Saturday, 19 December 2015

अम्मां के पास कुछ छुट्टे पैसे थे, उसे ही  लेकर मैं निकल पड़ा था भोर सुबह वाली बस से फूआ से मिलने। १५ से ज्यादे का नहीं था, इसलिए अम्मां ने न जाने देने के लिए पहले तो पैसों की दुहाई दी, फिर उम्र का हवाला। लेकिन वर्षों बीत गए थे फुआ को देखे। बाऊजी के साथ छुटपन में गया था, वही यादें रह-रहकर तड़पाती थीं। बाऊजी के पास किसानी के कामों से समय न था, तो अपुन ने जिद ठान ली. इसके आगे अम्मां को झुकना पड़ा। निकला तो बैशाख का गर्म महीना कुछ ही देर में तपने लगा। बस से उतरा तो दोपहर होने को थी और चिलचिलाती धूप मानो आग लगा देगी। इसी में कोस भर पैदल चलना था। उधर एक नदी बहती थी इसलिए रस्ते भर बालू-ही-बालू। पनही के नाम पर अपने पांव में एक जर्जर हवाई चप्पल ! चलता तो रेती में धँसकर उसका फीता निकल जाता। अफनाकर अपुन उसे हाथ में लिए और नंगे पांव बढ़े। सूरज की झुलसाने वाले ताप ने रेत को इस कदर गर्म कर दिया था कि कोई चाहे तो भूजा भूज ले। ऊपर से गर्मी की बरसात और नीचे रेत की तपिश की चुभन में किसी तरह फुआ के गांव पहुंचे। फूफा जो डिविजनल एकाउन्टेन्ट थे घर पर ही थे। देखते ही हर्षविभोर हो दौड़े और उस कमरे में ले गए जहाँ फूआ थीं। वे हमें जो देखीं तो उनकी आँखें भर आईं। रोते हुए आँचल में दुबका लीं, ' रे पगले, इस भरी दुपहरी में अकेले ?'
अपुन चुप उनकी मातृत्व तुल्य गोद का सुख लेते हुए मन्द-मन्द मुस्कुरा रहे थे। फिर तो अम्मां को उलाहना देते हुए हमें नहलायीं-धुलाईं और केश-कंघी कर चट-से पूड़ी-सब्जी बना अपने हाथों हमें खिलाने लगीं। हम उनके हिय में अपने प्रति असीम प्यार को न केवल एकटक देख रहे थे, बल्कि भीतर के करुण नेत्रों से अहसास भी कर रहे थे।
कल रात पता चला, 'फुआ नहीं रहीं !'
सोना फूआ.. बाबा की निशानी।कैसा तो मन हुआ है. सामने थाली रखी है लेकिन मन फुआ के वे हाथ खोज रहे हैं, जिनसे बचपन में वे प्यार से हमें खिलाया करती थीं। लो, हम खाना छोड़ते हैं। फूआ आपको अश्रुपूरित विदाई इस उम्मीद में कि आप जल्द लौटेंगी। 

Sunday, 13 December 2015

जंगला खुला था। आधी रात बीतने को थी। अपुन लिख रहे थे, कि निखिल के बिस्तर पर पट की आवाज़ हुई। वह उठ बैठा और लाइट जलाया। दिखा कि एक काला बिल्ला कूदकर भीतर कमरे में भाग रहा है। उसे बाहर कर बिजली बंद कर वह सो गया। अपुन भी एक सीनियर पत्रकार से बातों में मशगूल हो गए। कुछ देर बाद ही बाहर फुलवारी से जंगले के रस्ते होकर चिड़ियों के चीखने की ध्वनि सुनाई पड़ी। यह समय तो चिड़ियों के लिए भी अपने खतोने में सोने का है। रात्रि की नीरवता में उनकी चांव में दर्द था, जैसे खतरे में पुकार लगा रही हों। अपुन दौड़े फुलवारी पहुंचे। अँधेरा पसरा था, लेकिन उस अँधेरे में दो आँखें चमक रही थीं। जैसे कोई शेर झुरमुट में छिपा हो ! पल भर के लिए तो सहम गए हम। समझ गए वह बिड़ाल ही है। लेकिन कैसे भगाएं कैसे ? कहीं झपट पड़ा तो ? इन बिल्लों का भी कोई ठिकाना नहीं। मुम्बई में रहने वाली नीतीश की बड़ी मौसी की आँख पर बिल्ली के खंरोच के निशान आज भी हैं जिसने बचपन में उन्हें घाव दिया था। तो डरते-डरते आगे बढ़े, लेकिन वह बिना टस-से-मस हुए उसी भयंकर तरीके से एकटक घूर रहा है। अपने शरीर में भय की झुरझुरी छूट गई. फिर भी जोर की हांक लगाए। आवाज़ सुनकर निखिल लपका आया। अब जैसे बिल्ले श्रीमान को अपने लिए खतरा महसूस हुआ। उनकी पूँछ दुबकी और और वे महाशय सीढ़ियों से होते ऊपर भागे। पेड़ों-पौधों पर शान्ति थी, नीरवता ने साम्राज्य फैलाया। लो, मोबाईल ने नए नोटिफिकेशन का संकेत किया। अब उसी में फोड़ें आँख कुछ देर और..

Wednesday, 2 December 2015

चेन्नई के जल-प्रलय ने हिलाकर रख दिया है। वहां वेलूर के अरीयूर गांव से हमारे मित्र अन्बलगन राजगोपाल ने सन्देश दिया है कि वे बारिश में फंसे हैं। वे सुरक्षित हों और पानी की बाढ़ अब तो चराचर को डुबोना बन्द करे, उस सर्वशक्तिमान से प्रार्थना है।
यह डेल्यूज ऐसे समय हुआ है जब दुनिया भर के ४० हज़ार के करीब लोग पेरिस में जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर एकजाई हुए हैं। न केवल भारत बल्कि पूरा विश्व प्राकृतिक तबाही का शिकार हो रहा है। इसके साथ ही जलवायु परिवर्तन और खतरनाक रूप से मोड़ लेने लगा है। हमने ध्यान न दिया और यही गति रही तो अनुमान के मुताबिक २१०० तक ४. ५ डिग्री सेल्शियस तक तापमान की वृद्धि तय है, जो बड़े विस्फोट की ओर इशारा करती है। यदि वर्तमान नीति पर चले तो यह ३. ६ डिग्री सेल्शियस तक स्थिर हो सकता है, यह भी बहुत है। इसीलिए पेरिस समझौते को स्वीकार करने की बात चल रही है जिसके मुताबिक चलने पर तापमान वृद्धि २. ७ डिग्री सेल्शियस तक ही बढ़ सकेगा। २ डिग्री सेल्शियस की दर से ज्यादा बढ़ते जलवायु का कितना बड़ा दुष्परिणाम हमारे वैज्ञानिकों ने १९८० में खोजा कि ओजोन परत में छेद दिखाई दिया। इस प्रकार के छेद बढ़ते रहे तब तो कायनात ही नष्ट हो जाएगी।
चिंता यह है कि 'कॉप-21' सम्मेलन में विकासशील और गरीब देशों पर ही दबाव पड़ेगा कि वे अपने यहाँ कार्बन-उत्सर्जन में कटौती करें। इससे बात बनेगी नहीं। क्यों अपना विकास प्रभावित करेंगे गरीब देश ? लिहाजा उम्मीद है कि १९५ देशों के समृद्ध और कम आबादी के साथ ही अच्छी आय वाले देश समझौता करें और जीवन देने वाली इस सुन्दर-सी पृथ्वी को हरा-भरा बनाकर बेहतर जीवन दें।  

Tuesday, 24 November 2015

एक मुट्ठी में किस्मत तो एक में कर्म है। इनमें एक को खोलने से चाहे रेत-कण गिरें, लेकिन दूसरे से स्वर्ण-कण गिरना तय है।

Monday, 23 November 2015

पैदा होने से लेकर अब तक अनेकों बार इस चितकबरी के कारनामें सुना चुके हैं। सोचे इसकी छवि भी दिखा ही दें। बेचारी ! शिकार सिखाने की तो छोड़िए, जब इसकी माँ को इससे लिपटकर रहने और सुरक्षा देकर पालने की जवाबदारी थी, तो जाने किस मज़बूरी के चलते वह दगा देकर चलती बनी। अब यह पोटी अकेली फंसी, तिसपर एक डरावना काला बिल्ला इसपर घात लगाए पीछे पड़ा कि मौका मिले और दबोचूँ।
इसकी दीन दशा पर कौन होगा जो न पसीजे ? हमारी दयाशील भौजाई ने पोसना शुरू किया। कटोरी से दूध पिलाने और कुछ खाने-पीने को देते रहने से वह चपल होने लगी। निखिल और नीतीश को देखा कि वे चाकू का बेट उसके पंजों के सामने कर रहे हैं और वह उस पर ऐसे झपट्टा मार रही है मानो वह बेट न होकर कोई चूहा हो जिसे अभी ले भागेगी। बड़ा मज़ा आया देखकर। अब बच्चे उसे ऐसे ही उछाल मारना सिखाने लगे। फिर तो धीरे-से उसने शिकार मारना भी शुरू कर दी। कुछ दिनों पहले तो जिस तरीके से वह मोटा-सा मूस मुँह में दाबे सीढ़ियों पर भागती दिखी, उसने तो उसके जौहर की नजीर ही पेश कर दी।
हमें उससे कोई बड़ा प्रेम न था, किन्तु उसकी क्या कहें! जैसे ही देखती, चली आती पीछे-पीछे ! म्याऊं-म्याऊं करती लिपट जाती पैरों से। कितना भी झटको टस-से-मस न होती। उसका प्रेम निराला था, निःस्वार्थ। धीरे-धीरे वह हमें अपना बनाने लगी थी, कि पता चला कोई ले गया उसे। पक्का है, उसे अब भी हमारी याद आती ही होगी। हमें तो नहीं भूलती वह।        
   

Friday, 20 November 2015

खीसे में मात्र २० रूपये थे और इच्छा थी गोलगप्पे-चाट खाने की। अब इस महंगी में इतने से होता क्या है ? एक प्लेट छोला-चाट ही ३० चट कर जाता है, वह भी ठेले पर। फिर गोलगप्पा भी १० का केवल ४ ! इधर जीभ होठों से बाहर जा रही थी मानो बाल-हठ में हो कि चाहे जैसे हो गोलगप्पे खाना ही है। सोचे चलो हाफ़ प्लेट चाट और २ गोलगप्पे से ही जिह्वा को तर करें। निकलने को हुए, कि नीतीश का स्वर, एक पेन्सिल लेते आइएगा।'
अब २ पेन्सिल में गए.. सोचता निकला, चलो छोड़ो चाट, गोलगप्पे से ही काम चलाएंगे।
सोचा पेन्सिल पहले ले लेता हूँ, तब खट्टे पानी के साथ गोलगप्पे का चटखारा लूँगा .. लेकिन यहाँ तो जिह्वा हाथ भर का निकल रही है मानो डर रही हो कि धोखा न हो जाए। लेकिन उसे होठों के भीतर ही दबाए रखा कि थोड़ा तो सबर करो।
बाज़ार निकले और किताब दूकान पहुंच गए। वहां एक-से-एक स्टेशनरी आइटम ! हमने पेन्सिल माँगा तो उसने अनेक वेराइटी निकाल दी। ५ से १० की बात थी. १० वाली ज्यादा सुन्दर थी और गाढ़ी भी, साथ में रबर मुफ़्त था । क्यों न इसी को ले लें, रबर भी तो मिल जाएगा।
अब जिह्वा विद्रोह पर उतरी, 'फिर बचे १० में कितने गोलगप्पे खा लोगे ? एक गाल भी तो न होगा।'
सोचता देख दूकान वाले ने कहा, 'ये देखिए, २०० पेज़ की कॉपी.. मात्र २० की है, साथ में पेन्सिल मुफ़्त रबर और कटर के साथ।'
४ आइटम मात्र २० में ! घाटे का सौदा नहीं है।
खट्टे पानी के स्वाद लेने की लार मुख में घूम रही थी, तिस पर विद्रोह पर उतारू जिह्वा को दबाया और मन कड़ा कर २० का नोट दूकानदार को थमा दी. मुख में स्वाद सहसा बुझ गया, लार सूख गयी और जिह्वा चुप मारकर बैठ गई मानो हो ही न।
चारों सामान लेकर घर पहुंचे। देखते ही नीतीश ने कहा, 'कॉपी, रबर और कटर की क्या ज़रूरत थी ? यह तो बहुत है मेरे पास। आप भी क्या-क्या उठा लाते हैं ?
हम कैसे बताएं उसे इस लुभावने बाज़ार के बारे में, कि उसने अपने जाल में कई दिनों से लालायित हमारे जिह्वा के स्वाद को आज फिर खट्टा कर दिया।  
 और चारों सामान ले कर घर पहुंचे।

          

Wednesday, 4 November 2015

अबकी जंगल को छूने में दूसरी अनुभूति हुई। अब वह धूसरपन नहीं रहा उनमें। हरित पर्णों और लता-गुल्मों से वे इस कदर लिपटे झूम-नाच रहे हैं मानो महीनों बाद दूसरों से मिलने के चक्कर में अपना गम भी भूल गए। तभी तो यह जानते हुए भी, कि चार महीने बीतते-बीतते उनकी रंगत उड़ाने वाली वह जुल्मी गर्मी आ धमकेगी वे अपनी सुन्दरता और सजीलेपन पर लहालोट हो रहे हैं। होना भी चाहिए, आखिर यही तो जीवन का फ़लसफ़ा है, जिसकी सीख इनसे भी मिली है। दुःख के बाद सुख.. और यही चक्र निर्बाध है। विषाद में ही हर्ष के अंकुर छिपे हैं।
नरेन्द्र भाई के साथ के अपुन दुर्ग से लेकर बालोद और कांकेर के वन-प्रान्तर में घूमते रहे। अनेक हाट-बाज़ारों ने आकर्षित किया तो धान से गमकते खेतों ने भी ध्यान खींचा। सूखे की प्राकृतिक आपदा के बाद भी किसानों ने खलिहान सजा दिए यह बड़ी बात है। डिजिटल इण्डिया की तस्वीर भी साफ़ हुई। भीतर तक स्मार्ट फोन चला गया है, लेकिन यह सुनकर कलेजा बैठ गया कि मोबाईल तो है लेकिन बैलेंस नहीं ! अब वे क्या बात करें? गेम का लुत्फ़ उठा रहे हैं।  

Monday, 19 October 2015

बच्चों के बीच उद्यान में था। वे चिड़ियों के पीछे भाग रहे थे। एक मुन्नी अपने भाई से रो रही थी, कि तित्ती पकल के दो। वह बेचारा तितली क्या पकड़ता, बहन को चुप कराने में लगा। न मानी तो उद्विग्न होकर बोला, 'तो जाओ मैं जा रहा हूँ फिर न मिलूंगा।' और वह वहीं सीमेंट-कुर्सी के नीचे छिप गया।
मुन्नी की सांसें टंग गईं। रोना भूल गयी और चारों तरफ देखती मासूमियत से बोली, 'भिया तहां हो ? तित्ती नईं लेना, आप आ जाओ न !'
फर्लांग दूरी पर कुछ नौजवान क्रिकेट खेल रहे थे और उसी से आगे तरुणों की एक टोली थी, जिनमें कुछ वाद-विवाद हो रहा था। अपुन रुक गए। देश की भावी पीढ़ी थी भई, भला कैसे न देखते ? ओ ! तो ये महिला सशक्तिकरण पर डिबेट कर रहे हैं। तभी दो तरुणियां आईं, उनके हाथ में बिस्कुट-पैकेट हैं। सभी मिलकर खाने लगे और उनके कहकहों से माहौल गुलज़ार हो गया। इसी बीच क्रिकेट खेलते नौजवानों की बॉल इस टोली के बीच आकर गिरी। एक नौजवान दौड़ता आया, इससे पहले ही तरुण बॉल पास कर चुका था। तभी जोड़ा बिस्कुट लेकर तरुणी आये हुए नौजवान के पास दौड़ी, 'भैया, इसे तो खाते जाइए।'
क्षण भर में फिर कहकहे लगने लगे और माहौल गुलज़ार हो गया। उधर तितलियां उड़ रही हैं और वह छुटकी मुन्नी और उसका भाई उन्हें पकड़ने उनके पीछे जान लगा रहे हैं।
क्या तो सुन्दर पीढ़ी है न हमारी ? 

Monday, 12 October 2015

हमारा मग तो कंटकों का है, जिस पर चलकर पग लहूलुहान ही होंगे। लेकिन रगों में दौड़ रहे इस खून में वो रवानी भी है जो सत्य, ईमान, कर्म के प्रति अदम्य जिजीविषा, देश-समाज पर तर्क़ हो जाने का जज्बा और सबसे बड़ी बात दूसरों के लिए अपने को निछावर कर देने वाले पुष्प-सुमनों से इस मार्ग को इस कदर खिला देंगे जिस पर चलकर आपके पाँव मयूर हो उठेंगे।

Saturday, 3 October 2015

घरौंदे से निकला और शरीफा-अमरुद की ओर देखता बढ़ा, कि जैसे महीन आवाज़ में किसी ने पुकार लगाई, 'कभी इस ओर भी नज़रें इनायत हों हुज़ूर।'
पीछे मुड़ा। अरे, घृतकुमारी ! तो इसके बोल हैं ये। खामोश खड़ी है, लेकिन इसका हरापन तो देखो। तरी न मिलने से और पौधे पियरा रहे हैं। लेकिन ये है, कि बेचारी पानी मिले-न-मिले, अपनी प्राकृतिक सुषमा नहीं भूलती। लहलहाती रहती है।
उसका मर्म समझ पहुंचे पास। बेचारी झूम उठी। उसके तने तन गए। इसी में मन्द बयार बही और वह इसका लाभ हमको छूने में लेने को आतुर हुई। जैसे कह रही हो, आइए. अमरुद-शरीफा से कम न समझिए हमें।
बैठ गए पास उसके। तने पर हाथ फिराने की कोशिश की, तो उस पर के काँटों की पंक्तियों ने सावधान कर दिया। हमने उलाहना दिया, 'तेरे तन पर कांटे-ही-कांटे, फिर क्यों तुझे लेकर चाटें ?'
वह खिलखिलाई, 'क्या कह रहे हैं !'
'और नहीं तो क्या ? छूते ही प्रेम की जगह कांटे मिलें तो क्या कहूँ?'
'तब आपने पहिचाना ही नहीं हुज़ूर। हमें एलोवेरा के नाम से भी लोग पहिचानते हैं। हमारे ऊपर चाहे कांटें हों, लेकिन भीतर उतनी ही स्निग्धता-तरलता और मिठास है।'
'अच्छा!'
'जी हाँ, चमड़ी के रोग में हमारा बहुत उपयोग है। फिर पेट-रोगों में भी रामबाण औषधि से कम नहीं। चेहरा चमकाने के लिए भी लोग हमारे जेल का उपयोग करते हैं। इसका जूस बनाकर पीते हैं। अनेकों तरह से प्रयोग होता है हमारा।'
'ओ! अच्छा!'
'जी हाँ,  अभी कल ही भोर में बीवी जी ने हमारे एक तने से गुद्दा निकालकर खाया था। बाबू लोग भी गाहे-बगाहे हमारे तने को छीलकर चहरे पर मलते ही हैं। आपने भी तो प्रयोग किया है हमारा, फिर क्यों ऐसी रुखाई सरकार?'
'रे पगली, तू क्या सोचती है? तेरा दर्द हम नहीं समझते ?'
'बताइए ज़रा हमारे आसपास के उन सारे पौधों को खूब तरी मिलती है, लेकिन हमें ?' उसकी बात में दम तो है। हम चुप रहे। उसने आगे बोला, 'सूरज से रोज लड़ती हूँ, लेकिन मुर्झाती नहीं। अविचल रहती हूँ।'
'नहीं-नहीं, घृतकुमारी। तुम न इतना सोचो। सच है, तुम बहूपयोगी हो। इसीलिए तो तुम्हें लोग गमले तक में सजाने लगे हैं। '
वह चुप हो गई, जैसे रूठ गयी हो। धीमे-से हथेली का स्पर्श कर उसे सहलाया और होंठों को तने तक ले गया कि चाहे होंठ फट ही क्यों न जाएँ। आज इसकी शिकायत दूर ही कर दूँ। किन्तु ये क्या! इसमें से तो कुछ तरलता टपक रही है जो लार के सामान मुँह में घुल गया। आहा ! क्या तो स्वाद है !
उसने चहकते हुए कहा, 'अच्छा लगा?'  हमारी खुशी को देख मानों उसके रूप में हमारी ही बच्ची चहकी हो।
'सच, घृतकुमारी तुम अनमोल हो। तुम सुन्दर ही नहीं सुन्दरता का सन्देश देने वाली वह सेविनी भी हो जो खुद मिटकर दूसरों को जीवन देता है।'
वह लहक उठी खुशी से।
'और सूरज से तुम्हारी हर दिन की लड़ाई और तुम्हारी जीत यह भी सन्देश देती है कि कितने भी दुर्दिन हों, हमें घबराना नहीं चाहिए। विपत्तियों से लड़कर धीरज के साथ रहकर ही हमें सुख और शान्ति मिलती है। घृतकुमारी तुमसे प्रेम करते हैं हम, वही प्रेम जो एक पिता अपनी बच्ची से करता है। तुम खुश रहो। अब हम तुम्हें रोज निहारकर ही निकला करेंगे। ठीक ? तो निकलें ?
लो नीतीश इंतज़ार कर रहा है। अब आने के बाद लड़ना तुम उससे।          

Wednesday, 30 September 2015

कुछ भी कहें, सांस्कृतिक संकट के इस दौर में जहाँ दिल्ली के बेहतरीन राष्ट्रीय संग्रहालय के सूने पड़े रहने का रोना है, वहीं अपुन के भिलाई की सांस्कृतिक गतिविधियों के केन्द्रों में बहुत नहीं, तो कुछ चहल-पहल तो रहती ही है। चाहे सेक्टर-१ के नेहरू सांस्कृतिक सदन की बात करें अथवा सिविक सेण्टर स्थित नेहरू आर्ट गैलरी, या फिर कला मंदिर की ; इन स्थलों पर कुछ-न-कुछ होता तो दिखता ही है। हाँ, यह ज़रूर है कि पहले से अवमूल्यन तो हुआ ही है. वर्ना देखिए सुब्रत दादा को, हबीब तनवीर को, प्रेम साइमन को..किस-किस का नाम लें। अनुराग बासु ने तो 'बर्फी' को ऑस्कर के दरवज्जे ले जा कर भिलाई को रोशन ही कर दिया तो 'सखी सइयां तो खूब ई कमात हैं महंगाई डायन खाय जात है' में अपने नत्था ने भिलाई को नई ऊंचाइयां दीं। लेकिन कोई करे क्या ? संस्कार सिमट रहे हैं फिर भला कोई संस्कृति के बारे में सोचे भी कैसे। लेकिन फ़ख्र है कि अपनी सांस्कृतिक शून्यता में नहीं है। सेक्टर-१ नेहरू सांस्कृतिक सदन में आज भी रंगकर्मियों की गहमागहमी देखी जा सकती है। नाट्य संस्थाएं रिहर्सल में दिखती हैं। कल ही उभरते युवा अभिनेता अभिलाष ने शहीद भगत सिंह पर नाट्य मंचन की सूचना दी थी। अभी कुछ महीने पहिले ही रामहृदय तिवारी और अतृप्त आनन्द की नाट्य प्रस्तुतियों ने हमें अभिभूत कर दिया था। हमारे सहपाठी और रंगकर्म में अच्छा कर रहे कौशल उपाध्याय ने कई प्रतिभाओं को तराशा है। धर्मेन्द्र, हैदर, अर्चना आदि से भी उम्मीदें हैं। मणिमय मुखर्जी से लेकर राजेश श्रीवास्तव तक अनेक लोग भिलाई की सांस्कृतिक विरासत को सँवारने में अपनी ऊर्जा लगा रहे हैं। नेहरू आर्ट गैलरी में विश्व प्रसिद्ध कलाकारों और चित्रकारों की प्रदर्शनियाँ आकर्षण की केन्द्र रहती ही हैं। सिविक सेण्टर कला मन्दिर में लेटेस्ट भारत डाक विभाग ने डाक टिकटों की एक प्रदर्शनी लगाई जहाँ समाजसेवी भिलाई की स्थापना के शिल्पकारों में एक दिवंगत बलवन्त राय जैन पर एक लिफाफा निकाला। भिलाई इस्पात संयंत्र का इस क्षेत्र में योगदान सराहनीय है।
यहाँ सांस्कृतिक गतिविधियाँ बढ़ें और आगे जाएँ। पहिले से उन्नत और ऊंची सोच लेकर नई पीढ़ी आ रही है। उनका स्वागत है। 

Sunday, 27 September 2015

                                           भोर 

भोर में नेत्र खुले ही, कि खिड़की की आँखों से जवा-कुसुम के कई सुर्ख जोड़े इस कदर गुम्फित दिखे मानो पुष्प-गुच्छ मुस्कुराकर मॉर्निंग-वेलकम कर रहा हो। तिस पर कलियांने को आतुर रक्ताभापूरित कुसुम अलग ही मुस्किया रही है, जैसे हमारा आलस्य सोख लेना चाह रही हो। पुष्प-पौधों से कितने कुसुम-पर्ण झर गए हैं। नीचे चौतरफ़ा बिखरे मानों सन्देश दे रहे हैं, कि यही नियति है हमारी। लेकिन तुम इन्सान भी घमण्ड न करो. मिट्टी के माधो ही हो तुम भी. देखना, एक दिन मिट्टी में ही मिल जाओगे।
वहीं अमरुद में लगे हरे-हरे बतिया 'हर दिन होय न एक सामना' की तरह आने वाले सुखद कल का सन्देश देते झूल रहे हैं, कि पकने तो दो तब देखना हमारा स्वाद। सरीफ़ा भी हरियाया है. फल दिया तो है, किन्तु दो-चार ही। बेचारा एकदम शरीफ़ की भांति शराफ़त का मौन-गीत गाता पवन-झोंके में है।

वह कपोत-कपोती का जोड़ा देखो. कैसे दाना चुगते-चुगते एक दूसरे को कनखियाँ मार रहे हैं। इतरलिंगी रूप का अपना ही आकर्षण है न ? समय पाकर दोनों एक दूसरे पर चंचु-प्रहार भी कर दे रहे हैं जैसे और किसी को प्रणय-क्रीड़ा पता ही न हो। हमारे यहाँ इसके लिए बिहारी से लेकर अनेक कवि हुए हैं, समझे कबूतर दम्पती ?

अब देख लो ! छटाक भर की वह चितकबरी, बड़ा-सा मूस दाबे सीढ़ियों पर भाग रही है, जैसे कोई देख ही न रहा हो। उस बेचारी को क्या पता खिड़कियों का अविष्कार किन-किन फायदों के लिए किया गया है।

कूंचा लगने लगा है। उसकी खरर-खरर की आवाज़ मानो कह रहा हो, बिस्तर तो छोड़ो भई। पानी आ गया है। खूब सारी प्रजातियों के पंछी लग गए हैं काम में। तितलियाँ भी बदमस्त हैं फूलों पर. फिर अपुन क्या देख रहे हैं ! इतने बंदनवार, इतने स्वागत-गान से तन-मन तो जग ही गया। रोम-रोम में आनन्द समा गया। लो अगरबत्ती की महक आने लगी। मतलब अपुन का रास्ता क्लियर। अच्छा चलें।

Saturday, 19 September 2015

पानी 

कहाँ गई वह हिलोर
किल्लोलें भी नहीं
सागर तो हरहरा रहा है
इन्तज़ार कर रहा
तड़प रहा है
तुम्हें आकाश तक ले जाने
लेकिन तुम्हारा पानी
कौन सोख रहा है
मत भूलो सागर को प्यार है
तुमसे
तुम ही हो रूठी
या कि मज़बूर
लौटेगा ज़रूर पानी
कलकल बहती जा मिलोगी
सागर से

Thursday, 17 September 2015

इक़बाल और अरगास दोनों समक्ष हैं। इक़बाल प्राइमरी का सहपाठी। गणेशोत्सव शुरू होते ही लग जाता लोकोपकार में। पंडालों में खिचड़ियां बांटता और साईकिल पर दूर तलक घुमाने ले जाता हमें। अंखुआए चने की चटपटी खिलाता और मोटरसाइकलों की पहचान बताता। जावा, एज़्दी, बुलेट आदि की हेड लाइट को देखकर पहचानने की बताई उसकी कला आज भी याद है।
अरगास बढ़ई थे और उम्र में काफी बड़े। लेकिन छोटा देख बच्चों-सा ही व्यवहार करते। विश्वकर्मा पूजा हो तो अपुन उनकी दूकान पर निगाहें लगाए रखते कि कब पूजा ख़तम हो और उनकी मिठाई, बून्दी, खीरा, केला, सेब, नारियल आदि से मिश्रित प्रसाद मिले। जैसे ही पूजा होती वे हमें ही बुलाते और रख देते गदोरी पर। हम निहाल। छोटे बच्चे को और क्या चाहिए।
इक़बाल मिडिल से गायब है। अरगास परलोक सिधारे। आज से गणेशोत्सव है, विश्वकर्मा पूजा भी आज ही। लेकिन वे दोनों नहीं हैं, जिनमें सख्य-भाव था और जो अनन्त खुशियां देते थे। वे चाहे नहीं, लेकिन उनकी स्मृतियाँ साथ हैं। वे ही अश्रु ला रही हैं।      

Wednesday, 16 September 2015

सुबह रेलवे स्टेशन पर अकस्मात अनिल मिल गया। २५ वर्षों बाद उसे देखकर हर्षाविर्भाव हुआ। होना ही था। जिसके साथ फायरिंग की, छिपकर समोसे खाए और कॉलेज जाते टेम्पो-ट्रेन में गलमस्ती की वह इतने दिनों बाद वह भी अनायास दिख जाए तो कौन होगा जिसे खुशी न होगी? तो पत्रिका पढ़ने में तल्लीन उसे देख आवाज़ दी हमने। वह नहीं पहिचाना हमें। विस्मय से देखा मानो जानना चाहता हो कि कौन है ये अजनबी। बड़ी गूढ़ आँखों से झाँका हमारे भीतर। उसका देखना ऐसा था कि एक बारगी तो अपुन भी सहम गए, कि भावातिरेक में कहीं आँखें तो न फिसल गईं। फिर यह थोड़ा मुटियाया है, शरीर भी भरा है, डील डौल भी कम नहीं, फिर भी फेस-तो-फेस है, हमने कहा, "अनिल?"
अबकी आवाज़ ने जैसे स्मृति-किवाड़ को खटके से खोल दिया हो उसके।
"अरे! तूँ ?" और लिपट गया वह। काफी देर तक कंधों से लिपटा रहा। बताया कि कोई सुपर फ़ास्ट पकड़ने के चक्कर में उतरा है और थोड़ी देर में आने वाली है वह।
ठीक वही कॉलेज के दिनों वाली जिद करके वह स्टेशन के बाहर के एक होटल में ले आया वहां जलपान मंगाया। बताया कि वह रामानुजगंज में सीएएफ़ में प्लाटून कमाण्डर (पीसी) है। उसने खूब सारी अंतरंग बातों को साझा किया और यह भी बताया कि कैसे छत्तीसगढ़ के घनघोर जंगलों में अपनी पोस्टिंग के दौरान नक्सलियों से लोहा लिया। कई बार वह नक्सलियों से आमने-सामने का वार किया और हर बार भारी पड़ा। उसे वीरता पुरस्कार भी मिला है। वह थोड़ा दुखी था कि मुठभेड़ में नक्सलियों को मार गिराने के बाद भी उसका वीरता पदक पेंडिंग है और फाइलों में धूल खा रहा है। वह जानता है कि दुखी हो कर या तनाव में रहकर कुछ नहीं पा सकता। नक्सलियों की तरह बगावती सोच भी वह प्रजातन्त्र के लिए खतरनाक मानता है। उसे तो देश-प्रेम है। सिस्टम में पोल है तो वो क्या करे ? वह तो अर्जी बढ़ाएगा। हाथ जोड़ेगा और नहीं तो कोर्ट जाएगा। उसे न्याय पर भरोसा है। आँखों की कोर पर हथेली ले जाकर उसने यह कहते विदा लिया,
वतन परस्ती का जज्बा जवान रखते हैं, बहुत सम्हाल के हम पुरखों की शान रखते हैं।
कह दो मुल्क के नापाक ठेकेदारों से, हम अपने सीने में हिन्दुस्तान रखते हैं।
अलविदा दोस्त फिर मिलेंगे…   
 

Tuesday, 15 September 2015

               बदलती सोच

नहीं टूटी चिड़ियों की लयबद्धता
तितली भी कहाँ तोड़ी नियम
गिलहरी वैसे ही रच रही माया
पुष्पों ने भी कहाँ बदला चोला
सब वही तो है जो चला आ रहा है
हाँ, बदली है कुछ ज़रूर
और वह है सोच
कि तोड़ दो नियम एकजाई हो
कि बन्धन है गुलामी
चिड़ियों की लयबद्धता
तितलियों का फर्फराना
गिलहरी का फुदकना
चाहते हो रोकना
इसके लिए पिंजड़ा लिए
घूम रहे हो

Thursday, 10 September 2015

 
 
 
 
 

                                    कल का अपडेट

छत्तीसगढ़ी फिल्मों की अजन्ता गुफा में मद्धिम रोशनी का जो हल्का-सा खाका कल हमने खींचा था, उस पर कुछ अच्छे विमर्श छूटे हैं, उनका स्वागत करते हैं। केवल इसलिए नहीं कि इसे लेकर संजीदगी दिखी, बल्कि इसलिए भी कि छत्तीसगढ़ के बाहर भी यहाँ की फिल्मों के बारे में लोग जानकारी रखते हैं और जानना चाहते हैं। रंज केवल इस बात का है कि छालीवुड से जुड़े लोगों का चित्त क्यों नहीं फरिया रहा है? ओडिशा से में रहते हुए भी राजकुमार सिंह यहाँ की फिल्मों के प्रति जिज्ञासु बने हुए हैं, लेकिन यहाँ? आखिर दीप चटर्जी जैसे चिन्तक डॉक्टर क्योँकर कहने मज़बूर हुए, कि पाउडर थोप के, नया कपड़ा पहन के, जलपरी दिखा के फिल्में नहीं चलतीं. भूत-पिशाच भी नहीं। प्यार-रोमांस, जमींदारी, अलगाव, आतंकवाद, गाँव से कटता आदमी शहर में भटकता आदमी, युवा समस्या, टूटते घर, जुड़ते रिश्ते इस तरह कई प्लॉट्स हैं, लेकिन पटकथा नहीं. डॉ. चटर्जी ने जो यह कहा, कि रंगमंच को ही एक दृष्टि मिलती तो कुछ और अच्छी फिल्में मिल जातीं, चिन्तनीय हैं। रेल्वे पुलिस के सन्तोष दुबे जी ने इन फिल्मों में घालमेल की समस्या की ओर इशारा किया है तो रंगकर्मी हरिश्चन्द्र, कवि संजीव तिवारी व ए. त्रिनाथ राव ने किन्हीं-न-किन्हीं रूपों में स्वीकार किया है, कि हमें अपनी फिल्मों में चमत्कारी बदलाव लाना होगा और इसके लिए नए सिरे से चिन्तन-साधना-कर्म जरूरी है। तभी तो संजीव जी ने अपनी वाल पे इसे साझा भी किया है, जिस पर युवा कवि किशोर कुमार तिवारी ने गंभीर चिंतन की आवश्यकता पर बल दिया है।

उम्मीद है कि ज़रूर छत्तीसढ़ी फ़िल्मों का नया अध्याय शुरू होगा। पटकथा के साथ ही ओरिजनल छत्तीसगढ़ माटी की खुशबू महक उठेगी रजत पट के सामने ताली-सीटियों की अनुगूंज बॉलीवुड से लेकर हॉलीवुड तक सुनायी देंगी।

Wednesday, 9 September 2015

                          छत्तीसगढ़ी फिल्मों की छाप क्यों नहीं

आखिर इतना पैसा-कौड़ी खर्चने और नामी-गिरामी कलाकारों के बावजूद छत्तीसगढ़ी फिल्में कुछ छाप क्यों नहीं छोड़तीं ? मोर छइहां भुइंया और दो-एक फिल्मों को छोड़ दें, तो याद नहीं, कि किसी और छत्तीसगढ़ी फिल्म ने मेरा मन मयूर कर दिया हो। झूठी पीठ ठोंकने वाली बात हो तब तो कुछ नहीं, लेकिन कटु सचाई है, कि हमारे सिनेमा को कोई भाव नहीं मिलता।
एक बार मुंबई के बिड़ला मातोश्री सभागार में पत्रकारों के एक कार्यक्रम में बगल बैठे बॉलीवुड अभिनेता गूफी पेन्टल से हमने कहा, कि आप छत्तीसगढ़ी फिल्मों की ओर जरा देखिए. हो सकता है इससे सिनेमा की दुनिया को कुछ नायाब मिल जाए। क्योंकि छत्तीसगढ़ में एक-से-एक टैलेंटेड लोग भरे पड़े हैं। आखिर चन्दैनी गोंदा, चरनदास चोर से लेकर नवा बिहान तक अनेक नाटकों ने राष्ट्रीय स्तर पर अपने नाम का लोहा मनवाया कि नहीं ? फिर अनुराग बसु से लेकर नत्था को देख लीजिए, क्या धाक जमाई इन लोगों ने छत्तीसगढ़ की।
उसके बाद देखा; गूफी पेन्टल, मुकेश खन्ना आदि यहाँ आए। फिल्म भी बनी। किन्तु रे दुर्भाग्य ! वे भी इसे चरागाह ही समझे! लपेटे और चले। कितना पैसा तो डूब गया। क्या छत्तीसगढ़ी सिनेमा का दुर्भाग्य है?
आप देखिए उस नौजवान राजीव भाटिया को। प्रीतीश नन्दी के सीरियल से डायरेक्शन का काम जो शुरू किया तो परेश रावल, केतन मेहता आदि से लगायत अनेकों प्रसिद्ध लोगों की सीरियलों का निर्देशन किया। उनने हरियाणवीं में फिल्म बनाई पगड़ी द ऑनर और चमक उठे। इस फिल्म को सर्वश्रेष्ठ हरियाणवीं फिल्म पुरस्कार दिया गया। राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों के ६२ वर्षों का इतिहास था जो इस फिल्म को पुरस्कार योग्य चुना गया।
तो छत्तीसगढ़ी फिल्मों में क्यों नहीं निकल रहा कोई तीरंदाज़? जबकि देखा जाये तो छत्तीसगढ़ी फिल्मों के लिए खर्च-बर्च खूब हो रहा है। सुना हूँ सरकार भी मदद कर रही है। फिर अनेकों राजसत्ता से लगे लोग और अफसरान छत्तीसगढ़ी सिनेमा से जुड़े हैं। फिर भी यह हश्र ?
हम कहते हैं; अंतराष्ट्रीय न सही, कम-से-कम राष्ट्रीय पुरस्कार के लायक तो हों हमारी फिल्में। वर्ना तो समझा जायेगा कहीं-न-कहीं गड़बड़ी ज़रूर है।
आखिर हमारी फिल्मों का अच्छा इतिहास है। १९६५ में छालीवुड का जन्म हो चुका था। और उस कहि देबे सन्देश में संगीत के भगवान रफ़ी साहब ने गाना भी गाया था।

Tuesday, 8 September 2015

                                        समीक्षा

दुनिया में अशांति व फ़साद की जड़ इन्सान का आपसी अविश्वास और नस्ली रंगभेद है। बराबरी, औरत का मर्द की तरह जीना, उसकी स्वच्छन्दता और बेमेल शादी आदि को लेकर डॉ. सत्तार की सोच कैसे भरभराती है, इसे लेकर पाकिस्तान की कहानीकार नीलोफर इक़बाल ने 'बराबरी' में अच्छी मीनाकारी की है।

इस कहानी में डॉ. सत्तार प्रगतिशील सोच के इन्सान हैं, जो मर्दों की तरह ज़िन्दगी जीने, अकेले रहने और अपने फैसले खुद करने वाली बेटी मरियम की राह में रोड़ा नहीं बनते. यहाँ तक, कि तमाम सामाजिक बन्दिशों, बेगम मिसेस सत्तार की बातों को भी अनसुना कर उसे पढ़ने अमेरिका भेज देते हैं। वहां वह एक अमेरिकी से शादी कर लेती है। इसकी सूचना घर में मिलती है तो कोहराम मच जाता है। मिसेस सत्तार सारा दोष अपने शौहर डॉ. सत्तार पर मढ़ती हैं। किन्तु वे समझाते हैं, कि दुनिया प्रगति कर रही है। क्या हुआ जो उसने एक अमेरिकी से शादी रचा ली। ले-दे कर वे चुप होती हैं। अब वे बेटी-दामाद को देखने लालायित हैं। वह वर्षों नहीं आती है, तो उलाहना देते हैं, कि तुम अपने माँ-बाप के मरने पर ही आना।

अंततः वह खबर करती है, कि दामाद के साथ पहुंच रही है। स्वागत की तैयारी शुरू हो जाती है। गैर मुल्की नफासत पसन्द होते हैं इसलिए कमरों की नफ़ीस सजावट होती है। घर में ईद का समां बांधने वाला था। समय पर बेटी-दामाद को लाने घर वाले एयरपोर्ट पहुँचते हैं. वहां इंतज़ार के बाद दोनों दिखायी देते हैं। बेटी मरियम तो ठीक है, लेकिन दामाद एरिन मानो सबकी उम्मीदों पर पहाड़ पटक देता है। उसकी मुस्कुराहट भयानक थी। गुफाओं जैसे नथूने और स्याह होंठों के अन्दर लम्बे-लम्बे सफ़ेद दांत.. मानो समाज में दफ़्न हो जाएगी सत्तार परिवार की इज़्ज़त। देखते ही मरियम की बहन बुदबुदाती है, ''शुक्र है मेरी फ्रेंड्स नहीं आ रही हैं।" मिसेस सत्तार तो टूट ही पड़तीं हैं शौहर डॉ. सत्तार पर, " जलील कर दी कमीनी ने।" भाई व्यंजना में है, " हो सकता है उसकी रूह बहुत खूबसूरत हो।" तो जवाब मिलता है, "अचार डालना है रूह का? घर पर रिश्तेदार दांत गाड़े बैठे हैं।"

अन्त में प्रगतिशील पिता डॉ. सत्तार भी बेचारे बनते हैं, "सच कह रही है तुम्हारी माँ। नहीं भेजना चाहिए था लड़की को अकेले। नस्ल ख़राब कर दी बदबख़्त ने।"

Thursday, 27 August 2015

  खुशी 

उदास था मैं
कि दिखी
रो रही फूल-सी बच्ची
उठा लिया गोद में
उसके रूई-से गालों  
और गुलाबी अधरों को
हौले-से थपकाया
जैसे मिली हो दस्तक
उसके हृदय-द्वार पर
खोए पिता की
लग गई सीने से
हिचकना बंद उसका
हमारी उदासी
बदल गयी पल में
खुशियों से सराबोर हो गए दोनों

Sunday, 23 August 2015

                                           मौन-सौन्दर्य

     सोचता हूँ, भाषा न होती तो ? देखिए मूक पशुओं को, भावनाओं को कितना सुन्दर एक्सप्रेस करते हैं वे। अभी उसी दिन नीतीश बता रहा था कि वह पढ़कर आ रहा था। न्यू बसंत टॉकीज़ के सामने देखा कि रेल्वे क्रासिंग को भैसों के झुण्ड में एक भैंस अपने पाड़ा के साथ पार कर रही है। इसी बीच ट्रेन आ गई और उसकी जद में पाड़ा आ गया। छितरा गया बेचारा। मज़मा लग गया। भीड़ देख शेष भैंसें तो तितर-बितर हो गईं लेकिन उसकी माँ भैंस वहीं ट्रैक के पास बैठ गई। चुप अपने उस टुकड़े को देख रही है, जो कुछ देर पहिले ही उसकी थन से लगा आगे-पीछे हो रहा था। उसकी आँखों से अविरल धार बहने लगीं।
अभी उसी दिन मैत्री बाग़ में एक मृगछौना अपनी हिरणी माँ की पीठ अपनी निकल रही सींगों से ऐसे रगड़ने लगा कि वह उठ खड़ी हुई और लगी उसे दौड़ाने, मानो एक माँ अपने बच्चे को दण्ड देना चाहती हो। वह भी काम नहीं, छकाने लगा और अन्त में आकर लिपट गया जैसे मुआफ़ी मांग रहा हो। वह भी चाटने लगी उसे। यह मातृ-स्नेह का कैसा एक्सप्रेसन है। है न ?
अलगनी पर बैठी उस कपोती को देखा, कैसे तो बगल में प्रेंखादोला कर रहे कपोत के चिबुक को उसने अपने चंचु से सहलाया। जाने कौन सी भाषा थी कि फौरन दोनों उड़ गए, जैसे प्रणय में मगन होकर उड़े हों।
तो इन भाषाहीनों को देखिए। कितनी सुन्दर अभिव्यक्ति है इनकी। है कि नहीं ?
हमारे पास तो भाषा का वरदान है। एक-से-एक भाषा। इंटरनेशनल लैंग्वेज़ से लेकर अपनी राजभाषा हिन्दी, फिर उससे भी ऊपर अपनी मिट्टी की भाषा, याने मातृभाषा। इसके बाद भी क्या हम उन मूक पशु-पक्षियों से गलीच नहीं ? मौन-सौन्दर्य हमें उनसे सीखना चाहिए। है न?

Saturday, 8 August 2015

                                                       भोर और संध्या  

भोर से प्रेम का तात्पर्य यह तो नहीं, कि हम संध्या का आलिंगन ही विस्मृत कर दें। आखिर वह भी तो हमें बहुत कुछ समर्पित करती है। मानते हैं, कि भोर हमें नवोन्मेष से भर देता है। एक ताज़गी, स्फूर्ति और नई सोच के साथ हर दिन सूरज उदित होता है। लेकिन यही सूरज चंद घंटों में कैसा तो रौद्र रूप धरता जाता है। फुल ग्लेयरिंग में कितना परेशान करता है वह।
बेचारी उस संध्या को तो देखिए। कितने हौले-से दस्तक देती है। दिन भर जलने के बाद भी उसकी नज़ाकत। जरा निकलकर देखिए तो उसका नज़ारा। किस मन्द समीर के साथ वह हममें भीतर तक समा जाना चाहती है मानो कहती हो, चलो न जी , कुछ गुनगुनाओ भी हमारे साथ। वह भोर यदि आपको दूध में ब्रेड डुबाकर खिलाने को आमन्त्रित करता है, तो मैं भी तो चाय में टोस्ट का आनन्द देने को तत्पर रहती हूँ।  फिर वह स्निग्ध-शीतल चंदा के दर्शन भी कराती है जिसके ग्लोरी की अपनी ही छटा है। इससे हम प्यार की परिभाषा सीख सकते हैं।
वास्तव में संध्या का स्नेह तो भोर से कहीं ज्यादे है। वह शीतल से शीतलता की चलती है. इतनी कि यदि उसके साथ चलते रहे तो वह शान्त-शीतल चाँदनी की गोद में लिए चलेगी। उजली रात में उसके साथ एकांत में बैठकर आप कविता लिख सकते हैं। अम्मा-बाबूजी की यादों में दो बूँद चुआ सकते हैं। प्रियतमा को उलाहना दे सकते हैं और बच्चों के साथ खेल भी सकते हैं। अंधेरी रात हो तो भी अपनी बच्ची को पेट पर लिटाए उसे लोरी सुना सकते हैं. उसके विवाह और विदाई की कल्पना कर रो सकते हैं।
शायद यही वजह है, कि भोर में पंछी की चहचहाहट से मधुर होता है संध्या-काल का उनका कलरव . इसीलिये गिलहरी का फुदकना, तितली का फरफराना भाता है। बच्चे भी तो इसी संध्या पर लहालोट रहते हैं। पतंग के पीछे भागना। चिड्डा-तितली पकड़ने दौड़ना। फ्राक के पीछे बुशर्ट का दौड़ना...आखिर यही संध्या तो उन्हें ललचाता है न ? और वे भागे चले आते हैं।
भोर हमें शक्ति देता है तो संध्या शान्ति। यही जीवन का फलसफा है। इसी को कहते हैं भारतीयता।

Saturday, 1 August 2015

जब 'दृष्यम्' में इतना थ्रिल है, तो पक्का जबरदस्त उपन्यास होगा ' द डिवोशन ऑफ़ सस्पेक्ट X '. आखिर जापान के अपराध-लेखक कइगो हिगाशिनो के इस नॉवेल से प्रेरित होकर ही तो निशिकान्त कामत ने इस फिल्म का निर्माण किया है। इस पर आज सुबह टाइम्स ऑफ़ इण्डिया में छपे रिव्यू और फिर चौकसे जी की समीक्षा पढ़ने के बाद दृश्य सोचा ही था, कि दीप दा का मोबाइल आ गया, कि आओ चलें।
फिल्म देखकर लगा, कि वस्तुतः भारतवर्ष की सोच पक्के तौर पर जापान की सोच से अलहदा है. वहां के साहित्य में इल्लूसियनिस्म दिखाई देता है। लगता है इसीलिए जापानियों का मायालोक हमारे यहाँ के खड़ंजा की भांति है। हम पक्की सड़क पर भी गिरते हैं और वे खड़ंजा पर दौड़कर भी 'रेड बेल्ट' तक पहुँचते हैं। 'दृश्यम' में अनेक चित्ताकर्षक और मोहक चित्र हैं जो प्रकृति की सुंदरता को अनावृत्त करते हैं. लेकिन जो सबसे बड़ी बात है वह है व्यक्ति का अपने परिवार की सुरक्षा के प्रति उत्तरदायित्त्व और परिवार का भी अपने मुखिया से इस प्रकार सम्पृक्त हो जाना कि आँखों के भाव से ही वे अपने कर्त्तव्य-बोध से जड़ित हो जाएं। फ़िल्म का नायक विजय सालगांवकर अपनी पत्नी और २ बेटियों के छोटे-से परिवार के साथ खुशहाल है। सीमित आय में छोटी-छोटी खुशियों से ही सही, लेकिन अपने परिवार को वह संस्कारों के आलोक में दीप्त रखने की कोशिशों में लगा रहता है। सच्चाई, ईमानदारी, नेकनियती उसकी आभा है, जिसके नेपथ्य में उसकी पत्नी-बेटियों का साथ है। यही तो है भारतीयता। वास्तविक जीवन में भी अजय देवगन की सफलता का राज भी तो उनका 'परिवार' ही है।
तथाकथित सभ्य समाज का एकलौता चिराग, आईजी सुपुत्र इस कदर बिगड़ैल और अपसंस्कृति की चपेट में है, कि वह नेचरल स्टडी पर गई विजय की बेटी का नहाते हुए चोरी से एमएमएस बनाकर उसे ब्लैकमेल करता है। यहाँ तक कि वह इतना बेख़ौफ़ कि वह उसकी माँ तक की भावनाओं को मर्माहत कर मनमानी पर उतारू है। जिसकी परिणति उसकी हत्या से होती है, जो अप्रत्याशित रूप से विजय की बेटी के हाथों हो जाती है। यहीं से शुरू होता है थ्रिल जिसमें विजय अपने और परिवार के बचाव में इलूश़न रचता है। गज़ब का इलूश़न! पोलिस चकरघिन्नी बन जाती है। सब समझते भी आईजी साहिबा बेबस हैं। नटवरलाल भी फेल। अंततः वे हथ्यार डाल देती हैं। यहाँ मानवीयता का रूप उभरता है। विजय का आईजी से माफ़ीनामा सबूत है कि उसके मन में कहीं-न-कहीं इसे लेकर पश्चात्ताप तो है लेकिन पोलिस अभी भी उसे फांसने की जुगत में है।
यह मूवी कई आयाम तो देती है, लेकिन कई पश्न भी छोड़ती है। क्या समाज में सभ्यता का आवरण ऐसा होगा जिसमें बेटे बिगड़ैल बनें? स्वछन्द होकर दूसरे की बच्चियों को बेईज्ज़त करें और बेटियां बेचारी मज़बूरी के आवरण में सिसकती रहें ? क्या करे पिता?
मूवी में वे दो बेटियां, विशेषकर छोटी ने तो कमाल ही कर दिया! विजय की पत्नी की सरलता का अभिनय भी प्रशंसा को मज़बूर करता है। और तब्बू के क्या कहने! आँखों में ममत्व का पानी और चेहरे पर पुलिस ऑफिसर की दृढ़ता एक साथ साधना मज़ाक नहीं, जिसे उन्होंने कर दिखाया। बेहतरीन।

Thursday, 30 July 2015

     समय 

बुढ़ाने लगा है समय
जा रही है उसकी जवानी
वह तरुण समय मुस्कुरा रहा है
और देखो तो
उस चंचल बाल-समय की चपलता
अपनी ही धुन कितना तो
मस्त है
उसे कहाँ परवा किसी की
समय से सिखेगा
समय की परिभाषा

Wednesday, 29 July 2015

                                                      क्या करे राकेश

राकेश की बीवी उससे रूठ कर चली गई है। मायके वाले चिट्टा चढ़ाते हैं कि वह तुझे चांटा मारा है तो छोड़ दे उसे और यहीं खेती कर। कमा-खा, यहीं रह।
राकेश कहता है कि वह गुस्से से अपनी बीवी पर हाथ उठा दिया तो क्या, प्यार भी तो करता है। फिर वह भी तो उसे ताना-बोली मारती है। वह नहीं भागा है उसे छोड़कर।
आज वह रो दिया। कहता है कि, "मेरी बीवी अच्छी है। सुन्दर है। लो आप बात कर लो। बोल दो न आ जाए।" और थमा दिया लगाकर मोबाइल।
उधर से उसकी बीवी की महीन आवाज़…रोने लगी, कि राकेश के बिना यह नहीं जी सकती लेकिन क्या करे? घर वाले कहते हैं राकेश बदमाश है। उसके पास मत जा नहीं तो मार डालेगा। और यदि गयी तो दुबारा यहाँ आना मत। चाहे कुछ भी करे वो। फिर काट दी मोबाइल।
अपुन सन्न ! क्या कहें ?राकेश चकमक देख रहा है जैसे समस्या हल हो गयी हो।
पता चला है उन लोगों ने कोर्ट में वाद दायर कर दिया है। अब क्या करे राकेश ?  
  

Monday, 20 July 2015

लड़कियों में कमियां ढूंढने वाले लोग क्यों नहीं उसमें छिपी सुन्दरता देख पाते ? कल इस पर हमनें जो पंक्तियाँ लिखीं, उस पर अनेक विज्ञजनों ने सुन्दर विचार प्रस्तुत किये।
हमारे पूजनीय श्री कौशल किशोर मिश्र जी ने इसे नजरिया न बदल पाने का नतीजा बताया है। तो योगेश पाण्डेय जी ने लिखा, कि मन की आँखें नहीं हैं आत्मा सो गयी है। हमारे साथी रंगकर्मी ललित उपाध्याय ने टिप्पणी की, कि भीतर की सुन्दरता बिरले को ही नजर आती है। वहीं क्लास में अपने परफॉर्मेंस से हमको चिढ़ाते रहने वालीं उपासना साहू का कथन है, क्योंकी ऐसे लोग खुद तो काला दिल रखते है ना। हमारे साथी प्रदीप पिल्लै ने इसे आर्थिक क्रिया से जोड़कर देखा है कि गरीबों से करीब का रिश्ता भी छिपाते हैं लोग और अमीरों से करीब का रिश्ता भी बढ़ा-चढ़ाकर बताते हैं लोग। पत्रकार साथी राजकुमार सिंह इसे सूरत नहीं सीरत देखने का परिणाम बताया तो प्रज्ञा दुबे ने कहा है, कि अरे, भगवान ने सबको दीमाग वाली आंखे दी हैं, दिल वाली नही. इसके प्रत्योत्तर में फिर राजकुमार सिंह ने लिखा कि प्रज्ञा वाली आँखें भी हैं, महसूस तो करो। बालपन से
पत्रकारिता की शौक़ीन रही सुचित्रा कहती है कि सत्य वचन चाचाजी, लड़कियों की सीरत और संस़्कार किसी को नही दिखते सिर्फ सूरत की वजह से नकार दी जाती है लड़कियाँ यही कब बदलाव आयेगा इस नजरिये में. सारिका दुबे ने लिखा, सीरत से इन्हें क्या बतलब बस सूरत देख कर मरते हैं।
इन सब टिप्पणियों से हम बाग-बाग हैं। इसलिए, कि हमारा लिखना व्यर्थ हुआ ! देखिए न, एक असुंदर रचना में भी इतने लोगों ने कितने प्रकार से तो 'सुन्दरता में भी सुन्दरता' की तलाश कर ली है। हम देख रहे हैं वह स्वप्न जब यमुना का हरा पानी गंगा के उज्ज्वल जल से मिलकर सरस्वती में मिलकर दूध की तरह पवित्र और निर्मल होकर एक हो जाएगा जिसके जल में हमारी बच्चियां किल्लोलें करेंगी। उन्हें उनकी चमड़ी से नहीं, चरित्र और भीतरी सुन्दरता से पहिचाना जाएगा। 
जितने मनीषियों ने इस रचना को लिखे किया उनके प्रति भी हमारा सिर नत है।

Saturday, 20 June 2015

हमारे प्यारे देश को कई नामों से जाना जाता है. फॉरेन में इंडिया, तो अपने यहाँ हिन्दुस्तान और भारत कहने का प्रचलन है। देश के सो कॉल्ड अंग्रेजीदां भी इसे इंडिया कहकर ही फूलते हैं। लेकिन अपुन तो पढ़ते आए 'भारतवर्ष'. प्राइमरी में राष्ट्रीय दिवस के दिन जब हम तिरंगा लेकर निकलते, तो सोहनलाल द्विवेदी की कविता 'यह भारतवर्ष हमारा है, हमको प्राणों से प्यारा है' का सामूहिक गान करते कदमताल करते थे। तो भारतवर्ष को लेकर बार-बार जिज्ञासा होती। भारत तो भरत के नाम पर पड़ा, लेकिन साथ में यह वर्ष क्यों?
बाद में लीलाधर जूगड़ी की 'उत्तरप्रदेश' में सम्पादकीय पढ़ी. जिसमें हल था, कि भारत भी एक वर्ष है। वर्ष का अर्थ होता है 'खण्ड'. एक अर्थ इसका 'गुच्छा' भी है। भारत-खंड भारत की जनता और इस भूखंड की वनस्पतियों सहित अन्य प्राण-प्रजापतियों का एक ' पुष्प गुच्छा' है।
कितना सुन्दर लगता है न इसीलिए अपने महान देश को भारतवर्ष कहना। यह फूलों का गुलदस्ता ही तो है, जिसमें भांति-भांति के फूल सजे हैं।

Monday, 1 June 2015

कुछ मित्रों को गेहूं पीसने वाली हाथ-चक्की की याद आ रही है। कोई स्त्रियों द्वारा पीसती चक्की की तस्वीर अपलोड कर रहा है तो किसी को इसी बहाने अपने पुराने दिनों तो किसी को अपनी माता द्वारा चक्की के पिसे आंटे से बने रोटी खाने की याद आ रही है।
हम सोच रहे हैं उस स्त्री की पीड़ा, जो इन चक्कियों को पीसा करती थीं। तब वे रात्रि के अंतिम प्रहर के पहिले ही जग जाया करती थीं। केवल चक्की चलाने के लिए। भोर होने से पूर्व उन्हें बाहर दिशा-मैदान भी जाना होता था। बड़े-से परिवार के लिए सेइयों गेंहू पीसना उनकी मज़बूरी थी. पति कमाने के लिए बाहर, घर में बड़ा-सा परिवार। दूर का मायका, घूंघट की ओट, कभी पिता-भाई-भतीज आ भी गए तो कुछ देर की मुलाकात। बेचारी स्त्री ! गेंहूँ पीसते पसीने-पसीने हो जाती थी। तब गीत गाकर मन बहलाव होता था। इस गीत में गेंहू पीसती स्त्री की विरह वेदना देखिए,
'बड़े-बड़े जंतवा के छोटे-छोटे दंतवा हो ना, पिया अपने त गइलें कलकतवा हो ना, पिया अपने त गैइलें कलकतवा हो ना। '
इसमें वह गेंहूँ पीसने की पीड़ा के साथ ही पति के साथ न होने का दरद भी बयां कर रही है कि वे तो कलकत्ता चले गए इस पीड़ा को कौन हरेगा? 
हमें सहसा 'रेलिया बैरन पिया को लिए जाय रे.. गाने वाली उस स्त्री के विरह के अनुताप का भास हुआ जो बेचारी पति के लौट आने के लिए अनेकों जतन की मनौती मांग रही है।
हमने भी खाई है अम्मा के हाथ की वह रोटी जिसे पीसते-पीसते उनके हाथ पर घट्ठा पड़ गया था। कई बार पसाई में हमने उसका साथ दिया था, लेकिन छोटे हाथ साथ क्या देते, अम्मा का मन बहलाव हो जाता था। उस जिजीविषा को प्रणाम।  

Sunday, 31 May 2015

सामने गौरैया के कई जोड़े फुदक रहे हैं। वह छोटी-सी भी दिख रही है, क्या तो चोंच चल रहे हैं उसके! मानो धरती उसी की हो। क्या फंख फड़फड़ा रही है, जैसे हवा को चुनौती दे रही हो।
आज सवेरे डॉ. हरिदास वर्मा की याद आयी। मर्मस्पर्शी कविताएँ लिखा करते थे। ८० के ऊपर होने के बावज़ूद कभी निष्क्रिय नहीं हुए। साइकिल से चलकर हमसे मिलने आते रहे। अपने तीन पुस्तकों की भूमिका हम अदने से नाचीज़ से लिखवाई। एक दिन उनकी धमनियों के रक्त ने हृदय को सप्लाई बंद कर दिया। चल बसे बेचारे, सेक्टर-९ हॉस्पिटल में। कहा करते थे, कि डॉक्टरों ने उनकी पत्नी को कैंसर बताया है और देखिए, कि पत्नी को कुछ नहीं हुआ और उन्हें छोड़ वे ही निकल लिए। तो हम उन सीधे-सच्चे, सरल कवि की अर्धांगिनी का हाल जानने उनके घर पहुंचे। द्वार पर उनके दामाद आए, देखते ही आवाज़ दिए, कि शुक्ला जी आये हैं।
भीतर से लिवा लाने का अधीर स्वर सुनाई पड़ा।
हम अंदर कमरे में गए, तो वे बेचारी अध्कपटे बैठी थीं। सामने कुर्सी पर बैठे तो दिखा उनकी एक आँख बंद है और दूसरे में पानी चालू है। उनने हमारा हाथ पकड़ लिया,
'शुक्ला जी मेरी तो आँखें चली गईं। दोनों। अब कुछ नहीं दिखता। बस धुँआ-धुँआ।' और वे मायूस हो गईं। सामने डॉ. हरिदास जी की मुस्कुराती तस्वीर लगी थी। उनकी ओर देखा। याद आया किस उत्साह से वे इन वृद्धा की तस्वीर सीने से चिपटाए लाए थे, कि उनकी किताब में उनके साथ उनकी पत्नी लखराजी देवी की फोटो भी छप जाए। अपनी हर किताब में वे इन्हें नहीं भूले। बहुत सारी बातें हुईं उनसे। बोलने लगीं, कि आप बहू को लेकर आइए, एक बार देखना चाहती हूँ उन्हें। बड़ी तारीफ़ करते थे बर्मा जी। मैंने हाँ कहा और चलने को उठा, तो बांह कस कर पकड़ लीं और दामाद से कहीं, शुक्ला जी के लिए आम लाइए। बच्चों के लिए भी। फिर एक झोले में पके आम अपने पेड़ का तोड़ा हुआ डिक्की में रखवा दीं।
चलने को हुए तो रोने लगीं। उनकी आँखें चालू थीं, हम किसे दिखाएँ अपने आंसू जो डॉ. हरिदास के लिए कम इन मर्मस्पर्शी, ममता से भरी साहित्यकार की अर्धांगिनी के लिए आँखों की कोर तक पहुँच गए हैं। ईश्वर उन्हें दुखों दे अम्बार से निकालकर एक नयी रोशनी दें। वे खुश रहें।    



 

Thursday, 14 May 2015

उस माँ के बारे में सोच रहा हूँ, कितनी पुलकित होगी वह इन दिनों. बेचारी के पति बीच रस्ते दगा दे गए. एक बेटा था, उसे पढ़ाने की जिम्मदारी थी. कैसे करे? वह दृढ़निश्चयी थी, ठान लिया माँ के साथ पिता का दायित्व भी निभाऊंगी. उसने जज्बे के साथ बेटे को पढ़ाया और पंजाब टेक्नीकल यूनिवर्सिटी में दाखिला दिला दिया. वह पढ़ कर २०१४ में भिलाई स्टील प्लांट में ट्रेनिंग के लिए आया और ट्रेंड होने के बाद नौकरी के लिए भटकने लगा. हमसे एक होटल में मिला तो नौकरी में सिफारिश करने का निवेदन किया. लेकिन नौकरी रखी हुयी तो नहीं है न? सो वह चला गया. गांव में उसकी माँ ने उसका हौसला और मनोबल बनाये रखा. उसने कंबाइंड डिफेन्स सर्विस (सीडीएसई) का एग्जाम दिया और कमाल देखिए कि सेलेक्ट हो गया. सेकंड लैफ्टिनेंट के पद पर उसकी नियुक्ति हुयी है. बड़े अधिकारी का पद है यह. जुलाई १५ से नवल एकेडमी केरल में उसकी ट्रेनिंग शुरू होगी. उसका नाम है सिद्धांत प्रधान, अंजना जी वह वंदनीया हैं जिनने इस सपूत को जन्म दिया. बिहार का नवादा है इनका गांव.

Wednesday, 13 May 2015

               नियम  
गति का नियम- दम तोड़ता
आदमी हांफ रहा है बेदम भाग रहा है
हवाई जहाज पकड़ने बेताब देखो न
गिद्ध ऊपर से कैसा तो चिढ़ा रहा है
मानो बिल्ली के नाखून से चिड़िया
चिंचिया रही है डर से नहीं
अपने डैने पसार रहा है वह बाजों
का राजा फंदे से अनभिज्ञ
पानी का जहाज चला
और डूब गया सागर में 
हांफता-भागता आदमी फिर भी
रहा है तोड़ गति का नियम बद्ध है
                             -शिवनाथ शुक्ल 

Tuesday, 12 May 2015

सचमुच 'पीकू' का कोई तोड़ नहीं. बेंगॉली, अंगरेजी और हिन्दी मिश्रित भाषा ने एक नयी अनुभूति दी, तो अभिनय-कला ने अलग ही छाप छोड़ी। परसों के टाइम्स ऑफ़ इंडिया और कुछ दिन पहले रमेश उपाध्याय की रिव्यू के बाद फिल्म पर दिल आया ही था, कि कल डॉ. दीप चटर्जी ने फोन कर बुला ही लिया इसे देखने. अपुन का पेट गड़बड़ था, गुड़ुम-मुड़ुम हो रहा था, लेकिन चल दिए. अब वे ठहरे खानेपीने के शौक़ीन, पीवीआर में घुसते ही आर्डर दे दिए, गरमागरम समोसे से लेकर वेज रोल और कुछ स्नैक्स आदि का। खाने से उन्हें मना नहीं किया जा सकता, सो डरते-डरते जो होगा देखा जायेगा की तर्ज़ पर खा ही रहे हैं कि क्या देखते हैं कि 'पीकू' के 'बाबा' मोशन के प्रॉब्लम से परेशान हैं. यह देखते ही और घबरा गए हम, लगा अपना भी न गड़बड़ा जाये. लेकिन अमिताभ बच्चन ने जो अभिनय दिखाया उसने तो ऐसा लोटपोट किया कि पेट में बल पड़ गए, मेदा मज़बूत होने लगी. फाइनली जब फिल्म देखकर निकले तो हाजमा ठीक हो गया था और रात एक पत्रकार मित्र के यहाँ हुयी पार्टी में भी खाने में परेशानी नहीं हुयी. आज सवेरे भी मोशन ठीक हुआ, वर्ना तो दो-तीन दिनों से दिन भर तलब लग जाती थी, काम में मन नहीं लगता था. परसों भी खुलकर न होने से झुंझला गया था, यहाँ तक कि कल ऑफिस में एब्सेंट होना पड़ा. देखा जाए तो कब्ज़ियत ही शरीर की सारी समस्याओं की जड़ में है. अपने यहाँ तो राजवैद्य से लेकर आज के डॉक्टर तक इसके निदान में अच्छा पैसा कमाते हैं . देखिए शुजीत बाबू ने इसीमें क्या खूब कमाल कर दिया. अमिताभ बच्चन की तो क्या कहें, पीकू बनी दीपिका पादुकोण और इरफ़ान ने भी कम प्रभावित नहीं किया. कब्ज़ का मनोविज्ञान बड़ा बारीकी से पकड़ा है निर्माता ने . न मारधाड़, न कानफोड़ू गीत-संगीत, न सेक्स न कोई और तड़का. बस पीकू, उनके बाबा और टैक्सी ट्रेवल्स मालिक ने पूरी फिल्म को बांध दिया. कोलकाता की सड़कें, ब्रिज, गलियां, मोहल्ले, बसें, ट्राम्स, रोसोगुल्ले, साइकिल चलता वृद्ध, अनेक दृश्य देखकर रोमांचित हुआ, कभी इन जगहों पर घूमा जो था. तो दीप दा ! आपको धन्यवाद, हमारा हाजमा ठीक करने के लिए भी .