ....  
 


Wednesday, 25 June 2014

                                              वो ७ दिन 

                                                                             (७)

आधी रात पेट में ऐंठन होने लगी। यह इतनी बढ़ी, कि जड़-जड़ाय आ गया। ऊषा जी से लेकर काका-अम्मा सब परेशान। रजाई ओढानी पडी। हरिकेश जी कोई टेबलेट और सिरप दिए, राहत मिला। लेकिन लूज़ मोशन शुरू हो गया। हो सकता है खानपान में गड़बड़ी हुयी हो। प्रातः मन हल्का हुआ। रिजर्वेशन हो न सका था, तबीयत भी नासाज़ थी, तो हमने आज़ की यात्रा स्थगित कर दी। घर वाले भी यही चाहते थे। काका राउतपार चौराहा गए और हमारे लिए लूज़ मोशन की दो खुराक दवा ले आये। बेचारे चलने में तकलीफ पाते हैं। घुटने चलने नहीं देते। नीतीश ने उन्हें एक्यूप्रेसर का इलाज़ बताया, घुटने के नीचे कुछ पॉइंट्स पर प्रेस भी किया, वे दर्द से कराह  उठे। लेकिन उनका भी एक समय था। खासे पहलवान थे। अपुन तो उनकी पहलवानी देखे नहीं, लेकिन वे उन दिनों की बात अपने बाजुओं की मछली निकाल, उसे ठोंक-ठोंक कर बताते हैं कि कैसे अच्छे-अच्छे पहलवानों को वे अपनी धोबी पछाड़ से चित्त कर दिया करते थे। कइयों लीटर दूध-घी चट कर जाने की बात भी वे बताते हैं। तभी तो  उनके खूंटे आज भी जर्सी गाय ज़रूर बंधी दिखती है। अपुन को तो दोनों समय भर कटोरा दही ओर बड़ी वाली स्टिल गिलास में औंटा हुआ दुध मिलता है। इसी से पता चलता है कि उनकी पहलवानी के क्या दिन रहे होंगे। अपुन तो उन्हें तबसे जानना शुऱू किये जब वे अपनी मंझली बिटिया (ऊषा जी) का सम्बन्ध लेकर हमारे घर आये थे। तब उनके साथ उनके बड़े भ्राता (बाबूजी) भी आये थे। एक नज़र देखे और बतियाये नहीं क़ि चट से नज़्र देने को तैयार हो गए वे। उनका पिछले ही बरस स्वर्गवास हो गया। ८५ के ऊपर तक चले हैं। अब उनकी कमी खलती है। उनकी दी रामायण नित्य उनक़ी याद दिलाती है। तो काका हमारे विवाह में परछावन की लिए स्वयँ ही चालते हुए अपनी एम्बैसडर कार लेकर आए थे। उसी में हमारी अम्मा, भाभी, दीदी, फुआ आदि से लेकर अनेकों स्त्रियों ने पालम बाबा के थान तक घूम कर परछावन किया था। अब तो वे भी ८५ क्रॉस ही कर रहे होंगे, बाल सन की तरह सफ़ेद हो गये हैं। दोनों घुटने इस कदर टाइट-से हो गए हैं कि चल-फिर सकना दूभर होता है। तब भी है कि अल सुबह उठ जाते हैं . एक हमें देखिए, शहर में रहकर भी उठते हैं तो सूर्योदय हो गए रहता है। वे तो उठते ही गाय को नाद पर लगाते हैं और सानी-पानी करते हैं, गोबर काढते हैं और लगे रहते हैं। इसी में चरी काटने जाते हैं फिर उसे छांटते भी हैं। नौजवानी में जब लोग मुंह बा कर सोना पसन्द करते हैं, काका का इस वार्धक्य में भी निरंतर श्रम में लगे रहना प्रेरणा देते हैं।
चाचा ससुर श्री सुखदेव दूबे पूछने आए हैं। 'रात तबीयत कैसे ख़राब हो गई ?' उनसे स्वास्थ्य संबंधी कुछ बातें हुईं। वे प्रतिभा का सम्मान करने वालों में हैं। ब्लॉक डेवलेपमेंट ऑफिसर (बी डी ओ) थे, अवकाश ग्रहण करने के बाद घर पर ही रहते हैं। हमारे कहानी संग्रह बाबा व अनारकली की तारीफ़ करते हुए उपन्यास लिखने को कहे थे, ज़रूर लिखेंगे।
लो, ये प्रांजल और शिवम् आ गए। पट्टू के सुपुत्र हैं दोनों प्रायमरी में हैं। प्रांजल तो शुरू से हमारे मनोरन्जन का विषय रहा है। अमृत और अक्षत भी आये हैं। ये दोनों हरिकेश जी के आत्मज हैं। अमृत को पहाड़ा रटा रट्ट है तो अक्षत भी क़म नहीं। दोनों के पास प्रतिभा है बशर्ते और तराशें। हरिकेश दोनों की परवरिश बेहतर कर रहे हैं। यही प्रसन्नता है, वर्ना वह हरिकेश हमें नहीं भूलता जब हमारा पाणिग्रहण हो रहा था, कितना छोटा था वह। लेकिन हिम्मत से ग्रेजुएट हो गया। कंप्यूटर में दक्ष हो गया। अब तो वह काफी कुछ पा लिया है। पिता भी मदद करते हैं। मैटेरिअलिस्ट नहीं है वह, तभी तो शहर के अच्छे-भले काम को ठोकर मार आया। माँ-पिता की सेवा और पत्नी-बच्चों की परवरिश करता है। यही बड़ी बात है।
तो दिन कट गया। रात हमने फैसला किया, कल निकलेंगे। दुसरे दिन सवेरे ही तैयार हो गए। ६. ३० बजे ग़ाज़ीपुर के लिए बस थी। हरिकेश जी दो फेरे में हमें राउतपार चौराहा लाये फ़िर ऑटो में सवार हम बड़हलगंज के लिए रवाना हो गए। वहां १० मिनट ही खड़े होंगे कि पीं-पों, पीं-पों करती बस आ गयी। हरिकेश जी और निखिल लपक कर उसमें चढ़े और हमारे लिए जगह की व्यवस्था किये। अब जाने की बारी थी। हरिकेश जी की आँखें सजल हो गयीं। वियोग कष्ट देता ही है, हमारा मन भी भरा हुआ था। बस छूटने पर ऊषा जी की आँखें चल पड़ीं थीं। सरयू पार हो रही हैं। लो, सरयू पार हो गयीं। प्रणाम सरयू मैया, प्रणाम।   
 

Sunday, 22 June 2014

                                             वो ७ दिन 

                                                                           (६)

लिली आयी है। सूंघ रही है हमें। पाहिले तो बड़ा डर लगता था इससे। लेकिन अब नहीं। अब तो खेलने का मन करता है इसके साथ। बड़ी चैतन्य व फुर्तीली है यह। बच्चे बॉल खेलते हैं तो यह भी उसमें शुमार हो जाती है।  क्रिकेट खेलते हों तो फील्डर बन कर तैनात रहती है। दूर तक जाती गेंद को लपक कर पकड़ती है, मुंह में दबाती है और लेकर आ जाती है। हमने अपने मीठे का एक हिस्सा दिया तो उसने स्वीकार कर लिया।
सहसा ऊषा जी आईं और बोलीं, ' समै माई के दर्शन को चलना है।'
'समै माई!' हमारे मन में रोमांच हो आया। सहसा वह दृश्य कौंधा जब हम छोटे थे और अम्मा हमें लिए करही कढ़ाई चढाने समै माई के थान लिए जाती थीं। हमारे गांव से समै माई का थान कम दूरी पर नहीं है। कइयों कोस का फासला है। तरैना पर कर अनेक गांव होते पड़ौली की यात्रा होती है। इसी पड़ौली गांव में समै माई का थान पड़ता है। तब अम्मा हमें मुंह अँधेरे जगा देतीं और रैठा ( अरहर के सूखे पेड़ जो ईंधन के प्रयोग में आते हैं) का छोटा-सा बोझ बनाकर हमारे सिर पर रख देतीं और खुद एक झोला लेतीं जिसमें भोजन पकाने की सामग्री व कुछ बर्तनादि रहते। फिर गांव की अनेकों स्त्रियां अपने बाल-बच्चों के साथ पड़ौली के लिए प्रस्थान करतीं। रस्ते भर हरियाली की बहार रहती।  कहीं अरहर की सघन फसलें मिलतीं तो कहीं ऊँखों(गन्नों) के खेत; कहीं मटर-चना तो कहीं आलू-गंजी; पीले फूलों से सजी सरसों की फसलें ऐसा प्रतीत होतीं मानो धरती को पीले बुनकों वाली चादर ओढ़ा दी गई हों। इन सभी फसलों में हमें कहीं भय तो कहीं खुशी का आभास होता। सरसों व गन्ना के सघन फसलों को देख हम सहम जाते। इन फसलों में हाथी से लेकर सियार, हुंड़ार, साही, लकड़बग्घा, नीलगाय, जैसे पशुओं के छिपे होने के साथ ही भूत-प्रेतों का भी भय रहता। सबसे ज्यादा कष्ट हमें उन मूँजों से होता जो मार्ग के दोनों और बहुत गझिन और फ़ैली हुयी रहतीं। वे सुई-सी नुकीली होती हैं। थोड़ी भी असावधानी हुयी नहीं कि बदन में घुंसीं, नहीं तो कपड़े में हीं फंसीं। हम बच्चे थे, सिर पर बोझ, नन्हें कदम ऊपर से दूर का रस्ता, डगमगा जाते, लेकिन हर बार अम्मा हमें सम्हाल लेतीं। खरोंच न आने देतीं। फिर रस्ते भर अम्मा के साथ ही अन्य स्त्रियों का समवेत स्वर में 'देवी झूली-झूली ना.…जैसे देवी गीत हमें बांधे रखते। उन गीतों में एक-से-एक मनौतियां होतीं, जो हमारे और परिवार के कल्याण के लिए ही होतीं।
वहां की स्मृतियाँ इतनी मधुर, चपल व भाव विभोर कर देने वालीं हैं कि ऊषा जी ने कहा और हम चट-से तैयार हो गए। पहले भी तीसों बरस से जब भी हम गांव जाते तो तय करते, कि इस बार ज़रूर समै माई के थान चलेंगे। किन्तु हर बार साधनाभाव, असुविधाएं और अन्य परेशानियों को देख मन मसोस कर रह जाता। अम्मा जब तक रहीं जोर देतीं रहीं, पर कैसे जाएँ ? न वह बालपन है न आने-जाने का साधन। इस बार तो निखिल है। हरिकेश जी की मोटरसाइकिल है, साथ में ऊषा जी हैं।
जाने क्यों लग रहा है कि अदृश्य रूप से अम्मा ही हैं जो वहां ले जाने को तैयार हैं। चटपट तैयार हुए। निखिल ने मोटरसाइकिल निकाली तो हरिकेश जी से लेकर प्रकाश भैया मार्ग बताने में लगे की हाटा से नज़दीक रहेगा। भाभी (पट्टू की मम्मी) बोलीं कि इधर से निकलने में भी परेशानी नहीं है, तो रुनझुन को गोद में लिए बन्नी कहने लगी कि उसका घर तो वहीं आसपास ही है, इस रस्ते चल दीजिये। सबकी सुन हम निकल पड़े पड़ौली के लिए। इस बार न अम्मा थीं न वह बालपन और न ही पैदल यात्रा। अब मोटरसाइकिल थी, निखिल चला रहे थे और ऊषा जी हमारे पीछे बैठी थीं। हाटा से मामखोर वाले रस्ते बढे तो बीच में भीटी-लौहरपुर से हमारा गांव और पालम बाबा का थान दिखा, हमने सिर नवा दिया। मामखोर-बड़गों होते हम आगे बढ़े। तरैना का एक छोटा पुल क्रॉस किया। सड़क किनारे ताड़ी बिक रही है। यहाँ ताड़ी खूब बिकती है। रस्ते चलते इसके शौक़ीन लोग खरीदकर कोकोकोला सरीखा पीते हैं। छुटपन में अपुन भी एकाध बार लिए हैं। खट्टा-सा लगता है, कहते हैं कि इसके पीने से भूख बढ़ती है अपनी बढ़ी थी या नहीं ख्याल नहीं।
यहीं पूछे एक से पडौली का रास्ता, तो उसने कचिया की ओर इशारा कर दिया। हम उतर पड़े कच्चे रस्ते खेत में। आगे एक सवारी और जा रही थी, पता चला वे लोग भी वहीं जा रहे हैं।  पीछे हो लिए हम। किलोमीटर भर चले कि पक्का रास्ता आ गया और समै माई का थान नज़र आने लगा। हमारा मन बल्लियों उछलने लगा, गुदगुदी होने लगी। पुराना वह सारा दृश्य चलचित्र की भांति आँखों के सामने घूमने लगा। हम बढ़ते जा रहे हैं। समै माई नज़दीक आती जा रही हैं, हमारी नज़रों के समक्ष अम्मा घूम रही हैं।
'अरे! वो देखो, वहाँ पोखरा था। वो, वो देखो वहां तो मार्केट-सा दृश्य है जहाँ कड़ाही चढ़ा करती थी। अरे! यहाँ तो चहल-पहल बढ़ गयी है। चबूतरा पक्के का बन गया है।'
हमारी कुतूहल भरी प्रसन्नता, मन के आर्द्र भाव को निखिल और ऊषा जी भांप रहे थे। वे भी खुश थे। हम मंदिर के आहाते में मोटरसाइकिल खड़ी किये और पुष्प प्रसादादि ले माई के दर्शन को बढ़े। वह मतवा नहीं दीखतीं जो भभूत देतीं थीं। पता चला वे सदा के लिए चली गयीं। मेहदरावें के कोई दूबे जी हैं जो पूजा-पाठ करते हैं। हमने मंदिर का परिक्रमा किया, निरियल फोड़ा और पूजा कर निकले। मंदिर में ढेर सारी घंटियां बंधी हैं, बताया गया कि मन्नतें पूरी होने पर लोग घंटियां चढ़ाते हैं। हमारी कोई मन्नत नहीं थी। एक साध थी जो पूरी हुयी। फिर निखिल ने हमारा वहीं फोटो खींचा। कुछ देर रुक हम रिटर्न हुए।
ऊषा जी कुछ खाई नहीं हैं, बिना कुछ खाए-पिए देवी-दर्शन उनकी आदत है। तो हम खूब सारी खुशियां लिए लौट आये राउतपार।
यहाँ प्रणव जी मिले, गोरखपुर जा रहे थे आशीर्वाद लेने आये थे। वे प्रकाश भैया के होनहार चिरंजीव हैं जो गोरखपुर में डॉक्टरी (बी डी एस ) पढ़ रहे हैं। सिम्मी भी जा रही है। वह नीलम दी की आत्मजा है, वही नीलम दी जो हमारी बड़ी साली लगेंगी और जो एम ए की पढाई के दौरान कॉलेज जाते हमें विवाह के पूर्व देखने आयी थीं और यह कहती गयी थीं, कि 'ठीकै तो हैं।' तो सिम्मी से हमने बातें कीं, वह आगे बढ़ सकती है, बुद्धि तेज़ है, लेकिन तरसना होगा। सुना है नीलम दी इस उम्र में भी संगीत और कंप्यूटर सीख रही हैं। उनमें इतनी प्रतिभा है तो सिम्मी भी आगे होगी ही। उन्हीं का एक सुपुत्र शिवम् भी भोला व अच्छे विचारों वाला है। पिता की खूबियां लिया है। हमने प्रणव व सिम्मी को आशीर्वाद दिया। तब तक छुटकुल्ली रुनझुन दिखी, भाभी की गोद में थी हमनें लपक लिया। सुभी भी हमें ललचाती है, गुड़िया-विनय की बेटी है वह बच्ची। गुड़िया को तो हमने खिलाया है, सोचा भी न था कि कभी उसकी शादी हमारे ससुराल में होगी। वह हमारी बड़ी दीदी की ससुराल बरपार की है। अब देखिये यहाँ आ गयी।
हमारे एक और बड़े चचेरे साले अभिमन्यू भैया चाय पर बुला रहे हैं। वहां पहुंचा हूँ। भाभी नहीं हैं. वन्दना ने बताया कि वे अपने मायके गयी हैं। वन्दना के बच्चों से बात किया, दोनों गोरखपुर में पढ़ रहे हैं। होशियार हैं। उनके पिता बैंकॉक में रहते हैं। वहीं एक और बड़ी चचेरी साली बच्ची दीदी भी थीं उनने भी हलचल पूछा। अनिल भैया खीरा लाये हैं। हमने पुछा कि खेत से तोड़कर ला रहे हैं क्या? तो उनने कहा, नहीं। फिर कटोरे में खीरा काटकर बन्नी लिए आयी। अरुण भैया खटिये पर बैठे है कुछ बात कर रहा हूँ उनसे पूछ रहा हूँ बाबूजी की सारी पुस्तकें कहाँ हैं? वे कहते हैं वही लोग रखे होंगे कहीं। तब तक अमृत-अक्षत ने भोजन पर बुलाया। हमारी सरहज सुषमा जी इंतज़ार कर रहीं हैं। वे भी जीवट की स्त्री हैं भई। अनेक झंझावातों को पार कर पूरे परिवार को लिए चल रहीं हैं वे। अभी कुछ दिन पहले ही उनके गाल में घाव हो गया था, दर्जनों टांके लगे थे, लेकिन उफ़ तक न कीं। पूूरी ज़िम्मेदारी के साथ लगी रहीं। हरिकेश को अच्छे जीवन संगिनी मिली है। प्रकाश भैया की पत्नी को ही ले लीजिये, आधुनिक शैली की भारतीय स्त्रियां उनसे सीख ले सकती हैं। तो हम चले भोजन करने। अम्मा और काका बैठे होंगे। हमारे बिना कहाँ खाते हैं वे। कहते हैं पांव पूजे हैं तो कैसे भूल जाएँ।          

Friday, 20 June 2014

                                             वो ७ दिन 

                                                                           (५)

कमच्छा आते दिख रहे हैं। वही कमच्छा जिन पर हमने एक कहानी लिखी ' चौराहे पर कमच्छा'. यह कहानी अक्षर पर्व में छपी थी। देश भर से प्रतिक्रिया मिली थी इस पर। हम जब भी कमच्छा को देखते हैं वह दिन याद आता जाता है, जब इनसे पहली मुलाक़ात हुयी थी रायपुर के मेकाहारा अस्पताल में। इनके बारे में अम्मा से सुना करता था। हमारे ही गांव के बनिया हैं जो लम्बे लमय तक गांव से दूर रहे। हम देखे नहीं थे इन्हें। भिलाई में सहसा पता चला कि वे रायपुर के मेकाहारा में भर्ती हैं! पहले तो यही समझ न आया कि ये रायपुर कैसे आ गए। तब हमारा प्रेस रायपुर के पंडरी में था। हम पहुंचे रायपुर प्रेस और अपने अन्यतम साथी श्री नरेन्द्र चौहान को साथ लेकर मेकाहारा गए। इन्हें पहचानते तो न थे लिहाजा डॉक्टर से वार्ड और बेड नंबर पूछकर बिस्तर के पास पहुंचे। ये बेचारे एक आँख पर मोटी-सी पट्टी बाँधे लेटे थे। हमें देखे तो उठ बैठे। हमनें अपना परिचय बताया तो उनकी खुली आँख चल पड़ी। हमनें उन्हें ढाँढस बंधाया। उनने बताया कि वे एक निजी कारखाने में काम करने आये थे। उनकी ही लापरवाही से छोटी चिंगारी उनकी आँख में आ धँसी। नरेन्द्र भाई के साथ हम बाहर गए उनके लिए दवाइयाँ और भोजन खरीदे और डॉक्टर को साथ लेकर आये व उनके उचित देखभाल-चिकित्सा करने का अनुरोध किया। हम चलने लगे तो वे कृतज्ञता से ऐसे देख रहे थे मानो हम उनके भाई से कम न हों। फिर हफ़्तों हम नियमित अस्पताल आते रहे और बाद में उनकी छुट्टी कराकर अपने यहाँ ले आये। उसके बाद वे स्वस्थ होकर गांव लौटे। अब नियमित वहीं रहते हैं। 
तो वे आये और पास बैठ गए। हमनें कामधाम के बारे में पूछा तो लगे बताने, कि यहाँ नरेगा में कुछ काम मिलता है, लेकिन उसका पैसा सही नहीं मिलता। उनने बताया कि उनका बेटा राजू बाहर कमा रहा है। सुनकर अच्छा लगा। उनकी पत्नी स्कूल में रसोइया है. उसे भी पैसे मिल जाते हैं। कुछ देर रुक कर वे अपनी राह पकड़े तो अपन भी चाय-नास्ता कर सोचे क्यों न थोड़ी खेतवानी हो जाये। नीतीश को लिए और निकल पड़े पोखरे की ओर। बटोही के घर के सामने स्कूल के पीछे वाले स्थान पर क्रिकेट चल रहा है। बटोही की यादें भी काम नहीं हैं। उस छुटपन में पेट में ऐंठन, मरोड़ या मीठा दर्द होता तो अम्मा हमें इन बटोही के पास ही भेजतीं। क्या जादू रहता भई इनके हाथों में! जितना सुन्दर चाक चलाते उतना ही अच्छा हाथ भी। एक धागे से पेट और सीने के बीच माप-सा लेते और फिर अपने हाथों से मालिश करते। कुछ देर में दर्द फफूचक्कर हो जाता। यहीं क्रिकेट खेलते सचिन दिखा। हमें उसे देखने की उत्सुकता भी थी। वह हमारा फेसबुक मित्र है। दिमागदार लगता है। फेसबुक में अच्छी-अच्छी प्रेरक बातें लिखता रहता है। यहाँ दिखा, फोटो से पहचान गए। हमनें सोचा, थोड़ा बात कर लें। वह तो हमारे पास आया नहीं। बस निखिल-नीतीश के साथ मस्त दीखता है। तो हमनें उसे खेलते से रोका। वह शरमा-सा रहा था। फिर कुछ लफ्ज़ बोला, यही कि उच्च शिक्षा लेने के बाद वह यहीं किसी स्कूल में पढ़ा रहा है। हमें खुशी हुयी। विद्या-दान से बड़ा भला और अच्छा हो भी क्या सकता है। उसे आशीर्वाद दे हम आगे निकले।
बाबा के लगाए अपने बाग पहुंचे। महुआ का बड़ा वृक्ष लहरा रहा है मानो हमारी आगवानी कर रहा हो। लगा बाबा खड़े हैं। हम दौड़कर उससे लिपट गए। हमारी भावनाओं को निखिल-नीतीश परख रहे थे, उनने चट से फोटो खींच लिए। कभी इस बाग़ के पेड़ों पर चढ़ कर हम आम तोड़ा करते, उसकी सूखी टहनियां जलावन के लिए लाते। लेकिन आज वह सुख कहाँ? यहीं बगल में गोपाल मिले। हमारे घर के बगल ही इनका घर था किन्तु परिवार बड़ा हुआ तो यहाँ खेत में आकर अपना आशियाना बसा लिए। कई लोगों ने खेत में घर बनाया है। इसीलिए तो खेती का रकबा सिकुड़ा जा रहा है। बाग-बगीचे कट रहे हैं। हमारे आदरणीय श्री दीनबन्धु शुक्ल भी अपने गांव गए थे और पिछले दिनों फेसबुक पर बाग को लेकर अपना दर्द बयां किये था। कमोवेश यही हाल हर गांवों का है। बहरहाल, गोपाल से चर्चा कर हम आगे बढ़े। भुलई के बारी होते पहुँच गये मलहवा के मड़ई के पास। बहुतों से हुयी मुलाकात। दुःख हुआ कि सब एक-दूसरे के निंदा-प्रपंच में लगे हैं। कोई किसी को सोधा नहीं रहा है। ऐसा तो कभी न था इस गांव में! ग्रामीण समरसता इतना कम हो जाये कि लोग एक दूसरे की मदद करना तो दूर, दुखों के कारण बनते जाएँ तो सोचना पड़ता है कि जा कहाँ रहा है गांव? खैर, घर आये तो पता चला कि कैलाश शुकुल, पौहरी भैया, अनिल भैया आदि याद कर रहे थे। सबसे मिला, वही राम रहारी और चाय-पान के बाद कुछ बातें। फिर छोहड़ी माई का दर्शन किये।
ये लो, आ गया भिलाई से फ़ोन। बख्शी सृजन पीठ से है। राजनांदगांव में साहित्यिक गोष्ठी है। सञ्चालन मुझे करना है। हमने विवशता बताई तो वे मान गए। सोचे थे कल निकलने को, लेकिन अब सोचते हैं चलें राउतपार, वहां से परसों भिलाई के लिए प्रस्थान करेंगे। कुछ दौरा वहां भी हो जाए।
सामान बांधे, चाचा ले मुलाक़ात किए। याद आया..  अम्मा होतीं तो डीह बाबा के पास ले जातीं, वहां सिर नावाने को कहतीं और लोटे में जल लेकर हमें दूर तक छोड़ने आतीं। हम खुद ही द्वार पर डीह बाबा के चबूतरे पहुंचे और उनके सामने सिर नवाए मानो अम्मा साथ हों। आँखें भर आयीं हमारी। वहां से चले तो पालम बाबा का थान दिखा। यहाँ तक आतीं थीं अम्मा हमें छोड़ने। आज नहीं हैं। हम बच्चों के साथ हैं, फिर लग रहा है अकेले हैं। अम्मा के बिना किसी का कोई मोल नहीं। वह होतीं तो अभी भोंकार छोड़ कर रोने लगतीं। हम भी अपने को न रोक पाते और उनके अँचरे में दुबककर हबसने लगते। फिर सरे रस्ते हमारा चुपके से रोते बीतता। अम्मा, अम्मा, अम्मा चारों ओर अम्मा ही दिख रहीं हैं और हमारे आंसू ढुलकने से मानो रोक रहीं हैं। पालम बाबा का आशीर्वाद ले हम चल दिए। अलविदा गांव!