Thursday, 30 October 2025

इस बार गाँव में (1) इस बार गाँव से लौटे तो कुछ नया अनुभव और कुछ नए विचार लेकर। 22 अक्टूबर 2025 को हम और ऊषा जी नौतनवां एक्सप्रेस से निकले थे। ट्रेन समय पर चली और समय पर मऊ जंक्शन पहुँच गयी। पहली बार था कि हम दिन ढलने के पूर्व ही पहुँच गए। मऊ में गोरखपुर जाने वाली बस मिल गयी और हम 7 बजते-बजते रावतपार चौराहे पर उतर गए। हरिकेश जी लेने आये थे। उन्होंने अपनी बाइक पर हमें दू बार में अपने घर छोड़ा। घर पर उनकी श्रीमती जी ने स्वागत सत्कार किया। रात भर ससुराल में रुककर, सुबह हरिकेश जी की बाइक से हम ऊषा जी के साथ अपने गाँव खखाइचखोर के लिए निकल पड़े। हाटा बाजार से भीटी होते गाँव के सिवान पर लौहरपुर तरफ पेट्रोल पंप खुला है, वहां से मुड़ते ही हमें अपने गाँव की मादक सुगंध आने लगी। दूर तक फैले खेत और उनमें धान की लहलहाती फसलें मानों हमें अपने बचपन के दिनों में ले जाने को आतुर हो ! अरे यहाँ तो हम खेलने आते थे, वो ट्यूबवेल चल रहा है ऐसे ही पानी में कभी नंग-धडंग हम नहाया करते थे। वो महनोइयाँ, जिसकी माटी लेने हम आया करते थे जिससे अम्मा चूल्हा बनाया करती थीं। यहाँ मछली मारने वालों की भी बहुतायत होती थी। महनोइयाँ के पानी में मांगुर खूब छलकती थीं। जिसे मारने के चक्कर में कई बार कटिया फ़साने वाले खुद ही ग़च्चा खा जाते थे। देखो हमारा प्राइमरी स्कूल ! भवन बदल गया है लेकिन पालन बाबा और वह पोखरा जो हमें अनेक शिक्षाओं से सराबोर करता था वो नहीं बदला ! हाँ, कच्चे की जगह पक्का जरूर हो गया है। यही तो समय का बदलाव और प्रगति की निशानी है। हम ऊषा जी को लेकर पालन बाबा की स्थान पहुंचे। वहां छठ के घाट बनाये जा रहे थे। ऊषा जी और हमने मिलकर बाबू निखिल के विवाह का निमंत्रण-पत्र पालन बाबा को समर्पित किया। मानो वे बोल उठे, 'नगेस्सर सुकुल के गाँव पहुंचे तो हमारा घर जिसमें अम्मा और बाबूजी रहते थे उसका ताला खोलते ही पुरानी यादें आँखों में अश्रु बनकर उतर आईं। अब कोई ऐसा नहीं हैं जो हमारा स्वागत करे, चाय-पान के लिए बेकल हो। अब तो स्वयं ताला खोलो, स्वयं पानी भरो और स्वयं पियो। नहीं, अम्मा थीं तो.. खैर उन दिनों को याद करने का कोई फायदा भी नहीं। जो समय निकल गया वह फिर लौटकर आता कहाँ है ? हम सामने ही चाचा जी (श्री प्रेम नारायण शुक्ल ) के घर गये। वे भी 80 पार गए हैं। लेकिन फिर भी वार्धक्य से लड़ रहे हैं। उनके 3 बेटे जो पाने परिवार के साथ अन्य शहरों में कमा रहे है उन्होंने उन तीनों के प्रगति की जानकारी दी और कहा कि यहाँ अकेले जीवन से तो वे सुखी नहीं हैं, अपने बनाना और अपने खाना है लेकिन हाँ, घर की रखवाली कर रहे हैं इसी से संतोष है। हम सोचते रहे, क्या यही मानव-नियति है जो अंत समय में हमारे धैर्य और जीवन की परीक्षा लेती है ? चाचा को इस अवस्था में भी कोई बीमारी नहीं है और वे स्वस्थ व चलायमान हैं यह अच्छी और सकारात्मक बात है। हमने उनसे गाँव के लोगों को बाबू निखिल के शुभ विवाह का निमंत्रण-पत्र बांटने की सूची पूछी, तो उनने पूरब से पच्छी के लोगों की क्रमवार नाम लिखा दिए। हमने राम अशीष शुक्ल (कुल्लू बाबू) को साथ लेकर पूरब टोला का रुख किया। वहां सबसे पहले बंधन भैया के घर पहुंचे वहां हनुमान चालीसा का पाठ चल रहा था। याने मुहूर्त शुभ रहा। (2)

Thursday, 6 March 2025

एक दिन ननिहाल में बाबू आशुतोष का परिणयोत्सव और ननिहाल का श्रीनिमंत्रण ! मानो नाना-मामाश्री की मधुर-पुकार! महाकुम्भ की महाभीड़, ट्रेनों में रेलम-ठेल के बीच भी हमारे कदमों में उल्लास के नूपुर झंकृत हो उठे थे ! बस्ती में आलोक बाबू के विवाह के समय हमारी विदाई करते दिवंगत भाभी (श्रीमती धर्मेन्द्र भैया) ने बड़े प्यार से हमारे बुशर्ट की थैली में रूपये भेंटते उलाहना दिया था, "अकेले आते हैं ! अबकी साथ में लाना है।" जेहन में इसकी अनुगूँज बनी हुई थी। तो अबकी चलने को हुए तो चंद्रलोक में बैठीं हमारी अम्मा मानो पहले ही डोल्ची लिए तैयार हों! कई संयोग साथ बन रहे थे! हमने ऊषाजी से भी कहा तो वे अपने नैहर के सुख पर लट्टू हुईं! हमने कहा,"नहीं, इस बार नैहर नहीं; हमारे धर्मेन्द्र भैया के आत्मज के विवाह में पुष्प-वर्षा करना है।" हमारी भावनाओं को समझते हुए उनने अम्मा के नैहर के आगे अपने नैहर-सुख को निछावर कर दिया! 00 हम दुर्ग पहुंचे और नवतनवाँ सुपरफास्ट से यूपी के लिए निकल पड़े। दूसरे दिन रात में मऊ जं. और वहां से बस द्वारा बड़हलगंज ! छुटपन में यहाँ से अम्मा के साथ कई बार नकौझा गए हैं सो पता था कि उरुवां के लिए संगम टॉकीज के पास से वाहन मिलते हैं। तो ईवी पर बैठ पहुँच गए संगम टाकीज तरफ। वहां लाइन से लगे टैक्सी-जीप वाले पुकार लगा रहे थे, "हैए चलिए उरुवां..उरुवां बजार हो..है कहाँ चलेके बा..चला-चला जल्दी..?" इस पुकार में कितना अपनापा है। आवाज कड़क लेकिन भावनाएं मुलायम। एकदम हमारे पूज्य रामानंद मामा की तरह ! उन महात्मन के आवाज का जादू कोई समझ ले तो तर जाए। अम्मा के साथ का वह छुटपन साकार हो उठा, जब एक साधारण-सी डोल्ची लिए वह इसी प्रकार के ठसाठस भरे वाहनों में हमें लेकर सवार हो जाया करती थी ! इस बार वह नहीं, ऊषाजी थीं। हमने उन्हें तब के अनेक किस्से सुनाये और एक भर रही पीजो में सवार हो गए। ड्राइवर को जाने कैसे हमारे अंतर्मन की पहचान हुयी और उसने एक सवारी को आगे से उतार कर हमें बड़ी सुविधा के साथ उसके स्थान पर बैठा दिया जिससे हमारे पैर आगे तक फ़ैल सकें। हम उसकी सदाशयता पर मुस्कुरा उठे। नकौझा की तासीर ही ऐसी है। ०० जीप जब ठसाठस भर गयी और तिल रखने की जगह न बची तो कुछ महिला यात्रियों से बकझक करते हुए ड्राइवर ने मुट्ठे में भरकर फर्स्ट गेयर मार दिया और पीजो का इंजन सड़क से बतियाने लगा। महुआपार, झुमिला, कुड़वा आम होते गोला की तरफ बढे तो कितनी ही स्मृतियाँ आलोड़ित होने लगीं ! हमारे छोटे-छोटे पैर, अम्मा के आंसू..वे आंसू सहसा हमारी पलकों को घेरने लगे। हमने धीमे से मुड़कर ऊषाजी की तरफ देखा ! वे लहलहाती फसलों को निहार रही थीं। कुछ देर गोला में रुक, जीप फिर फर्राटा भरी और टॉप गेयर में गोपालपुर होते उरुवां बाजार पहुंच गयी। हम उतर गए। उरुवां का चौराहा, सजा हुआ बाजार, ननिहाल की मादक खुशबू ! हमारे लिए संसार की सबसे खूबसूरत जगह ! छुटपन में ध्रुव भाई के साथ यहाँ चले आने का सुख आज भी हमें आनंद से भर देता है। उनके खिलाए वे चने मानों आज भी स्वाद को तरी देते हैं। ऊषाजी को पुरानी बातों की तफ्सील देते हम उस मार्ग को बढ़े जो मानो अगवानी के लिए खड़ा हो। चौराहे के थोड़ा आगे उरुवां के प्रसिद्ध पकौड़ी की दूकान पर रुके और गरमागरम करारे पकौड़े लेकर स्वाद तर किये। सामने बंगाली दादा से कुछ मिष्ठान्न पैक कराये और चीन्हें रस्ते पर बढ़े। सहसा एक ईवी वाला रुका, "बइठीं, कहाँ चलेके बा?" "नकौझा !" हम ननिहाल-पथ देख रहे थे। वह सीट से उतरा और फूर्ति से हमारा सामन अपने व्हीकल पर रख दिया। "बाबा के इहाँ चलेके बा न ? चलीं !" हमें ठकमुर्री मार गयी ! नाना-मामा का प्रताप जस-का-तस ! पिछली बार का वह ममफली वाला खूब याद है, कितनी सहजता से मोटरसाइकिल से भेज दिया था वह। जब आते हैं कोई नया अनुभव मिल ही जाता है। ईवी वाले से क्या कहें ? यंत्रवत बैठ गए। सवारी दौड़ी और हम सोचते रहे किराया पूछे नहीं, कहीं बढ़कर माँगा तो ? ऐसे बहुत लोग होते हैं जो बैठा लेते हैं और मनमाना किराया मांगते हैं और फिर झगड़ा भी करते हैं। सोचते बढ़ रहे हैं कि झटके में नकौझा आ गया! हमने सकुचाते हुए उसे पचास का नोट थमाया। उसने नोट की ओर देखा तक नहीं, इससे पहले कि सामान पर हम हाथ लगाएं वह लपककर सारे सामान स्वयं ही उतार दिया और नमस्कार की मुद्रा में हाथ जोड़ चलता बना। हम उसे देखे तो देखते रह गए ! वाह, नकौझा की माटी ! ०० पहली नजर प्रेम भैया पर पड़ी। वे टेंट के आगे से निकल रहे थे। फिरकर देखे तो अपनी चिरपरिचित मुस्कान के साथ हमारी ओर लपके। तब तक धर्मेन्द्र भैया भी दिखे, वे भी आ गए। पूछे, 'अकेले।' तब तक टेंट की ओट से उनने ऊषाजी को देख लिया और खिल गए। यहाँ गीता दीदी बहुत याद आईं। वे होतीं तो अपनी गोद में दुबका कर ले जातीं। लेकिन द्वार से तकते ही भाभी (श्रीमती वीरेन्द्र भैया) ने ऊषाजी को अपनी गोद में भर लिया और अपने कमरे में लिवा चलीं। अम्मा के नैहर में उनकी बहू का शुभ-प्रवेश ! शुभातिशुभ ! हम तो भीतर ही दौड़ पड़े। नानाश्री के आगे सिर-नत होने ! जहाँ वे सोये रहते थे। जिस आले पर उनकी दिव्य फोटो रखी थी। लेकिन उनकी छवि न दिखी। वहाँ लगे भगवान के फोटुवों के समक्ष सिर झुकाये कि वीरेन्द्र भैया आ गए उनने फोटुओं को सहेजा और हालचाल पूछा। हम बड़ों की पवलग्गी और छोटों को दुलारने में लग गए। दिल्ली वाली भाभियों से लेकर बस्ती वाली भाभी तक खूब दुलार। बस्ती वाली भाभी (श्रीमती रवीन्द्र भैया) तो किचन में ही पसीने से ऊभ-चुभ थीं लेकिन देखते ही खिल गयीं। उनके सत्कार की अदा ही निराली होती है। वहीं बिटिया रानी गरिमा भी लोगों की सेवा में लगी मिली। उसे घर के कामों में दिलोजान से लगी देख अच्छा लगा। अंजू रानी अलग ही छटा में थीं उनके होनहार सुपुत्र की धज निराली थी। आलोक बाबू की श्रीमती जिनके विवाह में हम सुकुलजी के यहां गए थे वो भी गृह-कार्य में दौड़ लगा रही थीं। तृषा और जुगनू की रोशनी की तफरी भी देखते बनती थी। ध्रुव भैया की श्रीमतीजी और दोनों बच्चियां अंजली और लता से भी मुलाकात भावपूर्ण रही। बाबू जुगनू तो थे ही उनकी श्रीमती दुलहिन रानी भी कम बिजी नहीं ! पकड़ी में उनका विवाह देखने का सुअवसर हमें मिला था। उनके भाई साहब विनय सुकुल जी से भी भेंट हुयी। मेहमानों की आवभगत, देखरेख की व्यवस्था लोग संभाल रहे थे। गीता दीदी की कमी बहिन अशोक पूरा कर रही थीं। बड़ी दूनो दीदी भी हालचाल लीं। गायत्री दीदी ने तो अम्मा की खूब याद कीं कि, 'फूआ के बहुत याद आवेला।' ०० आलोक बाबू भोजन व्यवस्था संभाले थे तो बाबू जुगनू, बाबू चन्दन, बाबू अमित, आकाश बाबू, अनिल बाबू और रवीन्द्र भैया के छोटे साहब सभी किसी-न-किसी काम को अंजाम दे रहे थे। इसी में भोजन के लिए कहा गया। बड़हलगंज में खाये छोले-समोसे और उरुवां के करारे भजिये मानो छटक कर बाहर आ गए। वह महमह भात, वह लजाती हुयी तड़कीली दाल और सिसकारी भरती वह रसदार तरकारी भला और कहाँ ? मानो हमारी प्यारी मामी की सीता रसोई लिए स्वयं उपस्थित हो गयी हों। हम हाथ धोने आँगन में चांपाकल तक गए और हैंडिल मारने को हुए कि जाने कहाँ से लपककर सुनील बाबू आ पहुँचे ! उनने नल का हैंडल हमसे ले लिया और प्यार से स्वयं नल चलाने लगे। हम इस सुसंस्कार पर मर मिटे ! हमारे नानाश्री का रक्त यहीं बोलता है और हम श्रद्धा से नत हो जाते हैं। किसी ने तौलिया थमा दिया लेकिन तब तक हम दस्ती निकाल चुके थे। भोजन करने बैठे तो सभी लग गए सेवा में। रविंद्र भैया दौड़कर आते हैं। कहते हैं, "आप नीचे न बैठें, कुर्सी मंगवाते हैं।" भगवदवेत्ता, पुराणज्ञाता और सरलता-सहजता की प्रतिमूर्ति हमारे आदरणीय रविंद्र भैया ! हम आपसे क्या कहें ? हम बहुत छोटे हैं, धूलि-सम ! हम उन सौभाग्यशाली लोगों में हैं जिनके सिर पर महान नानाश्री से लेकर समस्त श्रीमामा ने हाथ फेरा है। तब हम चाहे जैसे हों खाएंगे तो आप लोगों के साथ ही। पैरों में ऐंठन के बाद भी हम आसन जमा लिए। ०० बाहर धम्मड़-धम्मड़-धम, धम्मड़-धम्मड़-धम.. धुमाल बज रहा है। 'बहारों फूल बरसाओ मेरा महबूब आया है..' की धुन है शायद ! हम निकलकर साजिंदों को देखते हैं। एक सोलह-अठारह साल का बजनिया गाल में हवा भरकर तुतरी बजा रहा है। उसके छोटे-छोटे केश ! लगता नहीं इतना पारंगत होगा लेकिन देखिये तो उसका हुनर। मानो लखनऊ घराने का साजिंदा हो। मन किया बात करूँ कि ओ, अम्मा के नैहर की माटी ! कितना सुन्दर बिगुल फूंकते हो यार। यह फ्रेंच भोंपू (फ्रेंच horn) बजाने की कला कहाँ से सीखी ? लेकिन वह व्यस्त था और हम मस्त। इसी में खड़ताल और स्नेयर ड्रम बजाने वालों की एक साथ मिलती लय और संगीत की स्वर लहरियां ! वाह ! एक और हाथ की छड़ी नाच रही है दूसरी उसके प्रहार से ड्रम बज रहा है। कभी शार्ट तो कभी लॉन्ग शॉट ! आरोह-अवरोह के व्यतिक्रम को रोककर हॉर्मोनिक्स पिच बनाना और फिर धुन का जादू बिखेर लोगों को झूमने को मजबूर कर देना, कम बड़ी कला नहीं। उरुवां की यह धुमाल पार्टी कुछ ट्रेडिशनल लगी किन्तु उसका डीजे वैरिएशनल ! हम आनंद ले रहे थे कि लक्ष्मीनारायण पप्पू भैया दिखे, बाबू दुर्गेश और भाभी भी ! प्रणामाशीर्वाद हुआ। उनने हमारी खबर ली और हमने दुर्गेश बाबू की तफ्सील ली। तब तक प्रिंसिपल साहब, शिक्षाविद जितेन्द्र भैया लक्षित हुए। इस बार उनकी चिर-परिचित मुस्कान तो थी लेकिन वह नायाब पगड़ी गायब थी जो अक्सर अलग ही अंदाज में छटा बिखेरती उनके सिर को मुकुट की तरह शोभित करती थी। प्रणाम को झुके तो सरस्वती-पुत्र ने गले लगा लिया। हम भाव-विह्वल हो उठे। हालचाल पूछे और भोजनादि भी। घर से सटकर नव-निर्माण भी दिखा। व्यवस्थित नक्शा ! सुन्दर डिजाइन। हमें ईश्वर से हाथ जोड़ा, 'इसे मनोनुरूप और सुन्दर बनायें।' यहीं फारिग होने की सुंदर व्यस्था थी। मेहमानों के लिए सुविधाजनक एवं आरामदायक। लीजिये, इमिली घोटाने का समय आ गया ! ०० 'नह काटू, नह काटू, नह काटू रे। अंगूरी जनि..' 'नह काटू नउनियाँ बचा के अंगुरिया देबू मैं तोके लाल-लाल चुनरिया..' इस परम्परिक गीत की आँगन में गूँज है और इसकी अनुगूंज हमारे ह्रदय की धड़कनों को पुरानी यादों में डुबो रहा है। तब हमारी अम्मा, मामी की साथ इसी गीत को गाया करती थी। समय बदला, जमाना बदला लेकिन देखिये गीतों की कड़ी, उसी चाशनी में पगी आज भी जस-की-तस मिठास से भरीं। हमारे पूर्वजों की धरोहर ! हम मन-ही-मन प्रणाम करते हैं और मुस्कुराकर भाभी के भाई साहब को देखते हैं जो इमिली घोटाने के लिए अँगने में पधार रहे हैं। धोती-कुर्ता और अंगोछे में सजे, उन्नत ललाट और ओठों पर मुस्कराहट की आभा। घर की स्त्रियां आँगन को घेरे खड़ी हैं। आसन पर भाभी और मातृ सुलभ गोद-सम चरणामृत पाते राजकुंवर-रूप में सजे दूल्हा बाबू आशुतोष ! भाभी की लाल साड़ी, लाल चादर, लाल चूड़ी, लाल महावर सबकुछ लाल-लाल.. हमें उस गीत का स्मरण हो आया जिसे युवा पीढ़ी खूब इंजॉय कर रही है कि, 'गोरी तोरी चुनरी बा लाल-लाल रे.. गाने को हुए तो उनके सिर पर रखा मउर नीला, पीला, सफ़ेद झिलमिल की रंगत में दिखा। रक्तिम आभा से लबरेज भाभी की सुंदरता खिल गयी थी। हास-परिहास की बीच, ' मामा-मामा शोर भइलें मामा नहीं अइलें हो..' 'बिरन भइया हो हमें इमिली घोटा द..' पहले गाने में कितना हास, कितनी उलाहना और दूसरे में कितना गहरा भ्रातृ-प्रेम, कितना तरल स्नेह, वीरता के पुट और स्वाभिमान की लरज ! इस दृश्य और गीत को सुनकर हमारी आँखें भरने लगी थीं ! भाई साहब के हाथ में साड़ी थी जिसे बहिन अशोक ने लेकर तागा खुट्ट से तोड़ दिया उसे फैला कर भाभी के कंधे पर ओढ़ाने का इशारा किया। फिर क्या था, भाई साहब आम-पल्लव कटवाए, साड़ी ओढ़ाए, रुपये ओंइछे और गीतों के हंसी-ठट्ठे के बीच रस्म अदा किये। अब बरात सजने लगी थी। सूरज ढलान पर और बजनियों का उत्साह उफान पर ! ०० लीजिये, विष्णु रूप वर बाबू चि. आशुतोष जी स्त्रियों के श्रीमंगल-गान के बीच जनकपुर के लिए निकल पड़े हैं। सभी भैया लोग, परिजन और मेहमानों की टोली बरात के लिए तैयार खड़ी है। गाड़ियों के हॉर्न-भोंपू एक-से-एक धुनें निकाल आगे-पीछे हो रहे हैं। एक अलग ही धज में धर्मेन्द्र भैया ! हमें एक लग्जीरियस कार में सुकुलजी (श्रीमानजी अंजू) का साथ मिलता है। एक ज़हीन और प्रतिभा से लबरेज युवा शख्शियत से बतियाते खूब-खूब अच्छा लगा। पता चला अपने ऑफिसियल काम से आप छत्तीसगढ़ आ चुके हैं। उनने राजधानी रायपुर से लेकर बलौदा बाजार, भाटापारा एवं हमारे जिले दुर्ग की भी तफ्सील दीं। कमर्शियल क्षेत्र से लेकर सोशल और सामयिक विषयों पर बात होती गयी और चीनीमिल, खेत-मेड़, खड़ण्जा, तारकोल सड़क होते बरात के लिए निकला हनुमान की पूंछ की तरह कारों का काफिला बनवारपार आ गया ! गाड़ियां खड़ी हो गयीं और बिजुलियाडाँड़ का पता पूछा जाने लगा। बनवारपार में गाड़ी खड़ी खड़ी थी। गान सुनायी दिया, ' राघवजी के गँउआँ बड़ा निक लागै.. बड़ा निक लागै हो बड़ा निक लागे, राघव जी के गँउआँ बड़ा निक लागै.." हम पलकें झुका गाने के साथ तादात्म्य बिठाने लगे। यहाँ से निकले तो सुकुलजी से बोले, 'बड़ा दूर गांव है भाई। चले तो चलते ही रहे हैं ! वे मुस्कुराये, 'हाँ चाचाजी, बड़ा अंदर है।' बहरहाल, फिर चले तो पहुँच गए बिजुलियाडांड़ ! वहां, इंतज़ार चल रहा था। देखते ही घरातियों में चहल-पहल ! बारातियों को माला पहिनाने की होड़ ! हमारे गले में भी एक सज्जन ने गेंदे की खशबूदार माला डाल दी, सम्मान से हमने उसे उतारकर उनके गले का हार बना दिया। वे हंस कर हमें गले लगा लिए। एक ओर जलपान की सुन्दर व्यवस्था और बारातियों के लिए आरामदायक चारपाइयाँ और गद्दे। वहां से नाचते-गाते और बैंड बाजा वालों के हुनर देखते द्वार पहुंचे जहाँ द्वार-पूजा आदि का कार्यक्रम हुआ। ग्यारह से ऊपर हो चुके थे। भोजन लग गया था। 000 जगमगाता भव्य प्रवेश द्वार, बजली की झालर और लड़ियों की सजावट जिसमें बल्बों का एक साथ जलना-बुझाना मानो फायर फ़्लाइस में रोशनी कि होड़ हो ! दौना की भीनी-भीनी खुशबू और मादक वैवाहिक-प्रांगण.. इन सबके बीच करीने से सजे भोजन-पकवानों के स्टाल ! गोल-गोल डाइनिंग टेबलों की सज्जा ! इसी में एक पर हम भोजन पाने बैठे। जोरदार स्टार्टर, फिर सुस्वादु भोजन ! तवा-रोटी की फरमाइश.. तुरत तवे से उतरी गर्मागर्म ! तंदूरी के साथ मिक्स वेज, छोले, मशरूम, सलाद, अचार, पापड़, राइस-पुलाव के साथ और भी बहुत से आइटम ! क्या-क्या खाएं? पकड़ी में अभिषेक बाबू साहब के विवाह में तो जयमाल के बाद देर रात लिट्टी-चोखा का स्वाद प्रिंसिपल साहब के साथ लिए थे, लेकिन यहाँ तो आप तीर्थ-व्रती हुए ! तो सुकुलजी, लक्ष्मीनारायण भैया और बाबू दुर्गेश आदि का साथ मिला ! फिर क्या ! लगा चटखारा ! स्वाद एक नंबर ! गाड़ियां लगीं और नकौझा लौटने कि पुकार लगी, लेकिन हम पिछड़ गए ! गाड़ियां चल दीं और हम देखते रह गए। किसी गाड़ी के इंतिजार में बैठे। रात गहराती जा रही थी और शीत का प्रकोप बढ़ता जा रहा था ! सोफे बैठे ठंडा रहे थे कि वीरेंद्र भैया ने मोटी-सी दुशाला हमारे कंधे पर रख दी, 'ठण्ड है इसे ओढ़ लीजिये।' भैया के वाक्यों में ही माधुर्य की इतनी हीट एनर्जी थी मानो इस शीत में भी उन मधुर-शब्दों की ऊष्मा ने हमारे शरीर को गर्माहट से भर दिया हो। हम खरगोश कि तरह दुशाला कि खोह में दुबक गए और नकौझा आ गया ! ०० विदा कहने की घड़ी आ रही है। यही वो समय है जो हमारे ह्रदय की सांसों की गति दूनी कर देता है। सोच ही रहे हैं, कि चम्मच रखी बड़ी-सी कटोरी में किसी ने हरे मटर की घुघुरी थमा दी है ! गर्मागर्म चाय भी आ गयी है ! कैसे पियें ? सांसें उछल रही हैं ! मिट्टी के छोटे-से कूप का दूध-नदी से बछुड़न है ! इतने अच्छे लोग, सुन्दर, उच्च और आदर्श विचार और सबसे बड़ी बात सभी-के-सभी हमारी अम्मा के प्रतिरूप ! लीजिये सुनिए, रसोई बनती रहे..लेकिन निकलना खाकर ही होगा ! भागवताचार्य रविंद्र भैया साथ लिवा बैठे हैं ! कड़ाही में नाचती गरमागरम पूड़ियाँ सीधे हमारे पत्तल में ! आलू-गोभी की रसदार तरकारी जिह्वा पर रौब गांठती है ! आचार्य प्रवर रविंद्र भैया की गाड़ी लग गयी है। बच्चे बैठ गए हैं और आप हमारे साथ हैं ! आँखें आर्द्र और चहरे पर वियोग की रेख ! भैया गंभीर हैं, बोलते कम हैं, लेकिन उनके भाव मानो रो पड़ते हैं ! मानो कथा कहते कोई कारुणिक प्रसंग आ गया हो। मामा की तरह साथ लेते हैं और कार तक पहुँचते हैं फिर बुशर्ट कि जेब में विदाई भेंट कर अगली सीट पर बैठ निकल चलते हैं ! हम ठक्क ! गुबार देखते रह जाते हैं। अब हमारा समय हो गया है। जीप लग गयी है। धर्मेन्द्र भैया डायरेक्शन देते हैं कि 'जीप से गोरखपुर और वहां से गाजीपुर के लिए सीधी बस सेवा है ! परेशानी से बचते रहिएगा और आराम से जाइएगा !' हमारे कानों के पर्दे पर जैसे मोह का मोटा पर्दा तह जमाया हो ! कुछ सुनायी ही नहीं देता ! हम भीतर जाकर सभी भाभी-बहुओं और बच्चों से भेंट आये हैं। आशीर्वाद ले लिया है। हमारे साथ प्रिंसिपल साहब, वीरेंद्र भैया, प्रेम भैया भी आ गए हैं। जीप स्टार्ट है। हमारे साथ दिल्ली नरेश बाबू मोहित जी और आपकी श्रीमतीजी भी हैं। खूबसूरत जोड़ी ! आप लोग भी गोरखपुर से ही दिल्ली के लिए प्रस्थान करेंगे। ड्राइवर ने गेयर पर मुट्ठा कस दिया है। गांव का ही है शायद ! इधर ही देख रहा है। सहसा हमारे साथ चार कंधे एक साथ मिलते हैं..प्रिंसिपल साहब, वीरेंद्र भैया, धर्मेन्द्र भैया और प्रेम भैया..दालान से और भी बहुत से लोग वियोग के हस्तकमल हिलाकर शुभकामनायें दे रहे हैं। ये लोग और लोगों के लिए साधारण हो सकते हैं लेकिन हमारे लिए हमारी अम्मा की आँखों की स्मृति-अश्रुबूंदें हैं जो आज भी हमारे सीने में बराबर धड़कती रहती हैं। सभी लोग निर्वाक ! इसी में शायद भोला भैया ने अपने अत्याधुनिक मोबाईल कैमरे से भैया लोगों के साथ की हमारी यह तस्वीर उतार ली है। जीप की गर्र-गर्र बढ़ गयी है, शायद विलम्ब का उलाहना है। हम चलें कि उससे पहले हमारी आँखें चल पडी हैं ! नकौझा की माटी, साष्टांग प्रणाम ! इति

Monday, 9 August 2021

(10) आज सुबह नींद जल्दी खुल गई। रात को मेल पकडऩी है तो थोड़ी उद्वविग्रता भी है। मुंबई का प्रवास बड़ी जल्दी समाप्त हो गया! लगा ही नहीं कि चार-पांच दिन बीत गए। दीदी-जीजा से बात भी कहां हो पायी? दीदी के यहां चाहे जितना दिन बिता लो, लगता ही नहीं कि दिन बीते हैंं। हर वक्त खुशनुमा। उधर बोरीवली में भी लोग कहते हैं कि बहुत कम समय दिए। फारिग हुए ही थे कि नाश्ता आ गया और नाश्ते के बाद पके हुए बड़े-बड़े आम। दीदी और ऊषाजी बातें कर रही हैं। इधर हम भी जीजा, अजयजी बातें करने में मशगूल हैं। कुछ देर बाद ही अजयजी सूरत के लिए रवाना हो गए। हम थोड़ा विश्राम किए। बाहर पानी गिर रहा है। हमें ठीक 6 बजे के पहले निकल जाना है क्योंकि पिछली बार 7 बजे निकले थे तो मेल छूटते-छूटते बची थी। जीजा की सक्रियता व समझादारी से ऐन वक्त हम सीएसटी पहुंच गए वर्ना ट्रेन छूट ही जाती। इसलिए 5 बजते ही तैयारी शुरू कर दिए। निखिल और शुभम भी घूमकर आ गए हैं। जैसे-जैसे विदाई की घड़ी नजदीक आती गयी हमारी अधीरता बढ़ती गयी। मन में रुलाई फूट रही थी कि कुछ ही देर में दीदी-जीजा व आत्मीयजन से बिछड़ जाएंगे हम। क्या करें? यही तो नियति है, जिस पर हमार वश नहीं। नहीं तो यही दीदी थीं कि गांव से लेकर भिलाई तक साथ ही रहते थे। मां की तरह ख्याल रखतीं रहीं हमारा। ट्रेन दुर्घटना के वक्त सेक्टर-9 के अस्पताल में दिन भर हमें खिलाने-पिलाने में ही गुजार देतीं। अब सोचता हूं कि सुबह वे आती थीं और शाम ढले जाती थीं तो दोपहर में स्वयं क्या खाती थीं? लगता है मेरे लिए भूखी रह जाती थीं। सोचकर कैसा तो मन हो जाता है। लीजिए 6 बजे गए और हमारी अटैची निकल रही है। दीदी ने ऊषाजी की मांग में सिन्दुर लगाया है। खोइंछा दिया है और विदा कर रही हैं। यह दृश्य हमें अन्दर तक भिगो गया। माई याद आ गई। यह संस्कार उसी के हैंं। खोइंछा परम्परा बड़ी समृद्ध है अपने यहां। पहिले के समय में अपने यहां खेतों में धान बहुत कम होता था। चावल नहीं बन पाता था। माई जब कभी मामा के यहां जाती तो खोइंछा लाती। खोइंछा में चावल मिलता है। हम खुश हो जाते कि आज चावल बनेगा। तो बचपन का वह दृश्य आज भी स्मृति में कौंध जाता है। दीदी ने बड़े प्यार से ऊषाजी को साथ लिया और निकल पड़ीं। हम जीजा को देख रहे थे। कमर में बेल्ट पहिने कुर्सी पर बैठे थे। उदास! शायद हमारे जाने का गम उन्हें भी समेटे था। हम उनके पैरों को छूए तो वे खड़े हो गए। मानोंं कमर में जान आ गयी हो और लपककर हमें अपनी बांहों में भर लिए। हम लाख समझाते रहे लेकिन आंखें न रुकीं और आंसू ढुलकाने लगीं मानों उलाहना दे रही हों कि आत्मा-से निकल रहे वियोग-रुदन को रोकने में असमर्थ हैं हम। हमने भी उन्हें भींच लिया। कुछ देर आत्म मिलन के बाद हम निकल पड़े। बाहर झींसा पड़ रहा है। दीदी भीगते हुए हमें जीटीबी नगर मोनो रेल स्टेशन के पास टैक्सी में बिठाकर विदा कर दीं। खिड़की से झांक कर हमने देखा लौटते वक्त उनकी आंखें सजल हो गई थीं। शुभम बाबू छोडऩे आ रहे हैं। समाप्त

Friday, 6 August 2021

(9) बारिश हो रही है और हम छोटकी दीदी के घर की ओर बढ़े जा रहे हैं। बान्द्रा होते धारावी से निकली टैक्सी तो हमने ऊषाजी को बताया कि "ये देखो धारावी। पूरी दुनिया में इसका नाम है। बड़े-बड़े डॉन-अपराधी यहां की झुग्गियों से निकले हैं।" बड़ा सघन और बेतरतीब है। लेकिन कोरोना महामारी में यहां के लोगों ने जिस तरीके से अपनी जागरुकता का परिचय दिया हम उसके कायल हो गए। यहां लपलपाकर बढ़ा कोरोना संक्रमण बहुत जल्द सम्भल गया तो यहां के लोगों की जागरुकता का ही कमाल था। अब साइन आ गया है। लाइन लगी है। शायद कोरोना वैक्सिनेशन चल रहा है। सड़क किनारे तरकारियां बिक रही हैं। भुट्टा लुभा रहा है। टैक्सी तेजी से बढ़ी जा रही है। अब हम आ गए हैं जीटीबी नगर मोनो रेल स्टेशन। यहीं उतरना है। उपयुक्त स्थल पर हम उतर जाते हैं। यहां से दीदी के घर के लिए निकलते हैं। फ्लैट भूल जाते हैं! सभी एक जैसे ही हैं तो थोड़ा भ्रम होता है। हमने फोन लगाकर शुभम से फ्लैट नम्बर पूछा तो वे बताए। इसके बाद हम पहुंच गए। दीदी-जीजा मिले। शुभम और निखिल कहीं घूमने निकले हैं। तभी बाथरूम से निकलते अजय कुमार मिश्र जी (जीजा के चचेरे भाई) दिखे। उन्हें देख हमारी बांछे खिल उठीं। वे हमारे किशोर-सखा की तरह हैं। उस समय जब कभी चैनपुर मिलने जाते तो अजय कुमार ही होते जो गांव से लेकर देवारा तक घुमाते और खरबूज-तरबूज, खीरा-ककड़ी तोड़कर खिलाते। हिम्मती थे, सरयू में कूद पड़ते थे और लकड़ा लेकर ऐसा तैरते कि हम अचम्भित हो जाते और देखते ही देखते सरयू पार करते और फिर तैरकर लौट भी आते। हम देखते रहते उफनती नदी को और सोचते कि कैसे तैरते हैं ये लोग। नरखा-जंघिया निकाल बहुत कोशिश करते किन्तु अपुन से न होता। इन्हीं के छोटे भ्राता विजय कुमार भी कम न थे। तैरने का हुनर उनमें भी गजब का था। अब सरयू के आंचल में ही पले-बढ़े तो भला वह कैसे न इन्हें अपनी गोद में खेलने का करतब सिखाएं? इसके साथ ही अजय, विजय और सबसे छोटे भ्राता शिव कुमार हम मिलकर अन्ताक्षरी खेलते और क्रिकेट आदि में हाथ आजमातेे। हफ्तों साथ रहते चैनपुर में। तब जीजा के बाबूजी-माई, डैडी-मम्मी, श्रवण जीजा होते जिनसे हमें बड़ा प्यार मिलता। खूब मजा करते हम उस किशोरावस्था में। तो अजय जी को देखते ही हम चहके और हाल-समाचार हुआ। वे जीजा का कुशल क्षेम पूछने आए हैं। उनसे गांव-घर से लेकर परिवार तक बातें हुईं। आजकल वे सूरत में रहते हैँ। विजय कुमार एवं उनके परिवार का भी हाल मिला। कुछ ही देर में दीदी ने चाय बनाई। हम तो पीते नहीं तो हमारे लिए ड्राईफ्रूट आया। सन्नी की श्रीमतीजी रसोई में लगी हैं। कुछ बना रही हैं शायद। हम बैठे-बैठे सन्नी और अजय से बातें करते हैं। कल हमें भिलाई के लिए रवाना होना है। इसी को लेकर तैयारियों पर बात होती है। मेल से आरक्षण है जो सीएसटी से रात साढ़े आठ बजे खुलेगी। छोटे जीजा का स्वास्थ्य ठीक होता जा रहा है इसकी खुशी है। रात को खाने में मिक्स वेज के साथ चावल-दाल और रोटी है। साथ में दही। दीदी द्वारा जमायी दही हमें बड़ी पसन्द आती है। साढ़ी (मलाई) इतनी गाढ़ी होती है कि खाकर आनन्द आ जाता है। खीरा का सलाद कटा है। दीदी को प्याज-लहसुन पसन्द नहीं सो वह नदारद है। जबकि सलाद में प्याज न हो तो कमी लगती है। लेकिन उसकी कमी गाजर, टमाटर आदि ने पूरी कर दी थी। निखिल और शुभम घूमने निकले हैं तो बाहर ही लेे लिए हैं भोजन। क्रमश: - 10

Wednesday, 28 July 2021

(8) बड़ी सुबह दीदी जाग गई हैंं। नौ बजे तक बोरीवली पहुंच जाना है। बेड टी तैयार हुई। जब तक वे लोग चाय लें हम तैयार होने लगे। लगगभग 8 बजे बोरीवली लिए निकल लिए। टैक्सी से किंग्स सर्कल रेलवेे स्टेशन पहुंचे। वहां टिकिट खिड़की गए तो पता चला टिकिट उन्हीं को मिलेगा जो कामकाजी हैं। सन्नी ने अपना आईडी दिखाया तो उन्हें टिकिट मिल गयी। हमने भी अपना प्रेस आईकार्ड दिखाया तो टिकिट देने वालीं मोहतरमा ने कहा कि "यह छत्तीसगढ़ का है, यहां महाराष्ट्र में नहीं चलेगा।" हमने उन्हें अपने आने का प्रयोजन बताया किन्तु वे तैयार न हुईं। कहने लगीं "नहीं तो नहीं!" हम जाकर स्टेशन मास्टर से मिले कि "हम पत्रकार हैं और काम से जा रहे हैं। फिर आपके प्रदेश में एक तरह से अतिथि हैं। क्या अतिथियों के साथ ऐसे ही व्यवहार होता है महाराष्ट्र में?" वे सकपका गए और टिकिट दिलवा दी। इस सद्व्यवहार से हम स्टेशन मास्टर के कायल हुए कि नहीं इंसानियत मरी नहीं है। उन्हें धन्यवाद दे हम निकले ही कि बोरीवली के लिए फास्ट लोकल चिघ्घाड़ती हुई प्लेटफार्म पर खड़ी हो गई। खाली थी। हम आराम से सीट पर बैठ गए। कुछ ही मिनटों मेंं बोरीवली उतर गए। वहां से कार द्वारा कार्यक्रम स्थल। बड़ा सुन्दर कार्यक्रम निबटा। कार्यक्रम पश्चात हम बोरीवली पाण्डेयजी के घर चले गए| दीदी, सन्नी और निखिल के साथ अपने घर निकल गईं। बोरीवली पहुंचे तो अंधेरा पसर चुका था। बिन्दू दीदी ने रसोई तैयार किया। हम लोग सामूहिक भोजन किए और सो गए। चौथी मंजिले पर फ्लैट के कमरे में हम सोए थे कि खिड़की से कांव-कांव की ध्वनि सुनाई दी। शायद कौवा जगा रहा था। नींद खुल गई। देखे तो झींसा पड़ रहा था और कुछ पक्षी उड़ रहे थे। दृश्य बड़ा खूबसूरत था। उठ बैठे। तब तक उधर भी चहल-पहल शुरू हो गई थी। हम नहाने चले गए। सुनीता और उनके पतिदेव बैठे थे। कुछ देर में निखिल और आशीष भी जाग गए। बिन्दू दीदी ने दूध में सेब घिस कर मिलाया है और वही लाकर दीं पीने को। सौम्या और आयांश खेल रहे हैं। पांडेयजी अपने कारोबार के सिलसिले में फोन पर व्यस्त हैं। बारिश हो रही है तो कहीं घूमने भी नहीं जा सकते। सोफे पर पसर गए। मन नहीं लगा तो आशीष बाबू से कोई किताब मांगे। उनने अपनी आलमारी से निबन्धों का संग्रह लाकर थमा दिया। एक-दो निबंध पढ़े। तब बिन्दू दीदी भोजन परोस दीं। बड़ा स्वादिष्ट भोजन था। रसास्वादन किए और नीचे घूमने निकल गए। लौटे तो बिन्दू दीदी सेब काट कर लायीं। खा लिए। वे और ऊषाजी बड़े दिनों बाद मिली हैं तो अपने नैहर की खूब बातें कर रही हैं। भूली बिसरी। उसी में बाबूजी-काका और दादा की मृत्यु का विलाप भी है। रिंकू की कमी खल रही है। वह अपनी ससुराल में है। होती तो जरूर हमारे लिए फ्रैंकी या दोसा नहीं तो और कोई व्यंजन जरूर ले आती। रिंकू के खुशहाल जीवन की प्रार्थना के साथ हम उसे याद करते हैं। रात हो गई है और भोजन आ गया है। समय बड़ा तेजी से पास हो रहा है। कल हमें भिलाई के लिए ट्रेन पकडऩी है। भोजनोपरान्त हम दूध पीकर सो जाते हैं। सुबह उठते हैं| नहा-धोकर नाश्ता किए और छोटी दीदी के घर निकलने की तैयारी करने लगे। दोपहर बाद बोरीवली से हमारी विदाई हो गई। आशीष बाबू ने ओला बुक कर दिया है। वे हमारी सुविधा का इतना ख्याल रखते हैं कि कभी ट्रेन से नहीं जाने देते। हर बार ओला बुक कर उसी से भेजते हैं और पैसे देकर ड्राइवर को ताकीद करते हैं कि "एक पग भी पैदल न चलने देना मौसाजी को। घर के बिल्कुल समीप उतारना।" हम कहते हैं कि "ट्रेन से चल देंगे" किन्तु वे नहीं मानते। ओला आती है। बिन्दू दीदी और आशीष टैक्सी तक छोडऩे आए हैं। हल्की बारिश हो रही है। बिन्दू दीदी हमें जाने नहीं देना चाहतीं, हम भी कहां चाह रहे हैं? ऊषाजी को देखते हैं उनकी आंखें भरी जा रही हैं अपनी दीदी को देखकर। बहिन का बिछडऩा कम नहीं अखरता। फिर बिन्दू दीदी उन्हें अपने बच्चों जैसा पाली-पोसी हैं। ऊषाजी में वे अपनी बच्ची की छवि देखती हैंं। तभी तो बार-बार अंकवारी में भर लेती हैं। खोइंछा देते समय भी आशीर्वादोंं से आंचल भर दी थीं वे। टैक्सी आई तो दोनों बहिने एक दूसरे से लिपट रो पड़ीं। हमारी आंखें भी सजल थीं। आशीष बाबू ने भी भरे हृदय से हमारे चरण छुए और टैक्सी का दरवाजा खोल दिया। हम बिन्दू दीदी के चरणों में झुके तो उन्होंने हमें पकड़ लिया। उनकी सजल आंखें मानो बोल रही थीं, "बाबू, भूल-चूक माफ, सपरिवार फिर जल्द ही आइए। आप लोगों के आने से बहुत अच्छा लगा।" हम ऊषाजी के साथ कार में बन्द हो गए हैंं। बाहर सड़क भीग रही है और भीतर हृदय! टैक्सी चल दी है.. क्रमश:- 9

Tuesday, 27 July 2021

(7) रसोई में आवाज सुन नींद खुल गई। देखा तो दीदी चाय पका रही थीं। याने सुबह हो गई है और इन लोगोंं के बेड टी का टाइम हो गया है। हम तो बेड टी के आदी नहीं। जीजा और दीदी ने चाय पी तब तक पानी खुल गया। हम फारिग हुए और अखबार पढऩे लगे। पुराना अखबार था लेकिन एडिटोरियल पर एक स्टोरी मिल गयी थी और स्टोरी कहां पुरानी होती है। उसी को लगे पढऩे। तब तक बाबू शुभम नीचे जाकर गरमागरम मसाला दोसा, इडली सांबर लेकर आ गए। नाश्ता हुआ। तब तक दिलीप जीजा आ गए ड्यूटी से। उनसे बातचीत करने लगे तो एक घंटा कट गया। दीदी ने आम काट दिया। दो-एक फांकी खाए और बातचीत करते रहे कि दोपहर हो गयी। दीदी ने भोजन परोस दिया। चावल-दाल, रोटी-सब्जी बहुत ही स्वादिष्ट। भोजन पश्चात थोड़ा विश्राम किए और फिर अपराह्न बेला में जीजा से बौद्धिक चर्चा होने लगी। उनके पास तो ज्ञान और अनुभव का भंंडार है। माक्र्सवाद से लेकर राष्ट्रवाद तक की बारीकियों पर चर्चा हुई। उनसे बात करो तो कई विमर्श परत-दर-परत खुलने लगते हैं। अरस्तू और प्लेटो से लेकर नेपोलियन तक का दृष्टान्त! सोचे, चलें थोड़ा बाहर घूम आएं, लेकिन बारिश होने लगी है। फिर बैठे तो दीदी ने अनार लाकर रख दिया। अनार को छीले और जीजा को खाने को दिए। अपने भी एक अनार का स्वाद लिए। फलों में अनार और सन्तरे का कोई जवाब नहीं। वैसे फल तो सभी स्वास्थ्यवर्धक होते हैं लेकिन जो चीज अनार और सन्तरे में है, वह और फलों में कहां? पेट भरना हो तो केला या सेब खा लीजिए लेकिन अनार और सन्तरे आप के पेट चाहे न भरें लेकिन पौष्टिकता भरपूर देंगे। तो अनार खाकर हम बरामदे में पहुंचे और वहां लेटे दिलीप जीजा से चुहल करने लगे। शाम की चाय तैयार हो रही है लेकिन अपुन को चाय से कोई मतलब नहीं। बस बातों का ही खजाना है जिसे भरते रहे और खाली करते रहे। रात हो गई है। बारिश चालू है। भोजन करते हैं और सो जाते हैं। सुबह बोरीवली की तैयारी करनी है। ऊषाजी और निखिल वहीं हैं। ऊषाजी अपनी बड़ी बहिन से भूली बिसरी बातें करने में मशगूल होंगी। दोनों बहिनें बड़े दिनों बाद मिली हैं। विचार करते-करते नींद लग जाती है। क्रमश:- 8 ०००००

Monday, 26 July 2021

(6) लीजिए, बातों-ही-बातों में समय कब निकल गया और घड़ी सुई नौ पर चली गई पता ही न चला। अब दीदी चलीं भोजन बनाने। हमने शुभम बाबू से कुछ पुस्तकें मांगीं कि वे सिविल सर्विस की तैयारी कर रहे हैं तो होंगी कुछ जानदार। सचमुच उनने आठ-नौ पुस्तकें लाकर सामने रखीं, सभी विश्व विख्यात! लेकिन अंग्रेजी मेंं। अपनी अंग्रेजी का धुर्रा बिगड़ा हुआ है सो पन्ने पलटे और लौटा दिए क्योंकि पोथानुमा इन पुस्तकों को पढऩे में अच्छा-खासा समय लगेगा जो अपने पास नहीं है। लेनिक हमने शुभम बाबू को बहुत शुभकामनाएं दीं कि वे उच्चतम ज्ञान की पुस्तकें पढ़ रहे हैं। बड़ी बात है। दीदी ने रसोई तैयार कर दी है। सन्नी की श्रीमतीजी भी रसोई में लगी हुई हैं। सास-बहू की जुगलबन्दी बड़ी अच्छी रही। यही घर को सँवारने में मददगार होता है। रोटी-आलू-गोभी की रसदार तरकारी, चावल, दीदी द्वारा जमायी हुई गाढ़ी दही, सलाद आदि बड़ा स्वादिष्ट लगा। जीजा के लिए उबली हुई सब्जियों का मिक्स बना है। भोजन का आस्वदन कर हम फिर बातों में मशगूल हुए। एक तो कोरोना काल, ऊपर से बारिश का मौसम..बाहर टहलने भी नहीं निकल सकते। सो बात करके ही मन बहलाएं। सन्नी बाबू सेवा भाव से लगे हुए हैं। उनमें भी एयर फोर्स ज्वाइन करने के बाद बहुत बदलाव आया है। लड़कपन की जगह परिपक्वता की झलक दिखती है। उत्तरदायित्त्व और जिम्मेदारियां खूब निभा रहे हैं। उनमें पर्यावरण के प्रति प्रेम भी बहुत है। दीदी बताती हैंं कि जहां उनकी पोस्टिंग है वहां अपने घर की बागवानी में बड़े सुन्दर-सुन्दर फूल-पौधे लगाए हैं। उनके द्वारा उगाई भिन्डी और करेले की फोटुएं भी दीदी दिखायी। यह कितना अच्छा है कि कोई प्रकृति से इस तरह प्रेम करे। हमारे बाबा तो एक पूरा अमोला ही लगा दिए थे। नहीं भी तो बारह-पन्द्रह आम महुआ आदि के पेड़ होंगे। उनका प्रकृति प्रेम निराला था। पूरा बगीचा ही स्थापित कर दिए। यह हर व्यक्ति में होना चाहिए। क्योंकि यह प्रकृति ही है जो हमें जीवन-प्राण देती है। तो बाबू सन्नी को हमने बहुत-बहुत शुभकामनाएं दीं। व्हाट्सऐप पर कोलकाता रह रहे हमारे गांव के श्री विकास शुक्ला का सन्देश आया है। पढ़कर बड़ी खुशी मिली। बचपन के समय एक बार गांव की रामलीला में उन्होंने राम और हमने लक्ष्मण की भूमिका अदा की थी। वह दृश्य आज भी हमें रोमांचित करता है जब बबुनन्नन बाबा और गांव के अन्य वरिष्ठजनों ने हाथों में आरती की थाल लिए हमारे मुखमंडल के समक्ष घुमाते हुए "श्रीरामचंद्र कृपालु भजु मन.." गा-गाकर आरती उतारी थी और हम राम-लक्ष्मण भेष में सजे धनुष-बाण लिए गर्वोन्नत शाही कुर्सी पर मुस्कान बिखेर रहे थे। हमने विकास भाई को रिप्लाई भेज दीदी को यह प्रसंग सुनाया। अब विश्राम का समय हो गया है। बारह बजने को हैं। बाहर पानी गिरने की आवाज सुनाई दे रही है। लगता है बारिश शुरू है। क्रमश:-7 ०००

Sunday, 25 July 2021

(5) संध्या ढल चुकी है। दिलीप जीजा ड्यूटी जाने की तैयारी कर रहे हैंं। वे हमारे जीजा के अग्र्रह हैं। ब्रह्मचर्य व्र्रत की जो प्रतिज्ञा लिए तो फिर विवाह नहीं ही किए। बड़ी शान से रहते हैं। अच्छा लगता है कि उनकी पुष्ट-प्रौढ़ शरीर में आज भी बालक मन छिपा हुआ है। आज के इस भीषण समय में जब मनुष्यता तिरोहित हो रही है, लोग पाषाण हृदय हो रहे हों, तब किसी मनुष्य में बाल-सुलभ अन्दाज दिखायी देे इससे बड़ी बात और क्या हो सकती है? हमारे दिलीप जीजा दुनियाई ज्ञान के माहिर हैंं, सरयू की धार नापे हैंं, चैनपुर गांव की कुटी में धुनी रमाई है और साधु पुरुष का सानिध्य पाया है, प्राथमिक और माध्यमिक अध्यापकों को फिर-फिर उलाहना का अवसर दिया है..कम बड़ी बात नहीं। हाईस्कूल तक की कविताएं उन्हें आज भी कंठस्थ हैं। रामायण की चौपाइयों और महाभारत-गीता पर भी बात कर सकते हैं। लोकगीतों के क्या कहने! ढोलक-झाल हो तो सस्वर समा बांध दें। बताते हैं कि होली त्यौहार में एक बार बबलू जी के घर क्या तो झूमकर गाए थे। अपने तो झूमें ही सारा गांव झूम उठा उनकी गाई कजरी सुनकर। उन्हीं के गांव के सेराज भाई से बात करें तो बड़ा बखान करते हैं इनका। और बखान कौन न करे? जब हमारी अम्मा ही आंचल में मुंह छिपा इनकेे मुुंह पर दही पुतवा देतीं और सभा में ठहाके गूंज उठते, तो औरों की क्या कहें? यही वजह है कि दिलीप जीजा हमारे लिए सदैव आकर्षण के केन्द्र में रहे हैं। हम मुंबई जाते हैं तो एक लोभ यह भी रहता है कि दिलीप जीजा से मुलाकात होगी तो उनके बाल-सुलभ हृदय से खेलने को मिलेगा। "छाता ले लीजिए, नहीं भीग जाएंगे।" हमारे कहतेे ही वे पीछे मुड़ हमें देखते हैंं, लम्बी मुस्कुराहट लेते हैं और दाहिने हाथ में पकड़ा मिनी छाता दिखाते कहते हैं, "ये देखिए, ले जा रहा हूं।" हम सोचे थे कि कहेंगे कि "देख नहीं रहे हो हाथ मेंं छाता?" लेकिन उनके हृदय से बड़ी सरलता से बालक बोला था। हम निहाल हो गए और वे सीढिय़ां उतरने लगे। लीजिए, छोटी दीदी से बात होने लगी है। वे सबका हालचाल लेती जाती हैं। इतने दिनों बाद मिली हैं तो बहुत-सी भूली-बिसरी बातें परत-दर-परत खुलती जाती हैं। बाबा से लेकर माई-बाबूजी, भैया-भाभी का परिवार, उनके सालों का परिवार, दोनों भतीजे-भतीजियों का परिवार, बड़े जीजा-दीदी का परिवार, फूआ-फुफा का परिवार, ननिहाल नकौझा, खखाइचखोर, पलामू, पुल्लहुर चाचा, लखनऊ, छपिया, बढय़ा-फुलवरिया, देवरिया, बनकटा, भिलाई, नीतीश की पढ़ाई, पोटिसन..बहुत-सी बातें जो याद नहीं आ रही हैं पर चर्चा होती है। वे और जीजा चाय पीते जाते हैंं और हमें थमा दिए हैंं काजू, बादाम और कुछ सूखे मेवे। हम खाते जाते हैंं और बातोंं का सिलसिला रज्जु की भांति बढ़ता जाता है। क्रमश::-6 ०००००

Friday, 23 July 2021

(4) हमने थोड़ा आराम किया और उठे ही कि शुभम बाबू मैदू बड़ा खाने की जिद करने लगे। हमारे यहां इसे सांबर बड़ा कहते हैंं और गांव में बारा। उड़द दाल से बनता है। बड़ा बढिय़ा स्वाद होता है। हमारी माई क्या तो खूब बनाती थी बारा। उसके हाथ का यह व्यंजन हमें भूलता नहीं। छुटपन में याद आता है कि मामा के यहां नकौझा में किसी कार्य परोजन मेंं माई ही बारा बनाती थी। हमें मौसी लाकर देतीं कि "लो तुम्हारी अम्मा ने भेजा है।" हम लपक लेते और बड़े मजे से खाते। तो शुभम बाबू का ने जो मैदू बड़ा खिलाया सूखे रूप में वह बारा की तरह ही था। अब आजकल कहां बनता है घरों में यह! बहुत हुआ तो होटल से मंगा लिए। नहीं तो यही पहले था कि घर-रिश्तेदार की महिलाएं ही मिलकर बना लिया करती थीं। उसमें कितनी हंसी-ठिठोली हुआ करती थी। मान-मनौवल चलता था। लेकिन अब सब नदारद! सन्नी की श्रीमती गृह कार्य में दीदी का हाथ बंटाती है देख अच्छा लगा। शाम हुई तो चाय की तैयारी होने लगी। छोटकी दीदी को चाय का बड़ा शौक है। कुछ मिल-न-मिले, खूब पकी हुई चाय मिल जाए तो क्या कहने! वह भी बिना अदरक और काली मिर्च वाली चाहिए उन्हें! चाय पत्ती के अतिरिक्त आप कुछ उसमेंं मिलाए नहीं कि हुआ गुड़ गोबर! फिर वे न पीएंगी। माई उनसे कहा करती कि "गुड़, काली मिर्च, सोंठ आदि मेंं उबालकर चाय पिया कर, फायदा करेगा।" लेकिन केवल चायपत्ती में उबली चाय का स्वाद उनकी जिह्वा पर जो लगा तो आज तक लगा ही है। यही उन्हें तरोजाता बनाए रखता है। आप उन्हें देखिए तो अंदाजा नहीं लगा सकते कि उम्र के अर्धशतक लगा चुकीं हैं। जब देखता हूं और इनके संघर्षों को याद करता हूं तो आंखें सजल हो उठती हैं कि इसी मुंबई में भाड़े के सुविधाविहीन एक छोटे से कमरे में कैसे वे अपना दिन गुजारा करती थीं। सास-ससुर, पति और दो बच्चोंं को लेकर वे जिस प्रकार रहीं एक वह दिन देखता हूं और एक आज! आज उनने अपने दोनों बच्चों को उच्च शिक्षित कर दिया है। बड़े को भारतीय वायसेना में नौकरी मिल गयी। छोटा उच्च पद के लिए तैयारी कर रहा है। कभी दीदी के गौने के बारे में सोचता हूं तो दिखता है कि कैसा तो रोना मचा था। छोटी उम्र थी और बलिया जिला में ससुराल मिली थी। माई ने साथ मुझे लगा दिया। मैं बाबा के समय का सेर! लगा शेखी बघारने कि "मेरे साथ दीदी आराम से चली जाएंगी।" लेकिन मेरी शेखबाजी में दीदी के रोने ने ऐसा पलीता लगाया कि मैं चारों खाने चित! विदाई के वक्त गांव में जो रोना शुरू हुआ तो लगातार जारी रहा। दोहरीघाट केे बस स्टैंड पर हम नहीं भी तो दो घंटे बैठे रहे और ये रोती रहीं। रोना भी हल्का-फुल्का नहीं, पूरा हुंकारी पार-पारकर! मैंने चाय-पानी, समोसे-भजिए आदि से लेकर अनेक युक्तियां निकालीं लेकिन सब विफल। यहां तक कि चैनपुर (गुलौरा) गांव जाते तक आंसू न थमे। जीजा तब विद्यार्थी ही थे। विद्यार्थी जीवन वैसे भी साधक-जीवन होता है। फिर इन्हें पढऩे के लिए तुरतीपार पुल की जगह गांव के समीप ही सरयू पर बने पीपे के पुल से भागलपुर होते पढऩे जाना पड़ता था, वह भी साइकल से! फिर बेल्थरा रोड में एक कपड़े की दूकान भी सम्भालनी पड़ती थी। लेकिन दीदी ने सब मैनेज किया। एक बड़े परिवार में वे अपने को समाहित कीं तो यह घर से मिला संस्कार ही था। क्रमश:- 5 ०००००

Thursday, 22 July 2021

(3) बहरहाल, अब भी उनकी जीजिविषा और दौड़ पडऩे की उत्कट ललक देखने लायक थी। बिस्तर से लपक वे व्हील चेयर पर बैठ गए और लगे बात करने। हाल-समाचार के बाद हम फ्रेश होने बाथरूम में चले गए। भारत के महानगर मुंबई मेंं जहां घर की समस्या बड़ी मानी जाती है, वहां जीजा ने अपनी श्रम-साधना से फ्लैट ले लिया है। जिसमें कमरे के साथ रसोई और बाथरूम की सुविधा भी है। परिवार आराम से रह सकता है। लेकिन यहां है कि हमारे आने के बाद कमरा तंग हो गया है। जीजा-दीदी और शुभम बाबू थे ही, सन्नी बाबू अपने परिवार के साथ आए हैंं। फिर हम भी ऊषाजी और निखिल के साथ आ पहुंचे। सो कमरा भर गया है। लेकिन अपनों के मिलने के उल्लास ने इस कमरा-तंगी का एहसास तक न होने दिया। घर-परिवार, नाते-रिश्तेदारों से मिलन की अनुभूति ही दूसरी होती है। स्नान-ध्यान कर ही रहे हैं कि दीदी ने झटपट रसोई में हमारे लिए नाश्ते की तैयारी कर दी। देखा कि उनका हाथ क्या खूब चल रहा है! भाई के आने की खुशी ने मानों उनके दुख पर मरहम का लेप लगा दिया हो। नहीं तो यही था कि फोन करने पर उनकी आवाज बुझी-बुझी सुनाई पड़ती थी। जीजा महीने से बिस्तर पर हों तो अनायास चिन्ता आएगी ही। लेकिन हमारे आने के बाद मानों वे आश्वस्त हों कि अब वे तन्दुरुस्त हो जाएंगे। हमने भी रसोई में उन्हें व्यस्त देख बाबा से सादर प्रार्थना किया कि दीदी के परिवार पर उनका आशीर्वाद बना रहे। पहले तो हमारे लिए चिरपरिचित खारी आई जिसे दूध में डुबाकर आनन्दपूर्वक रसास्वादन किए। इसके बाद रसीले आम काटे गए। क्या तो दसहरी थी! बड़ी-बड़ी और गुद्दे से भरी। इस प्रजाति के आम आम कहां मिलते हैं। कलमी आम जबसे आए हैं तबसे वह स्वाद जो देसी आमों से आया करता था अब जा चुके हैं। नहीं तो वही बचपन की याद आती है जब गांव में छोटे-छोटे आम खाने के लिए बड़े-बड़े पेड़ों पर चढ़ जाया करते थे हम। लेकिन उस आम का स्वाद आज भी जिह्वा पर बना हुआ है। बैठे बात हो ही रही है कि दीदी ने रसोई तैयार कर दी। सुस्वादु रोटी-दाल, चावल, सब्जी, अचार, पापड़, सलाद, दही आदि व्यंजनों से मन तरी हो गया। दीदी उत्साह में थीं, जीजा भी बहुत खुश थे, इन खुशियों में हमारी खुशी जाकर मिली तो मानों घर में संगम की सुगन्धि बिखर गई हो। हमने सोचा, इस भीड़ को कम करने का एक ही तरीका है कि आज ही ऊषाजी को निखिल के साथ उनकी बहिन के यहां भेज दिया जाए। आखिर उनके यहां भी शुभ प्रसंग है ही। एक दिन बाद जाने से अच्छा है आज ही निकल जाएं। हमारे जैसे ही ऊषाजी की बड़ी बहिन भी मुंबई में स्थापित हो चुकी हैं। उनके पति का अच्छा कारोबार है। उनका भी अपना सुविधायुक्त फ्लैट है। हमने ऊषाजी को संकेत कर दिया। मध्याह्न उनकी तैयारी होने लगी और लगभग 4 बजे निखिल के साथ निकल गईं। क्रमश:-4 ०००००

Tuesday, 20 July 2021

(2) पहुंचते ही दीदी ने अपने चिरपरिचित अंदाज में हम पर धार चढ़ाईं तब हम गृह में प्रवेश किए। धार चढ़ाने की यह परम्परा देखते ही माई याद आ जाती है। जब भी हम अपने गांव खखाइचखोर गए वह हर बार बड़ी धार्मिक तरीके से हम पर धार चढ़ाती थी। दरअसल धार एक लोटे में भरा वह जल होता है जिसमेंं अच्छत, दूब, पुष्प, लौंग आदि रहता है जिसे आए हुए अपनों के सिर पर ओइंछ कर गिरा दिया जाता है। मान्यता है कि इससे साथ आई बुरी नजरें गायब हो जाती हैं। माई जबसे स्वर्गवासी हुई तबसे कौन चढ़ाता है धार। लेकिन छोटी दीदी आज भी इस परम्परा को कायम किए हैं। हम उन्हें अपने प्रति इस ममत्व को देख भाव विह्वल हो जाते हैं। जैसे ही उनने लोटा हमारे सिर पर ओइंछा लगा माई ही गांव की तरह ओइंंछ रही हैं। हम नतमस्तक हो गए। भीतर जाते ही जीजा के दर्शन हुए। बिस्तर पर लेटे थे। देखते ही मुस्कुरा कर फूर्ति-से उठ बैठे मानो उनकी कमर में जान आ गई हो। "नहीं-नहीं जीजा, आप लेटे रहिए।" लेकिन वे कहां मानने वाले? तकिया के सहारे बैठ गए। लगे कुशल क्षेम पूछने। हम उनके चेहरे को एकटक देखते रहे। संघर्ष की यह प्रतिमूर्ति इस अवस्था मेंं! यही और दिन होता तो वे इस समय तक तैयार हो अपने अस्पताल जाने की तैयारी करते होते और रात 10-11 बजे ही लौटते! लगभग 30 बरस से तो हम यही देखते हैं कि एक साधक की तरह वे अपनी जिन्दगी जीते रहे हैंं। छात्र-जीवन में ही संघर्ष का पथ, कपड़े के व्यापार से होते इलाहाबाद में चिकित्सकीय पढ़ाई, फिर मुंबई में बन्दरगाह पर ड्यूटी और उसके बाद दो-दो अस्पतालों में डॉक्टर के रूप में लोगों को जिन्दगी देने का सेवाकार्य। लगातार चलायमान! लेकिन यही अब है कि लगभग दो महीनोंं से बिस्तर पर! लगता है जिन्दगी भी हिसाब लेती है। आप यदि उसके मुताबिक न चले तो वह अपने अनुसार चलने के लिए आपको बाध्य कर देती है। तब आप परवश हो जाते हैं। आखिर तीस-पैंतीस बरसों की थकान कभी तो उतरनी थी सो प्रकृति स्वयं व्यवस्था कर दी कि अब आप थोड़ा विश्राम करें श्रीमान। क्रमश:- 3
मुंबई में छ: दिन इस बार मुंबई प्रवास ऐसे समय हुआ जब हमारे छोटे जीजा डॉ. प्रदीप कुमार मिश्र के कमर दर्द को ठीक करने के लिए चिकित्सकों को शल्य क्रिया करनी पड़ी और वे महीने भर के विश्राम पर थे। उन्हें देखने हम ऊषाजी और बाबू निखिल के साथ गए थे। यों वहां रिश्तेदारी में एक मंगल-निमन्त्रण था, उसमें भी शामिल होना था। 12 जुलाई को हावड़ा-मुंबई मेल से हमारी टिकिट थी। एस-7 में आरक्षण सुरक्षित हो गया था। दुर्ग रेलवे स्टेशन पर हमारी ट्रेन समय से मिली और हम अपने कूपे में बैठकर रवाना हो गए। चूंकि कोविड काल चल रहा है सो चेहरे पर मास्क और हैंडवाश सहित अन्य सावधानियां बरतते हुए हम अलसुबह मुंबई सीएसटी रेलवे स्टेशन उतर गए। वहां पसरी वीरानी इस बात की गवाही कर रही थी कि कोरोना की विभीषिका ने इस महानगर को कितने गहरे घाव दिए हैंं। नहीं तो यही पहले था कि इस रेलवे स्टेशन पर पैर रखने की जगह न मिलती थी। लोग एक-दूसरे पर चढ़े आते थे। जन सैलाब के बीच अपनों के खो जाने का भय बना रहता था, यही वजह थी कि हम एक दूसरे की उंगलियां पकड़कर चलते थे। लेकिन इस बार एकदम सन्नाटा। ट्र्रेन से उतरते ही पीपीई किट पहने कर्मचारियों ने यात्रियों को एक लाइन में खड़ा कर दिया। सभी को आधार कार्ड निकालने कहा गया। वहां डॉक्टर हर किसी का कोरोना टेस्ट कर रहा था। हम सोचे यह प्रोसेस लम्बा चलेगा। आधार कार्ड भी हम भूल गये थे। लेकिन कोरोना वैक्सीन की दोनों डोज का प्रमाण पत्र पास था। हमने यह बात उन्हें बताई तो उनने प्रमाण पत्र का मुआयना किया और हमें जाने दिया। इससे बड़ी खुशी मिली। हम धन्यवाद दे लोकल टे्रन की ओर बढ़े कि सामने हमारे प्रिय भांजे सन्नी दिखे। हमें रिसीव करने आए थे। हमने कोरोना संक्रमण का हवाला दिया तो मुस्कुरा उठे। "नहीं मामा, सावधानियां बरत कर आया हूं।" वे भारतीय वायुसेना में हैं। इसी वजह से एयर फोर्स के हॉस्पिटल में जीजा का सफल ऑपरेशन सम्भव हुआ। तो हम टिकिट कटाकर लोकल पर सवार हुए और जीटीबी नगर उतर गए। वहां टैक्सी से छोटी दीदी के घर। क्रमश:- 2 ००००

Monday, 7 December 2020

                                                दिनांक- 08/12/2020
प्रिय बेटे नीतीश,
तीन ही दिन हुए लेकिन लगता है कि कितने बरस हो गए आपके गए! नौ महीनों के लगातार साथ का मानो कोई मोल ही नहीं। सचमुच इतने दिनों तक हमारा एकसाथ रहना लगता है कुछ था ही नहीं। समय कैसे फुर्र हुआ और कैसे मेडिकल कॉलेज से आपका बुलावा आ गया मानो सपने की तरह हो। आप के जाने के बाद मम्मी लगातार आपको याद कर रोती हैं तो निखिल हर वक्त किसी-न-किसी बहाने आपकी ही चर्चा छेड़ देता है। उसे भी आपकी कमी खल रही है। दोनों भाई जिस तरह एक दूजे का साथ देकर बढ़ते रहे और राग-अनुराग के बीच मेरा ख्याल रखे वह अभिभूत करती है। आप दोनों का रात में टीवी ऑन कर एक साथ भोजन करना, बातें करना और ज्ञानप्रद बातों का आदान-प्रदान करना ऐसा रहा जो आपसी मुहब्बत और सामंजस्य को और प्रगाढ़ करता है। आप दोनों ने मिलकर मेरी और मम्मी की छोटी-छोटी खुशियों का भी ख्याल रखा। मेरे बीमार होने पर आप दोनों ने मिलकर जिस अद्भुत मनोवैज्ञानिक और सामाजिक तरीके-से घर को सम्भाला, मुझे और मम्मी को हिम्मत और साहस दिया वह बेमिसाल है।  
आप निकले तो हम तो आपके स्वास्थ्य को लेकर बहुत चिन्तित हो गए। मैं तो फिर भी जानता था कि आप पूरी तरह फिट हो और घबराहट का फोबिया दूर कर लोगे, लेकिन मम्मी परेशान थीं। उनके लगातार रोने की वजह से मुझे उन्हें कई बार डाँटना भी पड़ा। लेकिन जब निखिल ने बताया कि रास्ते में आपने पौष्टिक चीजें खा ली हैं तो बहुत संतोष हुआ। फिर जब आपने बताया कि मेडिकल कॉलेज द्वारा की गई आपमें कोरोना टेस्ट की दोनों रिपोट्र्स निगेटिव निकलीं तो मन बाग-बाग हो गया। यह भी सुकून देने वाला रहा है कि नौ महीनों के गैप के बाद अपने को मनोवैज्ञानिक रूप तैयार कर, बहुत से सामानोंं के चोरी के बाद भी सब मैनेज कर और अपने को प्रसन्न रख आप व्यवस्थित होते रहे। ऐसे सकारात्मक प्रयास की हमें कामयाबी की राह दिखाते हैंं। समय से उठ  कर कमरे की सफाई, कम्बल-चद्दर से लेकर अन्य कपड़ों को धोना और फिर लगातार पढ़ते रहना..ये ऐसे कर्तव्य हैं जिन्हें मनोयोग से करके आपने न केवल अपने आप को बल्कि ईश्वर को भी प्रसन्न किया। भगवान उसी का साथ देते हैं जो अपने कर्तव्य, अपनी जिम्मेदारियां, अपने उत्तरदायित्वों के प्रति सचेत रहता है। ये सद्गुण हैंं इन्हें हर किसी को अपनाना चाहिए। मेरे बाबा इस मामले में बहुत आगे थे। आपको बताऊं कि वे अपने कर्तव्य-पथ पर ऐसे डटे रहते थे कि बड़ी-से-बड़ी निराशा और मायूसी भी उनके पास फटकने से डरती थीं। यही वजह रही कि वे भौतिक रूप से आज नहीं हैं उसके बाद भी हमारी आजीविका में उन्हीं का हाथ है। तो आप उन्हीं पदचिह्नों पर बढ़ते रहिएगा। यहां हम लोग बहुत अच्छे से हैं। मम्मी स्वस्थ हैं और निखिल पूरी निष्ठा और लगन के साथ अपनी प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं। आप अपनी शुभकामनाएं उन्हें देते रहिएगा ताकि उनका मनोबल बढ़ता रहे।   
अपने स्वास्थ्य का ख्याल रखना, खासकर नाश्ता और भोजन का। क्रीड़ा  गतिविधियों में हिस्सा लेते रहिएगा। फल और दूध जरूर लेते रहिएगा। टेलीफोन हर रोज होना चाहिए इसके बिना मम्मी का चेहरा फूल जाता है। ठीक है बेटा, खुश रहो..फिर बाते करेंगे।
आपके पापा

Friday, 21 August 2020

 तलाश नव-जीवन की
- शिवनाथ शुक्ल
भोर-सुबह खिड़की से पहली नजर पड़ी कि कपोत-कपोती बड़े उत्साह से दाना चुग रहे हैं। सूरज की सवारी आने से पहले का यह बड़ा सुंदर दृश्य । गुड़हल और डहलिया सहित लक्ष्मणबूटी के पुष्प मुस्कुराकर अलग ही मनोरम-सुरभि बिखेर रहे हैं ।
कई दिनों से तो अकेले यह कपोत ही दिखता था। कल सुबह भी बिजली-तार पर अकेला ही बैठा धूप सेंक रहा था। उसे देख हमने सोचा, कि 'अकेले ही दिखता है आजकल, इसकी जोड़ीदार कहां है?'
 लगता है हमारे मन की बात जान गया था वह! तभी तो आज अपनी कपोती को भी साथ लिए सिर मटका-मटकाकर दाना चुग रहा है। बड़ी खुशियाली लहक रही है मानो कह रहा हो, "लीजिए श्रीमान, अकेला न समझिए हमें। सुख-दुख में निभाने वाली संगिनी ही हमारी शक्ति है ।"
 दोनों के मुखमंडल देख रहे हैं! कपोती के कपोल और कजरारी आंखों में कितनी लज्जा, कितनी शर्मोहया है! वह दाना चुगती है और रह-रहकर तिरछी आंखों से अपने जोड़ीदार को देखती है, जैसे परिहास कर रही हो कि "तुम क्या चुगोगे? जरा इधर देखो, हमारा चुग्गा।"
दूसरी ओर तनिक कपोत महाशय के कपाल और चंचु देखिए, महान उत्साह की रेख दिखाई देती है इन पर ! ऐसी निशानी अक्सर उनके मुख-मंडल पर होती है जो कर्मोद्यमी, जीवट और परिश्रमी होते हैं।
 तो यह कपोत-कपोती भी कुछ इसी तरह का संदेश देते प्रतीत होते हैं।
कुछ मिनट इन्हें देखते-देखते हमारी नींद की खुमारी जाती रही।आलस्य थकान दूर हो गई। आंखें चैतन्य हो गईं ।
सोचने लगे, 'इन चिड़ियों की भांति ही हर कोई तो लगा है अपने काम पर।' उन रेजाओं की याद हो आई जो अपने शिशुओं को पीठ पर गमछे के सहारे बांधकर कठोर परिश्रम करती हैं । ईंट- गारा ढोती हैं, मनरेगा में कितने ही ऐसे श्रमिक मिल जाएंगे जो उत्साह के साथ डटे रहते हैं।
सहसा दूसरा दृश्य दिखा, एक किनारे रखी बल्ली पर बभनी का बच्चा तेजी से छरकता हुआ भाग रहा है। बड़ा अच्छा लगा! 'यानी शिकारी पक्षी से अपना अस्तित्व बचाए है अब तक यह!'
 यह उत्साह जागता है, कि विपत्तियों में घिरकर भी यदि हम चाहें तो अपने भीतर साहस स्फूर्ति का संचार कर अपने जीवन की रक्षा कर सकते हैं। कोरोना संकट-काल का यह स॔कट भी इसी तरह कटेगा। वह कितना भी मनुष्य को काट खाने पर आमादा हो, किंतु मनुष्य इस बभनी (सांप की मौसी) के बच्चे की भांति अपने अस्तित्व की रक्षा कर सकता है।
कोरोना लगातार बढ़ रहा है । आज भी भारत में कोरोना-विस्फोट हुआ है । अपने छत्तीसगढ़ में भी अनेक जिलों में मरीजों की संख्या में इजाफा हुआ है, और नए-नए केस मिलते जा रहे हैं। हालाँकि सार्वजनिक और भीड़-भाड़ वाले स्थल बंद हैं। उत्सव-समारोहों पर प्रतिबंध है, तब भी कोरोना मानने को तैयार नहीं है । लोगबाग कह रहे हैं कि इसके टीके का थर्ड ट्रायल शुरू हो गया, अनुमान है कि जल्दी ही आ जाएगा । इन्तजार है ।
इधर देखते-देखते श्रावण गया और आज से भाद्रपद लग गया। लेकिन वर्षा है, कि नदारद! सारी गणित धरी-की-धरी है ।
 कल फिर से बंदरों की टोली आई थी छत पर। बेचारे परेशान हैं सब। धार्मिक स्थलों के खुलने के बाद ही इन्हें नव-जीवन मिलेगा लगता है। सजग मानव समाज क्या, मूक जीवों की भी तो मरनी हो रही है । सभी नव-जीवन की तलाश में हैं ।

Regional News Unit Raipur: Special programme on Kargil Vijay Diwas

Thursday, 16 July 2020

कोरोना शूल में मुस्कुराहट के फूल
- शिवनाथ शुक्ल
कोरोना का रोना-धोना कब शुरू होगा पता नहीं, किन्तु अभी उसके जाल में फंसे लोग रो-धो रहे हैंं। जहां कहीं बात करो हर जगह-से आशा मिश्रित निराशाजनक बातें सुनने को मिलती हैंं। आज ही मुम्बई के प्रसिद्ध साहित्यकार-सम्पादक डॉ. प्रदीप मिश्र से बात हो रही थी, बताए कि उनके इधर अनेकों इलाके सील हैं। काम-धन्धा न के बराबर है और वे लोग घरों में बन्द रहने को मजबूर हैं।
इसी में सुखद और उत्साह भरने वाली बातें भी बताए, कि बात करते-करते वे ब्रेड-पकौड़े खा रहे हैं। तुलसी, अदरक-सोंठ वाली गरमागरम चाय का जायका भी बताए और ये भी कि शरीर का इम्यून सिस्टम बढ़ाने में सहायक होती है। अहमदाबाद में साहित्य-प्रेमी पाठक से बात हुई तो कहने लगे कि लगातार घर में रहने-से दिन में चार-पाँच चाय हो ही जाती है। सरकारी राशन दो माह का एक साथ मिल गया है, कोई परेशानी नहीं है। अपने प्राथमिक के सहपाठी रामजी कोहांर से गांव बात किए तो बताने लगा कि यहां तो लोग खेती में लगे हैंं। धान-रोपाई का काम गति पर है। जो लोग बाहर-से आए हैं उन पर नजर रखी जा रही है। इस प्रकार देखो तो मुम्बई, दिल्ली, गांव, नाते-रिश्तेदार जहां भी फोन किए, हर जगह कोरोना की ही चर्चा और कष्ट का रोना। प्रवासी मजदूर भी बेचारे बने हुए हैं। वे अपने घरों को तो लौट गए लेकिन कामकाज को लेकर मायूस हैं। मनरेगा किन-किन को संतुष्ट करेगा? लेकिन अच्छा यह कि इससे लोगों को बहुत संकट नहीं। लोग मजे की जिन्दगी काट रहे हैं। और-तो-और लोगों में अवसान होती संवेदनाएं भी इस दौरान विकसित हुई हैं। वरिष्ठ साहित्यकार इन्दुशंकर मनु और उनकी धर्मपत्नी वत्सला मनु गाय और कुत्ते जैसे मूक पशुओं के लिए हर रोज अलग-से खाना पकवाते हैं और इन्हें नियत समय पर खिलाते हैंं। आई. एस. मनु ने बताया कि शाम के निर्धारित समय पर इन पशुओं की उनके यहां भीड़ लगनी शुरू हो जाती है। ऐसे समय में जब बन्दरोंं-से लेकर हिरणों सहित अन्य वन्य पशु और पंछी शहरों की ओर रुख कर रहे हैं तो करुणा और संवेदना-से भरे हृदयशील लोगों की महत्ता और बढ़ गयी है। 
कोरोना संकट काल में कई सकारात्मक पहलू आते दिखे हैं। पहले तो यही, कि लगतार गिरते पर्यावरण को जान मिल गयी। पीले पड़ते पेड़-पौधे फिर हरिया उठे। विलुप्त हो रहे अनेक जलचर, नभचर एवं थलचर प्राणियों की कई प्रजातियां देखने को मिलीं। अपराधों के ग्राफ भी घटे। दिन भर बाहर रहने लोग परिवार के बीच हैं। छोटे बच्चों में चाहे व्यवहार-परिवर्तन की समस्या आ रही हो लेकिन इसी मेंं उनकी रचनात्मकता का विकास भी हो रहा है। अनेक बच्चे ऐसे दिखे जिनने इस दौरान पेंटिंग, चित्रकारी और गीत-संगीत में अपने हुनर को विकसित किया।
आइआइटी भिलाई के छात्र कोराना वायरस से बचाव के लिए अत्यावश्यक  व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण पीपीई किट बनाए हैंं जिसकी दूर तलक चर्चा सुनी जा रही है। कोरोना से बचने नित नए-नए तरीकों पर विचार हो रहे हैं। दवाइयां बन रही हैं और उनके अनुप्रयोग भी हो रहे हैंं। भीड़भाड़ वाले सेमिनारों की जगह, एकान्तवास में रहकर ही वेबिनार जैसे आयोजन और ई-वार्ताएं इस इलेक्ट्रॉनिक युग के महत्त्व को रेखांकित कर रही हैं। घर बैठकर बच्चे-महिलाएं मॉस्क बनाना सीख रहे हैं। विद्यार्थी अपनी जुगत-से हैण्ड सेनेटाइजर बना रहे हैं। कर्तव्यपरायणता और बोध बढ़ा है। लोग बाग स्वच्छता की ओर चलने लगे हैं। पहले हाथ न धोने वाले या केवल पानी से ही हाथ धोने की रस्म अदा करने वाले लोग भी कइयों बार साबुन-पानी से हाथ धोने लगे हैं। और नहीं तो भोजन के पूर्व और पहिले तो हाथ जरूर धो रहे हैं कि कहीं कोरोना का आक्रमण न हो जाए।
वर्षों से बिछड़े रिश्तेदार-परिवार एक-दूसरे की सुध ले रहे हैं। पुरुष-समाज स्त्री के हाथ बँटा रहा है। पानी, पेट्रोल-डीजल की खपत कम हुई है। मितव्ययता बढ़ी है। बच्चोंं को पिता का बड़ा समीप्य मिला है।
 तो बहुत-से सकारात्मक पहलू भी निकल कर सामने आए हैं। यह अच्छा है। कोरोना की समाप्ति निश्चित ही सुन्दर समाज के निर्माण में सहायक होगी।
इसी में यह शोचनीय है, कि राजनीति का स्तर नहीं सुधर पाया। उनके हाव-भाव जस-के-तस हैं। टुटपुंजियों की तरह उनके बयानात उनका स्तर गिरा रहे हैं। कहां कोरोना जैसी बामारी और कहाँ उससे परे सियासत का घिनौना खेल! भारतीय लोकतन्त्र का यह विद्रूप और स्याह पक्ष है, कि यहां राजनीति हर काम में पेंच फंसाती है। यह उजला पक्ष बन सकता था, किन्तु बौद्धिक ईमानदारी हो तब तो?
 हमारे छत्तीसगढ़ में शासन-प्रशासन ने कोरोना को लेकर बहुत अच्छा काम किया है। शुरुआती दौर में ही राज्य की सीमाओं को सील कर संदिग्धों को क्वारेंटाइन और पॉजीटिव केसों की एम्स में उपचार की प्रक्रिया इतनी अच्छी रही कि यहां मौत अपना खेल न खेेल सकी। राज्य में अनेक कोविड अस्पताल खोले गए और जांच की सुविधा भी बढ़ाई गई। नतीजा अपेक्षा के अनुरूप रहा। मरीज अच्छे होते गए। जिलों में तो प्रशासन की जितनी तारीफ की जाए कम है। कलेक्टर-एसपी और नगर निगम के कमिश्नर अमले को सक्रिय बनाए रखे हैं और मुक्कमल तरीके-से इसके संक्रमण के फैलाव को रोकने का काम कर रहे हैं।
यह भी कि छत्तीसगढ़ महात्मा गांधी रोजगार गारंटी योजना के तहत देश में सबसे अधिक रोजगार देने वाला राज्य बन गया है। कोरोना शूल में मुस्कुराहट के ये फूल ही हैं जो जीवन को नवोन्मेष-से हर्षा रहे हैं।
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Tuesday, 7 July 2020

रेनु के हिस्से का दु:ख
- शिवनाथ शुक्ल
"वह टूट चुका था। शाम तक उसे तीव्र ज्वर चढ़ गया और इससे पहले कि भैरा बैगा झाड़-फूंक से उस पर सवार अशुद्ध आत्मा को निष्कासित कर पाता, वह भी चल बसा!"
अजीत-रेनु जोगी के कहानी संग्रह 'फूलकुँवर' में उक्त पंक्तियां पढ़ रहे हैं, कि सहसा खबर ने सन्न कर दिया कि छत्तीसगढ़ के प्रथम मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने दुनिया को अलविदा कह दिया! जिनकी शैली-से न केवल राजनीति वरन्  साहित्य और समाज भी आप्लावित हुआ। उनकी भाव-संवेदना निराली थी।
उनके न रहने पर नजर जाती है डॉ. रेनु पर! वे रेनु जो अजीत जोगी की अर्धांगिनी हैं। उनकी पहिचान सरल और सहज राजनीतिज्ञ की तो है ही, लेकिन उसके पहिले वे अच्छी कहानीकार भी हैं। उनने किन संघर्षों में अपना जीवन बिताया इस विषय में स्वयं अजीत जोगी ने लिखा है, "छत्तीसगढ़ में जन्मी, बुन्देलखंड में बढ़ी, तमिलनाडु और अमेरिका में पढ़ी एवं बड़े बाप की लाडली बेटी अनायास गरीब घर में ब्याहकर आने पर बुनियादी सांस्कृतिक बदलाव के तूफान के झकझोरों को झेलकर जीवन के अनुभवों से ही कहानी कहना सीखती रही।"
देखें तो इसमें तनिक भी मानीखेज नहीं है। रेनु की वैवाहिक शुरुआत कितनी आह्लादकारी रही होगी, इसे भारतीय पुलिस सेवा और भारतीय प्रशासनिक सेवा के साथ ही सांसद की धर्मपत्नी से अच्छा भला और कौन समझ सकता है? रेनु ने 'फूलकुँवर' में अजीत जोगी को लेकर लिखा है, "संभवत: तुम्हारे समक्ष ही कई बार लोग कौतूहल वश मुझसे पूछते थे कि मुझे पहले कलेक्टर और फिर सांसद की पत्नी होने पर अपने जीवन शैली मेंं क्या अंतर लगता है? मैं जिज्ञासा-से भरे इस प्रश्र का सहज भाव से मुस्कुराकर संक्षिप्त-सा उत्तर देती थी, कि दोनों ही पदों में मान-समान सरकारी बंगला, नौकर-चाकर, टेलीफोन, बिजली की सुविधा लगभग एक जैसी है किन्तु लालबत्ती वाली सरकारी कार का अलग ही सुख और प्रतिष्ठा है अर्थात साइड मिलने की झंझट अथवा पार्किंग की कोई परेशानी नहीं। अब सोचती हूं कि इस छोटी-सी इच्छा पूर्ति के लिए कितनी कीमत चुकानी पड़ी!"
वाकई जब कभी हम रेनु के आन्तरिक जीवन में ताकते हैं, तो पता चलता है कि वे तो सरल स्वभावा हैं जो राजनीति की कुटिल और दुर्जेय महल की रानी कभी न बन सकीं। अपनी कहानियों में अपने हिस्से के इसी दर्द को वे बार-बार संबोधित करती दीखती हैं। कई अवसर ऐसे भी आए जब इस कुलटा राजनीति ने उनके मुखमंडल की आभा को पीताभ कर दिया।
उन्होंने 'जन्मदिन' कहानी मेंं अनायास नहीं लिखा, "यह मैं भली भांति समझ चुकी हूं कि जीवन जीना बहुत सरल नहीं है, जीवन जीना आसान नहीं है। हमें अपने जीवन में दुख, तकलीफ, यातना, अलगाव, मृत्यु धोखा, प्रलोभन और परीक्षाओं से होकर गुजरना पड़ता है।"
अजीत जोगी-से पहले रेनु को उनकी बिटिया अनुषा ने अकस्मात जिस अन्दाज में बीच सफर अलविदा कहा, कौन मां होगी जो न बिलख पड़ेगी? फिर रेनु को तो उस घटना ने तोड़कर ही रख दिया था। इस सदमें ने रेनु के संवेदशील हृदय पर कितना गहरा असर डाला था इसका अंदाजा उनकी इन पंक्तियों-से समझा जा सकता है, जो उनने अनुषा को ही सम्बोधित करते हुए लिखा है, "रेल के सफर में हमेशा तुम ऊपर की शैय्या पर देर तक सोना पसन्द करती थीं। चूंकि वाताानुकूलित शयनयान में तुम्हें ठंड भी अधिक लगती थी, अत: मेरा कंबल भी तुम्हीं ओढ़ती थीं। अब अकेले ट्रेन में यात्रा करते समय अपना कंबल तह करके ऊपर की शैय्या पर रख देती हूं।"
रेनु अपने हिस्से के दर्द को सहने के लिए भांति-भांति के प्रतीकों और दृष्टातों का सहारा लेती हैं। दुनिया भर के विचारक उनके विचारों के केन्द्र में आते हैंं। लियो टालस्टाय का संदर्भ देकर उनने लिखा है, "यदि यह कहा जाए कि कोई जीवन-भर सिर्फ एक व्यक्ति को ही प्यार करेगा तो यह असम्भव है, जैसे एक मोमबत्ती जीवनपर्यन्त नहीं जल सकती।"
डॉ. रेनु नेत्र की शल्य क्रिया में माहिर हैं। उनने मरीजों के भांति-भांति के दर्द और तकलीफ बहुत पास-से देखे हैं। लेकिन अपने ही घर-परिवार में बने दर्द के रिश्ते ने मानों उनके दर्द को काफूर कर दिया है, तभी तो कहती हैं, "मेरे मन में मृत्यु का भय भी दूर हो गया है। जिसे अब मैं मात्र परदे के समान देखती हूं। क्योंकि उस परदे के दूसरी ओर तुमसे मिलने की अप्रत्यक्ष खुशी छिपी है।"
उनने नौकरशाही और राजनीति के एक सच को हद तक अंगीकार तो किया, लेकिन जब दूसरा सच सामने आया तो अवाक् रह गयीं। उन्हीं के शब्दों में, "दोष मेरा ही है,  मैं दिवा स्वप्र को सच मामने लगी थी।"
जीवन में जिस हर्ष की तलाश में रेनु घूमती रहीं वह हर्ष न मिला तो ठीक ही है। क्योंकि हर्ष तो अभिमान और अहंकार पैदा करता है। वस्तुत: जीवन का आनन्द तो अमित-रस में है, सौभाग्य-से रेनु के पास वह सोता अभी सुरक्षित है। उनके लिए महाप्राण की पंक्तियां समीचीन हैं- 
दुख ही जीवन की कथा रही, 
क्या कहूं आज, जो नहीं कही।

फुलवारी में सुबह का उपहार
- शिवनाथ शुक्ल
भोर-सुबह आंखें बन्द ही हैंं कि हौली सरसराहट ने मानों गालों को सहलाया। करवट लेना चाहते हैं, कि सहसा जंगले-से खिलखिलाकर हँसने की ध्वनि सुनाई पड़ी मानों कुछ देखा हो उसने। यूं जंगले का हँसते रहना ही सुकून देता है। बन्द तो गवाछ भी सांस घोंटते हैं।
आंखें खुल गईं। वातायन के पार फुलवारी में पंछी की चहक शुरू हो गयी है। उस अमरूद पेड़ के नीचे गीली जमीन पर कपोत के जोड़े चुग्गा खेल रहे हैं। जवा कुसुम की मासूम डाल पर नन्हीं-नन्हीं फुर्गुद्दियों की तान गूंज रही हैं। आम-वृक्ष पर गिलहरियां दौड़ लगा रही हैं ।
अंगड़ाई ले जंगले के पार देखते हैं तो देखते रह जाते हैं!
बगल के शीशम-वृक्ष से सटे सीताफल की तिरछी गई डाल पर छोटा-सा रंगीला, बेहद लुभावना पक्षी बैठा है। अकेला! किस प्रजाति का है ये? अपुन को जन्तु और पक्षी-विज्ञान की जानकारी वैसे भी बहुत है नहीं। तो लगे सोचने कि नुकीली लम्बी चोंच, हरा-नीला रंगबिरंगा, चमकीले पंख, भूरी टोपी वाला सिर और चपल आंखों वाला ये पक्षी अकेले यहां कहां ? यह स्थानिक तो नहीं लगता और न ही परिचित। तो कैसे विचरण कर रहा है? कहीं प्रवासी तो नहीं? लेकिन आया कहां से होगा? अकेला है तो कहीं अपने समूह से बिछड़ तो न गया ?
पक्षी विज्ञान के जानकार मित्र मिलिन्द मोघे और तिमिर भट्टाचार्य को इसकी तस्वीर खींच भेजी और जन्तु विज्ञान की समझ रखने वाले मित्र मुरली देवांगन से बात हुई तो उनने बताया कि ये किंगफिशर है। जो कि तालाबों, झीलों और नदियों के आसपास रहता है। तिमिर भट्टाचार्य ने बताया कि इस पक्षी में अनेक खूबियां हैं।
बकौल तिमिर, "ये गौरैया की तरह का घरेलू पक्षी तो नहीं है, लेकिन है बड़े काम का। इसे युद्धक कहा जा सकता है। युद्ध-कला की बारीकियां इस पक्षी से सीखी जा सकती हैं। ये झील, सरोवर, नदी आदि के ऊपर हेलीकॉप्टर की तरह कम ऊंचाई पर उड़ते हुए मछली आदि को सर्च कर पोजीशन लेते रहते हैं और जैसे ही आंख सधती है टप से पानी में डुबकी लगा देते हैं। ये बगुले की तरह केवल चोंच डुबाकर शिकार नहीं करते बल्कि जरूरत पड़े तो पानी के भीतर गोता लगा शिकार मार देते हैं। किंगफिशर पक्षी हमारे पीआइ-8 ओरियन एयरक्राफ्ट की याद दिलाते हैंं जो समुद्री गश्ती विमान हैं जो समुद्र में दुश्मन-पनडुब्बियों पर नजर रखते हैं और जरूरत पड़ने पर उसे पानी में ही ध्वस्त कर डुबो देते हैं।"
वहीं मिलिन्द मोघे बताते हैं कि ये जलाशयों के किनारे अपना निवास स्थान बनाकर रहते हैं। उनने कहा कि ये पक्षी भी हमारे वातावरण और पारिस्थिकी व मानविकी के लिए बहुत जरूरी है। वहीं पर्यावरण प्रेमी मुरली देवांगन के अनुसार कल्चरल एवं इकोलॉजिकल दृष्टि से भी किंगफिशर बहुत महत्त्वपूर्ण होते हैंं। विशेषकर जंगलों के कटने ओर जलाशयों के सूखने की वजह से ये तालाबों आदि की खोज मेंं शहरों की रुख करते हैंं।
वैसे इस पक्षी मानव समाज को कोई खतरा नहीं होता। ये केवल अपने शिकार तक ही सीमित हैं।
कुछ लोगों ने बताया कि इस पक्षी में मानव-संस्कृति की झलक भी है। कई जगहों पर इन्हें पवित्र मानकर पूजा जाता है। तो कई जन जातियों में इन्हें अपशकुन के तौर पर भी देखा जाता है। प्रशान्त क्षेत्रीय किंगफिशरों को पोलीनेशियनों द्वारा पूजा जाता था। जिनकी मान्यता थी कि समुद्र और उनकी विशाल लहरों पर इनका नियंत्रण है। दूसरी ओर बोर्नियों के दुसुन लोगों के लिए ओरएंटल बौने किंगफिशरों को अपशकुन के तौर पर देखा जाता था। इसीलिए लड़ाई में जाते हुए योद्धा यदि इन्हें देख लें तो तो समर भूमि जाने की बजाए लौट आते थे। वहीं बोर्नियायी जनजाति के लोग पट्टीदार किंग फिशर को शगुन वाला पक्षी मानते हैं। साहित्य, कला और संस्कृत से लेकर ज्योतिष शास्त्र में भी इनके महत्व की व्याख्या की गई है । इन्हें राम चिरैया भी कहा जाता है ।
 कुछ पक्षी विज्ञानियों का कहना है कि किंगफिशर जिसे किलकिला भी कहा जाता है, टिड्डियों को भी निवाला बनाने में माहिर होते हैंं। ऐसे समय में जब भारत के अनेक हिस्सों में टिड्डियों के दल हमारी हरियाली को चट करने पर अमदा हैं और उनके हमले बढ़ रहे हैं, तब विचार आता है कि क्यूं न हम इन टिड्डी खाऊ किलकिलों के संरक्षण और बढ़त पर ध्यान दें।
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Friday, 6 March 2020

मिश्रौलिया में अपनों के बीच
सप्ताह बीतने को आए हमें भिलाई लौटे, लेकिन मन के पंछी हैं कि अभी भी ननिहाल में ही डेरा जमाए हैं, मानो उनके आने का मन ही न हो! रात सोने जाओ तो आँखों की पुतलियां एक दूसरे-से लगती ही नहीं, जैसे वे भी वहीं की होकर रह गई हों। हृदय-से हूक उठती है और रह-रहकर वहां के अपने लोग याद आते हैं जो दिलोदिमाग को भिगोते रहते हैं। वहां मिला प्यार, अपनापा और स्नेहिल दुलार बारम्बार मन को आलोडि़त किए है। रह-रहकर मिश्रौलिया का वह सुन्दर-सा घर, पीछे का खुला भू-भाग, वृक्ष-लता, गुल्मों-से आच्छादित स्थल और गऊमां का डेरा, अपने प्रियजनों का बसेरा दिल में हिलोर उठाता है। मन के कोने-कोने में रह-रहकर अपनों की प्रेम-वर्षा होती है और दिल भीग उठता है।
आदरणीय रवीन्द्र भैया ने नेह-से विदा तो कर दिया, लेकिन आप और आपके परिवार ने जो मुहब्बत दी है वह चिर स्मरण रूप में हमारे हृदय-से जुड़ गया है।
सोचते हैं, कि हमारे ननिहाल के लोगों के संस्कार और आचरण व्यवहार कितने ऊंचे ओर विचारवान हैं! जरूर नाना-परनाना महान साधक और साधु-पुरुष रहे होंगे जो इस प्रकार वटवृक्ष का पोषण किए जो आज भी उनके नाम की पताका फहरा रहे हैं। सरल-सहज मामी लोगों का परिवार भी कम संस्कारित नहीं रहा होगा, जो संस्कारों-से लबरेज होकर आईं और अपनी ससुराल की माटी को धन्य किया। फिर हमारा भी कितना बड़ा धन्यभाग, कि नकौझा जैसे गांव और श्रद्धेय पटेश्वरी तिवारी जी की लाडली बेटी ने हमें इस सुन्दर-सी धरती को देखने का गौरव प्रदान किया। आज वे तो नहीं हैंं, लेकिन उनकी बहुत-सी ख्वाहिशें जो अधूरी रह गईं और अपने नैहर को लेकर उनकी जो उत्सुकता बनी रही उसे बनाए रखने में हम अपने को भाग्यशाली मानते हैं।
नकौझा के साथ ही जब कभी बस्ती की बात निकलती तो अम्मा कहा करतीं, कि "तुहके बेलहर-मिश्रौलिया लियाके चलअब।" कई बार भिलाई-से खखाइजखोर जाने पर वे कहतीं, "एक बार मिश्रौलिया घूमि आवा।"
..तो बाबू आलोक के शुभ विवाह के बहाने हमारे मिश्रौलिया जाने को लेकर अम्मा की साध आखिर पूरी हुई। लेकिन तब जब वे इस संसार में नहीं हैं।  
क्रमश: - 2
०००
-२-  
पिछले महीने की एक ठिठुरती रात को लेह-से प्रियवर बाबू धूरुप का फोन आया था। उन्होंने हमारे आने के बारे में पूछा और कहा कि वे भी मिश्रौलिया के विवाह-समारोह में विथ फेमली पहुंच रहे हैंं। बड़े प्यार-से उनने हमें भी आने को कहा।
फिर कुछ ही दिन बीते होंगे कि एक सुबह प्रेम भैया का नकौझा-से फोन आ गया। आपने भी विवाह में पहुंचने को कहा। वहीं रवीन्द्र भैया भी थे। आपने भी अनुग्रह किया। फिर उसी दिन की शाम वीरेन्द्र भैया-से बात हुई तो आपने मिश्रौलिया का रूट बताया और कहा कि एकदम आसान है। आने में तकलीफ न होगी। हम भी रोमांचित थे।
इसी में एक रात चन्द्रलोक में बैठी हमारी अम्मा भी साक्षात् हो गईं! मानो वीरेन्द्र भैया, रवीन्द्र भैया, प्रेम भैया और बाबू धूरुप के सुर में वे भी अपना सुर मिला दीं, कि चलो मुझे भी चलना है मिश्रौलिया। अपने भाई-भतीजों के पास।
अब क्या कहें? ठिठुरती और कड़कड़ाती ठंड है। कोहरा-बारिश और धुंध ने हफ्तों-से डेरा जमाया है। फिर बस्ती हम कभी गए भी नहीं। कहते हैं कि वह निचला इलाका है और उधर सूनसान भी बहुत रहता है। जो इलाका कभी देखा नहीं वहां जाने मेंं भय होना स्वाभाविक है। लेकिन बात ननिहाल और अम्मा के भतीजे के विवाह की थी।
लीजिए, निमन्त्रण-पत्रिका भी व्हाट्सएप पर आ गई। बड़ा आकर्षक और प्रेरक कार्ड छपवाया है भैया ने। पहले तो लिफाफे पर ही पते के जस्ट बगल में आकाश-से उतरती हुई परी दिख रही है, जिसके हाथों में फूलों की माला है और वह उसे इस स्टाइल में लिए उतर रही है मानो मेहमान के गले में पहिना कर स्वागत को आतुर हो। यह मेहमानवाजी का कितना सुन्दर नमूना है। फिर देखिए, कि सामने भगवान श्रीगणेश और शिवलिंग के साथ ही शिव-पार्वती की सजीव होती तस्वीर है। आइने में श्रीकृष्ण-राधा का अद्भुत प्रेम चित्रित किया गया है, यही शाश्वत है। इसी में दीपक की भांति चमकते मंगल-कलश, ऊं की छवि और तबले दिखायी देते हैं। किनारे हल्दी-कुमकुम की शोभा है। ईश-वन्दना-से चमकदार कार्ड का मजमून भी बड़ा सुन्दर है।
इसी बीच एक शाम भाभी (श्रीमती वीरेन्द्र भैया) का फोन भी आया।
इन सब शुभ संकेतों और अपनों के अनुनय को समझ हमने फौरन ऊषाजी-से कहा, "तैयारी करो। हम मिश्रौलिया जाएंगे।"
वे खुश हुईं, कि इसी बहाने उनके भी अपने नैहर जाने का रास्ता खुल जाएगा।
क्रमश: - 3
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-3- 
सारी तैयारी कर और वहां होने वाली दिक्कतों को सोचते हम भिलाई-से गोरखपुर के लिए ट्रेन पकडऩे निकलने को हुए, तो जैसे वही डोल्ची लिए अम्मा भी खिलखिलाती आ खड़ी हुईं, कि "मैं भी चल रही तुम्हारे साथ अपने भतीजों-बहुओं-से मिलने। चलो, कोई कष्ट तो न होगा उल्टा इतनी सुविधा होगी कि आराम-से रहोगे।"
घने बादल लगे हैंं। तीन दिनों-से सूरज के दर्शन नहीं हैं। सुबह बारिश भी हुई थी। डर लग रहा है। फिर भी ऊषाजी को साथ लिए निकल पड़े। दुर्ग स्टेशन के प्लेटफार्म नम्बर-4 पहुंचे तो ट्रेन लग गई थी। इसी में वर्षा ने कोप दिखाया। लेकिन हम अपने कूपे में पहुंच गए। सुविधाओं-से लैस बड़ी शानदार बोगी थी। एयर टाइट डिब्बे में ठंड का नामो निशान न रहा। रात तानकर सोए और कटनी-बनारस होते कब मऊ हो आ गया पता ही न चला। एकदम समय पर पहुंचे थे।
वहां पहुंचते ही राज्य परिवहन की बस मिल गयी और सीट भी आराम-से। 2 घंटे में ही बड़हलगंज होते अपनी ससुराल राऊतपार चौराहा पर उतर गए।
राऊतपार में चायपान चल ही रहा है, कि मिश्रौलिया-से बाबू चन्दन का फोन आ गया।
"चाचा, कहां है?"
"हम आ गए हैं।"
"कल निकलेंगे, आपके यहां।"
"आपको गोरखपुर पैडलेगंज-से बस मिल जाएगी।"
"हां, हम वहां पहुंचकर फोन करेंंगे बाबू।"
"मैं आपको बस और उसका नम्बर भेज रहा हूं।"
चन्दन की बात सुनकर बड़ा गुमान हुआ, कि देखिए, लड़के को कितनी परवाह है हमारी। रास्ते में कोई तकलीफ न हो। आराम-से पहुंच जाएं। आखिर इसीलिए तो वह लगा है बेचारा। वर्ना तो निमंत्रण मिल गया, चाहे जैसे जाइए। लेकिन यह भैया-भाभी का संस्कार ही तो है, जो  वह इतनी लगन के साथ पूछ रहा है। यह बात हमने ऊषाजी को बताई। वे बहुत खुश हुईं। हमारे ननिहाल का संस्कार ही ऐसा है..
क्रमश: - 4
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[05:31, 25/02/2020] Shivnath Shukla: -4-
इधर सुबह की लालिमा गाढ़ी हुई उधर चायपान कर हम रावतपार-से निकल पड़े। ऊषाजी ने चिरपचित अन्दाज में हमें अपना ख्याल रखने और पहुंचते ही फोन करने की विनती कर विदा किया।
गोरखपुर पैडलेगंज पहुंचने में मुश्किल-से 2 घंटे लगे। बस-से उतरते ही लघुशंका की तलब लगी। कहां जाएं? चौतरफा तो भीड़-भड़क्का, लोगों की आवाजाही। सहसा सामने पुलिस चौकी नजर आयी। बेधड़क उसी में चल दिए जैसे अपना ही गुसलखाना हो। पुलिसवाले भी हक्के-बक्के! वहां सुविधाजनक बाथरूम था। वहां से निकल एक पुलिस वाले-से पूछे तो उसने बता दिया, कि वह सामने की बस कलवारी जाएगी। बाबू चन्दन ने जो नम्बर दिया था उसे मिलाए, तो पता चला कि बस वाला हमारा ही इन्तिजार कर रहा है।
पहुंचे तो बस ठसाठस भर चुकी थी। कई जनाना-मर्दाना खड़े भी थे। कंंडक्टर था, एक सुविधाजनक सीट पर उसने हमें विराजमान कर दिया। कुछ दरे बाद ही पीं-पां की आवाज करते बस खुल गई। गीडा, सहजनवां, खलीलाबाद होते बस्ती। रस्ते में मगहर भी पड़ा। निर्गुण ब्रह्म के उपासक सन्त कबीर का महापरिनिर्वाण स्थल। बहुत सुन्दर लगा। छोटे-छोटे कस्बे और फिर दूर-दूर तक हरे-भरे खेत। बाग-बगीचे।
खेतों के सौन्दर्य को देख पंतजी की काव्य पंक्तिया स्मरण हो आईं, 'फैली खेतों में दूर तलक मखमल की कोमल हरियाली..'
सरसों, गेहूं, मटर, गन्ना, चना आदि-से लेकर अनेक फसलों की खेती देखते ही बनती थी। देखते-ही-देखते बस्ती आ गया।
बस्ती को देखते ही हमारी आंखें भीगने लगीं। यही वो शहर है जो हमारे लिए बेहद संवेदनशील और स्मृतियों को लपेटे है। यहां हमारी अम्मा के पग तो पड़े ही हैं, सबसे स्मरणीय और भावभीना यह है, कि हमारे परम पूज्य, चिर स्मरणीय श्रद्धेय बाबा नागेश्वर शुक्ल जी के चरण-रज से भी यह शहर आलोडि़त हुआ है। बर्मा (रंगून) से लौटने के बाद कामकाज के सिलसिले में आप कुछ महीने यहीं रहे। तब यहीं हमारे फूफाजी पं. भानुप्रताप मिश्र जी पीडब्ल्यूडी में डिविजनल एकाउंटेन्ट थे। हमारे तीसरे नम्बर के भ्राता भी कुछ महीनों तक यहां कामधाम किए। फिर आरदणीय रामअवध मामा और आदरणीय रामानन्द मामा आप प्रियजनों के पदचिन्ह भी इसी शहर-जिले में अपनी चमक बिखेरे। यही वजह है कि इस शहर में प्रवेश करते ही हमारे रोंगटे हर्ष-से लहरा उठे। हम उचक-उचक कर बस-खिड़की के बाहर झांकते रहे, कि कभी यहीं तो हमारे पूजनीय परिजन भी घूमते रहे होंगे। जी किया, उतर जाएं और उन-उन जगहों पर जाएं जहां हमारे प्राण-प्रिय बाबा गए थे। लेकिन पता न था।
लीजिए, बस्ती-से बस आगे की ओर बढ़ गई है, हम अब कलवारी के पथ पर हैं। वहीं उतरने को कहा गया है।
क्रमश: - 5
०००
-5-
कुछ ही देर में कन्डक्टर द्वारा कलवारी उतरने वालों के लिए पुकार हुई।
हम गेट पर पहुंच गए। पहले-से वहां खड़ी एक भद्र महिला ने हमसे पूछा- "कलवारी उतरेंगे?"
"हां, हमें मिश्रौलिया जाना है।"
"अरे, तब तो कलवारी की बजाए थोड़ा और आगे चमनगंज है, वहां उतरें। वर्ना तो कलवारी-से मिश्रौलिया के लिए ऑटो लेने पर भाड़ा बहुत लेंगे।"
"ठीक है।"
उन भद्र महिला ने कन्डक्टर को हिदायत किया, "बाबू को चमनगंज उतारना।"
उनकी सज्जनता और राह बताने में अपनत्त्व का बोध ऐसा रहा, कि हम सोचने लगे, कितना सुन्दर संयोग। अपनी लगने वाली ये महिला कहां-से आ गईं?
लगा उस रूप में डोल्ची लिए अम्मा ही खड़ी हैं जो इस वक्त अपनी ही अदा में मुस्कुरा उठी हैं। जैसे वे ही हमारी राह आसान किए जा रही हों।
चांयं-चांय करती बस खड़ी हो गई है।
कन्डक्टर ने मुस्कुराकर कहा- "उतरिए साहब, यही चमनगंज है।"
हम हौले-से उतरे। कितना सुन्दर नजारा, मानो दुपहरिया भी रिक्शे-से उतर रही हो। चमनगंज में रौनक है। सामने-से सड़क गुजर रही है। हम चौतरफा देखते टहलते हुए वहीं के एक पानठेले पर पहुंचते हैंं और दूकानदार-से दर्याफ्त करते हैंं,
"हमें मिश्रौलिया जाना था।"
"हां, यही सड़क चली जाएगी।"
"कितनी दूर है?"
"ज्यादा तो नहीं है, फिर भी डेढ़-दो किमी से कम न होगा।'
"कोई आटो वगैरह.."
"नहीं मिल पाएगा।"
सहसा जाने उसके मन में क्या आया, कि सामने खड़े बाइक वाले-से उसने पूछा- "क्या कर रहे हो।"
"कुछ नहीं।"
"तो, इन बाबू को मिश्रौलिया छोड़ आओ जरा।"
हम चहक उठे। जान न पहिचान फिर भी देखो लगता है, कि यह हमारे ननिहाल का हो। दिल मयूर बन गया।
बाबू जुगनू की शादी के वक्त उरुवा बाजार के चौराहे पर लकठा और मम्फली बेचने वाले उस दूकानदार की याद हो आई, जिसने इसी तर्ज पर हमें नकौझा भेजने के लिए एक बाइक वाले को तैयार कर दिया था। तो कितनी समानता है न दोनों में!
अम्मा डोल्ची लिए अब भी मुस्कुरा रही हैंं मानों कह रही हों, "चलो बाबू, सवारी तैयार है मिश्रौलिया के लिए।"
हमारी आंखें सजल हो गयीं..
क्रमश: - 6
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-6-
बाइक वाले-से हमने कहा, श्री रवीन्द्र मणि त्रिपाठी जी के वहां चलना है।
तभी उसने सामने सड़क पर बाइक पर बैठे लड़कों की ओर इशारा करते हुए कहा, ये लोग तो वहीं के हैं। देखो जा रहे हैं।
जब तक हम उस ओर देखें सहसा उन लड़कों की नजर भी उड़ती हुई हमारी नजर-से आ मिली।
अरे! ये तो रवीन्द्र भैया के छोटे सुपुत्र बाबू अनुराग हैं। हम पहिचान गए। उन्हें नकौझा में देखे थे। वे भी पहिचाने और लपकते हुए हमारी ओर आए। प्रणाम किए और खुश हो बोले, "चलिए चाचाजी। कोई तकलीफ तो न हुई।"
हम क्या बोलें? हृदय के उछाह ने मानो हमारे लब ही सी दिए हों। कितना अद्भुत संयोग!
बाबू अनुराग की बाइक पर हम बैठ गए और मिश्रौलिया के रस्ते बढ़ गए। पक्का पिचरोड है। हम रोमांचित हैंं कि हमारे आदरणीय रामानन्द मामा ने इस क्षेत्र को अपने आशीर्वाद-से सिंचित किया है तभी तो हम वहां जा पा रहे हैं। इन राहों पर कभी हमारे नाना-मामा-अम्मा आदि भी गुजरते रहे हैं। तभी तो ये राहें बेगानी नहीं, पूरी तरह-से अपनी लगती हैं। हमारी आंखों मेंं चमक है। राह मेंं पडऩे वाले गांवों को हम अपलक देखते बढ़े जाते हैं।
बाबू अनुराग पूरी तन्मयता-से बाइक चला रहे हैं और हम सोचते जाते हैं कि कितना शुभ दिन है, कि बाबू आलोक के विवाह पर हम अम्मा-रूप में वर-वधू को आशीर्वचनों-से अभिसिंचित करेंगे।
सहसा हमारी स्मृति में आदरणीय रामअवध मामा की याद कौंध आती है। जिनमें बारे में अम्मा-से अनेकानेक संस्मरण सुन चुके हैं। गोण्डा-बस्ती को लेकर कितनी ही तो यादें हैं जो अम्मा के मुख-से सुनते-सुनते हम बड़े हुए। बड़का मामा का बेलहर और अम्मा का वहां को लेकर लगाव का जितना बखान करें कम है।
सोचते हैंं, बेलहर भी तो यहीं कहीं होगा न? जहां बड़का मामा के नाम की पताका है। कैसी होगी वह जगह? वहां अब क्या होगा? उनके सभी लड़के-बच्चे तो बड़ा नाम कमा रहे हैं और नाना-परनाना का नाम रोशन कर रहे हैं।
यही सब सोचते बढ़े जा रहे हैंं, आसपास के गांवों एवं खेतों की खूबसरती लगातार अनावृत्त हो रही है, कि सहसा बाबू अनुराग ने बाइक पर ब्रेक का शिकंजा कस दिया। हम समझ गए, कि मिश्रौलिया समक्ष है..
क्रमश: - 7
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सड़क के जस्ट किनारे ही घर है। पक्का सुन्दर मकान। उसे देखते हुए बाइक-से उतरते हैं। सामने कोई आटो खड़ी है। उसे पार करते द्वार की ओर बढ़ते हैं कि,
अरे! आदर्य धर्मेन्द्र भैया!
कुर्सी पर उन्हें बैठा देख हम खुशी-से झूम उठे।
धर्मेन्द्र भैया खखाइजखोर में अक्सर अम्मा-से मिलने आया करते थे। सभी भतीजों के साथ ही अम्मा को आप पर बड़ा गुमान था। माल्हनपार में अपनी पोस्टिंग के दौरान भी अम्मा का आशीर्वाद लेने आप आते रहे।  धर्मेन्द्र भैया का नाम ले अम्मा अक्सर भावुक हो जाया करतीं, कहें कि रोने लगतीं।
तो धर्मेन्द्र भैया को मिश्रौलिया की धरती पर बैठा देख हम खुशी-से झूम उठे। लपके और उनके चरणों में झुक गए। आपने खड़े होकर हमें पकड़ लिया और लगे कुशल-क्षेम पूछने। तब तक बाबू चन्दन आ गए। प्रणामाशीर्वाद की रस्म के बाद वे भी रास्ते की परेशानियों के बावत पूछने लगे। बैठे ही है, कि बड़ा स्वादिष्ट मीट्ठा और चटपटा नमकीन आ गया। धर्मेन्द्र भैया ने लेने को कहा, तो हमने चम्मच को हाथ लगा दिया। अभी यह सब चल ही रहा है कि गरमागरम चाय भी आ गई।
बातचीत के दौरान ही समीप में एक सज्जन टीका लगाए शानदार वस्त्र पहिने दिखे। हमने आपसे बातचीत की, पता चला, कि चतुर्वेदीजी हैं। भैया के साढ़ूभाई। परिचय का आदान-प्रदान हुआ। तबीयत के आदमी लगे। विंध्याचल में रहते हैं।
सहसा गीता दीदी आती दिखीं। सीधे आईं और पकड़ लीं। हमें अम्मा का स्मरण हो आया। वे भी तो ठीक ऐसे ही किया करती थीं। गीता दीदी ने समाचार-हाल जानने के बाद कहा- "चलअ बबुल्ले, भोजन तैयार बा।"
"इतनी जल्दी में क्या-क्या खाएं?" गीता दीदी नहीं मानीं और लिए-दिए भीतर की ओर चल दीं।
ओसारे में कदम रखते ही हमें दूसरी ही तरह की अनुभूति हुई और सहसा रामानन्द मामा और मामी का स्मरण हो आया। मामा के वही छोटे-छोटे केश, धोती-कुर्ता की धज और कड़कदार आवाज। वे महामना थे तभी तो इस धरा पर हमें भी पांव रखने का सौभाग्य मिला है। स्मरण में उन्हीं को प्रणाम कर हम भीतर को होते हैंं। कोठरी मेंं बाबू धूरुप आंखों पर बांह रखे लेटे हैं। नींद में हैं लगता है। हम बढ़ गए। कुछ देर में होगी मुलाकात अपने इन परमप्रिय-से।
भीतर कुर्सी-टेबल लगा दिया गया है। हम बैठ जाते हैंं। बगल में नीचे कुछ लोग भोजन कर रहे हैंं। तभी आदरणीया गायत्री दीदी और जासो दीदी दिख जाती हैं। हम चरणों में झुक प्रणाम करते हैंं, वे आशीर्वाद देते-देते अम्मा का स्मरण करने लगती हैंं, कि "फूआ की बहुत याद आती है।"
कुर्सी पर बैठते ही हैं कि सहसा निगाह पीछे की ओर जाती है।
अरे! रवीन्द्र भैया कराहे पर! सादे वेश में बैठे बड़े प्रेम-से पूरियां छान रहे हैंं। पूरियों को भी देखिए, क्या तो डब्ब-डब्ब फूल कर तेल में नाच रही हैंं। मानोंं रवीन्द्र भैया के छानने-से वे भी फूलकर कुप्पा हो रही हों, कि मालिक-मलिकार का प्रेम क्या किसी को इस रूप में मिलने का सौभाग्य प्राप्त हो सकता है?
रवीन्द्र भैया को कराहे पर बैठे देख हमें अम्मा की याद हो आती है, कि आज वे होतीं तो क्या रवीन्द्र भैया को कराहे पर बैठने देतीं? नकौझा में अनेक अवसरों पर अन्य बहुत-सी स्त्रियों के साथ अम्मा को भी हमने देखा है, कि कैसे कराहे पर पकवानोंं को तैयार करने में पसीना बहाती रही हैं। हम कुर्सी पर बैठे-बैठे रवीन्द्र भैया की सादगी और सरलता को देखते हैं, तो देखते ही रह जाते हैंं।
क्रमश: - 8
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लीजिए, गीता दीदी सुनहली और फुल्लल-फुल्लल पूड़ी, रसदार तरकारी, चावल-दाल चटनी-मीठा आदि लाकर प्रेम-से भोजन कराती हैं। सब्जी तो बड़ी लजीज है। इतनी स्वादिष्ट, कि क्या कहें? लगता है, पूरे परिवार ने अपना प्रेम-अमृत ही उड़ेल डाला हो।
भोजन कर ही रहे हैं कि देखते हैं, कि रवीन्द्र भैया की जगह कराहे पर मोर्चा अब गीता दीदी ने सम्भाल लिया है। बड़ा अच्छा लगा। गीता दीदी की यही विशेषता हमेंं झुमा देती है। हमारे जनऊ संस्कार में खखाइजखोर में अम्मा के साथ काम के प्रति आपकी लगन हमें आज भी रोमांचित कर देती है और यदाकदा अपने घर में हम आपका दृष्टान्त भी देते हैंं।
वहीं बहिन अशोक के दर्शन भी होते हैं। आकर प्रणाम कर आशीर्वाद लेती है। वह बड़ी सरल और सहज है। उसकी बिटिया भी उतनी ही प्यारी और अच्छी है। वह भी मिलती है। वह रागिनी लगातार व्यस्त दिखती है।
रवीन्द्र भैया की बड़ी सुन्दर और गरिमामय बिटिया की धज भी देखते ही बनती है। संस्कारों-से लबरेज वह लड़की भी भांति-भांति के कार्यों को मूर्त रूप देने में लगी है। लोगों को खिलाना है, पीछे काम भी पड़ा है। इसी में मंगल-कार्य है, कुछ देर में बारात की तैयारी है.. तो उसे फुर्सत कहां? आज उसके भैया का विवाह है। खूबसूरत पीले रंग की लहंगा-चुन्नी पहिने कितनी खुश है वह। फिर देखिए, कि हमारा आशीर्वाद लेना नहीं भूलती।
इसी में बाबू धूरुप की दोनों बच्चियां गुडिय़ा-अंजली भी आती हैंं। उन्हें शायद पता चल गया है, कि उनके पिताश्री ध्रुवनारायण मणि त्रिपाठी हमारे बालपन में कितने करीब रहे। नकौझा में हम प्यारी मामी को कितना परेशान करते थे, यह तो वे ही जानते होंगे। लेकिन एक वह बेचारी थीं कि हमें समय-से भोजन कराना न भूलतीं। ध्रुवजी की श्रीमतीजी भी विराजमान हैं। कुछ-कुछ कर रही हैं।
भोजन पा ही रहे हैं, कि सहसा बड़ी सुन्दर, छरहरी, अति व्यस्तता में भी अपनत्त्व का बोध और माथे तक पल्ला लिए सौभाग्यवती आईं और पैरों के पास बैठ गयीं! पता चला, कि भाभी (श्रीमती रवीन्द्र भैया) हैं। हमने उठकर उनके पैर छूए। हमारा आपसे पहिला परिचय है। इससे पहिले नकौझा में हो सकता है देखे हों, लेकिन इतना गाढ़ा परिचय न हुआ था। आपको देखे, तो देखते ही रहे गए! कितनी सरल और हंसमुंख! रवीन्द्र भैया के स्वभाव की तरह ही कर्मठी। कभी अन्दर तो कभी बाहर होतीं लगातार कामकाज निबटा रही हैं, लेकिन चेहरे पर शिकन तक नहीं! आज उनके ज्येष्ठ सुपुत्र का विवाह है। कोई भी स्त्री हो उत्साह तो होगा ही न? बड़े नसीब-से यह शुभ दिन देखने को मिलते हैंं।
हालांकि हम उस लायक तो नहीं, पर भी आपने हमारे आ जाने मात्र के लिए ही कितना-कितना तो आभार प्रकट किया, कृतज्ञता जताईं। अम्मा को भी याद कीं और हमें फिर-फिर धन्यवाद के शब्द कहे। हम तो अभिभूत हैं, कि कितने अच्छे और प्रेम-से भरे लोग हैंं। बाबू जुगनू की श्रीमतीजी जिनके विवाह में हम पकड़ी गए थे और कलानी के उस प्राथमिक स्कूल में बड़ा शानदार स्वागत हुआ था। वे भी आईं और आशीर्वाद लीं। बड़े संस्कारित हैं उनके परिवार के लोग।
उधर देखिए, शायद कोई आ रहा है..सिर पर पल्ला है, लिलार तक ढंका है..
क्रमश: - 9
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अंचवन के लिए उठे ही हैं, कि भाभी (श्रीमती धर्मेन्द्र भैया) दिखती हैंं। शायद उन्हें पता चल गया है, कि हम आ गए हैं। इससे पहिले कि वे हम तक पहुंचे, हम ही लपक कर उन तक पहुंचते हैं और प्रणाम करते हैं। हँसमुख स्वभावा आप हमारा समाचार पूछती हैं। आने के लिए धन्यवाद कहती हैं।
यहीं अन्जू भी दिख जाती है। कितनी अच्छी है वह। विवाह के बाद तो उसका सौन्दर्य और बढ़ गया है। आशीर्वाद  लेती है। उसका प्यारा, फूल-सा बालक भी खेलता दिखता है। हम उठा लेते हैंं। गाल पर चुटकी लेते हैं तो खुस्स-से हँस देता है।
बाबू जुगनू, आकाश और अमित बाबू सहित बाबू आशुतोष भी यहीं मिल जाते हैंं। सभी काम में लगे हुए हैं।
अंचवन के लिए गरिमा-से चांपाकल चलाने को कहते हैंं।
यहां-से पीछे की ओर निकले हैं। वहां का नजारा तो और भी अद्भुत! भगवा धोती और पीले रंग का कुर्ता पहिने आदरणीय वीरेन्द्र भैया-भाभी पूजन-बेदी पर हैं। आपको इस सुन्दर भूषा में देख, "..गेरू लाल छटा छबि बदन कमल सोहे.. की पंक्तियां याद हो आईं।
मिश्रौलिया के पंडितजी का मन्त्रोच्चार गूंज रहा है। बीच मेंं हरीश और बांस गड़ा हुआ है। जिसके बीच शुभ मूज और आम-पल्लव बंधा हुआ है। नीचे बेदी सजी है। केले का पत्ता, जनेऊ-से लिपटा और गोबर-जौ से गोंठा हुआ पूजन-कलश, मीठा, फल-मेवा, पान-सुपारीआदि रखा है और वहां आसन पर भैया-से गांठ जोड़े बैठीं भाभी को हम अपलक देखते हैंं। उनके बाएं हाथ पर कै्रप बैन्डेज बंधा हुआ है। समझ गए, कि यही हाथ फ्रैक्चर हुआ है जिसके बारे में वीरेन्द्र भैया-से बात हुई थी। खूबसूरत पीली साड़ी पहिने, हाथों में मेंहदी रचायीं भाभी का मुख देखते हैं। वे कुसुमकली की भांति मुस्कुरा रही हैं।
हम सोचते हैंं, देखिए भूखी-प्यासी सौभाग्यवती को। पीड़ा है, फिर भी चेहरे पर शिकन नहीं! यह कर्तव्यपरायणता का बोध ही है जो उन्हें सदैव कर्म की ओर प्रेरित रखता है। अभी कुछ वर्ष पहिले ही एक बार जब हम नकौझा गए थे, तब देखे थे कि वे मामी के साथ गेंहूं फटक और बीन रही थीं। मामी और भाभी का अद्भुत मेल दिखा था।
आज भी वही तेज दिखा चेहरे पर उनके। हाथ में दर्द तो होगा तब भी वे पूजा के विधि-विधान के अनुसार ही हाथ चला रही हैं और भगवान के समक्ष फूल-पत्ते चढ़ा रही हैं। यहां मिश्रौलिया में अपना दायित्त्व शिद्दत-से निभा रही हैं।
देखते ही हमसे पूछ बैठती हैं- "अकेल्लै काहें अइलीं?"
यह प्रश्र आप बारंबार पूछती हैंं। हम कहते हैं कि "वो तो अपने मायके का सुख ले रही हैं।"
दोनों सुहृद्वरों को प्रणाम कर हम पीछे की ओर निकल जाते हैं और देखते हैंं, कि कितना सुन्दर दृश्य है इधर।
फिर बाहर निकलते हैं तो दोनों शुकुलजी से भेंट हो जाती है। प्रणामाशीर्वाद होता है। हम आदरणीय डॉ. जितेन्द्र मणि त्रिपाठी (जितेन्द्र भैया) के बारे में पूछते हैंं, तो पता चलता है, कि पहुंचने ही वाले हैंं। प्रेम भैया आदि के न आने की खबर सुनकर मायूसी आती है। बोधनाथ भैया-से लेकर त्रिपुरारी भैया सहित अन्य भाई-भाभियों आदि के बारे में सोच ही रहे हैं कि सहसा प्रतापगढ़ वाले मुकेशजी आते दिख जाते हैं। वे प्रणाम करते हैं तो हम भाभी (श्रीमती परपन्ने भैया) के विषय में जानना चाहते हैंं। बताते हैं कि वे कुशलतापूर्वक अपना दैनंदिन कार्य कर रही हैं। हमेंं खुशी होती है और ईश्वर-से प्रार्थना करते हैं, कि भगवान आपको लम्बी उम्र और अच्छा स्वास्थ्य दें। हमारी प्रिय मामी के काम में नकौझा में गोद में भरकर उनके दिए 10-10 के दोनों सिक्के आज भी हमें उनके ममत्त्व की याद दिलाते रहते हैं। आदरणीय केदार भैया के बेटे की शादी के दौरान जब हम अम्मा के साथ प्रतापगढ़ गए थे, तब आपका हमारे प्रति किया सत्कार और वह खुशी भला कभी भूलेगी? भीड़-भड़क्का के उस घर में आपने हमें अपने घर गैस जलाकर जो कलेवा तैयार किया था उसका स्वाद हमारे जिह्वा पर आज भी वैसे ही विराजमान है और गाहे-बगाहे यूं ही चटखारे लेकर हम आपको याद करते हैं। आप स्वस्थ रहें भाभी, यही ईश्वर-से प्रार्थना है।
क्रमश: - 10
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लीजिए, फिर भाप निकलती गरमागरम चाय आ गयी। सुड़कते हैं। तबीयत हरी कर देने वाली चाय बनी है। जाने किसने बनाया है? जिसने भी बनाया उन्हेंं हार्दिक धन्यवाद है।
तभी सफेद रंग की मोटरकार आती दिखी। पता लगा, कि मास्टर साहब जितेन्द्र भैया हैं। कार रुकी और भैया के साथ ही भाभी उतरती दिखीं। गह्वर विवेेक के मालिक जितेन्द्र भैया सजीले किनारों-से युक्त शुक्ल-रंग की वही अपनी चिरपरिचित पगड़ी जो अपनी ही स्टाइल में होती है, बांधे हैंं। काली गरम जर्सी और पैंट में सुशोभित हैं। दाहिनी कलाई पर तुलसी या कि रुद्राक्ष-माला लिपटी है और बाईं पर श्वेत घड़ी शोभायमान है। मुस्कुराते हुए उतरते हैंं और वहीं सड़क किनारे खड़े हो चौतरफा मुआयना करने लगते हैं। जैसे मामाश्री के गरिमा के अनुकूलन को तौल रहे हों। काफी देर तक वहीं खड़े आसपास लोगों-से बतियाते रहे। लोग भी पुराने परिचितों की तरह आपसे आ-आकर मिले जा रहे हैं और पौलग्गी कर समीप खड़े हो जा रहे है। हम आपके पास पहुंचे और प्रणाम किए, तो मुस्कुरा कर गले लगा लिए। हाल पूछे। फिर पुराने घर की चौहद्दी दिखाने लगे। पुराना प्रवेश द्वार और उधर का पूरा ओसारा आदि दिखाते हुए बहुत-सी जानकारियां दीं। आप ने ऐसी बहुत-सी बातें बताईं जिसके बारे में हम अब तक भिज्ञ न थे। तब तक टहलते हुए धर्मेन्द्र भैया भी आ गए। बातें होने लगीं।
बाराबंकी में आदरणीय रामाश्रय मामा जो हम सबको मायूस कर हाल ही में चन्द्रलोक को प्रस्थान कर गए, शिद्दत-से याद किए जाने लगे। कमी खल रही है। स्वाभाविक भी है। आखिर आप ही पीढ़ी की अन्तिम निशानी थे। बाराबंकी की बातें होने लगीं। हमें दुर्गेश बाबू याद आए जो बाबू जुगनू के विवाह में मिले थे और उन्हीं की गाड़ी में बैठ कर हम बारात प्रस्थान किए थे। उस वक्त कार में हमने उनसे अपना परिचय देते हुए निवेदन किया था, कि "भैया-भाभी के साथ ही आदरणीय रामाश्रय मामा को जरूर हमारा प्रणाम निवेदित करना।"
हमने अपनी अम्मा के बारे में भी उनसे बातें की थीं। वे खुश तो हुए थे, लेकिन जाने मामाश्री तक हमारा सन्देशा पहुंचा था या नहीं?
बहरहाल, बातचीत चल ही रही है, कि रवीन्द्र भैया के मुस्कान बिखेरते साले-से परिचय हुआ। हंसमुंख और अच्छे व्यक्ति हैं।
धूरुप बाबू भी जाग गए हैं। बातचीत होने लगी है हमारी। वही पुरानी बातें और हाल के संघर्ष। बहुत अच्छा माहौल बना है। रवीन्द्र भैया सिर पर पगड़ी लपेटे बहुत-से कार्यों को अन्तिम रूप देते हुए दिखाई दे रहे हैंं।
पीछे चलते हैं, वहां कुछ हलचल है..
क्रमश: -11
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कच्चे चूल्हे-से धुआं निकल रहा है। लावा-भुजाई की रस्म अदा हो रही है। गीता दीदी तैयारी कर रही हैं। जासो दीदी के साथ ही दीदी गायत्री और बहिन अशोक चूल्हे में लकड़ी जलाने और लावा भुजाई की रस्म अदायगी में लगी हैं।
"हल्दी पड़ी है खुशबूदार, हे लगवा ले बन्ने.." जैसे मंगल-गीतों के बीच वर बाबू आलोक मणि को हल्दी लगने लगी है। वे मासूम-से लजाते बैठे हैं। गांव-घर की महिलाएं सज-धजकर हास-परिहास कर रही हैं। बाबू अनुपम और अनुराग को देख रहे हैंं हम, लगातार घरेलू कामों में व्यस्त हैंं दोनों। ढेरों काम पड़े हैंं दोनों के जिम्मे। इसी में मेहमानों की आवभगत भी कर रहे हैं। क्रिकेट में जलवा बिखेर रहे बाबू आशुतोष के साथ ही प्रिय जुगनू और वीरेन्द्र भैया के अन्य दोनोंं आत्मज बाबू आकाश और बाबू अमित भी हाथ बँटाते दीख रहे हैं। हमारा मन हुआ तो सीढिय़ां चढ़ते छत पर चले गए। बड़ा सुन्दर दृश्य लगा चौतरफा। बहुत-से ऐसे लोग भी हैं जिन्हेंं हम चीन्ह नहीं सके हैं अबतक।
ये देखिए, साजो-समान के साथ बाजे वाले भी आ गए। डीजे लगी गाड़ी भी है। कनइल वाले शुकुलजी भी विराजमान हैं। बाजा बजना शुरू हो गया। गायक ने भी माइक पकड़े रफी की नकल कर गाना शुरू कर दिया है। हिन्दी के साथ ही भोजपूरी की भी तान है। बड़े अच्छे बाजनियां हैं। संगत में सामंजस्य बिठा कितना सुन्दर धुन निकाल रहे हैं सब।
हम सोचते हैं गांवों में भी कितने योग्य कलाकार हैं, जिन्हें माइलेज मिलनी चाहिए।
तभी नचनियां आ गया। उसकी नाच शुरू हो गई। गानों की धुन पर कमर मटका-मटका उसके ठुमके सभी को आकर्षित कर रहे हैं। हमारे बगल जितेन्द्र भैया बैठे हैं। आप भी देख रहे हैं। बाहर सड़क तक बच्चे-महिलाओं सहित देखने वालों का मजमा लग रहा है। कुछ लोग उस तरफ की छत-से भी देख रहे हैंं।
नाचते-नाचते नचनियां को जाने क्या सूझा, कि वह कनइल वाले शुकुलजी के पास पहुंच गयी और उन्हीं के पास नाचते-ठुमके निछावर मांगने लगी। वह गालों तक हाथ ले जाती, कभी अँचरे-से दूल्हन बनने का स्वांग करती। वे बुजुर्ग.. कलकत्ता के अनुभव.. कहां दाल गलती?
उसके बाद बारी-बारी-से वह उपस्थितों के पास पहुंचने लगी। हर जगह-से मायूसी हाथ लगी, तो अन्त में जितेन्द्र भैया के पास आई। हम भी वहीं थे। दोनों फंसे।
कितना उल्लास, कितना हर्ष, कितना आनन्द और चुहल के साथ कितनी उमंग होती है शादी समारोहों में.. वही उमंग यहां बिखरी हुई है।
हमें तो अपना विवाह याद हो आया, जिसमें नकौझा-से निमन्त्रण ले आदरणीय जनार्दन भैया पधारे थे। हमें बहुत मानते थे। बोल तो न पाते थे, किन्तु लिख बढिय़ा लेते थे। कई बार जमीन पर अपना नाम लिखकर दिखाए हैं। अम्मा-से वेे इशारों-इशारों में हाथ नचा-नचा जाने कितनी और क्या-क्या बातें करते, कि अम्मा समझ लेतीं और अपने इन भतीजे का भाव समझ उनकी आंखें चल पड़तीं! वह स्नेह हमें आज भी भिगोता है।
तो हमारे विवाहोत्सव में भिलाई-से गए यार-दोस्तोंं के साथ जनार्दन भैया भी क्या तो झूमकर डांस किए थे। उनकी याद जैसे ही आई, जाने क्या हुआ, कि फट् हमारे हाथ जेब की ओर गए और हमने 10 का नोट निकाल नचनियां को थमा दिया। वह खुश। मानो सन्तुष्ट हो, मार दुवाएं देती अपनी गोल में चली गई।
संध्या उतरने को है। बारात की तैयारियां होने लगी हैं..
क्रमशा: - 12   -
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12-
दूल्हे को ले जाने वाली कार दूल्हन की तरह सज-संवर कर द्वार पर है। हार्न मारती बहुत-सी लग्जीरियस मोटर कारें भी आई जा रही हैं। लोगबाग भी तैयार हैं। बारात जाने वाले पहुंच रहे हैं। वीरेन्द्र भैया की धज देखते ही बनती है। क्या तो जानदार टोपी लगाए हैं। कोट-पैन्ट, टाई लगाए उनके होठों की मुस्कान और खुशी किन शब्दों में बखान करें! इधर जरा धर्मेन्द्र भैया को तो देखिए, उनकी टोपी भी वीरेन्द्र भैया-से क्या कम है! इतने सजीले जवान, कि लगते हैंं कि हां, हमारी अम्मा के भतीजे हैंं। मुस्कुरा रहे हैंं और आपस में कुछ चुहल भी कर रहे हैंं।
जितेन्द्र भैया, वीरेन्द्र भैया और धर्मेन्द्र भैया आपस में कुछ बतिया रहे हैं, शायद बारात की व्यवस्था और प्रस्थान का जायजा ले रहे हों। तीनों जन मुखिया की भूमिका में मुस्तैद दिख रहे हैं। कुछ-कुछ रवीन्द्र भैया-से पूछते हैं और धूरुप सहित नौजनवानों को कुछ-कुछ निर्देश देते हैंं। प्रियवर धूरुप बाबू भी तैयार हो गए हैंं। उनके क्या कहने, अभी बांके जवान हैं। व्यवस्था का जायजा ले रहे हैं।
ये देखिए, रवीन्द्र भैया की धज! नीले रंग की कोट, हाथ में बैग और मुस्कुराते होंठ! क्या तो लग रहे हैं भैया। पता चल जा रहा है, कि दूल्हे की पिताश्री हैं।
और लगें भी क्यों न? और शुभ संस्कारों की तरह आखिर विवाह-संस्कार के लिए भी तो माता-पिता ईश्वर के दरबार में हाजिरी लगाते हैं। भैया-भाभी के लिए वह शुभ दिन आज आ गया है।
वो देखिए, भाभियों की सज-धज! कितनी सुन्दर और प्यारी लग रही हैं सभी। मंगल-गान शुरू हो गया है। वर बाबू को वस्त्रों-से सजाया जा रहा है।
कौन किस गाड़ी में जाएगा, इस पर चर्चा चल रही है। जितेन्द्र भैया निर्देश देते हैं। उनकी कार में सीएनजी खत्म होने को है। कहते हैं, कि बस्ती में भरवा लेंगे।
वीरेन्द्र भैया ने आपसे कहा कि, "धर्मेन्द्र और बबुल्ले बाबू आपके साथ हो लेंगे।"
सुनते ही हमारी खुशी का पारावार नहीं। ज्ञान के खजाने के साथ यात्रा भला किसे सुखद न लगेगा? जितेन्द्र भैया के साथ रहने का मतलब पुरातन और अधुनातन की नई-नई जानकारियोंं-से लैस होना। आप इतने मर्मज्ञ हैं कि कोई प्रकाण्ड विद्वान क्यों न हो, आपका लोहा माने बिना न रहेगा और उतने ही शिष्ट, जहीन, विचारवान, नैतिक और धर्मज्ञ! फिर वीरेन्द्र और धर्मेन्द्र भैया भी क्या कम ज्ञानी हैं? दोनों भाई मिल जाएं तो क्या कहने?
यही वजह है कि हम बल्लियों उछल रहे हैं। मारे खुशी के फूले न समा रहे हैं। लेकिन इसी में वीरेन्द्र भैया का भी समीकरण बैठ जाता तो क्या कहने।
लेकिन वे, बाबू धूरुप के साथ बारात-व्यवस्था सम्भालने में लगे हैं। हम लोगों के निकलने की तैयारियां होने लगती हैं।
उधर, "धनि-धनि दशरथ राउर भाग.." जैसे विवाह-गीतों के साथ महिलाओं की टोली वर बाबू को लिए निकल रही है। परछावन होगा। संध्या लगभग उतरने को है।
क्रमश: - 13
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बारात निकल चुकी है।
क्या तो कारों का काफिला सजा है! एक-से बढ़कर एक मोटर कारें। जितेन्द्र भैया ने अपनी कार पीछे लगाई है। हम आपके साथ पीछे की सीट पर बैठे हैंं, अगली सीट पर धर्मेन्द्र भैया मार्गदर्शन कर रहे हैं।
हम कुछ फोटो लेने की सोच मोबाइल लेने जेब में हाथ डालते हैं तो वह नहीं मिलता है। सोचते हैं तो पता चलता है कि उसे तो मिश्रौलिया की कोठरी में चार्जिंग के लिए लगाये थे। तो वहीं छूट गया वह। मायूस होते हैंं। अब फोटो नहीं खींच पाएंगे। यही वो शौक है जो बचपन के यादें लौटाता है। आज भी नाना की जो फोटो नकौझा में शोभित है, वह हमारे द्वारा ही खिंची गई है। वहां जाने पर वह फोटो देखते ही नाना का वह गुरु-गम्भीर मुखमंडल हमारे सामने नाचने लगता है।
चलिए, कोई बात नहीं। लिखकर ही काम चलाएंगे। धर्मेन्द्र भैया घर फोन करके मोबाइल की सुरक्षा के लिए ताकीद कर देते हैंं।
चलते-चलते कार में बातें होती हैं, तो फिर जितेन्द्र भैया की ज्ञान-गरिमा की झलक मिलने लगती है। पहले तो आप परिवार को ही याद करते हैं। आदरणीय रामानन्द मामा की बातें होती हैं। आप बताते हैंं, कि मामाश्री कर्म के प्रति पक्के अनुशासित रहे। कभी कंघी न करते थे। आप क्या, उस वक्त कंघी लगभग कोई न करता था। केश बढ़ा तो कटवा लिए, बस। हाँ, आदरणीय रामाश्रय मामा जरूर शौकीन निकले। आप केश में जुल्फी के लिए कंघी रखते थे। यह सुनकर अच्छा लगा। धर्मेन्द्र भैया ने भी रामाश्रय मामा के बारे मेंं बहुत अच्छी जानकारियां देकर शिद्दत-से याद किया और दुखी रहे, कि आज वे हमारे बीच नहीं हैं।
चलते-चलते जितेन्द्र भैया इतिहास की ओर मुड़े और पानीपत की पहली लड़ाई का जिक्र छेड़ दिए। लोदी और बाबर में पहले हमला किसने किया? आपका यह प्रश्र कौतूहल पैदा करता है। इससे होते वे भूगोल पर उतर आए और दुनिया-जहान की जानकारी देते अन्त में इन्दिरा गांधी के इस वक्तव्य पर पहुंचे, कि पृथ्वी पर बहुत लोग नहीं हैं। यदि सभी आपस में मिल-जुल रहें तो बहुत अच्छे-से रहेंगे।
सच तो है। आज हमने अपनी नादानियों से इस धरती को क्या-से-क्या कर दिया है।
इसके बाद तो भैया ने धर्म-संस्कृति, कला-संगीत, अध्ययन-अध्यापन किस पर बात न की? इसी में आप गणेश प्रसाद पाण्डेय जी का स्मरण न भूले जो आपको पढ़ाए और सौभाग्य देखिए, कि आपको भी उन सज्जन के साथ पढ़ाने का मौका मिला। यह विरला नसीब है। जितेन्द्र भैया ने पाण्डेयजी की न भूलने वाली अनेक कहानियां सुनाईं। हमने वह कॉलेज भी देखा जहां भैया वर्षों तक प्राध्यापक रहे।
भैया ने बताया, कि आपकी प्राथमिक-से उच्च शिक्षा में कभी स्थायित्व न मिला। बाराबंकी-से ले बस्ती तक आपकी पढ़ाई घूमती रही। बड़का, छोटका-से ले दाढ़ी मामा तक भैया विश्वनाथ-दीनानाथ भैया सहित परिवार के अनेक सदस्यों पर खूब चर्चाएं हुईं।
सहस्त्रार्जन की रोचक जानकारी दे ही रहे थे, कि पता चला कि रास्ता भटक गए। गाडिय़ों का काफिला हमसे बिछड़ गया। बुरे फंसे। जगह-जगह रुक रास्ता पूछने लगे।
ऐसे में भैया को याद आई अपनी साली की। जो कि समीप ही बेलहरा गांव में रहती हैं। फोन किए तो आपने रास्ते की ताकीद की। साथ यह भी कहा, कि लौटते वक्त वे उनके गांव आना भूलें। बहुत दिन हुए आए। भैया ने कहा देखते हैं।
बड़ा अन्दर है हर्दिया बिलौड़ी गांव, जहां हमें जाना है। रात गहरा गयी है।
ले-देकर पूछते-पाछते हम हर्दिया पहुंच ही गए। बारात भी पहुंच ही चुकी है। वहां के स्कूल में रुकने की व्यवस्था है। ठंड अपने शबाब पर है। घराती पक्ष ने बारातियों के स्वागत सत्कार की सुन्दर व्यवस्था कर रखी है। प्रकाश की व्यवस्था है और नाश्ते के लिए स्टॉल लगे हुए हैं। चाट-मीठा आदि लगा है। हमें इच्छा न थी, तो जाकर एक चारपाई पर जगह लिए। तभी बड़ा-बड़ा रस में पगा राजभोग आ गया। भैया लोगों के साथ हमने भी उठाया। बड़ा ही स्वादिष्ट लगा।
यहां देखा तो लाइन से चारपाई बिछा है। ओढऩ-बिछावन कम नहीं है। भरपूर है। बाजा बजने लगा है। अब द्वारपूजा की तैयारी है। 
बाजे-गाजे के साथ हम हर्दिया बिलौड़ी गांव में प्रवेश कर रहे हैं। जहां आदरणीय श्री इन्द्रप्रसाद शुक्ल के निवास पर विवाहोत्सव का कार्यक्रम है।
गांव के बीच होते हम शुक्लजी के घर पहुंचते हैं। रास्ता सकिस्त है। फिर भी पहुंच जाते हैंं। वहां हम सभी का पुष्पमालाओं से स्वागत होता है। वन्दनवार सजाए गए हैं। गलीचा बिछा है। द्वारपूजा की रस्म हो रही है। हम लोग कुर्सियों पर बैठे हैंं। वधू के पिताश्री शुकुलजी बड़े सीधे और सज्जन लगते हैंं। सरलता-से सारे कामकाज निबटा रहे हैंं।
बगल के मंडप में जयमाल की तैयारी है। उसी के पीछे एक और तम्बू लगा है जिसे आहार कक्ष कहा जा सकता है। तरह-तरह के पकवानों की खुशबू आ रही है। शहरी बुफै सिस्टम में भोजन की व्यवस्था है।
क्रमश: - 14
०००
-14-
हम जयमाल वाले एरिया मेंं हैं। जहां सुगन्धित फूलोंं-से मंच सजा है। विष्णु-रूप वर बाबू आलोक विराजमान हैं। कुछ देर बाद ही लक्ष्मी-रूप में श्री इन्द्रप्रसाद शुक्ल-श्रीमती सुशीला शुक्लाजी की लाडली बिटिया नीरज, वधू-वेश में धीरे-धीरे पग धारतीं मंचस्थ होती हैं।
बड़ी सुन्दर लग रही हैंं। इस अनुपम जोड़ी की शोभा देखते ही बनती है। बराती-घराती के हर्षोल्लास और उमंग के बीच बड़े प्रेम-से राम-सीता की तरह आलोक और नीरज एक दूसरे के गले में जयमाल पहिना सदा के लिए विवाह-डोर में बन्ध जाते हैंं। घराती-बराती, पुष्प-अच्छत की वर्षा कर नवयुगल को अपने आशीषों से नवाजते हैं। मंच पर जाकर विष्णु-रूप वर और लक्ष्मी-रूपा वधू को आशीर्वाद देने की बारी आती है।
वीरेन्द्र भैया हम धूलि-सम को भी तलब करते हैं। हम सकुचाते हैं, कि सहसा अम्मा याद आती हैं। हम शुकुलजी को साथ लिए मंच पर जाते हैं। आशीर्वाद देने की हमारी क्या बिसात? बस अम्मा को याद करते हैंं और उन्हीं की पोटली-से पुष्प निकाल वर-वधू के ऊपर बिखेर स्नेहाशीषों की बौछार कर देते हैं, कि वर-वधू का दाम्पत्य आनन्दमय रहे और घर-परिवार को अपनी खुशियों से हर हमेशा लबरेज रखें।
मिश्रौलिया के छांव तले हर्दिया बिलौड़ी धन्य हुआ तो मंगलगान हुआ। हमें भी भोजन के लिए निवेदन हुआ। जितेन्द्र भैया के साथ हम आहार कक्ष पहुंचे तो पता चला कि आप आहार न लेंगे। आपने कॉफी ली। हम धर्मेन्द्र भैया के साथ भोजन पाए। वीरेन्द्र भैया और ध्रुव बाबू लास्ट तक एक-एक कर सबको चेक कर रहे हैं, किसने भोजन नहीं किया।
अब हम स्कूल में विश्राम करने आ गए हैं। भीतर एक कमरे में ध्रुव बाबू ने अपनी बगल में बिस्तर लगाया है। गद्दा गुलगुल है।
आज ध्रुव बाबू के बगल मेंं सोने के बाद कितनी सुखद अनुभूति हो रही है। वह बचपन याद आता है। जब हम साथ सोते थे। बीच बरामदे में कई बार लिहाफ उलट जाया करता था। भोर-सुबह जब हमारी नींद खुलती तो द्वार पर आदरणीय रामानन्द मामा खरहरा करते दिखते। क्या दिन थे वे भी।
हम बात करते हैं, कि सहसा बजनियां मेंं से कोई मोबाइल पर भोजपूरी गीत लगा दिया है। वह कमरे में गूंज रहा है। सहसा ध्रुव बाबू उसे हड़काते हैं, कि "बन्द कर मोबाइल, सोने में खलल पड़ रहा है।"
वह बेचारा डरकर मोबाइल बन्द कर देता है।
हम आराम-से सो जाते हैंं।
क्रमश: - 15-14-
हम जयमाल वाले एरिया मेंं हैं। जहां सुगन्धित फूलोंं-से मंच सजा है। विष्णु-रूप वर बाबू आलोक विराजमान हैं। कुछ देर बाद ही लक्ष्मी-रूप में श्री इन्द्रप्रसाद शुक्ल-श्रीमती सुशीला शुक्लाजी की लाडली बिटिया नीरज, वधू-वेश में धीरे-धीरे पग धारतीं मंचस्थ होती हैं।
बड़ी सुन्दर लग रही हैंं। इस अनुपम जोड़ी की शोभा देखते ही बनती है। बराती-घराती के हर्षोल्लास और उमंग के बीच बड़े प्रेम-से राम-सीता की तरह आलोक और नीरज एक दूसरे के गले में जयमाल पहिना सदा के लिए विवाह-डोर में बन्ध जाते हैंं। घराती-बराती, पुष्प-अच्छत की वर्षा कर नवयुगल को अपने आशीषों से नवाजते हैं। मंच पर जाकर विष्णु-रूप वर और लक्ष्मी-रूपा वधू को आशीर्वाद देने की बारी आती है।
वीरेन्द्र भैया हम धूलि-सम को भी तलब करते हैं। हम सकुचाते हैं, कि सहसा अम्मा याद आती हैं। हम शुकुलजी को साथ लिए मंच पर जाते हैं। आशीर्वाद देने की हमारी क्या बिसात? बस अम्मा को याद करते हैंं और उन्हीं की पोटली-से पुष्प निकाल वर-वधू के ऊपर बिखेर स्नेहाशीषों की बौछार कर देते हैं, कि वर-वधू का दाम्पत्य आनन्दमय रहे और घर-परिवार को अपनी खुशियों से हर हमेशा लबरेज रखें।
मिश्रौलिया के छांव तले हर्दिया बिलौड़ी धन्य हुआ तो मंगलगान हुआ। हमें भी भोजन के लिए निवेदन हुआ। जितेन्द्र भैया के साथ हम आहार कक्ष पहुंचे तो पता चला कि आप आहार न लेंगे। आपने कॉफी ली। हम धर्मेन्द्र भैया के साथ भोजन पाए। वीरेन्द्र भैया और ध्रुव बाबू लास्ट तक एक-एक कर सबको चेक कर रहे हैं, किसने भोजन नहीं किया।
अब हम स्कूल में विश्राम करने आ गए हैं। भीतर एक कमरे में ध्रुव बाबू ने अपनी बगल में बिस्तर लगाया है। गद्दा गुलगुल है।
आज ध्रुव बाबू के बगल मेंं सोने के बाद कितनी सुखद अनुभूति हो रही है। वह बचपन याद आता है। जब हम साथ सोते थे। बीच बरामदे में कई बार लिहाफ उलट जाया करता था। भोर-सुबह जब हमारी नींद खुलती तो द्वार पर आदरणीय रामानन्द मामा खरहरा करते दिखते। क्या दिन थे वे भी।
हम बात करते हैं, कि सहसा बजनियां मेंं से कोई मोबाइल पर भोजपूरी गीत लगा दिया है। वह कमरे में गूंज रहा है। सहसा ध्रुव बाबू उसे हड़काते हैं, कि "बन्द कर मोबाइल, सोने में खलल पड़ रहा है।"
वह बेचारा डरकर मोबाइल बन्द कर देता है।
हम आराम-से सो जाते हैंं।
क्रमश: - 15
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-15-
मुर्गे की बांग सुन नींद खुल गई है। बगल देखे, तो ध्रुव मणि जी मधुर निद्रा में खर्राटे मार रहे हैं। उन्हें देख हम मुस्कुराए, कि बाबू खूब मेहनत किए हैंं, अब लगाओ खर्राटे। अपुन तो उठाने वाले नहीं। लेकिन मुर्गे की बांग भला सोने देगी आपको?
"कुकड़ूं क्कूं-कुकड़ूं क्कू", दूर मुर्गे की बांग भोर की नीरवता में मानों कंकड़ फेंक रही हो। पहले के जमाने में इसी बांग पर लोग उठ जाया करते थे कि सवेरा हो गया। तो हम भी घड़ी देखते हैं, छोटी सूई 5 पर है। उठ जाते हैं। तब तक अनेक लोग जाग गए हैं। दिशा-मैदान को जा रहे हैं। बाहर शीत है। चारों ओर चांदनी आवरण। फसलों पर ओस की बूंदें हैं।
हम बाहर आते हैंं और निकल जाते हैं मैदान की ओर। तब तक नीम का छरका आ जाता है। दातौन करते हैं।
पौ भी न फटा है, कि सलवार-सूट पहिने एक स्त्री लक्षित होती है। उसके साथ में छोटी बच्ची है और हाथ में छोटी-सी ढोलक।
कुछ देर में वह जोर-जोर-से गाना शुरू कर देती है।
पता चलता है कि नेटुआइन है।
वह एक-एक रिश्तेदार के समक्ष जाती है और धुन में गाने गा-गा उन्हें प्रसन्न करती है। बदले उसे पैसे मिलते हैं।  फिल्मी-से लेकर लोकगीत और हिन्दी-भोजपूरी के मिश्रण वाले हास्य-विनोद के गीत भी वह सुनाती है। पैसे के लिए वह लोगों को तंग भी करती है। दूल्हे के मामा के तो वह पीछे ही पड़ जाती है किन्तु वे भी पक्के मट्ठर ही निकलते हैंं। गाने सुनते हैंं, मुस्कुराते हैं लेकिन उसे पछाडऩे-से पीछे नहीं हटते।
नेटुआइन की ठगठैनी देख रवीन्द्र भैया उसे न्यौछावर देते हैं और किसी को परेशान न करने की हिदायत करते हैं।
किन्तु वह कहां मानने वाली? आ जाती है मास्टर साहब (डॉ. जितेन्द्र भैया के पास) गीतों का पिटारा खोलती है, "गोरी तेरी चुनरी है लाल-लाल रे.." सुनते ही भैया जेब में हाथ डालते हैं और नम्बरी निकाल थमा देते हैं उसके हाथ, मानो कह रहे हों इसके बिना पीछा छूटने वाला नहीं।
तब भी वह जाती नहीं और हम लोगों के साथ ही चलते-चलते वधू के द्वार पहुंच जाती है। वहां भी उसका नाज-नखरा जारी रहता है।
वधू के यहां भीतर-बाहर की रस्में जारी रहती हैं।
मिलना होता है। आदरणीय शुकुलजी और उनके परिजन करबद्ध हो बिदायी करते हैं।
अब हम निकल पड़े हैं, वापसी के लिए।
रास्ते में ही जितेन्द्र भैया की साली का फोन आ जाता है, तो हम मुड़ जाते हैंं बेलहर के रास्ते।
वहां वे लोग हमारा बेसब्री-से इन्तिजार कर रहे हैंं। जाते ही पानी-मिट्ठा और स्नेह के बोल। आप लोग वहां बड़ा भव्य मकान बनवा रहे हैं। उसे देखते हैंं।
हम पहली बार आए हैं, हवाला दे..बड़ी मिन्नत कर वे लोग भोजन तैयार कर देते हैं। भैया वहीं गुनगुने पानी में नहाते हैं और बड़ी शीघ्रता में तैयार किया भोजन सामूहिक रूप में होता है। घी-चुपड़ी गर्मागरम रोटियां, कटोरा-आकार गोलाई में सजा चावल, तड़का दाल, हरी तरकारी और स्वादिष्ट नींबू-आंवले का अचार, पापड़.. बड़ी स्वादिष्ट रसोई बनी है।
सौभाग्य देखिए, कि गोंडा-से गृहस्वामी श्री तिवारीजी भी आ गए हैं।
सभी-से भेंटघाँट के बाद अब हम मिश्रौलिया के लिए रवाना होते हैं..
क्रमश: - 16
०००
-16-
मोटरकार रफ्तार-से मिश्रौलिया की ओर बढ़ चली है।
अचानक हमारा दिल व्यग्र हो गया! धक्-धक् करने लगा है! लगता है कलेजा निकल पड़ेगा! क्यों?
शायद वहां पहुंचते ही दिल को अपनों-से बिछडऩे का आभास हो गया है!
सच तो है! हमने जितेन्द्र भैया और धर्मेन्द्र भैया-से कह दिया है, कि वहां पहुंचते ही हम लौट पड़ेंगे। क्योंकि कल ही भिलाई के लिए रिजर्वेशन है।
सुनकर क्षण के लिए दोनों भैया खामोश हो गए हैं। मोटरकार की रफ्तार भैया की खामोशी और हमारे दिल की धड़कन मानो साथ-साथ बढ़ती ही जा रही है।
कैसे विदा लेंगे अपने हृदय-करीबियों-से?
दिल में बैठीं मानों अम्मा ने तो मानो रोना ही शुरू कर दिया है। जैसे उनकी बिल्कुल भी तबीयत न हो इन अपनों को छोडऩे की।
जितेन्द्र भैया और धर्मेन्द्र भैया की गहरी खामोशी के बीच कुछ ही घंटों बाद अपनों-से विदा लेने की बातें सोचते हमारी आंखें भरने लगी हैं। इससे पहले कि आंसू ढुलक पड़ें,
सहसा कानों में मधु के समान मद्धिम-मद्धिम स्वर पड़े, "..कभी अलविदा ना कहना, कभी अलविदा ना कहना..
चलते-चलते मेरे ये गीत याद रखना.."
यह अनायास था या सायास, लेकिन भाइयों की खामोशी के बीच धीमें-धीमें बज रहे इस गाने ने मानो सहसा हमारी आंखों के अश्रुकण सोख लिए।
सामने देखे, कार की स्टीरियों में 90-40 एफएम पर ये गाना बज रहा है.. आंखें बन्द कर उसे ही सुन रहे हैं। मोटर कार रफ्तार में है। बस्ती में कहीं भी सीएनजी नहीं है। थोड़ा रुक आगे बढ़ते हैं। कलवारी होते, चमनगंज.. और अब मिश्रौलिया की राह..
ये लीजिए, पहुंच गए मिश्रौलिया। चार बजे-से ऊपर हो रहे हैं। हम जाने को कहते हैं, तो पता चलता है कि कलवारी-से गोरखपुर के लिए इस वक्त कोई बस नहीं है।
रवीन्द्र भैया और जितेन्द्र भैया में मशविरा होता है। रवीन्द्र भैया कहते हैं कि "आज रात रुक जाते तो कल आराम-से निकल जाते बाबू।"
हम कल ही ट्रेन पकडऩे हवाला देते हैं तो आप चुप हो जाते हैंं।
वीरेन्द्र भैया भी लौट रहे हैं। आप चाहते हैं कि हम उनकी गाड़ी में निकल चलें। किन्तु दिक्कत यह है, कि वहां उरुवाबाजार या सिकरीगंज पहुंचते रात हो जाएगी और फिर वहां से गोरखपुर के लिए बस मिलनी मुश्किल हो जाएगी।
निदान निकला, कि वीरेन्द्र भैया हमें कलवारी में बस्ती के लिए सवारी में बिठा देंगे। वहां से गोरखपुर के लिए हर वक्त बस मिलती है।
..तो तैयारी होने लगी।
क्रमश: - 17-16-
मोटरकार रफ्तार-से मिश्रौलिया की ओर बढ़ चली है।
अचानक हमारा दिल व्यग्र हो गया! धक्-धक् करने लगा है! लगता है कलेजा निकल पड़ेगा! क्यों?
शायद वहां पहुंचते ही दिल को अपनों-से बिछडऩे का आभास हो गया है!
सच तो है! हमने जितेन्द्र भैया और धर्मेन्द्र भैया-से कह दिया है, कि वहां पहुंचते ही हम लौट पड़ेंगे। क्योंकि कल ही भिलाई के लिए रिजर्वेशन है।
सुनकर क्षण के लिए दोनों भैया खामोश हो गए हैं। मोटरकार की रफ्तार भैया की खामोशी और हमारे दिल की धड़कन मानो साथ-साथ बढ़ती ही जा रही है।
कैसे विदा लेंगे अपने हृदय-करीबियों-से?
दिल में बैठीं मानों अम्मा ने तो मानो रोना ही शुरू कर दिया है। जैसे उनकी बिल्कुल भी तबीयत न हो इन अपनों को छोडऩे की।
जितेन्द्र भैया और धर्मेन्द्र भैया की गहरी खामोशी के बीच कुछ ही घंटों बाद अपनों-से विदा लेने की बातें सोचते हमारी आंखें भरने लगी हैं। इससे पहले कि आंसू ढुलक पड़ें,
सहसा कानों में मधु के समान मद्धिम-मद्धिम स्वर पड़े, "..कभी अलविदा ना कहना, कभी अलविदा ना कहना..
चलते-चलते मेरे ये गीत याद रखना.."
यह अनायास था या सायास, लेकिन भाइयों की खामोशी के बीच धीमें-धीमें बज रहे इस गाने ने मानो सहसा हमारी आंखों के अश्रुकण सोख लिए।
सामने देखे, कार की स्टीरियों में 90-40 एफएम पर ये गाना बज रहा है.. आंखें बन्द कर उसे ही सुन रहे हैं। मोटर कार रफ्तार में है। बस्ती में कहीं भी सीएनजी नहीं है। थोड़ा रुक आगे बढ़ते हैं। कलवारी होते, चमनगंज.. और अब मिश्रौलिया की राह..
ये लीजिए, पहुंच गए मिश्रौलिया। चार बजे-से ऊपर हो रहे हैं। हम जाने को कहते हैं, तो पता चलता है कि कलवारी-से गोरखपुर के लिए इस वक्त कोई बस नहीं है।
रवीन्द्र भैया और जितेन्द्र भैया में मशविरा होता है। रवीन्द्र भैया कहते हैं कि "आज रात रुक जाते तो कल आराम-से निकल जाते बाबू।"
हम कल ही ट्रेन पकडऩे हवाला देते हैं तो आप चुप हो जाते हैंं।
वीरेन्द्र भैया भी लौट रहे हैं। आप चाहते हैं कि हम उनकी गाड़ी में निकल चलें। किन्तु दिक्कत यह है, कि वहां उरुवाबाजार या सिकरीगंज पहुंचते रात हो जाएगी और फिर वहां से गोरखपुर के लिए बस मिलनी मुश्किल हो जाएगी।
निदान निकला, कि वीरेन्द्र भैया हमें कलवारी में बस्ती के लिए सवारी में बिठा देंगे। वहां से गोरखपुर के लिए हर वक्त बस मिलती है।
..तो तैयारी होने लगी।
क्रमश: - 17
०००
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भरे हृदय-से हम पीछे की ओर गए। वहां बड़ी भाभी (श्रीमती जितेन्द्र भैया) से मिलते हैं। आप के आंसू ढुलकने लगे। कहने लगीं, "बाबू यहां 10 वर्षों-से ज्यादा रही हूं।
 और भी बहुत-सी यादें निकालीं। हमने उनसे फिर कभी और बातें करने का वादा किया।
तभी भाभी (श्रीमती वीरेन्द्र भैया) आ गईं- "एतना जल्दी काहें बाबू?"
"कल की ट्रेन है भाभी।"
"नकौझा अइहैं बाबू।"
"जरूर भाभी, जरूर।"
आपकी बातों में ऐसा प्यार घुला है कि हम आपकी ओर देख तक न सके। कैसे देखें? आँखें तो भर आयी हैं।
हम दूसरी ओर-से आ रहीं भाभी (श्रीमती धर्मेन्द्र भैया) को देखने लगते हैं। वे आती हैंं और बड़े नेह-से जाने का कारण पूछने लगती हैं। हम आप भाभी का अपने प्रति स्नेह भी देखते रह जाते हैं। चेहरे पर मुस्कुराहट है लेकिन उस मुस्कुराहट में बिछुडऩ का दर्द रोके न रुक रहा है।
इसी में भाभी (श्रीमती रवीन्द्र भैया) आती हैं। इतने दिनों-से थकी हुई हैं, लेकिन इस वक्त भी ताजादम लग रही हैं। हमसे मिलती हैं और बारम्बार आशीर्वाद देने के लिए कहती हैं।
हम कहते हैं- "भाभी उल्टा कह आप हमेंं क्यूं शर्मिन्दा करती हैं। हम छोटे हैंं इसलीए आपका आशीर्वाद हमारे लिए जरूरी है।"
"नहीं बाबू, कितना भी है, तो आप लोगों का आशीर्वाद ही हमारे लिए सबसे बड़ा है। फिर वे अम्मा का याद करने लगती हैं। कि "फूआ बड़ी अच्छी थीं। उनकी कमी सबको खलती है।"
अम्मा के लिए इन सुमधुर शब्दोंं को सुन हम भाभी के प्रति और आसक्त हो जाते हैं। कहते हैं- "अम्मा जहां भी हैं वहीं-से आप सभी परिजनों को अपने आशीर्वाद-से अभिसिंचित करती हैं।"
इन सबके बीच, भाभी लोग हमारे ऊपर की थैली में अपना प्रेम उड़ेलने लगती हैं। हम खामोश मूर्ति की भांति खड़े सर्वशक्तिमान-से प्रार्थना करते हैं- "हे ईश्वर! हमारे इन परिजनों पर अपनी अमृत-वर्षा करते रहना। इन्हें हर प्रकार खुशियां देना और अपने छांव तले सुरक्षित रखना।"
खड़े-खड़े भाभी लोगोंं की मुहब्बत, बाहर खड़े भैया लोगों का प्यार देखते और महसूस करते अम्मा को याद करते हैंं और ऊपर की ओर देख उनसे बातें करते हैंं-
"क्या अम्मा! कितनी महान हो तुम! तुमने हमारे नाना परम श्रद्धेय पटेश्वरी तिवारी जी के नाम को धन्य कर दिया है। आज तुम चाहे हमें छोड़ गईं, लेकिन अकेलापन कभी महसूस न होने दिया। देखो तो, अपने इन भतीजे और उनकी गुणों-से भरी बहुओं को। ये लोग इतना अपनत्त्व देते हैं कि लगता ही नहीं कि तुम नहीं हो। तुम्हारी कमीं पूरी करने की कोशिश करते हैं। मानो सन्देश देते हैं, कि "बबुल्ले, चिन्ता न करना। फूआ चली गईं तो क्या? हम तो न मर गए?"
आंखें डबडबा गई हैंं। हम निकल कर बरामदे में आ गए हैं।
वीरेन्द्र भैया और शुकुलजी चलने को रेडी हैं।
हमारे पैरों में तो मानो किसी ने पत्थर बांध रखे हों। दिल में बैठी अम्मा हैं कि फिर-फिर देखती हैं, भीतर। गीता दीदी आईं  हैं, आराम-से जाने को हिदायत करती हैं। जासो दीदी, गायत्री दीदी, बहिन अशोक सहित बाल-बच्चे सभी निकल आए हैं। प्रणामाशीर्वाद होता है.
रवीन्द्र भैया, जितेन्द्र भैया, धर्मेन्द्र भैया सहित घर के अन्य परिजन साथ हैं। मोटर गाड़ी स्टार्ट हो गयी है।
आगे का दरवाजा खुल गया है। हम बैठने को होते हैंं कि दिल-से हूक उठती है और हम लपक कर भैया लोगों के चरणों को छूते हैं। सभी लोग हमें सीने-से लगा लेते हैं।
गाड़ी में बैठ गए हैंं। फर्स्ट गेयर लग गया है। धीरे-धीरे सड़क पर बढऩे लगी है वीरेन्द्र भैया की मोटरगाड़ी। मन का पंछी इधर-उधर उड़ रहा है। उसे समझाते हैं, "लौटना ही नियति है।" 
अच्छा, तो अब चलते हैं,
अलविदा, मिश्रौलिया!
अस्तु..
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