Thursday, 15 December 2016

सुरक्षा एजेन्सियों ने किया सतर्क  
सुरक्षा बलों की लगातार सर्चिंग व कार्रवाइयों-से तंग माओवादी गुटों में बताते हैं, कि अब नई तिकड़म जन्म लेने लगी है। गुरिल्ला युद्ध के बाद छापामार और फिर आमने-सामने की लड़ाई में भी लगातार नाकाम होते जाने-से माओवादी लीडरों के माथे पर चिन्ता की लकीरें गहराती जा रही हैं। बताया जा रहा है, कि वे नए पैंतरे की तलाश में हैं। उनके छापामार दस्तों ने पिछले कुछ दिनों-से प्रेशर बमों-से जोर आजमाइश शुरू की थी। उन्होंने वन-क्षेत्र में अनेकों इन्सीडेन्ट किए व प्रेशर बम का प्रयोग कर सुरक्षा बलों को खतरे में डाला। कुछ शहीद भी हुए। उसके बाद-से सुरक्षा बलों व स्थानीय पुलिस ने तालमेल बिठाकर उनके अनेक ठिकानों को न केवल नष्ट किया वरन् अनकों माओवादी या तो पकड़े गए या फिर आत्मसमर्पण को मजबूर हुए।
इधर खबर आ रही है, कि माओवादी दस्ते के लोग यह पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं, कि माओ प्रभावित क्षेत्रों में तैनात अर्ध सैनिक बलों व पुलिस कर्मियों के परिजनों का ब्यौरा क्या है! इसके पीछे उनकी मंशा क्या है इसका कोई खुलासा तो नहीं हो सका है। लेकिन नक्सल मामलों के जानकारों का मानना है, कि यह प्रोपेगेण्डा हो सकता है। कारण, कि माओवादी कभी नहीं चाहते, कि भारत के विभिन्न प्रान्तों के लोग जो कि पैरामिलिट्री फोर्सेस में भर्ती होकर अपना काम कर रहे हैं वे उनके परिवार वालों को कोई नुकशान पहुंचाएं। चूंकि केन्द्रीय सुरक्षा एजेन्सियों ने नक्सल प्रभावित राज्यों के अर्धसैनिक बलों व पुलिस इकाइयों को एलर्ट किया है, कि माओवादी उनके कार्मिकों व परिवार वालों के बारे में व्यक्तिगत ब्यौरे एकत्र कर रहे हैं, इसलिए यह सोचने की बात तो है। सुरक्षा एजेन्सियों की चिन्ता इस बात को लेकर है, कि कहीं माओवादी, सुरक्षा बलों व पुलिस कार्मिकों को निशाना न बनाएं..इसलिए सतर्क रहने की जरूरत है। इस मामले में तफसील यह भी है, कि नक्सल क्षेत्रों में काम कर रही खुफिया एजेन्सियों को ऐसी जानकारियां मिली हैं, कि नक्सलियों के कुछ कैडर माओवाद प्रभावित छत्तीसगढ़, बिहार, झारखंड आदि जैसे राज्यों में पदस्थ सुरक्षा बलों व पुलिस कार्मिक परिजनों के बारे में टोह ले रहे हैं, लिहाजा परिजनों को सतर्क व सावधान रहने की सलाह दी जाए। नक्सल मामलों के विशेषज्ञ इस मामले में यह तो मानते हैं, कि आज के माओवादी रास्ता भटके हुए लोग हैं और उनका चरम उद्देश्य समाज व देशहित में नहीं है। फिर भी वे यह मानने को तैयार नहीं, कि सुरक्षा बलों के परिवार वालों को वे निशाना बना सकते हैं। चाहे जो हो, इस मामले में सुरक्षा एजेन्सियों के रिपोर्ट की अनदेखी नहीं की जा सकती। उनकी अतिरिक्त सतर्कता बरतने की सलाह को गम्भीर होकर देखने की जरूरत है।        
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Monday, 12 December 2016

वीरता-से भरी बेटियां

ये है भारतवर्ष की बेटियों का कमाल! एशिया कप टी-20 में पाकिस्तान जैसी चिरप्रतिद्वंद्वी टीम को परास्त कर चैम्पियन बनी भारतीय महिला क्रिकेट टीम की खिलाडिय़ों ने अपनी शक्ति व शौर्य का नायाब प्रदर्शन कर भारतीय महिला खेल का डंका न केवल एशिया महाद्वीप वरन् पूरी दुनिया में बजा दिया है। ऐसे समय में जबकि राष्ट्रीय स्तर की एक शूटर खिलाड़ी ने अपने ही कोच पर दुष्कर्म का आरोप लगाया है और भी जाने कितने ही हरास्मेन्ट के केसेस सुनने को मिले हैं जिससे लगता रहा है, कि खेलों के क्षेत्र में महिलाओं की राहें उतनी आसान नहीं जितनी की समझी जाती हंै। लेकिन इन सबके बीच भी महिला खिलाडिय़ों द्वारा लगातार सफलता के परचम लहराने के किस्से भी प्रेरणा-से भरे देते हैं।
कितनी सुन्दर बात है, कि उन्हें हर बार गिराने की कोशिशे होती हैं, तब भी वे बारम्बार हंसती हुई उठ खड़ी होती हैं। ये भारतवर्ष की बेटियां ही हैं जिन्होंने कठिन समय में अपना उत्साह बनाए रखा और लगातार कामयाबी की सीढिय़ां चढ़ती रहीं। भारतवर्ष के हर क्षेत्र में आज महिलाएं अपना शौर्य दिखा रही हैं, यहां तक, कि सेना में भी उनकी दमदार उपस्थिति कम बड़ी बात नहीं। स्वतन्त्रता दिवस के परेड में लाल किले पर उनके दमदार करतब और कदमताल की गूंज आज भी दुनिया में गूंजायमान है।
एशियन क्रिकेट में पाकिस्तान-से हुई खिताबी भिड़न्त को लेकर बहुत-से कयास लगाए जा रहे थे। यहां तक कहा गया, कि भारतीय महिला क्रिकेट टीम पिछड़ जाएगी। जबकि देखा जाए तो भारतीय टीम कोई मैच हारी नहीं और इससे पहले फाइनल तक के सफर में पांचों मैचों में विजय हासिल करती गई। महिला खिलाडिय़ों ने ऐन वक्त पर जिस तरह का लांगशॉट और गुगली के करतब दिखाए उससे तो पाकिस्तान चारों खाने चित्त हो गया। प्लेयर ऑफ द टुर्नामेन्ट बनीं मिताली राज की 72 रनों की पारी और स्पीनर एकता बिस्ट के द्वारा चटकाए गए 2 विकेटों को लम्बे समय तक याद रखा जाएगा।
जहां तक भारतवर्ष में महिला खिलाडिय़ों का सवाल है, तो इस पर ध्यान लगाने की जरूरत है। कारण, कि विश्व स्तरीय प्रतिभाएं हमारे बीच हैं लेकिन उनकी कोई पूछ-परख नहीं है! कइयों बार पता चला है, कि महिला खिलाडिय़ों के साथ नाइन्साफियां होती रही हैं लेकिन हर बार उनकी अनेदेखी की गई। भारत की बेटियों पर हमें नाज है, उन्हें खेलों के क्षेत्र में पर्याप्त सुविधाएं और अवसर मिलना ही चाहिए।  
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एक ओर जहां भारतवर्ष के चीफ जस्टिस ने न्यायालय को मछली बाजार कह न्याय व्यवस्था पर एक सवालिया निशान खड़ा कर दिया है, वहीं पूर्व वायुसेना प्रमुख की अगस्ता वेस्टलैण्ड घोटाला मामले में गिरफ्तारी ने हमारी सैन्य व्यवस्था पर भी एक तरह की उंगली उठा दी है। निश्चित ही दोनों मामलों-से भारतीय लोकतन्त्र के स्तम्भों की अच्छी तस्वीर सामने नहीं आयी है। पहले ही यह बहस का विषय रहा है, कि भारतीय लोकतन्त्र के पायों में घुन लगते जा रहे हैं जिससे लोकतान्त्रिक मूल्यों का निरन्तर क्षरण हो रहा है। इसी बीच सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश मार्कण्डेय काटजू ने न्यायालय के समक्ष माफी मांगने की पेशकश कर यह भी जता दिया है, कि अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर हम देश के साथ किस प्रकार का खिलवाड़ कर रहे हैं। बन्द होना चाहिए यह सब। भारतवर्ष एक महान देश है और उसके महान लोकतान्त्रिक उद्देश्य हैं। उन उद्देश्यों की पूर्ति व एक नए नव निर्माण के लिए जरूरी है, कि लोकतन्त्र के चारों स्तम्भ अपने महत्त्व को समझें व अपने मूल्यों की सीमा में रहकर राष्ट्रोत्थान के काम में लगें।
सर्वोच्च न्यायलय के मुख्य न्यायाधीश टी. एस. ठाकुर का यह दर्द न केवल उनके लिए बल्कि देशवासियों के लिए भी सालने वाला है, जिसमें उन्होंने कहा है, कि 23 साल के अपने कैरियर में उनने वकीलों का ऐसा उद्दण्ड रवैया नहीं देखा। वे जब यह कहते हैं, कि जल्द ही अवकाश प्राप्त करने के बाद आखिर किस तरही की यादें लेकर जाएंगे? तब सवाल उठता है, कि क्या यह इस बात की पीड़ा नहीं, कि लोगों को न्याय दिलाने वाले अधिवक्ता अपने कर्म-धर्म-से च्युत होकर अपने ही वरिष्ठों की तौहीन कर रहे हैं? एक गांधी जी की बैरिस्टरी देख लीजिए, सामान्य वेश-भूषा में वे किस तरह की जिरह किया करते थे और देश और उसके नागरिकों को न्याय दिलाने के लिए अंग्रेजी कोर्ट में भी सौम्य तरीके-से न्याय की आवाज बुलन्द करते थे। लेकिन आज? आखिर चीफ जस्टिस की कठोर टिप्पणी के बाद बचा ही क्या है अब?
उधर सेना में पूर्व वायुसेना प्रमुख एसपी त्यागी की गिरफ्तारी ने तो हिलाकर रख दिया है। इसके बाद एक नए ही तरह की बहस जन्म ले रही है। क्या इससे हमारी सेना का मनोबल नहीं गिरेगा? भारतीय सेना अपने शौर्य व पराक्रम के लिए पूरी दुनिया में मशहूर है। फिर वायुसेना का तो नाम आते ही दुश्मनों के छक्के छूट जाते हैं। उसी वायुसेना में वह भी मुखिया के ऊपर उंगली उठ जाए! सीबीआई ने अपना काम जरूर किया है, लेकिन सोचना है, कि तब सेना को किस रूप में देखा जाएगा? हांलाकि इस पर चिन्ता भारत सरकार के रक्षा मन्त्री ने भी जताई है।
तब किस पर करें भरोसा?
एक ओर जहां भारतवर्ष के चीफ जस्टिस ने न्यायालय को मछली बाजार कह न्याय व्यवस्था पर एक सवालिया निशान खड़ा कर दिया है, वहीं पूर्व वायुसेना प्रमुख की अगस्ता वेस्टलैण्ड घोटाला मामले में गिरफ्तारी ने हमारी सैन्य व्यवस्था पर भी एक तरह की उंगली उठा दी है। निश्चित ही दोनों मामलों-से भारतीय लोकतन्त्र के स्तम्भों की अच्छी तस्वीर सामने नहीं आयी है। पहले ही यह बहस का विषय रहा है, कि भारतीय लोकतन्त्र के पायों में घुन लगते जा रहे हैं जिससे लोकतान्त्रिक मूल्यों का निरन्तर क्षरण हो रहा है। इसी बीच सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश मार्कण्डेय काटजू ने न्यायालय के समक्ष माफी मांगने की पेशकश कर यह भी जता दिया है, कि अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर हम देश के साथ किस प्रकार का खिलवाड़ कर रहे हैं। बन्द होना चाहिए यह सब। भारतवर्ष एक महान देश है और उसके महान लोकतान्त्रिक उद्देश्य हैं। उन उद्देश्यों की पूर्ति व एक नए नव निर्माण के लिए जरूरी है, कि लोकतन्त्र के चारों स्तम्भ अपने महत्त्व को समझें व अपने मूल्यों की सीमा में रहकर राष्ट्रोत्थान के काम में लगें।
सर्वोच्च न्यायलय के मुख्य न्यायाधीश टी. एस. ठाकुर का यह दर्द न केवल उनके लिए बल्कि देशवासियों के लिए भी सालने वाला है, जिसमें उन्होंने कहा है, कि 23 साल के अपने कैरियर में उनने वकीलों का ऐसा उद्दण्ड रवैया नहीं देखा। वे जब यह कहते हैं, कि जल्द ही अवकाश प्राप्त करने के बाद आखिर किस तरही की यादें लेकर जाएंगे? तब सवाल उठता है, कि क्या यह इस बात की पीड़ा नहीं, कि लोगों को न्याय दिलाने वाले अधिवक्ता अपने कर्म-धर्म-से च्युत होकर अपने ही वरिष्ठों की तौहीन कर रहे हैं? एक गांधी जी की बैरिस्टरी देख लीजिए, सामान्य वेश-भूषा में वे किस तरह की जिरह किया करते थे और देश और उसके नागरिकों को न्याय दिलाने के लिए अंग्रेजी कोर्ट में भी सौम्य तरीके-से न्याय की आवाज बुलन्द करते थे। लेकिन आज? आखिर चीफ जस्टिस की कठोर टिप्पणी के बाद बचा ही क्या है अब?
उधर सेना में पूर्व वायुसेना प्रमुख एसपी त्यागी की गिरफ्तारी ने तो हिलाकर रख दिया है। इसके बाद एक नए ही तरह की बहस जन्म ले रही है। क्या इससे हमारी सेना का मनोबल नहीं गिरेगा? भारतीय सेना अपने शौर्य व पराक्रम के लिए पूरी दुनिया में मशहूर है। फिर वायुसेना का तो नाम आते ही दुश्मनों के छक्के छूट जाते हैं। उसी वायुसेना में वह भी मुखिया के ऊपर उंगली उठ जाए! सीबीआई ने अपना काम जरूर किया है, लेकिन सोचना है, कि तब सेना को किस रूप में देखा जाएगा? हांलाकि इस पर चिन्ता भारत सरकार के रक्षा मन्त्री ने भी जताई है।

Friday, 4 November 2016


जब समाज का यही रुख है और आए दिन नवयुवतियों को किसी-न-किसी तरीके-से मारा और परेशान किया जा रहा है, तो आखिर किस मुंह-से हम बेटी बचाने की वकालत करते फिर रहे हैं? देश में जो कुछ हो रहा है वह तो हो ही रहा है, लेकिन हमारे छत्तीसगढ़ में जिस तरीके-से बच्चियों और नव युवतियों के साथ अत्याचार और शोषण की घटनाएं बढ़ रही हैं वे मानस को मथने लगी हैं। यह न केवल सरकार वरन पूरे समाज के लिए शोचनीय है.. और यह भी, कि समय रहते इस पर काबू न पाया गया, तो बना-बनाया सामाजिक ढांचा चरमराए बिना नहीं रह पाएगा। इसके लिए दोषी कोई एक नहीं, बल्कि हम सब होंगे।
पिछले कुछ दिनों-से छत्तीसगढ़ के कोने-कोने-से बच्चियों के साथ हो रही नाइन्साफियों की खबरें बेचैन किए हैं। शोषण और उत्पीडऩ के साथ ही बच्चियों के बेचे जाने की खबरें तो थी हीं, लेकिन इधर जिस तरीके-से अपराधी किस्म के युवकों और मनबढ़ुओं की संख्या में इजाफा हुआ है और वे बेखौफ होकर बच्चियों के साथ शर्मनाक घटनाएं कर रहे हैं उससे महिलाएं सदमे में तो हैं ही, पूरा समाज भी सहमा हुआ है। कल ही राजधानी रायपुर के एक गांव मुजगहन थाना क्षेत्र में जिस जघन्य तरीके-से छात्रा की हत्या उसकी मां के सामने ही कर दी गई, उसे सुनकर तो रोएं ही पर्रा गए! कितना वीभत्स व दहलाने वाला है, कि कोई युवक एक बेकसूर छात्रा को उसकी मां के सामने ही हत ले! इसके पूर्व एक घटना ने और हिलाकर रख दिया था, जिसमें पता चला, कि एक युवती के दुष्कर्म किया गया और फिर उसके साथी मित्र की गोली मार कर हत्या कर दी गई। बाद में उस युवती को इतना परेशान किया गया, कि वह बेचारी भी फांसी लगाकर आत्महत्या करने पर विवश हो गई! केन्द्रीय स्कूल चरोदा के हेडमास्टर द्वारा अबोध छात्रा का किस्सा देखिए, कितना शर्मनाक! एमजीएम, माइल स्टोन, डीपीएस आदि जैसे नामचीन स्कूलों में क्या-क्या न हुआ! देखा जाए तो कितनी निर्मम और दिल दहलाने वाली घटनाएं हैं ये? लेकिन किसका ध्यान है इस ओर? पुलिस ने अपना काम किया और अब न्यायालय में केस चलेगा। समाज के लोग खामोश रहेंगे और एक प्रकार-से यह ढर्रा चलता रहेगा।
क्या विडम्बना नहीं, कि जिस समाज में बेटियों बचाने और उन्हें सलामत रखने के लिए हम रोज आन्दोलन चला रहे हैं, सेमिनार, कार्यशालाएं और भी न जाने कौन-कौन-से अभियान चला रहे हैं उसके बाद भी बेटियों के साथ घटनाएं जारी ही हैं! दहेज के दानव एक ओर जहां अपना काम रहे हैं, वहीं चमड़ी के भूखे भेडि़ए भी कम नहीं! वे इतने निडर व नरपशु हो गए हैं, कि हर लड़की उन्हें एक वस्तु के रूप में दिखाई देती है। ऐसा तो नहीं था हमारा समाज..और हम भी कहां ऐसे थे? तब.. क्या सच नहीं, कि  समाज के लोग भी अपने दायित्त्यों-से च्युत हुए बैठे तमाशा देख रहे हैं। नहीं तो यही था, कि व्यक्ति किसी परायी महिला में भी अपनी ही मां, बहिन और बेटी के दर्शन करता था और उन्हें सम्मान देता था।   

Tuesday, 5 July 2016

 शासन का बिगड़ता स्वरूप

भ्रष्टाचार और कदाचरण तो था ही, लेकिन अब चारित्रक रूप-से भी लोक सेवकों पर उछल रहा कीचड़ आखिर किस बात का संकेत है? इससे तो ऐसा लग रहा है, कि हमारी पुलिस और प्रशासनिक व्यवस्था में सुरंग खुद रही है! यह राज्य के लिए किसी भी कीमत पर शुभ संकेत नहीं। प्रशासनिक अमला और पुलिस विभाग ही तो हैं जो किसी राज-व्यवस्था की रीढ़ होते हैं। यदि उनमें भी घुन लगने लगे, तो हम रह कैसे सकेंगे? हालिया बिलासपुर रेन्ज के पुलिस महानिरीक्षक पवन देव के ऊपर जिस तरीके-से कोई और नहीं बल्कि उन्हीं के पुलिस विभाग की एक महिला आरक्षक ने आधी रात के वक्त बुलाने का आरोप लगाया उसने तो हिलाकर रख दिया। महकमें में इसे लेकर तरह-तरह की चर्चाएं तो हैं ही, छत्तीसगढ़ के आम नागरिकों में भी बहस-मुबाहिशों का दौर शुरू हो गया है, कि यदि रक्षक ही भक्षक बनेगा तो हम उस समाज की परिकल्पना भला कैसे साकार कर पाएंगे जिसे सभ्य कहा जाता है? उससे भी हैतरअंगेज तो यह है कि रातों रात उस महिला आरक्षक की वर्दी और घर वाली ग्लैमरस फोटूएं सोशल नेटवर्किंग साइटों पर वायरल हो गईं और साथ ही आईजी और उसकी बातचीत का टेप भी! जिसमें साफ हो रहा है कि शराब के नशे में साहब बात कर रहे हंै और आरक्षिका ना-नुकुर कर रही है। इससे ऐसा लगा, कि कहीं यह सब किसी के द्वारा प्रायोजित तो नहीं है? क्योंकि पवन देव ने भी बाद में कहा, कि यह किसी टीआई की चाल है जो उन्हें फंसाना चाहता है और जिसका कि उस महिला आरक्षक से संबंध है। मामले में चाहे जो हो, लेकिन यह तो है ही, कि आईजी हों या टीआई या फिर वह महिला आरक्षक सभी पुलिस से सम्बन्धित हैं जिनके ऊपर कि लोगों की रक्षा का भार है। सोचा जा सकता है, कि यदि वे लोग ही नैतिक और चारित्रिक पतन के शिकार होंगे तो औरों की रक्षा भला क्या करेंगे? इसके पूर्व यही साहबान जब राजनांगांव में पदस्थ थे तक भी किसी जहरखुरानी की बात सामने आई थी जिसे फुड प्वाइजनिंग का केस कहा गया! बीते समय में प्रशासनिक और पुलिस अमले में चम्पावत और सिंह फैमिली के किस्से भी उड़े थे। क्या है यह सब? जिन लोगों ने रात-रात भर जागकर पढ़ाई की और समाज में बड़े बदलाव की उम्मीद-से प्रशासनिक और पुलिस सेवा में भर्ती हुए वे ही आज यदि इस स्तर पर उतरेंगे, तो समाज किन नजरों-से देखेगा उन्हें? इससे राज्य सरकार का भी क्या हाल होगा? वह कैसे काम कर पाएगी? इस प्रसिद्ध लोकोकोक्ति को ध्यान में रखकर यदि विचार किया जाए, कि शासन का स्वरूप चाहे जो हो, सर्वोत्तम वही होता है जिसका प्रशासन सर्वोत्तम होता है। पता चल जाएगा कि छत्तीसगढ़ के भाग्य विधाताओं की यदि हालत यही रही तो वह आने वाले समय किस पतन की गर्त में जाने को विवश होगा। इस घटना-से पर्दा हटना ही चाहिए। कोई कितना भी बड़ा क्यों न हो, बख्शा जाना राज्य-हित में उचित न होगा।  

Friday, 1 July 2016

नस-नस में भ्रष्टाचारी खून!

ऐसे में कैसे चलेगा? हर तरफ यदि भ्रष्टाचार का ही बोलबाला होगा तो आने वाली पीढिय़ां कैसे साफ-सुथरी और चमकीली होंगी? फिर तो न्यू जनरेशन में भी उसी करप्शन का ब्लड रीफर होगा और जिस सुन्दर समाज की हम परिकल्पना कर रहे हैं वह रह ही जाएगा। दुर्भाग्य तो यह है कि जिस राजनीतिक शुचिता की हम परिकल्पना और बातें करते हैं वह कहीं भी दिखाई नहीं देता। बल्कि कहें तो राजनीति एक तरह से आज की डेट में पूरी तरह-से व्यापार में तब्दील हुई दिखती है। लेकिन इसमें भी है कि नेताओं को व्यापार करना भी नहीं आता आखिर वे व्यापारी तो हैं नहीं इसीलिए सब कुछ गड्ड-मड्ड है। इसी का परिणाम हैं कि हम किसी नतीजे पर नहीं पहुंच रहे हैं। हमारे नेताओं को न राजनीति करने आ रही है न ही व्यापार। अव्वल समाज सेवा तो शायद उनकी डायरी से गायब ही है।
अरस्तु ने राजनीति के बारे में कहा था कि राजसत्ता को समाज के प्रति अभिमुख होना चाहिए। प्लेटो से लेकर माक्र्स और फिर अपने यहां के गांधी, पं. नेहरू, जेपी, पं. दीनदयाल से लेकर अनेकों चिन्तक हुए जिनने अन्तिम व्यक्ति की बात कही है, लेकिन कौन चल रहा उस रस्ते पर? माआवादियों को देखिए, कि वे अलग ही राह भटके हुए हैं। कहां बढ़ पा रहे हैं वे माओ-त्से-तुंग की राह पर भी? ऐसे में कहां सम्भव है क्रान्ति? फिर सत्ता भी है, कि उसका चरित्र सभी देख ही रहे हैं। राजनीतिक दलों के लोग अपनी पार्टियों के मेनिफेस्टो का हाशिये पर रख बस निजी स्वार्थों में ही मस्त हैं। इसका सीधा असर समाज और जन साधारण के जीवन पर पड़ रहा है। जन-जीवन आक्रान्त है और लोग अपनी रोजमर्रा की तकलीफों से लहूलुहान। फिर प्रश्र है, कि कौन मसीहा है? जो आएगा और जन-तकलीफों को छूमन्तर करेगा। कई बार यह जुमला उछला, कि प्रधानमंत्री के पास कोई जादू की छड़ी नहीं है। यह ठीक है, लेकिन यह भी सोचना होगा कि यदि जादू की छड़ी नहीं है, तो कोई तो ऐसा जादूई नुस्खा आए जो इन नताओं और हमारे सिस्टम में फैले भ्रष्टाचार के खून को साफ करे। कारण कि भारतवर्ष आजादी के बाद-से लगातार विकास के उन पायदानों को छूने की कोशिश कर रहा है जिन्हें विकसित देश अपना मानते रहे हैं। उसमें कोई अड़ंगा नहीं है। हमारे उससे ज्यदा ही है जो अन्य देशों के पास है। जरूरत है तो इस बात की कि हमारी कोशिशें ईमानदार पर देश के प्रति समर्पित हों। वर्ना तो ढर्रा चल ही रहा है।  

Friday, 17 June 2016

     सब्जियों के दाम आसमान छू रहे हैं! टमाटर और पेट्रोल की कीमतें लगभग समान होने को हैं! दालें तो कबकी दूर हो चुकीं हैं थाली-से! अब फिर डीजल-पेट्रोल का दाम बढ़ा है, तो स्वाभाविक है कि फिर-से वस्तुओं के दाम बढ़ेंगे ही। परिवहन चार्ज बढऩे का सीधा असर आवश्यक वस्तुओं पर ही पड़ता है। ऐसे में क्या स्थिति होगी आम आदमी की? वह तो पहले ही दुब्बर हुआ जा रहा है, फिर-से उस पर मंहगाई का बोझ लादते जाने-से तो डर है, कि कहीं उसकी कमर ही न टूट जाए। देखा जाए तो आज की डेट में अगर कोई पिस रहा है, तो वह आम मध्यवर्ग है, जिसकी कि संख्या बहुतायत है। गरीब रेखा-से नीचे जीवन यापन करने वाले ऐसे लोग जिनका नाम सरकारी पंजी में दर्ज है उन्हें सस्ता चावल तो मिल जा रहा है, लेकिन सवाल है कि केवल चावल से ही तो नहीं हो जाता न? सब्जी-भाजी, दूध, मसालों से लेकर चायपत्ती, तेल, नमक, बे्रड आदि भी तो हैं जो बहुत नहीं तो थोड़े पोषण आहार के रूप में तो जरूरी हैं। फिर बच्चों की फीस, इलाज का खर्चा अलग ही है। उसकी व्यवस्था कैसे होगी? फिर आम मध्यवर्ग की ओर देखें तो उस बेचारे के पास तो चावल तक का सुभीता नहीं है। आज की डेट में गिरे-से-गिरे चावल की क्या स्थिति है मार्केट में भला किससे छिपा है? एचएमटी से नीचे कोई खाने लायक चावल भी नहीं मिलता। ऐसे में वह क्या करेगा?
फलों के दाम आसमान छू रहे हैं। आम को ही देख लीजिए, मौसमी फल है। बड़ों से लेकर बच्चों तक को यह बहुत पसन्द रहता है। लेकिन उसका मूल्य कोई सुन ले तो देखे न उस ओर। गरीब तो छोडि़ए, आम मध्यवर्ग आम की ओर से विमुख हुआ है। एक आम खाने के लिए भी सोचना पड़ा है। अन्य फलों की भी कमोवेश यही स्थिति है। फिर आम आदमी करेगा क्या?
यह समझ नहीं आता कि लोकतान्त्रिक व्यवस्था में तन्त्र को देखिए तो वह तो फल फूल रहा है, लेकिन लोगों की दशा दयनीय रूप से गिरती जा रही है। यह विडम्बना की ओर इशारा नहीं तो और क्या है? दो नम्बरी और चार सौ बीस करने वाले मिठलबरे, भ्रष्ट ठेकेदार, नेताओं की जिन्दगी देख लीजिए तो अच्छे पढ़े-लिखे और सभ्य समाज के लोग सिर नीचा कर सोचने लगते हैं कि क्या इसी दिन के लिए कुर्बानी हुई थी हमारे महान नेताओं की! दरसल सचाई तो यह है, कि जनसाधारण एकमत नहीं है। वह वर्गों में विभक्त है इसीलिए उसकी आवाज उठ नहीं पाती और नीति नियन्ता मनमानियां करते हैं। लेकिन यह दशा ठीक नहीं है। इससे तो स्थितियां सुधरेंगी नहीं। इसके लिए तो आम आदमी को एक होकर अपने हक के लिए आगे आना ही होगा।
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Wednesday, 25 May 2016

 भालू-बन्दरों का भी उत्पात 

छत्तीसगढ़ के जंगलों से वन्य पशुओं का निकल कर बाहर आना लगातार जारी है। वे फसलों से लेकर अन्य सामानों और घरों को तोड़कर तबाही तो मचा ही रहे हैं साथ-ही-साथ ग्रामीणों को भी मार कर बड़ा नुकसान करते जा रहे हैं। उनका आतंक इस कदर फैलता जा रहा है, कि ग्रामीण अब घर-बार छोड़कर दूसरे ठौर की तलाश करने लगे हैं। सरगुजा से लेकर अम्बिकापुर, रायगढ़, कोरबा आदि के पूरे क्षेत्र में हाथियों का बड़ा आतंक देखने को मिल रहा है। आए दिन इस प्रकार की खबरें सुनने में आ रही हैं कि हथियों के दल गांवों में पहुंच कर घरों को विनष्ट कर सामानों को तितर-बितर कर रहे हैं। कइयों घटनाएं हुईं जिनमें हाथियों ने जानमाल की बड़ी तबाही की है। शुक्रवार को धरमजयगढ़ वनमंडल के कापू व छाल वन परिक्षेत्र में तेंदूपत्ता तोडऩे निकले ग्रामीण को हाथी ने कुचल कर मारा ही था, कि फिर खबर आई है कि प्रेमनगर में एक ग्रामीण को सूंड़ में लपेट कर हाथी ने पटक दिया जिससे उसकी मौत हो गई। दर्जनों से ऊपर इन्सीडेन्ट हो चुके हैं जिनमें हाथियों ने महिला-पुरुषों को कुचलकर या पटककर मारा है। बताते हैं कि हाथियों के दल खाना-पानी की तलाश में जंगलों से निकल कर गांवों में विचरण कर रहे हैं।
इसी प्रकार भालुओं का भी आतंक हैं। वे भी ग्रामीणों को नोच-खसोट रहे हैं। बालोद क्षेत्र में बन्दरों का उत्पात है। वहां मालीघुड़ी ग्राम के एक निवासी ने बताया कि उस क्षेत्र में बन्दरों का आतंक इतना है कि किसान अपने कवेलू के घरों को हटाकर टीन शेड डलवा रहे हैं या फिर पक्का बनवा रहे हैं। वन्य जन्तुओं का इस प्रकार से जंगलों से निकलना बताता है, कि कहीं-न-कहीं उन्हें दाना-पानी की दिक्कतें हैं। बताया जाता है कि जंगलों में पानी की कमी होती जा रही है। बढ़ती गर्मी में गला तर करने के लिए वे जंगलों से निकल रहे हैं। ऐसी स्थिति में समझ में यह नहीं आता कि जंगल के अफसरान वन परिक्षेत्र में पोखरों का जगह-जगह निर्माण क्यों नहीं करवाते? यह भी है, कि जंगलों में पारिस्थिक सन्तुलन गड़बड़ा रहा है। इसीलिए वन्य पशु भी परेशान हैं। हिरन, खरगोश आदि लुप्त होते जा रहे हैं। इस ओर बड़े प्रोजेक्ट के निर्माण के साथ सुगठित नीति बनाने की जरूरत है। इसे गम्भीरता से लेकर और परिस्थितियों के साथ स्थानीय भूगोल को समझकर योजना को अमलीजामा पहिनाना होगा। जिससे जंगलों के साथ ही वन्य-पशु भी सुरक्षित रह सकें और मनुष्यों के साथ ही उनके घर व खेत-खार की सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।

Tuesday, 10 May 2016

 बच्चों की चोरी

तो क्या छत्तीसगढ़ के सरकारी अस्पताल भी अब भगवान भरोसे ही चल रहे हैं? यह प्रश्र इसलिए है, कि राज्य के सरकारी अस्पतालों में अनेक गम्भीर किस्म की विसंगतियां लगातार सामने आ रही हैं। जिला चिकित्सालय दुर्ग में तो कल एक बच्चा ही चोरी चला गया! जिसका अब तक कोई अता-पता नहीं है। कितनी बड़ी और गम्भीर बात है यह, कि प्रसव पीड़ा से तड़पती एक गरीबन सरकारी अस्पताल दुर्ग में डिलवरी के लिए जाती है और डिलवरी में उसे लड़का प्राप्त होता है जिसे कुछ ही देर में चोरी कर लिया जाता है! सोचा जा सकता है, कि क्या हालत होगी उस मां का जिसका बच्चा उसकी आंखों के सामने से ही गायब हो जाए। क्या भरोसा करेगी वह सरकारी अस्पताल पर?
देखा जाए तो यह कोई पहला मामला नहीं है। अनेकों मामले हैं जिसमें नवजात बच्चों के इधर-उधर किए जाने और चोरी के मामले देखने को मिले हैं। यह तब है जब सरकार ने सुरक्षा के लिए अस्पतालों में अनेक प्रकार इन्तजामात किए हैं। एक पूरा अमला ही इसके लिए लगाया गया है, जिसमें भारी भरकम खर्च किए जा रहे हैं। पुलिस की व्यवस्था जो है सो अलग। फिर भी कैसे घटित हो रही हैं इस प्रकार की घटनाएं? क्या कोई अन्तर्राष्ट्रीय रैकेट काम कर रहा है, जो इस प्रकार की घटनाओं को सरंजाम देने में सरकारी मिशनरी से मिल कर अपना काम करने मे लगा है?
बताया जाता है, कि बच्चों की चोरी के पाशविक धन्धे में एक बड़ा गिरोह काम करता है। अनेकों ऐसे मामले सामने आए जिसमें पता चला कि बच्चा खरीदने वाली दम्पतियों से लेकर क्राइम जगत से जुड़े लोग अपना जाल फैलाकर रखते हैं। लेकिन सवाल यह उठता है, कि सरकारी अस्पताल जहां कि गरीब और बेसहारा सर्वहारा वर्ग के लोग बहुतायात में आते हैं उनकी सुरक्षा और सुविधा के लिए क्या कोई समझौता किया जा सकता है? आज भी पता चलता है कि सरकारी अस्पतालों में चिकित्सकों से लेकर दवाइयों तक का टोटा रहता है, फिर भी मरीज हैं कि बेचारे बड़ी उम्मीद से वहां जाते हैं। उसके बाद भी उनके साथ नाइन्साफी हो, तो फायदा क्या? देखा जाए तो प्रशासन ने अस्पतालों के प्रसूति कक्ष में सुरक्षा के पर्याप्त इन्तजामात कर रखे हैं। सीसीटीवी कैमरे तक लगाए गए हैं पर भी घटनाएं घट ही रही हैं। हैरत तो यह होती है कि ऐन घटना के वक्त ये सीसीटीवी कैमरे बन्द पाए जाते हैं जो सन्देह पैदा करते हैं और अनेक सवालों को जन्म देेते हैं। इसीलिए लगने लगता है, कि सरकार और प्रशासन की व्यवस्था में कहीं तो खामी है और ये सरकारी अस्पताल भी भगवान भरोसे ही चल रहे हैं। आखिर कब सुधरेगी इस प्रकार की कुव्यवस्था?

Monday, 9 May 2016

रघुराम राजन की माकूल चेतावनी

सचमुच आज के बदलते दौर में बढ़ते गैर जरूरी पाठ्यक्रमों की उलझन ने छात्र-छात्राओं को अपने मोहपाश में फांस लिया है। इसकी मृगतृष्णा ऐसी है कि इसमें फंस कर छात्र-छात्राएं अपने भविष्य को दांव पर लगा रहे हैं। इस मामले में रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) के गर्वनर रघुराम राजन ने भारतीय छात्र-छात्राओं को जिस लहजे में आगाह किया है उसे समझकर चौकन्ना होने की जरूरत है।
यह सच है कि आज का युग संचार और सूचना प्रौद्योगिकी का है, जहां का वातावरण पल-प्रतिपल बदलता रहता है। इसके व्यामोह ने आभासी दुनिया का ऐसा कृत्रिम आवरण आच्छादित कर रखा है जहां कि सपने और ऊंची उड़ानें हैं। शानदार लाइफ स्टाइल और विदेश यात्रा के हसीन सपने पालती हमारी नौजवान पीढ़ी हर स्तर पर समझौते करने को तैयार खड़ी दिखती है। लेकिन यह भी याद रखना है कि यदि यह समय सूचना प्रौद्यागिकी और डिजिटलाजेशन का है तो व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा भी कम नहीं है। यह होड़ ऐसी है, कि दुनिया का युवा वर्ग इससे प्रभावित होता जा रहा है। यह भी याद रखना है, भारत आज भी तीसरी दुनिया के देशों में गिना जाता है जहां निर्धनता, गरीबी और पिछड़ेपन का दंश है। जहां का युवा वर्ग अपने बेहतर भविष्य के लिए हाथ-पैर मार रहा है। इसीलिए रघुराम राजन की चेतावनी को बड़े ध्यान से सोचने की जरूरत है। कारण कि आज भी अनेक मल्टीनेशनल कम्पनियां बड़े-बड़े सब्जबाग दिखाकर हमारी युवा पीढ़ी को आकर्षित कर रही हैं। भगोड़े विजय माल्या की नजीर हमारे सामने है, जिसने जाने कितनी जिन्दगियों को बर्बाद किया। उसकी एयरलाइन्स कम्पनी में काम करने के लिए छात्र-छात्राओं ने क्या-क्या न किया? लेकिन आज उनका भविष्य क्या है? इसी प्रकार देश के कोने-कोने में अनेक शैक्षणिक संस्थाएं खुली पड़ी हैं जो एक-से-एक पाठ्यक्रमों में प्रवेश देने की दूकानें खोले बैठी हैं जिनका दावा रहता है कि नौकरी पक्की! इसी लालच में नौजवान आकर्षित होते हैं और मोटी फीस होते हुए भी कर्ज गुआम लेकर एडमिशन ले लेते हैं।
हमारे छत्तीसगढ़ में भी ऐसे अनेक संस्थान संचालित हैं, जो बच्चों को सब्जबाग दिखा रहे हैं। शहरों से लेकर ग्रामीण इलाकों तक में इनके बड़े-बड़े होर्डिंग्स लगे हैं जो हमारे छात्रवर्ग को आकर्षित करते हैं। कई कोर्सों का नाम देकर लुभाया जा रहा है। छात्र-छात्राएं इस क्रेज को देखते हुए ऊंची फीस के लिए बैंकों से कर्ज लेकर एडमिशन लेती हैं, लेकिन बाद में उन्हें रोजगार नहीं मिल पाता और उन पर बैंक का लोन चढ़ जाता है। एविएशन क्षेत्र से लेकर एमएमई, एआइएम, आईएमआईएम जैसे दर्जनों कोर्सेस संचालित हैं जिनमें एडमिशन के लिए बच्चे भागे जा रहे हैं। पालकों और समाज के हर वर्ग के लिए यह सोचने का समय है कि वे अपने बच्चों को सही मार्गदर्शन दें और उन्हें उन्हीं पाठ्यक्रमों में प्रवेश के लिए प्रेरित करें जो रोजगार के सही अवसर प्रदान करे। साथ ही भारतीय संस्कारों का बीजारोपण भी करे।

Thursday, 5 May 2016

 सामाजिक असन्तुल
 
लोग भौंचक हैं और कह रहे हैं कि अमीर तो और अमीर हुआ जा रहा है और गरीब और गरीब! आखिर कौन-सी नीति बनायी है हमने जो सामाजिक असन्तुल को बढ़ाती ही जा रही है। हालात देख कर एक बारगी तो ऐसा लगने लगता है कि यही हाल रहा तो बेमेल समाज में खतरनाक परिस्थितियां न उत्पन्न हो जाएं। कारण कि लोग देख रहे हैं कि अमीरी-गरीबी के बीच की खाई कितनी चौड़ी और गहरी होती जा रही है।
जिनके पास अनाप-शनाप पैसा है वे उसका उपयोग भी अनाप-शनाप ही कर रहे हैं। देखा जा रहा है कि काली कमाई करने वाले अनेक लोग रियल इस्टेट के धन्धे में भाग्य आजमाने के लिए भारी निवेश किए जा रहे हैं।  शराब से लेकर अन्यान्य अवैध धन्धों से पैसा-पत्तर बनाकर दो नम्बरी किस्म के लोग सत्ताधीशों और नौकरशाहों के पास पहले तो अपनी धमक बढ़ाए और फिर खुल्ला खेल शुरू कर दिए। आज आप चाहे जहां जाएं, हर जगह उन्हीं का बोलबाला मिलेगा। सभ्य समाज के लोगों की चाहे कोई पूछ न हो लेकिन शासन और प्रशासन के गलियारे में इनकी पूछ-परख अवश्य दिखाई देगी। इसी का परिणाम है सामाजिक ताना बाना बिगड़ता ही जा रहा है। हर जगह विसंगतियां और विभेद का भाव दिखाई देने से लगता है कि आने वाला समय और कठिनाई भरा होगा। विशेषकर उसके लिए जो ईमान पसन्द और तहजीब से रहने वाला है।
आज आप गरीब बस्तियों में चले जाएं, कहां दूर हुई है उनकी गरीबी? देख लीजिए उनकी लाइफ स्टाइल। आजादी के बाद से लगातार हम गरीबी हटाओ का ढोल पीट रहे हैं लेकिन ईमानदारी से तनिक अपने सीने पर हाथ रखकर पूछें तो पता चलेगा, कि गरीबों के नाम पर इन नेताओं ने कैसे अपनी दूकानदारी चलाई है और अपना घर भरा है। सच तो यह है कि गरीब बेचारा और गरीब हुआ है। उसकी बदहाल जिन्दगी न तो पहले बहार थी और न ही अब है। शिक्षा से लेकर स्वास्थ्य और यहां तक कि खाने-पीने तक के लिए उन्हें दूसरों का मुंह ताकना पड़ता है। दुखद तो यह है कि अमीर बनने के लिए अब शार्ट कट योजना के चलते बड़े-बड़े क्राइम हो रहे हैं जिन पर किसी का ध्यान नहीं है। जमीनों की दलाली से लेकर बैंकों से ऋण लेकर अदा न करने की प्रवृत्ति और बहुतेरे अवैध धन्धों के माध्यम से धन कमाने की लिप्सा ने ही इस विभेद को बढ़ाने का काम किया है। इसे दूर करने के लिए आखिर प्रयास करेगा कौन?
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Wednesday, 13 April 2016

मिल बाँटकर खाओ

इधर सड़क दुर्घटनाओं में हर रोज मौतें हो रही हैं उधर वाहन चालकों को छेक कर लाइन में खड़ा किया जा रहा है.. इधर नक्सली लगातार आत्मसमर्पण में हाथ खड़े कर रहे हैं तो उधर उनके द्वारा बम-ब्लास्ट कर हमले-पर-हमले भी हो रहे हैं.. इधर पानी के लिए सरकार बैठकें कर रही है और उधर मैदानी इलाकों  में नागरिक बूंद-बूंद पानी के लिए  तरस रहे हैं.. अन्तिम व्यक्ति के भूख मिटाने के खाद्यान्न बंट रहे हैं तो बेचारे आदिवासियों के छींद के कीड़े खाकर भूख मिटाने की भी खबर है.. इस प्रकार की निरन्तर मिल रहे समाचारों से लगने लगता है, कि क्या छत्तीसगढ़ भगवान भरोसे है? हर जगह देखने पर लगता है कि व्यवस्था और उसके परिचालन में कहीं कोई साम्य नहीं है! हर कोई अपनी ही मस्ती में दिखता है। कोई काहू मगन कोई काहू मगन की तर्ज पर जिसे देखो वही मदमस्त है मानो उसे किसी और से कोई मतलब ही नहीं! इन सबके बीच लोग हैं कि फंसे हुए बन्दर की भांति इत-उत देख रहे हैं किन्तु कहीं ठौर नहीं मिल रहा है।
छत्तीसगढ़ की यातायात व्यवस्था पर ही बात करें, तो सवाल है कि जब हमारा टे्रफिक सिस्टम इतना चैतन्य व चौकन्ना है तो फिर सड़क दुर्घटनाएं रुक क्यों नहीं रहीं? यही सवाल माओवादी उन्मूलन में चल रहे कार्यों को लेकर भी है, कि जब माओवादी इतने ही हतोत्साहित व निराश होते जा रहे हैं तो लगातार उनके हमले कैसे जारी हैं? सरकारी अमले से लेकर बड़ी संख्या में सुरक्षा बलों की उपस्थिति के बाद भी आग के शोले उठते ेरहें तो क्या कहा जाए? इससे तो यही लगता है कि छत्तीसगढ़ के वास्तविक हितों के साथ किसी को सरोकार है, लगता नहीं! जिसे देखो वही कमाई पर लगा है। चाहे जैसे हो आने दो सोच के चलते हर जगह कबाड़ा हो रहा है। कभी-कभी लगता है कि मिल बाँटकर खाओ वाली नीति हर जगह चल रही है। माओवादी अपनी चला कर लूट ही रहे हैं तो दूसरे भी ईमान का चोला पहने नागरिकों को कोई सुविधा नहीं दे रहे हैं। बल्कि नागरिक तो बेचारा बना हुआ फुटबॉल की तरह इधर-उधर फेंका जा रहा है।

Sunday, 10 April 2016

युद्ध-कौशल को जंग 

फिर तो यह चिन्ता के फलक को और बड़ा कर देने वाला है, कि नक्सली उन्मूलन में सरकार की ओर से मोर्चे पर डटे केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल(सीआरपीएफ) में फीजिकल फिटनेस का अभाव इस कदर है कि वे राष्ट्र स्तरीय स्पर्धा में ही फिसड्डी साबित हो रहे हैं!
मध्य प्रदेश ग्वालियर जिले में टेकनपुर के बीएसएफ अकादमी में सम्पन्न छठवीं राष्ट्रीय स्तरीय स्पर्धा में सीआरपीएफ के कमाण्डोज के निम्न प्रदर्शन की जो जानकारियां आ रही हैं उसने तो माथे पर बल ला दिया है।  पता चला है कि इस स्पर्धा में सीमा सुरक्षा बल का तो ठीक किन्तु सीआरपीएफ का प्रदर्शन बड़ा लचर रहा। बताया जा रहा है कि सीआरपीएफ के कमांडोज को सभी महत्वपूर्ण खंडों में शिकस्त मिली है। फायरिंग जैसी महत्वपूर्ण स्पर्धा तक में उनके पिछडऩे की खबर है। ऑपरेशन प्लानिंग एण्ड ब्रीफिंग, एसटीओ जंगल खंड की तो हालत और भी पतली बतायी जाती है। पता चला है कि 20 मार्च से 5 अप्रेल तक आयोजित इस प्रतियोगिता में 23 प्रतियोगियों में छत्तीसगढ़ के सीआरपीएफ कमाण्डोज को 20 वां स्थान मिला है।
उल्लेखनीय है कि यह स्पर्धा देश के सभी प्रशिक्षित कामाण्डोज की होती है। वेल ट्रेन्ड कमाण्डोज की एक तरह से यह परीक्षा होती है कि उनके अन्दर कितनी कुव्वत है और प्रतिभा के मामले में वे कितने अव्वल है। लेकिन टेकनपुर स्पर्धा में उनके लचर प्रदर्शन ने बहुत सोचने पर मजबूर कर दिया है। यह इसलिए भी है कि माओवादी लगातार अपने जंगल वार फेयर को धारदार बना रहे हैं। गुरिल्ला युद्ध का उनका रणकौशल लगातार परवान चढ़ा रहा है। एक-से-एक प्लानिंग तैयार कर वे अपने लड़ाकों को बन्दरों के समान चुस्त दुरुस्त कर अटैक करते हैं। यही वजह है कि अर्धसैनिक बलों को अनके बार मुंह की खानी पड़ती है। अभी हाल ही में लैंड माइन बिस्फोट में 7 जवान सीआरपीएफ के ही मारे गए। छत्तीसगढ़ पुलिस विभाग के एक अवकाश प्राप्त अधिकारी ने इस पर चिन्ता जताते हुए पिछले दिनों बताया था कि किस प्रकार सीआरपीएफ के कमाण्डो प्रशिक्षण से दूर हैं। बताया गया कि नियमित पीटी-परेड तो दूर की बात वे इतने लुंज-पुंज हैं कि अपने शारीरिक सौष्ठव का ध्यान तक नहीं रखते। कैम्पों में इस कदर सुस्ती है कि सोना और खाना बहुत हुआ तो थोड़ी-सी पेट्रोलिंग और संतरी ड्यूटी, बस। वहीं माओवादी लड़ाके हैं कि नियमित पीटी परेड तो छोडि़ए कोहनी और घुटने के बल पर क्रॉलिंग कर उफ् तक नहीं करते । वे जान देकर भी टे्रन्ड होने तत्पर रहते हैं। पेड़ों में छिपकर फायरिंग और डालों पर कूदकर छिपने की कला वे इस कदर विकसित करते हैं कि क्या कहें? हमारे पास अत्याधुनिक हथियार लेकिन उनके पास क्या? फिर भी वे कई बार बाजी मारते हैं तो क्या यह हमारे लिए आलोचनात्मक आत्मपरीक्षण का विषय नहीं? कड़ा प्रशिक्षण ही है जो हमारे जवानों को स्पर्धा में खरा उतार सकता है। उस पर कोई समझौता नहीं होना चाहिए। यही समय की मांग है साथ ही देश की आन्तरिक सुरक्षा का सवाल भी।
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 कराहता आम आदमी 

  जीवन है तो बीमारियों का साथ भी है, लेकिन इन्हें दूर करने के लिए दवाइयां ही हैं जो साथ निभाती हैं। परन्तु आज दवाइयों को लेकर क्या हाल है सभी जानते हैं। और-तो-और, अब जरूरी स्वास्थ्य रक्षक दवाओं के लिए भी लोगों की मुश्किलें बढऩे लगी हैं। दिन-प्रतिदिन स्वास्थ्य सेवाएं महंगी ही होती जा रही हैं। ऐसे में आम आदमी उसमें भी निम्र आय वर्ग के लोगों की तो एक तरह से मरनी ही हो गई। लोगबाग तो अब अस्पताल के नाम से ही कांपने लगते हैं। कहें कि अच्छे-भले आदमी के सामने अस्पताल का नाम ले लें तो उसे बुखार आ जाता है। 
स्थिति यह है कि निजी चिकित्सालयों में इलाज काफी महंगा हो गया है। छोटी-से-छोटी बीमारी के लिए भी हजार रूपए से ऊपर निकल जाना आम बात हो गई है। सामान्य सर्दी-बुखार में भी डॉक्टर की सैकड़ों रूपयों की फीस और फिर उसके बाद रक्त-मूत्र आदि की जांच न भी हुई तो एंटीबॉयोटिक्स और एंटीएलर्जिक से लेकर अन्य दवाओं की खरीदी में मरीज की नानी याद आ जाती है। मेडिकल दूकानों में जाते ही मरीज सोचता है कि कहीं पैसे कम न पड़ जाएं! इसके पीछे कारण यह है, कि ब्राण्डेड दवाएं तेजी से लोगों की जेबें हल्की कर देती हैं। बीच में जेनरिक दवाओं के लिए सरकार ने बड़ा अभियान छेड़ा था। लेकिन अब उसका कहीं अता-पता नहीं है। इसे देखने के लिए न तो डीआई के पास फुर्सत है और न ही विभाग के अन्य लोग ही रुचि ले रहे हैं फिर सरकार में बैठे लोगों के पास कहां समय है। इससे हो यह रहा है कि मेडिकल वालों से लेकर डॉक्टर्स तक ब्राण्डेड दवाओं में हाथ खोल रहे हैं। चमकीली रैपर्स में पैक्ट्ड ब्राण्डेड दवाइयां इतनी महंगी हैं, कि एक मरीज को अपने पूरे माह का वेतन खर्च कर देना पड़ता है। जेनरिक दवाओं के लिए छिड़े सरकार के अभियान ने क्यों दम तोड़ दिया? मरीज आज भी सवाल करते हैं। डॉक्टर की पर्ची मिलते ही मरीज सीधा पूछता है, कि जेनरिक दवाएं कहां मिलेंगी? लेकिन हों तब तो! यहां तो बताते हैं कि दवा कंपनियों की अस्पताल व नर्सिंग होम्स वालों से इतना तगड़ा गठबंधन है कि चाह कर भी जेनरिक दवाएं नहीं चल पातीं। सिप्रोफ्लाक्सेसिन जैसी एंटीबॉयोटिक में खूब कमाई चल रही है। किस-किस का नाम लें, अनेक दवाएं जो जेनरिक में इतनी सस्ती हैं कि मरीज खरीदे तो पता ही न चले, लेकिन वहीं ब्राण्ड में घुसें तो एक पत्ता लेने में हालत बिगड़ जाती है।
जेनरिक दवाओं को लेकर सरकार का अभियान बड़ा सुन्दर और पुण्यात्मक था। इसका सीधा लाभ मरीजों को मिल रहा था। किन्तु उसने क्यों सांस तोडऩी शुरू कर दी यह तो वे लोग ही जानें।
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Monday, 4 April 2016

 छत्तीसगढ़ में कांग्रेस निस्तेज

     युवा दिलों की धड़कन समझे जाने वाले कांग्रेस के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राहुल गांधी हिन्दुस्तान के कोने-कोने जा रहे हैं। सम्भवत: कोई प्रदेश नहीं होगा जहां उनका पसीना न गिर रहा हो। छत्तीसगढ़ तो वे अनकों बार आए। वन-प्रदेश के आदिवासियों से लेकर ग्रामीण अंचल के किसानों और फिर शहरों में छात्र-युवा जगत से भी रूबरू हुए। देखें तो उनके पास सुन्दर आइडियालॉजी है और काम करने की चित्तवृत्ति भी। इसके बाद भी छत्तीसगढ़में कांग्रेस के जिम्मेदार लोग हंै, कि उनकी भावनाओं का लेश मात्र भी उपयोग नहीं कर रहे हंै। आपस में सिरफुटौव्वल और मुंहफुलौव्वल का ऐसा अद्भुत नजारा है कि सब इसी में लस्तम्पस्त हैं, फिर कौन देखे उनका आइडोलम!
कांग्रेस यदि तीन बार से लगातार शिकस्त खाकर राज्य-विधानसभा में उल्टा पल्ला है, तो इसके लिए वह मतदाताओं को दोष नहीं दे सकती और न ही यह कह कर बहाना बना सकती है कि मनमोहन सरकार में भ्रष्टाचार और महंगाई की पराकाष्ठा ने उसे राज्य-सत्ता से वंचित कर दिया। कोई कहता रहे कि आम जनता ने ही कांग्रेस के इतिहास को भुला दिया है, लेकिन यहां के मतदाताओं ने तो नगरीय निकाय चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशियों के सिर पर ताज पहिनाकर अपनी अभिव्यक्ति का खुला आगाज कर दिया, कि वे नेहरू-गांधी परिवार के त्याग और बलिदान को बिल्कुल नहीं भूले हैं। मिनी भारत भिलाई से लेकर राजधानी रायपुर में यदि कांग्रेस महापौर की कुर्सी पर है तो जनता का यह सन्देश नहीं तो और क्या है, कि छत्तीसगढ़ में कांग्रेस कमजोर नहीं, बल्कि कमजोर तो वे कांग्रेसी हैं जिनने नेहरू और गांधी की विरासत को ही विस्मृत करके रखा है! पूछा जा सकता है कि वैचारिक दारिद्र्य के शिकार लगते यहां के अनेक कांग्रेसी जुबान चलाने के अलावा करते क्या हैं? कांग्रेस के वैचारिक महापुरुष महात्मा गांधी ने केवल आजादी की लड़ाई ही नहीं लड़ी, बल्कि वे सीधे जनता से जुड़े और उनकी दैनिक और घरेलू समस्याओं के लिए भी चरम संघर्ष किया। चम्पारण में नीलहों का आन्दोलन इसका बड़ा उदाहरण है। फिर पंडित नेहरू को ही देख लीजिए, डिस्कवरी ऑफ इण्डिया उन्होंने यूं ही नहीं लिख दिया। उससे क्या सीख लेते हैं यहां के कांग्रेसी ?
नई दिल्ली का 10 जनपथ भी क्या न सोचता होगा, कि उनके परिवार की इतनी बड़ी कुर्बानियां क्या इसीलिए हुईं, कि कांग्रेस के लोग जब भी उसके दरवाजे आएं तो बस शिकायतों की फाइल और एक दूसरों को नीचा दिखाने वाले सबूतों का पुलिन्दा लिए अपने लिए पद-प्रतिष्ठा की मांग करने ही पहुंचें? कितने होंगे जो नि:स्वार्थ और जनता के लिए मर मिटने वाले आन्दोलनों की फेहरिस्त लिए दिल्ली दरबार में दस्तक देते हों? राहुल गांधी पूछ सकतें हैं यहां के कांग्रेसियों से, कि चलिए बताइए तो जनता से सीधे जुडऩे के लिए आपने किया क्या ? छत्तीसगढ़ में आदिवासी मर रहे हैं, बस्तर का पूरा इलाका युद्ध की चपेट में है, जनसमस्याएं नर्तन कर रही हैं और आप अपने में ही रस्साकसी कर रहे हैं। ठीक है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ आपने आवाज उठाई, किन्तु कितनों को सरंजाम तक पहुंचाया? यही छत्तीसगढ़ है जहां पं. नेहरू का नायाब तोहफा भिलाई इस्पात संयंत्र खड़ा है, यही वनांचल है जहां श्रीमती इन्दिरा गांधी के पैर आदिवासीजनों के पैरों के साथ थिरके थे और यही छत्तीसगढ़ है जहां राजीव-सोनिया गांधी को वनवासियों ने तीर-धनुष भेंट किए ? किसलिए ? इसलिए न कि वे उनसे प्यार करते थे। लेकिन अब ? अब आदिवासियों की बात ही छोडि़ए, कांग्रेसी-ही-कांग्रेसी से नफरत करता प्रतीत होता है। राहुल गांधी एक गुप्त आंकलन करा लें, पता चल जाएगा कि किस तरीके से यहां खांटी और अनुभवी कांग्रेसजनों को उपेक्षा का शिकार बना दिया गया है। भाजपा यदि आज भी डंके की चोट पर कहती है, कि वह चौथी बार भी राज्य में सरकार बनाकर दिखा देगी, तो उसके पीछे उसकी दंभोक्ति नहीं बल्कि सचाई छिपी है, कि वह सूत्र पकड़ चुकी है कि कांगे्रस को कोई और नहीं बल्कि कांग्रेसी ही हराएंगे उसे तो बस उन्हें उद्दीप्त करना है।

Friday, 1 April 2016

 बच्चों में क्षीण होती सहनशीलता

     कुछ ही दिन पूर्व भिलाई में 16 साल की 11 वीं कक्षा की छात्रा ने ट्रेन के सामने कूदकर अपनी इहलीला समाप्त की ही थी, कि अब बीएससी पढ़ रही धमतरी क्षेत्र की एक छात्रा द्वारा चूहामार दवाई खाकर आत्महत्या करने की घटना सामने आई है! उधर राजधानी रायपुर में भी एक नर्सिंग छात्रा द्वारा जहर खा के जान देने की कोशिश करने की खबर मिली थी। इस प्रकार के आकस्मिक हादसों ने बहुत कुछ सोचने पर मजबूर कर दिया है! चकित करने वाला तो यह है, कि ये आत्महत्याएं इसलिए की गईं बताई जाती हैं कि बच्चियों को उनके फेल होने की खबर थी!  इससे क्षण में वे इतने सदमे में आ गईं, कि अपने प्राण ही दे बैठीं! यह दांतों तले उंगली दबाने और माथे पर बल लाने वाला है, कि जिस देश में हिमालय-सा धीर, सागर-सा गम्भीर, पहाड़ों-सा सहनशील, माँ-सी करुणा और क्षमा जैसी उपमाओं और बिम्बों से अटी पड़ी कविताओं और कहानियों का पाठ पढ़ाया जाता हो वहां इत्ती-सी बात पर बच्चियां आत्मघात करें, अपने ही हाथों अपने प्राण हर लें! किसी कक्षा में विद्यार्थी का अनुत्तीर्ण होना सामान्य तौर पर कोई बड़ी बात तो नहीं ? अनेक विद्यार्थी हैं जो एक ही कक्षा में अनेक बार फेल हुए, किन्तु उन्होंने तो ऐसी अदम्य जीजिविषा का परिचय दिया कि फिर न केवल क्लास टॉप किया बल्कि आगे चलकर प्रथम श्रेणी के अधिकारी बनकर अपना नाम देश-दुनिया में रौशन कर दिया।
ये सच है कि आज के समाज में विद्यार्थियों में प्रतिस्पर्धा की भावना बढ़ी है और यह भी सच है कि परिवार का दबाब बच्चों पर रिजल्ट को लेकर जरूरत से ज्यादा बढ़ गया है। लेकिन इसका मतलब ये तो नहीं, कि विफलता का भय होने पर वे अपने आपको ही खत्म कर दें। फिर कहां हुई प्रतिस्पर्धा की भावना ? समाज शास्त्र तो कहता है कि प्रतिस्पर्धा में विफलता भी सफलता की घोतक होती है। क्योंकि इसमें विफल बारम्बार सफल होने की कोशिश में लगा रहता है।
लेकिन अब यह गलत साबित होने लगा है। लगता है कि टेलीविजन द्वारा पसरती अपसंस्कृति के साथ ही आज की सूचना प्रौद्योगिकी का गलत इस्तेमाल और पालकों का अपने बच्चों पर मनोवैज्ञानिक लगाव न होने की वजह से उनके चिन्तन में बदलाव आता जा रहा है। अति आधुनिकता की चासनी अब इतनी मीठी हो चली है कि बच्चे दिमाग से मजबूत तो बन रहे हैं, किन्तु उनका दिल उतना ही कमजोर हुआ जा रहा है। दिल और दिमाग में साम्य न होने की बजह से वे नकारात्मक विचारों को अंगीकार कर रहे हैं। स्कूलों द्वारा भी अपने दायित्त्यों का निर्वहन न के बराबर किया जा रहा है। वे लोग तो लगता है कि केवल पैसे की हवश में मरे जा रहे हैं मानो बच्चों की जिन्दगी से ज्यादा प्यार तो उन्हें पैसों से ही है।
ऐसे समय में जरूरी है, कि समाज अपनी भूमिका में लौटे। विशेषकर समाजशास्त्री इसके लिए आगे क्यों न आगे आएं और समाज के नवनिर्माण में अपनी भूमिका का निर्वहन करें ? वर्ना हमारे बच्चे कहीं के न रहेंगे।