Monday, 25 August 2014

वह रो रहा था
अपने आप पर या दूसरों पर यह तो नहीं पता
किन्तु वह रो रहा था
उसके रुदन में अट्टहास का पुट था
वैसे ही जैसे सियार रोते हैं
किसी मोटे शिकार को देखकर और बुलाते हैं
साथियों को अपने
वह रो रहा था
सहसा उसका रोना
बदल गया हंसी में
अब वह हँस रहा था
पता नहीं किस पर

              -शिवनाथ शुक्ल

Tuesday, 12 August 2014

                                              आँसू  

तालियों की गड़गड़ाहट और बड़े साहब के सीना मिलाकर गले मिलने से भाव विभोर हो गए त्रिवेदीजी। लम्बी अवधि की नौकरी के बाद आज वे सेवानिवृृत्त हो रहे हैं।
यही साहबान हैं जो कल तक साँस तक न लेने देते। और-तो और अपने काम का बोझ भी उन्हीं पर लादे देते थे। लेकिन आज है, कि उन्हें गले लगाया जा रहा है। अच्छा है, विश्रांति की बेला में साहब का यह स्नेह कम-से-कम शेष जीवन को तो सुकून देगा।
'स्वागत है त्रिवेदीजी, आपने हमारी कम्पनी की तरक्की के लिए जीवन लगा दिया अपना। आपकी ईमानदारी, लगन और निष्ठा के साथ ही कम्पनी के प्रति वफ़ादारी के कायल हैं हम।' कहते हुए साहब ने एक बड़ा-सा पैकेट त्रिवेदीजी को थमाया- 'यह रहा आपका इनाम।'
आँखें छलक पड़ीं त्रिवेदीजी की। काम के लिए आदेश देने वाले होंठो से सत्कार के मुलायम शब्द, यह इनाम, साहब की सहृदयता पर वे नतमस्तक हो गए।
निकलने लगे, तो साहब ने कहा- ' यार त्रिवेदी, एक काम करना; घण्टे भर लगेंगे, जाते-जाते ज़रा आज के फ़ाइल का निबटारा तो करते जाना।'
मानो त्रिवेदीजी आसमान से गिरे। हाथ में रखा इनाम मानो उपहास कर रहा हो, ' लो सेवानिवृत्ति का असली इनाम तो यह है कि जाते-जाते भी करते जाओ काम।'
उनकी आँखें फिर छलक पड़ीं ! कृतज्ञता के नहीं, साहब की कृतघ्नता के आंसू थे।

Saturday, 9 August 2014

                                           भिलाई के पत्रकारों का ढाई लाख का दुर्घटना बीमा

न्यू प्रेस क्लब ऑफ़ भिलाई ने इस वर्ष पत्रकारों के बीमा राशि के दायरे को बढ़ाकर ढाई लाख रूपये कर दिया है। अब पत्रकारों को नेशनल इंश्युरेंस कंपनी द्वारा ढाई लाख रुपये तक एक्सीडेंट रिस्क कवर मिलेगा। प्रेस क्लब व राज्य सरकार के दुर्घटना बीमा का लाभ पत्रकारों के साथ ही प्रेस दफ्तरों में काम करने वाले कंप्यूटर ऑपरेटरों व सभी प्रकार के प्रेस वर्करों को भी प्राप्त हो इस दिशा में प्रयास शुरू कर दिए गए हैं। भिलाई प्रेस क्लब के अध्यक्ष शिवनाथ शुक्ल ने बताया कि पिछले वर्ष १ लाख रूपये के दुर्घटना बीमा के दायरे को बढ़ाया गया है, लक्ष्य ५ लाख रूपये का है। बीमा के साथ ही पत्रकारों के राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा (स्मार्ट कार्ड), पत्रकार कॉलोनी फेस-२ निर्माण की प्रक्रिया जारी है। इसके साथ ही राज्य सरकार द्वारा पत्रकारों के ५ लाख के दुर्घटना बीमा व वरिष्ठ पत्रकारों को पेंशन के दायरे को बढाने का भी प्रयास किया जा रहा है।

Thursday, 26 June 2014

                                           वो ७ दिन 

                                                                    (कैफ़ियत)

ग्राम्य यात्रा के वृतान्त (वो ७ दिन) में कई ऐसे लोग मिले जो हमारे साथ-साथ चले हैं। उनकी प्रतिक्रियाओं से ऐसा आभास हुआ कि यात्रा तो हमनें की, आवागमन का कष्ट हमने झेला, खानपान की परेशानियां हमें हुईं लेकिन उसका असल आनन्द तो हमारे उन पाठकों व शुभचिन्तकों ने उठाया जो रस ले लेकर इसे पढ़े और टिप्पणियां कीं। ऐसा लगा कि पूरी यात्रा उन्होंने हमारे साथ ही कर लीं और हमारे सबसे परिचित भी हो लिए। इसे पढ़कर कइयों ने तो फोन भी किया।
सबसे पहले तो बिन्दू दीदी ही कीं। वे मुम्बई में रहती हैं, ऊषा जी की बड़ी बहिन हैं. लगीं कहने कि बहुत अच्छा लगा पढ़कर। फोटुओं की भी तारीफ कीं वे।
हमारे पुराने पत्रकार साथी असित बोस जो अब कोरबा में हैं, उनने कई पत्रकार और साहित्यकार साथियों का नाम लेते हुए टिप्पणी की, कि लाजवाब भाई, भूले-बिसरे दिनों की याद आ गयी। रोजी-रोटी के फेर में मशीन का एक पुर्ज़ा बन जाने की बात कहीं उनने। लिखे, कि हम लोगों का नसीब अच्छा है जो किसी न किसी रूप में साहित्य की सेवा कर रहे हैं। असित भाई बहुत मारक लिखने वालों में रहे हैं। मुझे उनका साथ अच्छा मिला। असित भाई, आप जानते हैं कॉफी हाउस में बात भी हुयी है, पत्रकार कभी मशीन का पुर्ज़ा नहीं बन सकता। उसमें माद्दा होता है। आप तो जीवट इन्सान हो, हम साथ हैं। शुभकामना के लिए आपका धन्यवाद।
साहित्यकार-बैरिस्टर संजीव तिवारी ने लिखा, कि पढ़ते हुए लग रहा है कि वे हमारे साथ सफर में हैं। फिर दूसरे दिन संजीव जी ने टिप्पणी की- वाह भई, अन्तिम पंक्तियों ने आँखें नम कर दीं। तीसरे दिन उनकी टिप्पणी रही, कि हमरे संगे गाँव उहो घूम रहे हैं। संजीव सम्वेदनशील ह्रदय के लगते हैं। तभी उनने उन तंतुओं को पकड़ा जो उनके मन से होते आँखों के करीब तक पहुँच पाए। इसे ही साहित्य कहते हैं। 
अरुण शुक्ला ने टिप्पणी की, कि मैंने पहली बार हमारी स्टोरी पढ़ी, कहने के लिए शब्द नहीं हैं....सच। अरुण सोचने वालों जिज्ञासु लोगों में लगते हैं। उनको हमारी शुभकामनाएं। इंडियन आर्मी के हमारे भतीजे मनीष शुक्ला (सीटू) का कॉमेंट है कि उन्हें उनके बचपन का सफर याद आ गया। अच्छा लिखे हैं। बचपन के सफर की बात ही कुछ और होती है। सचिन शुक्ला ने बहुत धन्यवाद कहा है, शायद उन्हें अच्छा लगा हो . दिल्ली से उमाशंकर शुक्ला का कहना है कि हम हमेशा ही दिल छू लेते हैं। बेहतरीन लिखावट है। फिर दूसरे दिन उनने टिप्पणी की कि हम रियली ग्रेट हैं.…हैट्स ऑफ। हम ग्रेट तो नहीं लेकिन उमाशंकर की भावनावों का सम्मान जरूर करते हैं।
प्रज्ञा दूबे ने लिखा कि हम उन लोगों में गिने जाते हैं जो लोगों की कमियों से ज्यादा खूबियां पहचानते हैं। प्रज्ञा जी ने कुछ तो ठीक लिखा है। लेकिन खूबियों के हक़दार वही होते हैं जो उसके लायक होते हैं। बाद में प्रज्ञा जी ने लिखा कि लगता है कि हम उनके घर को अच्छे से जानते हैं। प्रज्ञा जी. प्यार करने वालों को कौन नहीं जानता? लिली भी तो इसी लिए पसंद आती हैं न ? 
संगीत की मल्लिका मोनू के लेख है, कि हमारा लेख उन्हें हमेशा प्रभावित करता है, तो यह हमारा सौभाग्य है। सरस्वती की देवी बोल रहीं हैं यह क्या कम है हमारे लिए।
 अवनीश दूबे ने लिखा है 'वेरी नाइस' तो इसके लिए अवनीश को वेरी थैंक्स।
 राजनीति के दिनों के हमारे साथी शशि भूषण ने लिखा कि बहुत दिनों बाद अपनों से मिलना अच्छा लगा। अपनों से दिनों बाद की मुलाक़ात सुखकर होती ही है शशि भाई। हमें भी कुछ कम न हुयी आपकी टिप्पणी पढ़कर। 
युवा वैज्ञानिक प्रकाश शर्मा ने गज़ब कर दिया ! लिखे, कि गाय और गांव की कथा ने मुंशी प्रेमचन्द के गोदान की याद दिला दी। प्रकाश जी की अपनी भावनाएं हैं, लेकिन अपुन समझते हैं कि हम उनके घलुआ बराबर भी नहीं। कहाँ प्रेमचन्द कहाँ हम!
डॉक्टर मनोज आनन्द ने वेरी नाइस लिखा तो डॉक्टर साहब को वेरी थैंक्स।
हरिकेश दूबे ने लिखा,
पुरानी अनूभूति एवँ वर्तमान की सच्चाई का एहसास कर के अच्छा लगा। हमें भी उनकी यह टिप्पणी पढ़कर अच्छा लगा। 
दूरदर्शन के पत्रकार मो. फ़ारूक़ का कहना है की वो 7 दिन साहित्य लेखन का अच्छा उदाहरण है, यह लेख युवावों को अच्छे लेख के लिए प्रेरित करता है। ठीक है फारूक जी, आप भी लिखें। हमारी शुभकामना। नवभारत की प्रतिभाशालिनी पत्रकार संगीता मिश्रा ने लिखा कि हमनें जो लिखा वैसा दृश्य उनकी आँखों के सामने दिख गया। यही लेखन की सफलता है। संगीता सुरुचि में अच्छा कर रही हैं। उन्हें बधाई।
पैथोलॉजी में गरीबों की सेवा करने वाले मुक्तकंठ साहित्य समिति के अध्यक्ष-साहित्यकार सतीश चौहान को इसमें गांव की खुशबू मिल गयी, यह अच्छी बात है कि गावों की खुशबू महकने का अहसास लोगों में है। यही गॉवों को जीवित रखेगा। अन्त में सतीश जी ने लिखा, अपनो के बीच की अपनी बातें....सतीश जी हमारे अपने ही हैं। उन्हें अपनापा महसूस हुआ हम धन्य हुए।
दिल्ली से राजीव निगम की टिप्पणी भी प्रेरक है, कि हम ग्रेट हैं और हमारे सभी लेख पढ़ने से उन्हें अच्छे लगते हैं। राजीव को धन्यवाद हमारा। उन्होंने और सोनू ने लिखा की वे हमारी अम्माँ को बड़ा मिस करते हैं। इसलिए सोनू-राजू आप लोग हमारे दिल में रहते हैं।
मुम्बई से आशीष पाण्डेय ने फोटो की तारीफ की है। मुंबई से रिंकी पाण्डेय ने प्रणाम किया है तो उन्हें आशीष। दीपक कुमार वासनिक ने वेरी नाइस लिखा है उन्हें थैंक्स। 
अनेक लोग ऐसे भी हैं जिनने हमारे ब्लॉग वाले फोटो पर टिप्पणी कीं। इक़बाल राइन ने लिखा, दाढ़ी बना कर बढ़िया से रहा करो यार। ध्यान देंगे इक़बाल जी।
डॉ. मनोज आनन्द और प्रवीण दूबे को फोटो बाबा की तरह लगती है, हम 'बाबा' की चरण धूलि भी नहीं हो सकते। बहरहाल उनकी टिप्पणी से हमारा मन विभोर हो गया।
एस. राजू ने पूछा है कि मैं इतना सीरियस क्यों दिख रहा हूँ ? राजू जी, ऐसी कोई बात नहीं हैं, आप-से शुभचिंतक हैं, तो सीरियस का कहाँ सवाल? 
हितवाद के हमारे पत्रकार साथी प्रशान्त सरकार ने लिखा हम स्कॉलर-फिलॉस्फर लग रहे हैं, प्रशान्त जी आपके मुँह में घी-चीनी. 
इसके साथ ही अनिल मिश्रा, विक्की शर्मा, भैया अशोक श्रीवास्तव, प्रेम गुप्ता, निखिल, सूर्यप्रकाश मिश्रा, अवधेश यादव, भैया प्रमोद भारद्वाज, मोंटू तिवारी, स्नेहा मिश्रा, विशाल कुकरेजा, प्रकाश शर्मा, ममता शुक्ला, सुधीर शुक्ला, एंजेल सारिका, धनञ्जय शुक्ला, राजकुमार नंदे, आदरणीय दीनबन्धु शुक्ला, अभिषेक शुक्ला, सोनाली धर चक्रवर्ती, अनिल मणि त्रिपाठी, ललित कुमार वर्मा, तेजेंदर सिंह गगन, राजेश मिश्रा, इन्द्रनील श्रीवास्तव, महेन्द्र सिंह शेखावत, रामप्रकाश ढीमर, राकेश मणि त्रिपाठी, दीनबन्धु मिश्रा, मनीष जाग्याशी, रमज़ान खान, राजकिशोर भगत, सन्तोष सिंह, विनोद उपाध्याय, विनोद दुबे, अनूप कुमार जैसवार, मृदुल शुक्ला, सैय्यद मज़हर हुसैन, रवि दाहटे, हर्ष दूबे, अतुल गुप्ता, विजय शर्मा, अन्जन दास, गिरिजा यादव, अभिनेष त्रिपाठी, गोलू मिश्रा, सुभाशीष सेनगुप्ता, रमाकान्त गुप्ता, सीमान्त कश्यप, गुरदेव सिंह रंधावा, हरेन्द्र अवस्थी, संजय कुमार, जगदीश कुदरिया, तरविन्दर सिंह छत्री, सतनाम पामा सहित और कइयों लोगों ने इस वृतान्त को पसंद किया है। उनके प्रति आभार.. 

                                                                                                          इतिश्री  ....  
 


Wednesday, 25 June 2014

                                              वो ७ दिन 

                                                                             (७)

आधी रात पेट में ऐंठन होने लगी। यह इतनी बढ़ी, कि जड़-जड़ाय आ गया। ऊषा जी से लेकर काका-अम्मा सब परेशान। रजाई ओढानी पडी। हरिकेश जी कोई टेबलेट और सिरप दिए, राहत मिला। लेकिन लूज़ मोशन शुरू हो गया। हो सकता है खानपान में गड़बड़ी हुयी हो। प्रातः मन हल्का हुआ। रिजर्वेशन हो न सका था, तबीयत भी नासाज़ थी, तो हमने आज़ की यात्रा स्थगित कर दी। घर वाले भी यही चाहते थे। काका राउतपार चौराहा गए और हमारे लिए लूज़ मोशन की दो खुराक दवा ले आये। बेचारे चलने में तकलीफ पाते हैं। घुटने चलने नहीं देते। नीतीश ने उन्हें एक्यूप्रेसर का इलाज़ बताया, घुटने के नीचे कुछ पॉइंट्स पर प्रेस भी किया, वे दर्द से कराह  उठे। लेकिन उनका भी एक समय था। खासे पहलवान थे। अपुन तो उनकी पहलवानी देखे नहीं, लेकिन वे उन दिनों की बात अपने बाजुओं की मछली निकाल, उसे ठोंक-ठोंक कर बताते हैं कि कैसे अच्छे-अच्छे पहलवानों को वे अपनी धोबी पछाड़ से चित्त कर दिया करते थे। कइयों लीटर दूध-घी चट कर जाने की बात भी वे बताते हैं। तभी तो  उनके खूंटे आज भी जर्सी गाय ज़रूर बंधी दिखती है। अपुन को तो दोनों समय भर कटोरा दही ओर बड़ी वाली स्टिल गिलास में औंटा हुआ दुध मिलता है। इसी से पता चलता है कि उनकी पहलवानी के क्या दिन रहे होंगे। अपुन तो उन्हें तबसे जानना शुऱू किये जब वे अपनी मंझली बिटिया (ऊषा जी) का सम्बन्ध लेकर हमारे घर आये थे। तब उनके साथ उनके बड़े भ्राता (बाबूजी) भी आये थे। एक नज़र देखे और बतियाये नहीं क़ि चट से नज़्र देने को तैयार हो गए वे। उनका पिछले ही बरस स्वर्गवास हो गया। ८५ के ऊपर तक चले हैं। अब उनकी कमी खलती है। उनकी दी रामायण नित्य उनक़ी याद दिलाती है। तो काका हमारे विवाह में परछावन की लिए स्वयँ ही चालते हुए अपनी एम्बैसडर कार लेकर आए थे। उसी में हमारी अम्मा, भाभी, दीदी, फुआ आदि से लेकर अनेकों स्त्रियों ने पालम बाबा के थान तक घूम कर परछावन किया था। अब तो वे भी ८५ क्रॉस ही कर रहे होंगे, बाल सन की तरह सफ़ेद हो गये हैं। दोनों घुटने इस कदर टाइट-से हो गए हैं कि चल-फिर सकना दूभर होता है। तब भी है कि अल सुबह उठ जाते हैं . एक हमें देखिए, शहर में रहकर भी उठते हैं तो सूर्योदय हो गए रहता है। वे तो उठते ही गाय को नाद पर लगाते हैं और सानी-पानी करते हैं, गोबर काढते हैं और लगे रहते हैं। इसी में चरी काटने जाते हैं फिर उसे छांटते भी हैं। नौजवानी में जब लोग मुंह बा कर सोना पसन्द करते हैं, काका का इस वार्धक्य में भी निरंतर श्रम में लगे रहना प्रेरणा देते हैं।
चाचा ससुर श्री सुखदेव दूबे पूछने आए हैं। 'रात तबीयत कैसे ख़राब हो गई ?' उनसे स्वास्थ्य संबंधी कुछ बातें हुईं। वे प्रतिभा का सम्मान करने वालों में हैं। ब्लॉक डेवलेपमेंट ऑफिसर (बी डी ओ) थे, अवकाश ग्रहण करने के बाद घर पर ही रहते हैं। हमारे कहानी संग्रह बाबा व अनारकली की तारीफ़ करते हुए उपन्यास लिखने को कहे थे, ज़रूर लिखेंगे।
लो, ये प्रांजल और शिवम् आ गए। पट्टू के सुपुत्र हैं दोनों प्रायमरी में हैं। प्रांजल तो शुरू से हमारे मनोरन्जन का विषय रहा है। अमृत और अक्षत भी आये हैं। ये दोनों हरिकेश जी के आत्मज हैं। अमृत को पहाड़ा रटा रट्ट है तो अक्षत भी क़म नहीं। दोनों के पास प्रतिभा है बशर्ते और तराशें। हरिकेश दोनों की परवरिश बेहतर कर रहे हैं। यही प्रसन्नता है, वर्ना वह हरिकेश हमें नहीं भूलता जब हमारा पाणिग्रहण हो रहा था, कितना छोटा था वह। लेकिन हिम्मत से ग्रेजुएट हो गया। कंप्यूटर में दक्ष हो गया। अब तो वह काफी कुछ पा लिया है। पिता भी मदद करते हैं। मैटेरिअलिस्ट नहीं है वह, तभी तो शहर के अच्छे-भले काम को ठोकर मार आया। माँ-पिता की सेवा और पत्नी-बच्चों की परवरिश करता है। यही बड़ी बात है।
तो दिन कट गया। रात हमने फैसला किया, कल निकलेंगे। दुसरे दिन सवेरे ही तैयार हो गए। ६. ३० बजे ग़ाज़ीपुर के लिए बस थी। हरिकेश जी दो फेरे में हमें राउतपार चौराहा लाये फ़िर ऑटो में सवार हम बड़हलगंज के लिए रवाना हो गए। वहां १० मिनट ही खड़े होंगे कि पीं-पों, पीं-पों करती बस आ गयी। हरिकेश जी और निखिल लपक कर उसमें चढ़े और हमारे लिए जगह की व्यवस्था किये। अब जाने की बारी थी। हरिकेश जी की आँखें सजल हो गयीं। वियोग कष्ट देता ही है, हमारा मन भी भरा हुआ था। बस छूटने पर ऊषा जी की आँखें चल पड़ीं थीं। सरयू पार हो रही हैं। लो, सरयू पार हो गयीं। प्रणाम सरयू मैया, प्रणाम।   
 

Sunday, 22 June 2014

                                             वो ७ दिन 

                                                                           (६)

लिली आयी है। सूंघ रही है हमें। पाहिले तो बड़ा डर लगता था इससे। लेकिन अब नहीं। अब तो खेलने का मन करता है इसके साथ। बड़ी चैतन्य व फुर्तीली है यह। बच्चे बॉल खेलते हैं तो यह भी उसमें शुमार हो जाती है।  क्रिकेट खेलते हों तो फील्डर बन कर तैनात रहती है। दूर तक जाती गेंद को लपक कर पकड़ती है, मुंह में दबाती है और लेकर आ जाती है। हमने अपने मीठे का एक हिस्सा दिया तो उसने स्वीकार कर लिया।
सहसा ऊषा जी आईं और बोलीं, ' समै माई के दर्शन को चलना है।'
'समै माई!' हमारे मन में रोमांच हो आया। सहसा वह दृश्य कौंधा जब हम छोटे थे और अम्मा हमें लिए करही कढ़ाई चढाने समै माई के थान लिए जाती थीं। हमारे गांव से समै माई का थान कम दूरी पर नहीं है। कइयों कोस का फासला है। तरैना पर कर अनेक गांव होते पड़ौली की यात्रा होती है। इसी पड़ौली गांव में समै माई का थान पड़ता है। तब अम्मा हमें मुंह अँधेरे जगा देतीं और रैठा ( अरहर के सूखे पेड़ जो ईंधन के प्रयोग में आते हैं) का छोटा-सा बोझ बनाकर हमारे सिर पर रख देतीं और खुद एक झोला लेतीं जिसमें भोजन पकाने की सामग्री व कुछ बर्तनादि रहते। फिर गांव की अनेकों स्त्रियां अपने बाल-बच्चों के साथ पड़ौली के लिए प्रस्थान करतीं। रस्ते भर हरियाली की बहार रहती।  कहीं अरहर की सघन फसलें मिलतीं तो कहीं ऊँखों(गन्नों) के खेत; कहीं मटर-चना तो कहीं आलू-गंजी; पीले फूलों से सजी सरसों की फसलें ऐसा प्रतीत होतीं मानो धरती को पीले बुनकों वाली चादर ओढ़ा दी गई हों। इन सभी फसलों में हमें कहीं भय तो कहीं खुशी का आभास होता। सरसों व गन्ना के सघन फसलों को देख हम सहम जाते। इन फसलों में हाथी से लेकर सियार, हुंड़ार, साही, लकड़बग्घा, नीलगाय, जैसे पशुओं के छिपे होने के साथ ही भूत-प्रेतों का भी भय रहता। सबसे ज्यादा कष्ट हमें उन मूँजों से होता जो मार्ग के दोनों और बहुत गझिन और फ़ैली हुयी रहतीं। वे सुई-सी नुकीली होती हैं। थोड़ी भी असावधानी हुयी नहीं कि बदन में घुंसीं, नहीं तो कपड़े में हीं फंसीं। हम बच्चे थे, सिर पर बोझ, नन्हें कदम ऊपर से दूर का रस्ता, डगमगा जाते, लेकिन हर बार अम्मा हमें सम्हाल लेतीं। खरोंच न आने देतीं। फिर रस्ते भर अम्मा के साथ ही अन्य स्त्रियों का समवेत स्वर में 'देवी झूली-झूली ना.…जैसे देवी गीत हमें बांधे रखते। उन गीतों में एक-से-एक मनौतियां होतीं, जो हमारे और परिवार के कल्याण के लिए ही होतीं।
वहां की स्मृतियाँ इतनी मधुर, चपल व भाव विभोर कर देने वालीं हैं कि ऊषा जी ने कहा और हम चट-से तैयार हो गए। पहले भी तीसों बरस से जब भी हम गांव जाते तो तय करते, कि इस बार ज़रूर समै माई के थान चलेंगे। किन्तु हर बार साधनाभाव, असुविधाएं और अन्य परेशानियों को देख मन मसोस कर रह जाता। अम्मा जब तक रहीं जोर देतीं रहीं, पर कैसे जाएँ ? न वह बालपन है न आने-जाने का साधन। इस बार तो निखिल है। हरिकेश जी की मोटरसाइकिल है, साथ में ऊषा जी हैं।
जाने क्यों लग रहा है कि अदृश्य रूप से अम्मा ही हैं जो वहां ले जाने को तैयार हैं। चटपट तैयार हुए। निखिल ने मोटरसाइकिल निकाली तो हरिकेश जी से लेकर प्रकाश भैया मार्ग बताने में लगे की हाटा से नज़दीक रहेगा। भाभी (पट्टू की मम्मी) बोलीं कि इधर से निकलने में भी परेशानी नहीं है, तो रुनझुन को गोद में लिए बन्नी कहने लगी कि उसका घर तो वहीं आसपास ही है, इस रस्ते चल दीजिये। सबकी सुन हम निकल पड़े पड़ौली के लिए। इस बार न अम्मा थीं न वह बालपन और न ही पैदल यात्रा। अब मोटरसाइकिल थी, निखिल चला रहे थे और ऊषा जी हमारे पीछे बैठी थीं। हाटा से मामखोर वाले रस्ते बढे तो बीच में भीटी-लौहरपुर से हमारा गांव और पालम बाबा का थान दिखा, हमने सिर नवा दिया। मामखोर-बड़गों होते हम आगे बढ़े। तरैना का एक छोटा पुल क्रॉस किया। सड़क किनारे ताड़ी बिक रही है। यहाँ ताड़ी खूब बिकती है। रस्ते चलते इसके शौक़ीन लोग खरीदकर कोकोकोला सरीखा पीते हैं। छुटपन में अपुन भी एकाध बार लिए हैं। खट्टा-सा लगता है, कहते हैं कि इसके पीने से भूख बढ़ती है अपनी बढ़ी थी या नहीं ख्याल नहीं।
यहीं पूछे एक से पडौली का रास्ता, तो उसने कचिया की ओर इशारा कर दिया। हम उतर पड़े कच्चे रस्ते खेत में। आगे एक सवारी और जा रही थी, पता चला वे लोग भी वहीं जा रहे हैं।  पीछे हो लिए हम। किलोमीटर भर चले कि पक्का रास्ता आ गया और समै माई का थान नज़र आने लगा। हमारा मन बल्लियों उछलने लगा, गुदगुदी होने लगी। पुराना वह सारा दृश्य चलचित्र की भांति आँखों के सामने घूमने लगा। हम बढ़ते जा रहे हैं। समै माई नज़दीक आती जा रही हैं, हमारी नज़रों के समक्ष अम्मा घूम रही हैं।
'अरे! वो देखो, वहाँ पोखरा था। वो, वो देखो वहां तो मार्केट-सा दृश्य है जहाँ कड़ाही चढ़ा करती थी। अरे! यहाँ तो चहल-पहल बढ़ गयी है। चबूतरा पक्के का बन गया है।'
हमारी कुतूहल भरी प्रसन्नता, मन के आर्द्र भाव को निखिल और ऊषा जी भांप रहे थे। वे भी खुश थे। हम मंदिर के आहाते में मोटरसाइकिल खड़ी किये और पुष्प प्रसादादि ले माई के दर्शन को बढ़े। वह मतवा नहीं दीखतीं जो भभूत देतीं थीं। पता चला वे सदा के लिए चली गयीं। मेहदरावें के कोई दूबे जी हैं जो पूजा-पाठ करते हैं। हमने मंदिर का परिक्रमा किया, निरियल फोड़ा और पूजा कर निकले। मंदिर में ढेर सारी घंटियां बंधी हैं, बताया गया कि मन्नतें पूरी होने पर लोग घंटियां चढ़ाते हैं। हमारी कोई मन्नत नहीं थी। एक साध थी जो पूरी हुयी। फिर निखिल ने हमारा वहीं फोटो खींचा। कुछ देर रुक हम रिटर्न हुए।
ऊषा जी कुछ खाई नहीं हैं, बिना कुछ खाए-पिए देवी-दर्शन उनकी आदत है। तो हम खूब सारी खुशियां लिए लौट आये राउतपार।
यहाँ प्रणव जी मिले, गोरखपुर जा रहे थे आशीर्वाद लेने आये थे। वे प्रकाश भैया के होनहार चिरंजीव हैं जो गोरखपुर में डॉक्टरी (बी डी एस ) पढ़ रहे हैं। सिम्मी भी जा रही है। वह नीलम दी की आत्मजा है, वही नीलम दी जो हमारी बड़ी साली लगेंगी और जो एम ए की पढाई के दौरान कॉलेज जाते हमें विवाह के पूर्व देखने आयी थीं और यह कहती गयी थीं, कि 'ठीकै तो हैं।' तो सिम्मी से हमने बातें कीं, वह आगे बढ़ सकती है, बुद्धि तेज़ है, लेकिन तरसना होगा। सुना है नीलम दी इस उम्र में भी संगीत और कंप्यूटर सीख रही हैं। उनमें इतनी प्रतिभा है तो सिम्मी भी आगे होगी ही। उन्हीं का एक सुपुत्र शिवम् भी भोला व अच्छे विचारों वाला है। पिता की खूबियां लिया है। हमने प्रणव व सिम्मी को आशीर्वाद दिया। तब तक छुटकुल्ली रुनझुन दिखी, भाभी की गोद में थी हमनें लपक लिया। सुभी भी हमें ललचाती है, गुड़िया-विनय की बेटी है वह बच्ची। गुड़िया को तो हमने खिलाया है, सोचा भी न था कि कभी उसकी शादी हमारे ससुराल में होगी। वह हमारी बड़ी दीदी की ससुराल बरपार की है। अब देखिये यहाँ आ गयी।
हमारे एक और बड़े चचेरे साले अभिमन्यू भैया चाय पर बुला रहे हैं। वहां पहुंचा हूँ। भाभी नहीं हैं. वन्दना ने बताया कि वे अपने मायके गयी हैं। वन्दना के बच्चों से बात किया, दोनों गोरखपुर में पढ़ रहे हैं। होशियार हैं। उनके पिता बैंकॉक में रहते हैं। वहीं एक और बड़ी चचेरी साली बच्ची दीदी भी थीं उनने भी हलचल पूछा। अनिल भैया खीरा लाये हैं। हमने पुछा कि खेत से तोड़कर ला रहे हैं क्या? तो उनने कहा, नहीं। फिर कटोरे में खीरा काटकर बन्नी लिए आयी। अरुण भैया खटिये पर बैठे है कुछ बात कर रहा हूँ उनसे पूछ रहा हूँ बाबूजी की सारी पुस्तकें कहाँ हैं? वे कहते हैं वही लोग रखे होंगे कहीं। तब तक अमृत-अक्षत ने भोजन पर बुलाया। हमारी सरहज सुषमा जी इंतज़ार कर रहीं हैं। वे भी जीवट की स्त्री हैं भई। अनेक झंझावातों को पार कर पूरे परिवार को लिए चल रहीं हैं वे। अभी कुछ दिन पहले ही उनके गाल में घाव हो गया था, दर्जनों टांके लगे थे, लेकिन उफ़ तक न कीं। पूूरी ज़िम्मेदारी के साथ लगी रहीं। हरिकेश को अच्छे जीवन संगिनी मिली है। प्रकाश भैया की पत्नी को ही ले लीजिये, आधुनिक शैली की भारतीय स्त्रियां उनसे सीख ले सकती हैं। तो हम चले भोजन करने। अम्मा और काका बैठे होंगे। हमारे बिना कहाँ खाते हैं वे। कहते हैं पांव पूजे हैं तो कैसे भूल जाएँ।          

Friday, 20 June 2014

                                             वो ७ दिन 

                                                                           (५)

कमच्छा आते दिख रहे हैं। वही कमच्छा जिन पर हमने एक कहानी लिखी ' चौराहे पर कमच्छा'. यह कहानी अक्षर पर्व में छपी थी। देश भर से प्रतिक्रिया मिली थी इस पर। हम जब भी कमच्छा को देखते हैं वह दिन याद आता जाता है, जब इनसे पहली मुलाक़ात हुयी थी रायपुर के मेकाहारा अस्पताल में। इनके बारे में अम्मा से सुना करता था। हमारे ही गांव के बनिया हैं जो लम्बे लमय तक गांव से दूर रहे। हम देखे नहीं थे इन्हें। भिलाई में सहसा पता चला कि वे रायपुर के मेकाहारा में भर्ती हैं! पहले तो यही समझ न आया कि ये रायपुर कैसे आ गए। तब हमारा प्रेस रायपुर के पंडरी में था। हम पहुंचे रायपुर प्रेस और अपने अन्यतम साथी श्री नरेन्द्र चौहान को साथ लेकर मेकाहारा गए। इन्हें पहचानते तो न थे लिहाजा डॉक्टर से वार्ड और बेड नंबर पूछकर बिस्तर के पास पहुंचे। ये बेचारे एक आँख पर मोटी-सी पट्टी बाँधे लेटे थे। हमें देखे तो उठ बैठे। हमनें अपना परिचय बताया तो उनकी खुली आँख चल पड़ी। हमनें उन्हें ढाँढस बंधाया। उनने बताया कि वे एक निजी कारखाने में काम करने आये थे। उनकी ही लापरवाही से छोटी चिंगारी उनकी आँख में आ धँसी। नरेन्द्र भाई के साथ हम बाहर गए उनके लिए दवाइयाँ और भोजन खरीदे और डॉक्टर को साथ लेकर आये व उनके उचित देखभाल-चिकित्सा करने का अनुरोध किया। हम चलने लगे तो वे कृतज्ञता से ऐसे देख रहे थे मानो हम उनके भाई से कम न हों। फिर हफ़्तों हम नियमित अस्पताल आते रहे और बाद में उनकी छुट्टी कराकर अपने यहाँ ले आये। उसके बाद वे स्वस्थ होकर गांव लौटे। अब नियमित वहीं रहते हैं। 
तो वे आये और पास बैठ गए। हमनें कामधाम के बारे में पूछा तो लगे बताने, कि यहाँ नरेगा में कुछ काम मिलता है, लेकिन उसका पैसा सही नहीं मिलता। उनने बताया कि उनका बेटा राजू बाहर कमा रहा है। सुनकर अच्छा लगा। उनकी पत्नी स्कूल में रसोइया है. उसे भी पैसे मिल जाते हैं। कुछ देर रुक कर वे अपनी राह पकड़े तो अपन भी चाय-नास्ता कर सोचे क्यों न थोड़ी खेतवानी हो जाये। नीतीश को लिए और निकल पड़े पोखरे की ओर। बटोही के घर के सामने स्कूल के पीछे वाले स्थान पर क्रिकेट चल रहा है। बटोही की यादें भी काम नहीं हैं। उस छुटपन में पेट में ऐंठन, मरोड़ या मीठा दर्द होता तो अम्मा हमें इन बटोही के पास ही भेजतीं। क्या जादू रहता भई इनके हाथों में! जितना सुन्दर चाक चलाते उतना ही अच्छा हाथ भी। एक धागे से पेट और सीने के बीच माप-सा लेते और फिर अपने हाथों से मालिश करते। कुछ देर में दर्द फफूचक्कर हो जाता। यहीं क्रिकेट खेलते सचिन दिखा। हमें उसे देखने की उत्सुकता भी थी। वह हमारा फेसबुक मित्र है। दिमागदार लगता है। फेसबुक में अच्छी-अच्छी प्रेरक बातें लिखता रहता है। यहाँ दिखा, फोटो से पहचान गए। हमनें सोचा, थोड़ा बात कर लें। वह तो हमारे पास आया नहीं। बस निखिल-नीतीश के साथ मस्त दीखता है। तो हमनें उसे खेलते से रोका। वह शरमा-सा रहा था। फिर कुछ लफ्ज़ बोला, यही कि उच्च शिक्षा लेने के बाद वह यहीं किसी स्कूल में पढ़ा रहा है। हमें खुशी हुयी। विद्या-दान से बड़ा भला और अच्छा हो भी क्या सकता है। उसे आशीर्वाद दे हम आगे निकले।
बाबा के लगाए अपने बाग पहुंचे। महुआ का बड़ा वृक्ष लहरा रहा है मानो हमारी आगवानी कर रहा हो। लगा बाबा खड़े हैं। हम दौड़कर उससे लिपट गए। हमारी भावनाओं को निखिल-नीतीश परख रहे थे, उनने चट से फोटो खींच लिए। कभी इस बाग़ के पेड़ों पर चढ़ कर हम आम तोड़ा करते, उसकी सूखी टहनियां जलावन के लिए लाते। लेकिन आज वह सुख कहाँ? यहीं बगल में गोपाल मिले। हमारे घर के बगल ही इनका घर था किन्तु परिवार बड़ा हुआ तो यहाँ खेत में आकर अपना आशियाना बसा लिए। कई लोगों ने खेत में घर बनाया है। इसीलिए तो खेती का रकबा सिकुड़ा जा रहा है। बाग-बगीचे कट रहे हैं। हमारे आदरणीय श्री दीनबन्धु शुक्ल भी अपने गांव गए थे और पिछले दिनों फेसबुक पर बाग को लेकर अपना दर्द बयां किये था। कमोवेश यही हाल हर गांवों का है। बहरहाल, गोपाल से चर्चा कर हम आगे बढ़े। भुलई के बारी होते पहुँच गये मलहवा के मड़ई के पास। बहुतों से हुयी मुलाकात। दुःख हुआ कि सब एक-दूसरे के निंदा-प्रपंच में लगे हैं। कोई किसी को सोधा नहीं रहा है। ऐसा तो कभी न था इस गांव में! ग्रामीण समरसता इतना कम हो जाये कि लोग एक दूसरे की मदद करना तो दूर, दुखों के कारण बनते जाएँ तो सोचना पड़ता है कि जा कहाँ रहा है गांव? खैर, घर आये तो पता चला कि कैलाश शुकुल, पौहरी भैया, अनिल भैया आदि याद कर रहे थे। सबसे मिला, वही राम रहारी और चाय-पान के बाद कुछ बातें। फिर छोहड़ी माई का दर्शन किये।
ये लो, आ गया भिलाई से फ़ोन। बख्शी सृजन पीठ से है। राजनांदगांव में साहित्यिक गोष्ठी है। सञ्चालन मुझे करना है। हमने विवशता बताई तो वे मान गए। सोचे थे कल निकलने को, लेकिन अब सोचते हैं चलें राउतपार, वहां से परसों भिलाई के लिए प्रस्थान करेंगे। कुछ दौरा वहां भी हो जाए।
सामान बांधे, चाचा ले मुलाक़ात किए। याद आया..  अम्मा होतीं तो डीह बाबा के पास ले जातीं, वहां सिर नावाने को कहतीं और लोटे में जल लेकर हमें दूर तक छोड़ने आतीं। हम खुद ही द्वार पर डीह बाबा के चबूतरे पहुंचे और उनके सामने सिर नवाए मानो अम्मा साथ हों। आँखें भर आयीं हमारी। वहां से चले तो पालम बाबा का थान दिखा। यहाँ तक आतीं थीं अम्मा हमें छोड़ने। आज नहीं हैं। हम बच्चों के साथ हैं, फिर लग रहा है अकेले हैं। अम्मा के बिना किसी का कोई मोल नहीं। वह होतीं तो अभी भोंकार छोड़ कर रोने लगतीं। हम भी अपने को न रोक पाते और उनके अँचरे में दुबककर हबसने लगते। फिर सरे रस्ते हमारा चुपके से रोते बीतता। अम्मा, अम्मा, अम्मा चारों ओर अम्मा ही दिख रहीं हैं और हमारे आंसू ढुलकने से मानो रोक रहीं हैं। पालम बाबा का आशीर्वाद ले हम चल दिए। अलविदा गांव!
 

Saturday, 14 June 2014

                                            वो ७ दिन 

                                                           (४)

 सँउकेरे थोड़ी दूर बगल के नीम-वृक्ष पर एक लड़का चढ़ रहा है। हमनें सोचा क्यों न टूथपेस्ट रगड़ने की बजाय आज दांत-मसूड़ों से ही कुछ कसरत करवाई जाए। बिना काम के उनकी गति भी मद्धिम पड़ने लगती है। वह लड़का तेज़ी से चढ़ा जा रहा है। उसे देख हमें वह दिन याद आया जब ७-८ की उमर में हम भी बाबा द्वारा लगाए अपने द्वार के उस विशाल नीम-वृक्ष पर चढ़ा करते थे, तभी जाने कैसे घूँघट काढ़े अम्मा आ पहुँचतीं और डपट पिलातीं। लेकिन हम पर वह तनिक भी असर न करता और हम और ऊँचे चढ़े जाते। बहोत कोशिशों के बाद हारकर वे हाथ जोड़तीं और मिन्नतें करने लगतीं-'बाबू, गिर पड़ोगे, उतर आओ।'
'नहीं गिरूँगा अम्मा।' हम चढ़ते हुए वीरता दिखाते।
'तो मरा मुँह देखोगे मेरा, उतरो नहीं तो मेरी सौं।' मानो उसका कलेजा फट रहा हो।
अम्मा के इस वाक्य में जाने कैसी वेदना होती कि हम चुप से उतरते और उनकी गोद में भागते। वे भी लपककर हमें अपनें अँचरे में दुबका लेतीं। 
हमनें अपने द्वार के उस नीम-वृक्ष को निहारा। उसकी विशालता वैसी ही बनी हुयी है। यह वृक्ष डीह बाबा के चबूतरे को छाँह तो देता ही है, परछावन के लिए आने वाले वर व अन्य सभी लोग इसके छाँव में रस्म अदायगी करते हैं। कभी इसी की छाया तले अजोद्धा (ठाकुर) हमारे और पड़ोसियों के केश कर्तन किया करते थे । हाल ही में वे दिवंगत हो गए। वे भी क्या जिन्दादिल इन्सान थे। जितना अच्छा अस्तूरा फिराते उतना ही अच्छा ढोलक बजाते। मुझे तो उनसे बेहद स्नेह था। वे कभी कभार मलेरिया की टेबलेट भी बांटते थे। इसीलिए अक्सर हम उन्हें डॉक्टर कह दिया करते। यह सम्बोधन सुनकर वे खुश हो जाते। हम जब भी गांव गए, तो आवश्यक न होने पर भी हमनें निखिल-नीतीश का केश-कर्तन उनसे करवाया। बदले में जब हम कुछ पैसे उनके हाथ पर रखना चाहते, तो वे इनकार कर देते- 'ये क्या बाबू! यह खुशनसीबी बार-बार मिलती है?'
'क्यों? बाबा तो पैसे से लेकर अनाज तक जो कुछ देते, रख लिया करते थे, हमसे क्यों नहीं?'
'अरे, अपने बाबा की याद न दिलाएं सरकार। उनकी सानी कहाँ। फिर उस वक्त तो नियमित का काम था। आप तो कभी-कभी आते हैं।'
'फिर भी ले लो, बच्चों को आशीर्वाद मिल जायेगा।' हमारे इस वाक्य के आगे वे नतमस्तक। ठहाका मारते, रूपये हथेली में बंद कर लेते। उनकी पत्नी काफी पहले चल बसी थी, बड़ी सेवा भावी थी। सुना है उनका छोटा पुत्र निर्मल गांव में ही है। मुझसे मिल नहीं पाया। 
वह लड़का दातौन तोड़कर उतर आया है। दो छरका हमें भी दिया है। हमनें पत्तों को अलग कर कइयों दातौन तैयार किए और एक को अपने मुख में ले दतुअन करने लगे। थोड़ा कड़वा लगा, लेकिन मुँह की ताज़गी मञ्जन की ताज़गी से अच्छी लगी।
मौसम ख़राब है, काले-काले बादल छा रहे हैं। पानी गिरेगा क्या? सहसा घाघ की कहावत याद आयी, करिया बादर जिव डेरवावें, भूरा बादल पानी लावें। इस अनुसार तो पानी नहीं बरसेगा। हम सोचे कहीं घूम आवें। तो चलें तहसील गोला। लेकिन पानी टपकने लगा। अरे! घाघ की कहावत गलत होगी का? 
लेकिन चाय पीते कहावत सच हुयी, बूंदाबांदी बंद। हम निखिल के साथ सवेरे गोला के लिए निकल पड़े। मामखोर, बड़गों वाले रस्ते से गोला आए। वहां से सोचे क्यों न ननिहाल चला जाए। तीसों साल हो गए वहां गए। निखिल ने भी हामी भर दी। वह तो कभी नहीं गया है वहां। बच्चों में नयी जगह देखने की ललक होती ही है। 
वहां से उरुआं बाज़ार बहुत दूर नहीं है। सोचे शाम तक लौट आएंगे। फिर भी दरयाफ़्त करने के उद्देश्य से अपने मामा के छोटे सुपुत्र गोरखपुर में रह रहे शासकीय चिकित्सक डॉ. धर्मेन्द्र मणि त्रिपाठी को फोन लगा दिया। वे सुनकर खुश हो गए और बोले कि दूर नहीं है, आप पहुँचिये। हम उरुवां बाज़ार वाले रस्ते बढ़े। हमारे भीतर रोमांच था। तब कितना छोटा था, अम्मा के साथ आता था। नाना जीवित थे तब। मामा-मामी, धूरुप, अशोक, गीता दीदी से लेकर एक बड़ा परिवार। अब तो न नाना हैं न मामा। हमारी अम्मा भी जा ही चुकीं हैं। हाँ, छोटी वाली मामी नेमत हैं अभी। फिर उनका बड़ा-सा कुनबा दिल्ली-लखनऊ से लेकर प्रतापगढ़, बाराबंकी, आगरा, रांची, रीवा, इलाहबाद, हैदराबाद, बंगाल तक फैला है। एक से बढ़कर एक ऑफिसर हैं वहां के लोग। हमारी अम्मा बड़े घर की बेटी थीं, नाज़ों से पलीं। उनकी अम्मा याने हमारी नानी उनके बचपन में ही गुज़र गयीं थीं सो वे पिता और भाइयों के सहारे ही पलीं। 
उरुवां बाज़ार जैसे-जैसे नज़दीक आता हमारा मन बल्लियों उछलता मानो अम्मा साथ लिए जा रही हों। थोड़ी देर बाद सड़क के दोनों किनारों और अनेक जगहों पर खजूर के पेड़ देखने लगे- 'बस आ रहा है उरुआं बाजार निखिल। ये खजूर के पेड़ द्योतक हैं।' फिर हमनें उल्लास में बताया कि इधर खजूर के पेड़ बहुतायत में होते हैं। हमारे उल्लास को निखिल पहिचान गया था। इंजीनियरिंग कर रहा है, इतना समझदार तो हो ही गया है। 'पापा आप बहुत दिन बाद जा रहे हैं न अपने मामा के घर !' वह समझकर बोला था, हमारी तो आँखें भरी जा रही थीं, मामी को उनके उस घर को देखने के लिए जिसमें कभी हम छुपा-छुपौअल का खेल खेला करते थे। साथ नीतीश होता तो क्या खुश होता वह भी। पक्का बोलता, पापा को दादी की बहुत याद आ रही है न ? वह मेरी सम्वेदनावों को खूब समझता है। 
'लो आ गया उरुआं बाजार ! ये देखो निखिल, इधर से रास्ता जाता है मामा के गांव और इस तरफ हम घूमते हुए आ जाया करते थे।' हमनें निखिल को कुछ जगहें दिखाईं। हमारी प्रसन्नता को भांप कर वह भी खुश हो रहा था। हम एक जगह लीची लेने खड़े हुए कि सहसा बिरेन्द्र भैया मोटर साइकिल में दिखे। वे मामा के सुपुत्र हैं। मिलिट्री से अवकाश लेने के बाद घर पर ही रहते हैं। देखते ही रुक गए- 'धर्मेन्द्र ने फोन किया था, आपके आने की सूचना दी थी। लेने चला आया।'
'अरे आप क्यों परेशान हुए, हम घर तो देखे ही हैं। चले आते।'
हम मामा के गांव 'नकौझा' के रस्ते बढ़े। वाह! अब तो पक्की सड़क बन गयी है इधर। कुछ भी कहो, सड़कों के मामले में यहाँ के गावों ने प्रगति जरूर की है। हम जैसे-जैसे आगे बढ़ते पुरानी यादें अनावृत्त होती जातीं। ये देखो यहाँ पीपल का बड़ा-सा पेड़ था, अब नहीं है। वहां दूसरा पीपल उग रहा है। शायद पुत्र है, पिता की याद अक्षुण्ण रखना चाहता है। 'नकौझा' मुड़ने वाला रास्ता आ गया। उसी और मुड़ गया हूँ । कई द्वारों पर चउआ बंधे हैं। कुछ घरों के आहाते में परिवार बैठे हमें कुतूहल से देख रहें हैं, मानो बूझने की कोशिश कर रहे हों कि कौन हैं ये अज़नबी। अभी उतरकर बता दूँ, कि इमिरता देवी का लड़का हूँ, तो मिट्ठा-पानी से नीचे बात न हो। जाने क्यों यहाँ सभी मुझे अपने लग रहे हैं। इन्हीं गलियों में अम्मा दौड़ी-खेलीं होंगी न ? इन्हीं द्वारों पर कई बार किसी काम से आयी होंगी न ? इन्हीं लोगों के अपनापे में वे बड़ी हुयी होंगी और यही लोग या इनके घरों की स्त्रियां उनके विवाह में गीत गायी होंगी, रोते हुए विदा की होंगी।
लो हम मामा के दरवज्जे आ गए। अरे! घर तो पक्का हो गया है। लेकिन नाद वहीं पर है। गाय-भैंसे बंधी हैं। आहते से होते प्रवेश द्वार पहुंचे।  अरे! यह तो नाना की फोटो है, इसे हमनें उस छुटपन में अपने अल्फा कैमरे से खींचा था जो बिना फ्लैश वाला था। तब वे इसी तरह खटिये पर बैठा करते थे। तीसों बरस पहले एक प्रवास के दौरान यह फोटो खींची थी हमनें। उनकी फोटो देखकर श्रद्धा से सिर झुक गया। दरवाजा खटखटाये बिना हम सीधे घर में चले गए। मामी और भाभी गेहूं बीन रही हैं। हम सबको पहिचान गए। लपके पहुंचे और उनके चरणों में झुके। उन्होंने लरज़ती आँखों से हमें गले से लगा लिया। फिर तो खूब बाते हुईं। हमें लगा हमारी बातों में अम्मा, नाना, मामा भी शामिल हों। बिरेन्द्र भैया ने सभी का हाल बताया। हम जब दिल्ली गए थे और छत्तीसगढ़ भवन में रुके थे तब आर के पुरम में रह रहे बोधनाथ भैया के घर कुछ देर के लिए गए थे, वह रोचक प्रसंग उन्हें सुनाया तो सब लोग खुश हुए। घंटे भर में दो बार डट कर नास्ता हुआ। भाभी ने लौकी और प्याज-आलू का पकउडी बनाया था जो हमारी अम्मा भी बनाया करती थीं। लौकी का हमारे स्वास्थ्य पर कितना अच्छा असर होता है यह बिरेन्द्र भैया ने निखिल को बताया। उन्होंने बातों-बातों में रोशनी और प्रकाश में भेद भी बताया। तब तक भाभी ने बड़े-से कटोरे में भरकर चीनी मिलाई मीठी दही ले आईं। उसने इस गर्मी में गज़ब का आनन्द दिया। इसी बीच निखिल दौड़कर उस बोरिंग से हो आया जिसके हौज में हम किलोलें किया करते थे। अब हमने विदा मांगी तो मामी और भाभी रुआंसी हो गईं। रात रुकने का निवेदन किया। हमने समय की दुहाई दी, तो वे क्या बोलें ? सैकड़ों रूपये और कपड़े-लत्ते दे कर नम आँखों से हमारी विदाई कीं। हम निकले तो मानो अम्मा भी साथ हों। रस्ते में मयूरों की जोड़ी खेलती दिखी हमने वह फोटो खींच लिया। पूरे रस्ते निखिल उस मीठी दही की प्रशंसा करते नहीं थका।
वहां से शाम हम अपने गांव पहुंचे तो बनमाली शुक्ल से मुलाकात हुयी। हम साथ पढ़े हैं। उन्हीं के यहाँ गांव का कोटा है। हमसे कहे  कि मिट्टी तेल से लेकर चीनी आदि जिसकी ज़रूरत हो ले जाऊं, लेकिन मैंने सधन्यवाद उन्हें बताया की ये चीजें अभी हैं। उनके यहाँ जनेव है, रुकने के लिए बोले हैं। इसी बीच बिसुनदेव चाचा (विष्णुदेव शुक्ल) मिल गए। कुशलक्षेम पूछे। हम लोगों के समय इन्हीं माननीय के बड़े-से द्वार पर रामलीला होती थी और बबुनंनन चाचा वगैरह आरती की रस्म अदा करते थे। एक बार हम भी लक्ष्मण बने थे, तब विकास ने राम का रोल अदा किया था।
निशागमन हो गया है। चलें ऊषा जी इंतज़ार में होंगी। नीतीश भी उलाहना देगा। लौटा हूँ के रस्ते में अर्जुन बाबा का घर पड़ता है। थोड़ा वहां भी चलकर चाची से मिल लेता हूँ। मुरारी चाचा खटिये पर निस्पृह लेटे हैं, कुल्लू बैठा है देखते ही आवभगत में लगा। चाय बनाकर चाची ले आईं। कैसी हो गयीं हैं वो। जब हरिशंकर चाचा जीवित थे तब क्या रौनक थी उनपर। लेकिन अब का चेहरा देखकर दुःख होता है। पति ही पत्नी का अवलंब होता है। यही दिखा।
घर आ गया हूँ। रात घनेरी हो गयी है। बादल छाये हैं। बारिश होगा लगता है। लो, बूंदाबांदी चालू हो गयी।

Monday, 9 June 2014

                                            वो ७ दिन 

                                                           (३)

 सुबह हुयी, चाय के लिए दूध नहीं मिला। अब बताइये, गांव में दूध किल्लत ! यहाँ हमें अपने कथाकार मित्र की वह कहानी याद आ गयी जिसमें ग्रामीण पृष्ठभूमि के नायक को गाय का दूध पीने को छोड़िये, चढ़ाने तक को ढूंढें नहीं मिलता। यहाँ वह सच दिखा। क्या हो गया है हमारे गांवों को? कहाँ तो हम श्वेत क्रान्ति की बातें करते हैं और कहाँ गांव-गांव में पशुपालन ही ख़त्म हुआ जा रहा है। एक समय वह भी था जब न केवल हमारे वरन आसपास के सारे घरों के द्वार पर गाय-भैंसें बंधी होती थीं बल्कि पड़वे-बाछे इस द्वार से उस द्वार कुँलांचे भरा करते थे। हम उधर तरैना तो इधर महनोइया तक गौवें चराने जाया करते। मुझे अपनी अच्छी डील-डौल वाली वह श्यामा गाय भुलाए नहीं भूलती जो हमें देखते ही नाद छोड़कर रम्भानें लगती। जब कभी उसकी कुकुरौंछी निकालते वह पूंछ उठाती, प्यार से निहारती और हमें चाटने लगती। पोखरे में  उसे नहलाना, सिर पर टीका लगाना, गले में घंटी बांधकर उसे चराने निकलना, क्या यह सब बंद हो गया? कहते हैं चरागाह खत्म हैं, चरी बोई नहीं जाती। जितना पशुओं को खिलाओ उतना निकलता नहीं, उससे तो अच्छा दूध खरीद लो। लेकिन प्रश्न तो यही है कि बाजार में दूध आएगा कहाँ से? यही कारण है कि नकली और अमानक दूध की खपत हो रही है। हमारी ससुराल में तो अच्छा है, इस वार्धक्य में भी हमारे ससुर श्री बलदेव दूबे जी अच्छे नस्ल की जर्सी रखे हैं, बाल्टी भर देती है वह। बेचारे सुबह से शाम उसी में लगे रहते हैं वे। अच्छा है, इससे व्यस्तता तो बनी रहती है, वरना तो वे अपने बड़े भाई श्री श्यामबदन दूबे के चिरनिद्रा में सो जाने के गम को भुला ही नहीं पाते। जब समय पाते हैं उन्हीं की चर्चा छेड़े देते हैं। उनके जाने का गम किसे नहीं है? वे धर्मपरायण सज्जन पुरुष थे, जिधर निकलते लोग श्रद्धा से सिर नवा लेते। ऊषा जी के लिए मुझे प्रथम पसन्द तो उंनने ही किया था। वन्दना और अमिता तो बाद के दूसरे क्रम में आयीं। कई बार मुझसे बतियाते वे इस कदर भावुक हो जाते कि उनकी आंखॉ से मोती गिर पड़ते। अब वे नहीं हैं, द्वार पर हाथ में पत्रा लिए उनकी फोटो लगी है . ऊषा जी आज भी हमें उलाहना देतीं हैं ,'अन्त समय बाबूजी को नहीं दिखाए।'
तो हम दूध की चिंता में थे कि सामने से वह धोबिन निकली जो हमारे घर के कपडे धोया करती थी। हमें देखी तो फूल-सी खिल उठी। 
'कब अईलीं हईं ?' वह उत्साह में थी। 
'काल्हियें त।' मैं भी उस धोबिन को देख मुदित हो गया था। वही तो थी जो अन्दर से लेकर बाहर तक के कपड़े ले जाती और समय पर दे जाती थी। हमारी अम्मा बहुत मानती थीं इसे। भोजन से लेकर साड़ी, उपहार तक देतीं थीं। दोनों का बड़ा हेलमेल था। मुझे वे दिन याद आने लगे। हमने उसे भीतर बुलाया और कुछ रूपए उसके हाथों पर यों ही रख दिए। वह विभोर हो गयी। कुछ देर बाद भुलई के बारी से दूध का जुगाड़ हो गया, लेकिन हमने मना कर दिया। रेड-टी का आनन्द लेंगे। अम्मा होतीं तो ऐसा कभी न होता। 
धोबिन गयी ही है, ६-७ वर्ष का एक बालक आकर प्रणाम किया। पूछने पर बताया कि वह कुल्लू का लड़का है, १ में पढ़ रहा है। बड़ा चञ्चल और भोला दीखता है। इसके बाबा हरिशंकर चाचा बहुत पहले हमारे सामने ही चल बसे थे। उनका एक ही सुपुत्र कुल्लू अब होमगार्ड में पोस्टेड है। गोरखपुर में ड्यूटी है। उसके इस पुत्र को देख हमें खुशी हुई। हमने उससे स्कूल की प्रार्थना पूछी वह करबद्ध हो आँखें बंद कर 'इतनी शक्ति हमें देना दाता…इस तेज़ी व लय से पढ़ दिया के हम चकित रह गये ! कौन होगा जो प्रार्थना याद रखता होगा ? लेकिन यह बालक! हमने उसकी पीठ ठोंकी और खाने को मिठाई दी, वह खुश होकर हमें देखा जैसे उसका मास्टर होऊं। इसी बीच मुन्ना भैया(पोस्टमास्टर) निकले हमने खड़े होकर उन्हें प्रणाम किया। पं प्रतापनारायण मिश्र युवा सम्मान लखनऊ मिलने के बाद इस गांव में भी जब हमारा सम्मान हुआ था तब उनके पिता विशेष रूप से मुझे आशीर्वाद देने आये थे। उनसे राम-रहारी हुयी, फिर तो अनेकों लोग आते गए और हम सबसे नया-पुरान हुए। 
सन्ध्या को हम खेतवानी को निकले। पोखरा पर पहुंचे अपने खेतों दो देखा। अभी तो गर्मी है, खेत जोते नहीं गए हैं। गेहूं की फसल कट गयी है। वहां अब धान बोया जायेगा। इस खेत में कभी हम सिर पर खाँची रखकर खाद फेंकने आया करते थे। हमने यहाँ चने की फसल अपने हाथों काटी है, खूंटी भी उखाड़ी है। गेहूं के बोझ भी ढोए हैं और हेंगा की सवारी भी की है। लेकिन अब वह सब कहाँ ? अब तो सब मशीनें कर रहीं हैं। 
वहां से शिवल्ला होते घर जाने को निकले तो रस्ते में अनिल भैया के यहाँ मज़मा लगा था। वही अनिल भैया जिनका इकलौता सुपुत्र हमारा प्यारा सोनू आजकल दिल्ली में हिंदुस्तान टाइम्स ग्रुप में अपने जलवे दिखा रहा है। वे देखते ही हमें पुकार लगाए, हमने बाइक रोकी, जाकर उनका प्रणाम किया। वहां कैलाश, कुल्लू, राजेश वगैरह बैठे थे। अनिल भैया अपने अंदाज़ में बोले - क्या मीडिया में हो यार ! यहाँ गो-हत्या हो गयी और किसी पेपर वाले को फुर्सत नहीं ?'
'क्या हुआ ?' हम चकित थे। 
'तुम नहीं जानते ?'
'नहीं तो।'
'अरे सिकन्दरा एक बाछे को खिला-खिला कर मार डाला, हमने इसकी सूचना थाने से लेकर पेपर वालों तक को दी किन्तु कहीं से सुनवाई नहीं हुयी।' वहां उपस्थित सब लोगों ने एक साथ बताया। 
'कितनी देर हुयी ?' हमने पूछा। 
'दो घंटे पहले की।'
'गांव का मामला है। पुलिस को आने में समय तो लगेगा ही।'
तब तक एक बाइक में दो पोलिस वाले आते दिखे। सब चुप हो गए। पता चला वे आरोपी को ले गए।
हम घर आये तो पता चला कि श्रीमती जी से लेकर दोनों बच्चे गोलगप्पे लेकर रखे हैं! मैगी भी आएगा। शहरी संस्कृति यहाँ भी पसरने लगी है। हमने गोलगप्पे न खाया। हमें तो अम्मा की बनाई वह पकउड़ी याद आ रही है जो वह अपने हाथों से हमें खिलाया करतीं थीं। बेसन,प्याज, मिर्चादि से वेस्टित वह पकउड़ी चाय के साथ अम्मा के साथ खाकर हम बच्चे बन जाया करते थे। अम्मा! अब कभी न खिलाओगी अपने हाथों से वह पकउड़ी ? आह! अम्मा,सो न सकेंगे हम तुम्हारे बिना।

 

Sunday, 8 June 2014

                                           वो ७ दिन 

                                                           (2)

 पंछी कलरव कर रहे हैं। मयूरों के पैंकों-पैंकों की ध्वनि गुञ्जित हो रही है। पपीहे भी पी कहाँ, पी कहाँ की टेर  लगा रहे हैं। हम निद्रा में लीन हैं। कानों में इन मधुर संगीत-लहरियों ने मानो हौले से कहा- 'आँखें खोलो, भोर हो गयी।'
हमने नेत्रों की बैटरी चालू कर दी। आहा ! क्या नज़ारा है! बगल के आमों के सघन वृक्ष, बेल, नींबू, नीम आदि के पेड़-पौधों पर खिली हरियाली ने मन मोह लिया। हम बिस्तर से उठ बैठे। वातावरण अत्यन्त सुरम्य व मोहित करने वाला था। निराला-पन्त की कवितायेँ मस्तिष्क में घूमने लगीं। प्रकृति के इन रूपों को देखकर ही उनकी कविताएं फूट पड़ती होंगी। प्राची में लालिमा का फैलाव होने लगा और हम अपने गांव जाने की तैयारी में लगे। नल के ताज़े पाने की फुहार में नहाने के बाद चाय-नाश्ता के लिए बैठा तो हमारे चचेरे मंझले साले डॉ. सतीश दूबे, उनसे छोटे विनय दूबे व उनके बच्चों से मुलाकात हुयी। पता चला कि सृष्टि जेईई में अच्छा रैंक लायी है, उसका का चयन एनआईटी में तय है। खुशी हुयी, सतीश भैया स्वयं शासकीय चिकित्सक हैं, बेटी इंजीनियर हो जाएगी। उनके बड़े भाई श्री प्रकाश चन्द्र दूबे बड़हलगंज कॉलेज में गणित के प्रोफ़ेसर हैं, उनकी बिटिया दीपू डॉक्टरी की तैयारी कर ही रही है, बड़ी वाली मोनू संगीत में महारत हासिल कर चुकी है। उधर आनन्द जी का सुपुत्र अवनीश और हर्ष गज़ब का चित्र बनाते हैं भई ! दोनों हमारे फेसबुक मित्र हैं, छोटा हर्ष मुझसे चेटिंग तो खूब करता है किन्तु यहाँ चुप था। शायद शरमा रहा था। तो कितना अच्छा लगता है न एक ही घर में गणित, विज्ञान, कला, संगीत का संगम। 
बच्चे तैयार हो गए थे। हमारे साले श्री हरिकेश दूबे ने गांव जाने के लिए अपनी बाइक दे दी, यह कहकर कि आप जब तक रहें अपने पास रखें। यह बड़ी सुविधा थी। हम राउतपार से प्रस्थान किये तो कहला होते हुए हाटा बाजार पहुंचे। हाटा बाजार मेरे लिए सदैव आकर्षण का केन्द्र रहा है. यही वह जगह है जहाँ कभी अम्मा सूत कातकर देती थी और हम खादी ग्रामोद्योग में बेचने आया करते थे। तब मेरी उम्र ७-८ रही होगी। इस छुटपन में ३ किलोमीटर के करीब जाकर सूत बेचकर आने में चाहे नन्हें-नन्हें पांव थक जाते हों किन्तु सूत के बदले फुटकर मिले पैसे अम्मा के हाथों में रखने की ललक में जो उत्साह होता मानो क़दमों में खरगोश के पैर बांध देते। दौड़ते-झूमते जाते और लपकते-झपकते आते। लेकिन तब रस्ते में कुछ जगहों पर सघन वृक्षों के समूह पड़ते जहाँ पहुँचते ही हमारे प्राण सूख जाते। लाला की बारी में एक मक़बरा था उसे देखते ही कलेजा सूख जाता। सूनसान हो तो दिल निकलने को हो आता। नउवा की बारी के आम-कटहल के वृक्ष भयावह लगते। हाँ, चेड़वारी में बंगाली चाचा की बोरिंग पर बना छोटा सा कमरा जरूर थोड़ा सुकून देता, लेकिन डर यहाँ भी कम नहीं लगता। अपने एक बाल उपन्यास में हमने इसकी चर्चा की है।  
तो हाटा बाज़ार में हम दुर्गा मंदिर के सामने खड़े हैं। यही वह मंदिर है जहाँ ऊपर वाले पूजा कक्ष के सामने बरामदे में हमारे विवाह का प्रसंग हुआ था। यहीं हमारी ससुराल की स्त्रियां हमें देखने आतीं और अंततः ऊषा जी के लिए हमें पसंद कर लीं। हम मंदिर को देख रहे हैं, बगल में मेवा का होटल है। ज़माने से वह इस दूकान में मिठाइयों से लेकर समोसे, जलेबियाँ, भजिया आदि से लेकर चाय तक मिलते हैं, भीड़ लगी रहती है। हमारे ही गांव के बनिया हैं मेवा। सोचा फिर आकर इनकी दूकान में जायका ताज़ा किया जायेगा। यहाँ से हम पक्की सड़क से गांव की और बढ़े। भीटीं के बाद मोड़ से पालम बाबा का थान दिखाई देने लगा। रोमांच हो आया। यहीं हमारी प्राइमरी की क्लास लगती थी। बचपन के पुराने दिन याद आ गए। वो मुन्ना, चुन्ना, पप्पू, कैलाश, सच्चिता, दिनेश, बूटी, सुरसतिया, बिंदू, दशरथ, बलिराम, नंदू, कृपाल, बनमाली,सुनील, सुशील, बृजेश से लेकर अनेकों नाम हैं जो जेहन में घूम रहे हैं के साथ खेलना-पढ़ना सब-कुछ मानो फिर सामने हो। अब बिल्डिंग नयी बन गयी है। तब एक पुरानी बिल्डिंग को क्रेन की बजाय हाथी से गिरवाया गया था। हम तालियां बजते देखते रहे थे।
हम आगे बढे तो चेडवारी आयी, उसकी रौनक गायब थी ! वृक्षों की सघनता का भी लोप हो गया है। गांव पहुंच गए। आह! अम्मा कहाँ हो तुम ? घर में ताला है। तुम तो दौड़कर धार चढाने आती थीं। अब तो सब सूना-सूना है। सामने डीह बाबा को प्रणिपात कर हम ताला खोले मानो अम्मा सामने हों और खिलखिलाकर हमारा स्वागत कर रही हों। हमारी आँखें दरों-दीवारों पर भी अम्मा की छवि देख रही थीं। वे हमारे नयनों को भीगने से रोक रही हैं।

Friday, 6 June 2014

                                           वो ७ दिन 

                                                           (१)

दुर्ग रेलवे स्टेशन से हम गोरखपुर एक्सप्रेस में बैठे और अगले दिन मऊ जंक्शन पर शाम ८  बजे उतर गए। अँधेरा पसर गया था। बाहर निकलकर रिक्शा लिए और बस अड्डे के लिए निकले तो रिक्शे वाले ने हमारे बच्चों को जो पैदल ही चलना चाहते थे उन्हें भी पीछे टांग लिया। उसकी यह सहृदयता मुझे भा गयी। वह कमज़ोर था। बच्चे बैठते क्या, बीच-बीच में ठेलकर रिक्शेवाले की मदद करते चलते। कुछ फर्लांग पर ही बस अड्डा है, वहां पहुँच कर हमने बिन पूछे ही उसके हाथ में २० का नोट रख दिया।
अब बड़हलगंज तक जाने वाली बस की तलाश थी। घंटे भर बाद सोनौली जाने वाली एक बस आयी तो ठसाठस! लेकिन निखिल ने उसमें चढ़कर मऊ उतरने वाले यात्रियों की जगह हम सबके लिए सीट का जुगाड़ कर दिया था। बस में तिल रखने की जगह न थी लेकिन हम बैठ गए थे, बगल बैठे एक यात्री ने पूछा, 'कहाँ जाना है ?'
' ग्राम खखाईजखोर।'
सुनते ही वह पैर छू कर प्रणाम किया, ' हमें भी बड़हलगंज जाना है। वहां कपडे और ज्वेलरी की दूकान है हमारी। यहाँ मऊ में बेटी का रिश्ता देखने आये थे। आप लोग तो पूज्य हैं हमारे।' उसने हमारे गांव की महिमा गायी। सुनकर गर्व हुआ। लेकिन जब उसने यह कहा कि ' अब वहां भी लोगों का आचार-विचार भ्रष्ट हुआ जा रहा है। तो शर्मिंदगी हुयी कि वाक़ई हम कहाँ थे और कहाँ आ गए। उसने बताया कि उसका नाम मोहनजी है और वह संगम टॉकीज के पास रहता है और किसी मंदिर का प्रबंधक है। उसका अनुभव अच्छा है। बड़हलगंज तब और अब पर बहुत बातें हुईं। हम छुटपन में अम्मा के साथ रथयात्रा का मेला देखने जाते थे बड़हलगंज। सरयू में किलोलें करना, मेले में अम्मा से जिद्द कर डमरू-पिपिहिड़ी खरीदना। चटखारे ले-लेकर कचालू का स्वाद लेना, इधर-उधर भागने पर अम्मा की डपट खाना। कितनी तो यादें हैं बड़हलगंज को लेकर। कई दिनों तक रौनक रहती थी तब। मोहनजी ने बताया कि वह रौनक अब कहाँ ? अब तो औपचारिकताएं ही शेष हैं, वही निभ जाए बहुत है। तब तो हमारी दूकानों तक चबूतरे पर रेल-पेल मची रहती थी, भगाने पर भी लोग जमे रहते थे। जमाल मियाँ तक आवभगत में लगे रहते। अब सब काफूर है। उनने यह भी बताया कि कैसे खेती-किसानी चौपट हो रही है और नौजवान वर्ग नशे का शिकार हो रहा है।
बस धीरे चाल में थी, पसीने से थकबक लोग ड्राइवर पर तंज कस रहे थे। वे क्या जाने अतिरिक्त बोझ होता क्या है। दो घंटे बाद तकरीबन दस के आसपास हम बड़हलगंज पहुँच गए । वहां से हमारे ग्राम खखाईजखोर तक जाना टेढ़ी खीर था. कारण कि सड़क से तीन किलोमीटर भीतर था हमारा गांव। कैसे जाते? सोचे, चलो ससुराल चल देते हैं। वह तो सड़क पर ही है, रात बिताकर सुबह गांव चल देंगे।
तो उसी बस से आगे बढ़े और उतर गए राउतपार चौराहा। वहां हमारे साले हरिकेशजी बाइक लिए इंतज़ार करते मिले। ११ बज गए थे। बाइक पर लदफंद कर हम ससुराल पहुंचे तो सास-ससुर से लेकर सारा परिवार इंतज़ार करता मिला। हमें अपना गांव याद आया जहाँ आधी रात को भी हम ऑटो लेकर चले जाया करते थे, तब अम्मा-बाबूजी थे, दरवाजा खोलते थे, बाँहों में भर लेते थे। लेकिन अब दोनों नहीं हैं। घर पर ताला है, कौन करता स्वागत ? खैर, ससुराल में रात को भोजन कर विश्राम में चले गए। यहाँ भी मच्छर कम नहीं हैं, मच्छरदानी थी, मज़े की नींद आ गयी।